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Wednesday, 3 June 2020
Tuesday, 2 June 2020
माय फेथफुल गुडविन
जोशिया
जॉन गुडविन
वह
भाग्यवान आशुलिपिक जिन्हें स्वामी विवेकानन्द कहते थे “माय फेथफुल गुडविन”
(2 जून, गुडविन की पुण्य तिथि पर विशेष)
स्वामी
विवेकानन्दजी के विश्वप्रसिद्ध भाषण लिखने का श्रेय ‘जोशुआ जॉन गुडविन’ को है।
स्वामीजी उन्हें बड़े प्रेम से कहा करते थे- “मेरा
निष्ठावान गुडविन (My faithful Goodwin)”। गुडविन का जन्म 20, सितम्बर,
1870 को इंग्लैंड के बैथेस्टोन में हुआ था। उनके पिता जोशिया
गुडविनजी भी एक आशुलिपिक (stenographer) एवं सम्पादक
थे। गुडविन ने भी कुछ समय पत्रकारिता की, पर सफलता न मिलने
पर वे ऑस्ट्रेलिया होते हुए अमेरिका आ गए।
स्वामी
विवेकानन्दजी के सन 1895 में न्यूयार्क प्रवास के दौरान एक ऐसे आशुलिपिक की
आवश्यकता थी, जो उनके भाषण ठीक तरह से और तेजी से
लिख सके। इसके लिए कई लोग लगाए गए, पर इस कसौटी पर केवल
गुडविन ही खरे। 99 प्रतिशत शुद्धता के साथ 200 शब्द प्रति मिनट लिखने में गुडविन
को कौशल प्राप्त था, यह उनकी विशेषता
थी। स्वामी विवेकानन्दजी के भाषणों को सुनकर उसे शुद्धता के साथ तेजी से लिखने में
माहिर गुडविन इसके पहले कई वरिष्ठ एवं प्रसिद्ध लोगों के साथ काम कर चुका था। अतः
उसे उचित पारिश्रमिक पर इस कार्य के लिए नियुक्त कर लिया गया, पर स्वामीजी के भाषण सुनते-सुनते गुडविन का हृदय परिवर्तन हो गया।
उन्होंने पारिश्रमिक लेने से स्पष्ट मना कर दिया और अपनी सेवाएं नि:शुल्क देने
लगे। उन्होंने अपने एक मित्र को लिखा, “मुझे अब पैसा
मिले या नहीं, पर मैं उनके प्रेमजाल में फंस चुका हूं। मैं
पूरी दुनिया घूमा हूं। अनेक महान लोगों से मिला हूं, पर
स्वामी विवेकानन्द जैसा महापुरुष मुझे कहीं नहीं मिला।”
एक निष्ठावान
शिष्य की तरह गुडविन स्वामीजी की निजी आवश्यकताओं का भी ध्यान रखते थे। वे उनके
भाषणों को आशुलिपि में लिखकर शेष समय में उन्हें टाइप करते थे। इसके बाद उन्हें
देश-विदेश के समाचार पत्रों में भी भेजते थे। स्वामीजी प्रायः हर दिन दो-तीन भाषण देते थे। अतः गुडविन को अन्य
किसी काम के लिए समय ही नहीं मिलता था। सन 1895-96 में स्वामीजी ने कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग और राजयोग पर जो भाषण दिए,
उसके आधार पर स्वामीजी के सबसे महत्वपूर्ण ग्रन्थ बने हैं। स्वामीजी
ने स्वयं ही कहा था कि ये ग्रन्थ उनके जाने के बाद उनके कार्यों का आधार बनेंगे।
उन दिनों गुडविन छाया के समान स्वामी विवेकानन्दजी के
साथ रहते थे।
स्वामीजी भाषण
देते समय किसी और लोक में खो जाते थे। कई बार तो उन्हें स्वयं ही याद नहीं आता था
कि उन्होंने व्याख्यान या श्रोताओं के साथ हुए प्रश्नोत्तर में क्या कहा था? ऐसे में गुडविन उन्हें उनके भाषणों का सार दिखाते थे। स्वामीजी ने उसकी
प्रशंसा करते हुए एक बार कहा कि गुडविन ने मेरे लिए बहुत कुछ किया है। उसके बिना
मैं कठिनाई में फंस जाता।
अप्रैल,
1896 में स्वामीजी के लंदन प्रवास के समय भी गुडविन उनके साथ थे।
जनवरी, 1897 में वे स्वामीजी के साथ कोलकाता आ गए। गुडविन
वहां सब मठवासियों की तरह भूमि पर सोते थे तथा दाल-भात खाते थे। वे दार्जिलिंग,
अल्मोड़ा, जम्मू तथा लाहौर भी गए। लाहौर में
उन्होंने स्वामीजी का अंतिम भाषण लिखा। फिर वे मद्रास आकर रामकृष्ण मिशन के काम
में लग गए। उन्होंने ‘ब्रह्मवादिन’ नामक पत्रिका के प्रकाशन में भी सहयोग दिया। पर मद्रास (अब चेन्नई) की गरम
जलवायु से उनका स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया। अतः वे ऊटी आ गए। वहीं 2 जून, 1898 को केवल 28 वर्ष की अल्पायु में उनका देहांत हो गया। स्वामीजी उस समय
अल्मोड़ा में थे। समाचार मिलने पर स्वामीजी के मुँह से निकला, “मेरा दाहिना हाथ
चला गया।” ऊटी में ही स्वामी विवेकानन्द के
इस प्रिय शिष्य का स्मारक बनाया गया है।
गुडविन इस लिखित
सामग्री को ‘आत्मन’ कहते थे।
शार्टहैंड में लिखे ऐसे हजारों पृष्ठ उन्होंने एक छोटे संदूक में रखकर अपनी मां के
पास इंग्लैंड भेज दिए थे, जिनका अब कुछ भी पता नहीं है।
इनमें स्वामीजी के भाषणों के साथ ही उनके कई भाषाओं में लिखे पत्र भी हैं।
...
Monday, 4 May 2020
Friday, 3 April 2020
Saturday, 8 June 2019
योग का वास्तविक प्रभाव कैसे दिखेगा ?
भई, ज्येष्ठ का महीना है और गर्मी का बड़ा ही जोर है। गर्मी के कारण गला सूखता है, और प्यास भी लगती है। हम अपनी प्यास बुझाने के लिए जलस्रोतों की ओर चल पड़ते हैं। जिन क्षेत्रों में पर्याप्त जल है वहां नलों तथा कूपों से बड़ी आसानी से जल मिल जाता है। जबकि अनेक स्थानों पर नदी, तालाब आदि सूखने लगते हैं। पर ऐसे समय में वह नदी, वह जलस्रोत हमें पूजनीय लगता है जो भीषण गर्मी के बावजूद हमारी प्यास बुझाता है।
सद्गुरु कबीर साहब ने भक्तिभाव के निरन्तर बने रहने के सम्बन्ध में बड़ी मार्मिक बात कही है :-
भक्ति भाव भादो नदी, सबे चले उतराय।
सरिता सोई सराहिये, जेठ मास ठहराय।।
अर्थात् भादो के महीने में तो हर नदी, तालाब लबालब भरे होते हैं; परन्तु ज्येष्ठ माह में प्रत्येक नदी में पानी नहीं होता। वह नदी सराहनीय है जिसमें ज्येष्ठ माह के दौरान भी पर्याप्त जलराशि होती है। उपर्युक्त साखी में भक्तिभाव को भादो नदी कहा गया है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि भक्ति भादो के महीने में ही प्रगट होती है, वरन भक्ति की नदी प्रतिपल, निरन्तर, सदैव प्रवाहित होती रहती है। इसलिए अपने भीतर विद्यमान भक्तिभाव का अवलोकन करना आवश्यक है कि वह कब-कब प्रगट होता है? या फिर वह भाव हमारे मन, वचन और कर्म में निरंतन प्रगट हो रहा है अथवा नहीं। सरिता सोई सराहिये, जेठ मास ठहराय।।
भारत का विश्व के लिए सर्वश्रेष्ठ उपहार है – “योग”। 21 जून को सारा विश्व “अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस” मना रहा है। भारत में भी सभी राज्यों में बड़े-बड़े मैदान से लेकर छोटे से छोटे प्रांगण में 21 जून को योगासन-प्राणायाम कर इस दिन को बड़े उत्साह और श्रद्धा से मनाया जाता है। इस दिन विशेष बात यह भी होती है कि जो लोग चादर तानकर वर्षभर सोते हैं, वे भी सुबह उठकर योग करते दिखाई देते हैं। ऐसे में क्या लाभ? सिर्फ फोटोबाजी करने के लिए आसन किया जाएगा तो भला शरीर मजबूत कैसे होगा? हमें नियमित आसन-प्राणायाम करना होगा, तभी शरीर और मन शुद्ध होगा।
फिर सवाल उठता है कि क्या शरीर के स्वास्थ्य, मजबूती अथवा सुगठन के लिए ही योग किया जाना चाहिए या फिर उसके आगे भी कुछ है। जो लोग नित्य रूप से बाग-बगीचे में एकत्रित होकर योगासन करते हैं उनके शरीर, मन, बुद्धि पर निश्चित रूप से सकारात्मक प्रभाव तो पड़ता ही है। पर केवल आसन, प्राणायाम और सूर्यनमस्कार को ही योग समझ लेना सही नहीं है।
योग के आठ अंग हैं – यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। इनमें से प्रारम्भिक दो अंगों का महत्त्व सबसे अधिक है। इसलिए उन्हें सबसे प्रथम स्थान दिया गया है। यम और नियम का पालन करने का अर्थ मनुष्यत्व का सवर्तोन्मुखी विकास है। योग का आरम्भ मनुष्यत्व की पूर्णता के साथ आरम्भ होता है। बिना इसके साधना का कुछ प्रयोजन नहीं। इसलिए यम और नियम को छोड़कर हम केवल आसन और प्राणायाम पर केन्द्रित हो जाएं तो बात नहीं बनेगी।
यम के पांच आयाम हैं : अहिंसा (अपने विचार, शब्द और कृति से किसी को भी पीड़ा नहीं देना) सत्य (विचारों में सत्यता, परम-सत्य में स्थित रहना, सत्य का पालन) अस्तेय (चोर-प्रवृत्ति का न होना), ब्रम्हचर्य (ब्रम्ह का साक्षात्कार और इन्द्रिय संयम) और अपरिग्रह (आवश्यकतानुरूप संचय)। इसी तरह नियम के भी पांच अंग हैं : शौच (शरीर और मन की शुद्धि), संतोष (संतुष्ट और प्रसन्न रहना) , तप (स्वयं से अनुशासित रहना), स्वाध्याय (आत्मचिंतन करना) तथा ईश्वर-प्रणिधान (ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण)।
“युज्यते अनेन इति योगः” अर्थात् योग जुड़ने की प्रक्रिया है। आत्मा को परमात्मा से, व्यक्ति को परिवार से, परिवार को समाज से, समाज को राष्ट्र से और फिर समष्टि से जोड़ने की साधना है योग।
योग के ऐसे अनेक सूत्र हमारे मनीषियों ने दिए हैं। हम आसन को देखकर उसके अनुरूप अपनी स्थिति तो बना सकते हैं, अपने शरीर को स्वस्थ भी रख सकते हैं पर चित्त की शुद्धि, मन की पवित्रता आदि के लिए यम और नियम का पालन तो करना ही होगा। यम-नियम को अपने आचरण का अंग बनाना होगा। तभी विश्व में योग का वास्तविक प्रभाव दिखेगा।
Monday, 1 April 2019
मनाएं अपना “भारतीय नववर्ष”
विश्व की सर्वाधिक वैज्ञानिक कालगणना का नववर्ष है - चैत्र शुक्ल वर्ष प्रतिपदा। वर्ष प्रतिपदा, गुढ़ीपाड़वा, नवसंवत्सर, संवत्सरी, चेट्रीचंद आदि नामों से मनाया जानेवाला यह वर्ष के स्वागत का पर्व काल के माहात्म्य का पर्व है। इसका एक नाम युगादी है जिसे उगादी भी कहा जाता है। युग का आदि अर्थात प्रारम्भ का दिन। इस दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना की। सृजन के साथ ही समय का प्रारम्भ हुआ। वास्तव में यह अत्यन्त वैज्ञानिक संकल्पना है। हिन्दू धर्म का नववर्ष इसी दिन प्रारम्भ होता है। हिंदी पंचांग में इस तिथि का बहुत अधिक महत्व है। यह अनेक ऐतिहासिक पलों या फिर कई घटनाओं का स्मरण करने का दिन है। वैज्ञानिक मान्यता है कि हिन्दू पंचांग व कालगणना सबसे अधिक वैज्ञानिक है।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा सृष्टि के आरम्भ का दिन है। अपनी यह कालगणना सबसे प्राचीन है। सृष्टि के आरम्भ से अब तक १ अरब, ९५ करोड़, ५८ लाख, ८५ हजार ९९ वर्ष से अधिक वर्ष बीत चुके हैं। यह गणना ज्योतिष विज्ञान के द्वारा निर्मित है। आधुनिक वैज्ञानिक भी सृष्टि की उत्पति का समय एक अरब वर्ष से अधिक बता रहे हैं। भारत में कई प्रकार से कालगणना की जाती है। युगाब्द (कलियुग का प्रारंभ) श्रीकृष्ण संवत्, विक्रमी संवत्, शक संवत् आदि। वर्ष प्रतिपदा का दिन एक प्रकार से मौसम परिवर्तन का भी प्रतीक है। बसंत ऋतु का आरम्भ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है। यह उल्लास, उमंग, खुशी तथा चारों ओर पीले पुष्पों की सुगन्ध से भरी होती है। इस समय नई फसलें भी पककर तैयार हो जाती हैं। नक्षत्र शुभ स्थिति में होते हैं किसी भी कार्य को प्रारम्भ करने का शुभ समय चैत्र शुक्ल प्रतिपदा ही होता है।
कहा जाता है कि इसी दिन सूर्योदय से ब्रहमाजी ने जगत् की रचना प्रारम्भ की। २०७५ वर्ष पहले सम्राट् विक्रमादित्य ने अपना राज्य स्थापित किया था जिनके नाम पर विक्रमी सम्वत् आरम्भ हुआ। इसी दिन लंका विजय के बाद अयोध्या वापस आने के बाद प्रभु श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ था। अतः यह दिन श्रीराम के राज्याभिषेक दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। शक्ति और भक्ति का प्रतीक नवरात्रि का पर्व भी इसी दिन से प्रारम्भ होता है। एक प्रकार से नवरात्रि स्थापना का पहला दिन यही है। सिखों के द्वितीय गुरू अंगददेवजी का प्राकट्योत्सव भी मनाया जाता है। स्वामी दयानंद सरस्वती ने इसी दिन आर्य समाज की स्थापना की थी। सिन्ध प्रांत के समाज रक्षक वरूणावतार संत झूलेलाल इसी दिन प्रकट हुए। अतः यह दिन चेट्रीचंद के रूप में सिंधी समाज बड़े ही उत्साह के साथ मनाता है। पूरे देशभर में सांस्कृतिक समारोह का आयोजन किया जाता है। झांकिया आदि निकाली जाती हैं। विक्रमादित्य की भांति उनके पौत्र शालिवाहन ने हूणों को परासत करके दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने के लिए शालिवाहन सम्वत्सर का प्रारम्भ किया। सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशवराम बलिराम हेडगेवार का जन्म हुआ था।
अपनी कालगणना हिन्दू जीवन के रोम-रोम एवं भारत के कण-कण से अत्यंत गहराई से जुड़ी है। भारत की सामान्य ग्रामीण जनता भी अच्छी तरह से जानती है कि अष्टमी कब है या नवमी कब है। देश का किसान व गरीब जनता भी चन्द्रमा की गति से परिचित होता है। हिन्दू नववर्ष के दिन हिन्दू घरों में नवरात्रि के प्रारम्भ के अवसर पर कलश स्थापना की जाती है। घरों में पताका, ध्वज आदि लगाये जाते हैं तथा पूरा नववर्ष सफलतापूर्वक बीते इसके लिए माता-पिता सहित सभी बड़ों का आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। लोग नौ दिनों तक फलाहारी व्रत रहकर माँ की आराधना करते हैं तथा उनका पुण्य प्राप्त करते हैं।
आइए, हम अपना नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन जो इस वर्ष 6 अप्रैल को है, मनाएं और यह सन्देश घर-घर पहुंचाएं।
Tuesday, 1 January 2019
युवा और गणतन्त्र
26 जनवरी को भारत के लिए गणतांत्रिक व्यवस्था स्वीकार करके भारत की जनता ने आगे बढ़ने का संकल्प प्रस्तुत किया था। संविधान बना जिसमें इस विराट् राष्ट्र का जन अधिकार पत्र देखा जा सकता है। जनवरी में ही ‘युवा दिवस’ आता है। स्वामी विवेकानन्द की मान्यता थी कि यदि सर्वश्रेष्ठ मानव का जन्म हो सकता है तो वह भारत के गाँव में ही हो सकता है, जहाँ आधे-से देवता और आधे-से भगवान रहते हैं।
युवा शब्द ‘यु’ धातु से बनता है जिसका अर्थ है- मिश्रण और अमिश्रण। देश और दुनिया की अनेक समस्याएँ होती हैं। युवक उनमें से एक के साथ जुड़ कर और अन्य से दूर हट कर उसका समाधान खोजता है। इसी क्रम में एक-एक कर के वह सभी समस्याओं का हल खोज लेता है। इसलिए वह युवा है। जितनी बड़ी चुनौती होती है, वह उतना ही बड़ा हो जाता है- जैसे समुद्र पार करने के लिए हनुमान ‘कनकमूथराकार’ हो गए थे।
युवा को तरुण भी कहा जाता है। तरुण का अर्थ है- तैराक, तैर कर पार करने वाला। वेद में आता है-
अश्मनवती रीयते संरभ्ध्वम्। उत्तिष्ठत प्रतरत सखायः।
पथरीली नदी बह रही है, उसमें तैरना संभव नहीं है। बड़ी से बड़ी चुनौती है तो उसी के अनुरूप बन जाओ। समारम्भ करो। उसी ओर सब सखा मिलकर उसे पार कर जाओ। जैसे तैर नहीं सकते, वहाँ युक्तिपूर्वक नदी पार करो।
भारत युवाओं का देश है। वे देश के विकास के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जायेंगे। कोई प्रेरक चाहिए। विवेकानन्द चाहते थे कि भारत के युवा जागें। वे लोहे की तरह शरीर बना लें और हृदय में करुणा का स्रोत हो। सेवा में सबसे आगे रहें। भतृहरि ने कहा है - सेवाधर्म परम गहनो यो गिनायाम्यमभ्यः।
प्रजातंत्र वह जिसमें सब प्र-ज = प्रदष्टजन्मा हो। लोकतंत्र वह है जिसमें सब अवलोकन क्षम हो। जनतंत्र वह है जिसमें सब दिव्यजन्मा बन सकें। गणतंत्र वह है जिसमें सब नागरिक गण्य-मान्य है। हमारी व्यवस्था इनमें से कुछ भी नहीं है क्योंकि अपनी व्यवस्था में प्रत्येक नागरिक को कुछ बनना पड़ता है। नागरिक कुछ भी न बनेगा तो कोई व्यवस्था भी नहीं होगी।
भारतीय समाज एक अखण्ड परिवार की तरह से है। परिवार वह है जिसमें प्रत्येक सदस्य को अपने दोषों को दूर करने के लिए वातावरण और अवसर मिलता है- परितः वरियति स्वदोषान् यस्मिन् सः। परिवार संसार का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय है, सबसे बड़ा प्रशिक्षणालय है, सबसे बड़ा चिकित्सालय है और सबसे बड़ा साधना केन्द्र है।
दुर्भाग्य से देश की नई सरकार ने योजनाबद्ध षड्यंत्र करके परिवार पर ही आक्रमण किया। छोटा परिवार के नाम से समाज को बाँटा। ‘हम दो हमारे दो’ या ‘हम दो हमारा एक’ के नारे लगाए। परिवार कभी छोटा हो ही नहीं सकता। विश्वकुटुम्ब की भावना कैसे साकार होगी।
परिवार में भाई, बहिन, भतीजे, भांजे, दौहित्र, बुआ, फूफा, मौसी, मौसा, पति, जेठ, देवर आदि अनेक सम्बन्ध बनते हैं और उनमें पवित्रता बनाये रखने पर बल दिया जाता है। यह भूल जाने के कारण समाज में कई समस्याएँ पैदा हो गई है। कन्या भ्रूण हत्या, अपहरण, बलात्कार की समस्याएँ नई हैं। कन्याओं को तो कामना करने योग्य मान कर अष्ट मंगलों में स्थान दिया गया था।
परिवार पर आक्रमण होने से जनसंख्या वृद्धि की समस्या ने जन्म लिया। पहले संयुक्त परिवार में पाँच भाइयों में एक बेटा या बेटी हो तो वह सब की सन्तान मानी जाती थी। हम दो - हमारे दो की सोच से आबादी बढ़ी। किसी को किसी से कोई लगाव नहीं रहा। सन्तान भी विद्रोही हो गई। सामंजस्य का धागा टूट गया।
परिवार का निर्माण कुलवधू करती थी। वेद का वचन है - जायेदस्तम् = जाया इत् अस्तम् - जाया ही घर है- ‘गृहिणी गृहः उच्यते।’ (मनुस्मृति)
परिवार (व्यवस्था) शिथिल हुआ तो स्त्री का दर्जा कम हुआ है। मनु ने कहा था - यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता। जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवता भी रमण करते हैं। नारी की अवमानना हुई तो परिवार टूटने लगे। परिवार भारत की मानव जाति के इतिहास को महत्त्वपूर्ण सबसे बड़ी देन है। इससे भारतीय सनातन परम्परा कमजोर हुई। गणतंत्र गण्य-मान्य बनने का मार्ग खोजें।
Thursday, 2 August 2018
स्वतंत्रता का मोल
स्वतंत्रता सबको प्रिय है। क्योंकि स्वतंत्रता मनुष्य का स्वभाव है। यही कारण है कि वह अपनी स्वतंत्रता के लिए छटपटाता है। हमारे देश में लगभग 1000 वर्षों तक विदेशी आक्रमण होते रहे। ग्रीक, हूण, शक, यवन और मुग़ल शासन की प्रताड़ना सहते हुए अपने सांस्कृतिक और अध्यात्मिक विरासत का जतन बड़ी सजगता के साथ हमारे पूर्वजों ने किया। तब जाकर हमारी सांस्कृतिक विरासत की रक्षा हो सकी। बाद में अंग्रेज आए और लगभग 200 वर्षों तक उन्होंने हमारे भारतवर्ष पर शासन किया। यह एक ऐसा शासन था जिसने वास्तव में हमारे देशवासियों के मन को गुलाम करने में सफलता पायी। देश अपना, भूमि अपनी, खेत अपने, इतिहास अपना, लोग अपने फिर भी सब पर शासन अंग्रेजों का ही चलता था। हम नहीं चाहते थे कि अपने भूमि, भवन, धर्म, संस्कृति और शिक्षा व्यवस्था पर अंग्रेजों की अधीनता रहे। इसलिए तो हमारे पूर्वजों ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया, हजारों देशभक्तों ने अपने प्राणों की आहुति दी, लाखों परिवारों इस स्वाधीनता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। और अंततोगत्वा 15 अगस्त, 1947 को हमारा देश “भारत” स्वतंत्र हुआ। पर क्या हम हमारे बलिदानी वीरों के ‘त्याग और सेवा’ प्राप्त स्वाधीनता के मोल को समझ पाए हैं, इस पर विचार होना चाहिए।
स्वतंत्रता का श्रेय केवल ‘एक’ को नहीं
कई लोग कहते हैं कि देश को स्वतंत्रता अहिंसा से मिली, यह स्वतंत्रता महात्मा गांधी ने दिलाई। कई लोग कहते है कि अंग्रेजों ने भारत को लूटकर छोड़ दिया और हमें स्वतंत्रता मिल गई। स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजों के साथ युद्ध नहीं करना पड़ा। कई बुद्धिजीवी तो यहां तक कहते हैं कि अंग्रेज नहीं होते तो यहां लोकतंत्र नहीं होता और न ही देश में कोई विकास हो पाता। ये सही है कि महात्मा गांधी ने ‘स्वतंत्रता’ की इच्छा को जन मन में जगाया, उन्होंने इसे आन्दोलन का स्वरूप दिया। पर केवल अहिंसक आन्दोलन के प्रभाव से अंग्रेजों ने भारत को नहीं छोड़ा। भारत के अन्दर युवा क्रांतिकारियों के बलिदान के प्रति भारतवासियों के मन में अपार श्रद्धा थी, उनसे लाखों लोग देश के लिए मर मिटने के लिए प्रेरित हुए थे। एक तरफ सशस्त्र क्रांतिकारी, दूसरी ओर अहिंसक आन्दोलन (सत्याग्रह)। स्वतंत्रता आन्दोलन में जहां चंद्रशेखर आजाद ने क्रांतिकारियों के संगठन का नेतृत्व किया, वहीं महात्मा गांधी ने अहिंसक आन्दोलन की बागडोर सम्भाली। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने एक ओर आजाद हिन्द फ़ौज का नेतृत्व किया, वहीं दूसरी ओर स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने भारतीय युवाओं को सेना में शामिल होने का आह्वान किया। द्वितीय विश्वयुद्ध चल रहा था और अंग्रेजों को सैनिकों की आवश्यकता थी। अंग्रेज अपने स्वार्थ के लिए भारतीय युवाओं को सैनिक शिक्षा देने को तैयार थे। तब सावरकर ने इस अवसर का लाभ लेने के लिए युवाओं से कहा, “एकबार सैनिक शिक्षा ले लो और जब जरुरत पड़ेगी तो तय कर लेना कि बंदूक की गोली किस ओर चलाना है। सावरकर की प्रेरणा काम कर गई और युवा भारत सैनिक प्रशिक्षण में शामिल होने के लिए दौड़ पड़े। अंग्रेज डर गए कि जब सारे युवा सैनिक बन गए तो वे अंग्रेजों से लड़कर बूरी तरह समाप्त कर देंगे। अंग्रेजों का यह भय स्वाभाविक था क्योंकि लाखों युवा सैनिक प्रशिक्षण ले चुके थे।
स्वतंत्रता का श्रेय किसके नेतृत्व को है, इसको लेकर बहुत चर्चा होती है, विशेषकर सामान्य लोगों में। स्वतंत्रता आन्दोलन का नेतृत्व अनेक धाराओं में स्वतंत्रता सेनानियों ने किया, लेकिन सारे देशभक्तों की प्रेरणास्रोत तो स्वामी विवेकानन्दजी के विचार ही रहे। चाहे गांधी हो या सुभाष, चाहे लोकमान्य तिलक हो या सावरकर, क्रांतिकारियों के ठिकानों पर कभी अंग्रेज छापे मारते तो उन्हें उन ठिकानों पर स्वामी विवेकानन्दजी के देशभक्ति जगानेवाले विचार की प्रतियां मिलती। यह भी एक विशेष बात है जिसका संज्ञान लेना आवश्यक है। वहीं देश के कवियों, गीतकारों और साहित्यकारों के देशभक्ति जगानेवाले साहित्यिक योगदान को भी कभी नहीं भूलाया जा सकता। लोकमान्य तिलक और गणेशशंकर 'विद्यार्थी' की राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत पत्रकारिता जिसने स्वतंत्रता आन्दोलन को मुखर बनाया, गांधीजी का अहिंसक आन्दोलन, सावरकर ने सेना में भर्ती होने का आह्वान किया, सुभाषचन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फ़ौज बनाई और सशस्त्र क्रांति की मशाल तो 1857 से स्वतंत्रता तक जल ही रही थी। इसलिए केवल एक व्यक्ति को स्वतंत्रता प्राप्ति का श्रेय देना लाखों स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग, तप और बलिदान का अपमान हो होगा। लेकिन देश का दुर्भाग्य ही है कि हमारे यहां अंग्रेजों की चापलूसी करनेवाले लोग तब भी थे और उनका गुणगान करनेवाले लोग अब भी हैं।
स्वतंत्रता का दुरुपयोग
गुलामी मानसिकता के लोग स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग और बलिदान का महत्त्व न पहले समझते थे और न ही अब। इसलिए आज स्वतंत्रता का दुरुपयोग करने में इन्हें मजा आता है। इस श्रेणी में सामान्य मनुष्य कम ही हैं पर बड़े पदों पर बैठे लोग इस महान स्वतंत्रता का दुरुपयोग करने में कोई मौका नहीं छोड़ते। शिक्षा संस्थानों में शिक्षा की अव्यवस्था को देखिए, राजनीति में भ्रष्टाचार को देखिए, सिनेमा जगत में स्वैराचार को देखिए, सामाजिक क्षेत्रों में फैले जातिभेद और दुराचार को देखिए, कानून व्यवस्था में ईमानदारी की दुर्गति को देखिए, ये सारे दृश्य मानो हमारे महान स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान का उपहास कर रहे हैं।
दूसरी ओर स्वतंत्रता दिवस के उत्सव को मनाने का तरीका भी देखिए। विद्यालयों, महाविद्यालयों तथा विभिन्न संस्थानों में तिरंगा फहराया जाता है। कुछ क्षण बलिदानियों को याद किया जाता है। वहीं देश की युवा पीढ़ी मोटरसाइकिल में सवार होकर, हाथों में तिरंगा लेकर सड़कों पर डीजे की कर्कश आवाज के साथ इस उत्सव को मनमानी ढंग से सेलिब्रेट करते दिखाई देते हैं। ये ‘देशभक्ति’ भी आज की पीढ़ी के लिए बड़ी कमाल की चीज हो गई है। फेसबुक, ट्विटर और वाट्सएप प्रोफाइल या चेहरे, कपड़े अथवा ब्रेसलेट पर तिरंगा लगा लो तो आप देशभक्त बन जाते हैं। क्या यही देशभक्ति है? तिरंगा का आदर तो होना ही चाहिए क्योंकि वह हमारे देश का राष्ट्रीय ध्वज है। पर केवल तिरंगे का प्रोफाइल फोटो बना देनेभर से क्या हमारी देशभक्ति साबित हो जाती है? क्यों क्रिकेट, 15 अगस्त और 26 जनवरी को ही जागती है हमारी लिमिटेड राष्ट्रभक्ति? इस बात पर भी चिन्तन होना चाहिए।
स्वतंत्रता मिली है - “राष्ट्रभक्ति की भावना से, समर्पण और बलिदान से”। राष्ट्र का उत्थान भी होगा देशभक्ति भाव के जागरण से। आइए, “देशभक्ति फिर जगे, देश का ये प्राण है” इस भाव का जागरण कर समाज में राष्ट्र चेतना का अलख जगाएं।
Monday, 4 June 2018
समरसता
मन एवं मनुष्याणां कारणं बन्ध मोक्षयोः अर्थात् बन्धन और मोक्ष का कारण मन है। यह श्रीमद्भगवद्गीता का वचन है। वहीं यह भी कहा गया है कि मन को वश में करना बड़ा कठिन है पर अभ्यास और वैराग्य से मन को जीता जा सकता है। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।
मन की तीन वृत्तियाँ हैं - इच्छा, ज्ञान और क्रिया। ये मिलकर एक रस हो जाए तब समरसता पैदा होती है। महाकवि जयशंकर प्रसाद ने कहा है - समरस थे जड़ और चेतन आनन्द अखण्ड घना था।
कामायनी में उनका आनन्द दर्शन विशद् रूप में प्रकट हुआ है। उसमें इच्छा, ज्ञान और क्रिया - मन की तीनों वृत्तियाँ मिलकर एक हो जाती हैं। ये समरस न हों तब तक आनन्द की सृष्टि नहीं हो सकती। तीनों वृत्तियाँ समरस हो जावें, तब मन विज्ञानमय कोश में आत्मसात् हो जाता है। विवेक का उदय होता है। आनन्दमय कोष में अखण्ड आनन्द की अनुभूति होती है।
सुख-दुःख की परिभाषा की गई - अनुकूलवेदनीयं सुखम्; प्रतिकूल वेदनीयं दुःखम्।
शरीर प्रकृति से बना है। उसमें समता-समानता नहीं होती। हाथ की पाँच अँगुलियाँ तक समान नहीं होतीं। चार अँगुलियाँ और अँगूठे में समरसता होती है।
परिवार के सब लोग एक-दूसरे के पूरक बनकर, परस्पर मदद करते हैं। मदद ही नहीं करते एक-दूसरे की उन्नति में सहायक भी होते हैं। वेद का वचन है - उद्-यानम् ते नावद्रव मानम् अर्थात् हे मनुष्य तुम्हारे लिए केवल ऊपर जाने का मार्ग है, उन्नति का मार्ग है न कि अद्योगति का।
परिवार का बड़ा रूप समाज होता है। जिसमें लोग साथ-साथ गति करें उसे समाज कहा जाता है - समं अजन्ते इति समाजः। मनु ने कहा है कि यह मेरा है, वह तेरा है - यह छोटी बुद्धिवाले सोचते हैं। उदारचरित व्यक्तियों के लिए तो वसुधा ही कुटुम्ब के समान है।
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।। (मनुस्मृति)
संसार भर के मनुष्य, एक ही मनुष्य जाति के हैं जिनका धर्म मानवता है। एक शब्द और है - जाति जिसे बोलचाल में न्यात कहा जाता है। जाति वह जिससे व्यक्ति की पहचान होती है। सोने का काम करे वह स्वर्णकार, चमड़े का काम करे वह चर्मकार, लोहे का काम करे वह लौहकार, लकड़ी का काम करे वह वर्द्धकि, कपड़े धोने का काम करे वह धोबी, घड़ा बनाए वह कुम्भकार (कुम्हार)। समाज के ये सभी लोग समरसतापूर्वक एक दूसरे की आवष्यकता की पूर्ति करते हैं। यह परिवार से बड़ा संगठन है।
भारत कृषिजीवी लोगों का देश है। कृषि सामूहिक श्रम का क्षेत्र है। इसमें अनेक मानवीय सम्बन्धों का विकास होता है और उन सम्बन्धों की पवित्रता की रक्षा भी की जाती है। यह सामाजिक समरसता का प्रमाण है। जाति और जाति का अन्तर न समझने के कारण हमारे प्रगतिशील लोग जाति-पाँति तोड़ने के लिए कटिबद्ध होकर बैठे हैं। भारत के सामाजिक ढाँचे को न समझने के कारण ऐसा होता है। जाति को गाली देने का अर्थ है - जन्मदात्री माता को गाली देना। जाति को तोड़ने का अर्थ है - सामाजिक समरसता को तोड़-मरोड़ कर नष्ट करना। दोनों ही अपराध हैं।
वेद का वचन है - कृषिमित् कृशस्व मादीन्यत् अर्थात् खेती ही करो जीवन को जुआँ मत बनाओ। लोक में भी प्रसिद्ध है - उत्तम खेती, मध्यम वणिज, अधम चाकरी। आज भारतीय समरसता की जीवन पद्धति को भूल जाने के कारण लोग नौकरियों के लिए गलकांट होड़ लगा रहे हैं। राजनीतिक दल नौकरियाँ बाँटने के नाम पर उनको बहका रहे हैं। वे आसानी से बहकावे में आ जाते हैं। भारत को सुनागरिकों का देश बनाना है अथवा नौकरों का देश बनाना है - इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। मानवीय श्रम का सौदा बन्द होना चाहिए।
Sunday, 6 May 2018
त्वं हि ब्रह्मा बभूविथ
राष्ट्रमण्डल खेलों में भारतीय खिलाड़ियों ने 26 स्वर्ण पदक सहित कुल 66 पदक जीत कर भारत का गौरव बढ़ाया। पदक विजेताओं में अधिक उल्लेखनीय यह है कि अग्रणी पंक्ति में महिलाएं रहीं। उन्होंने कई मानक भी स्थापित किए। खिलाड़ी दल का ध्वज साक्षी ने संभाला था। इससे देशवासियों में जो आशा बंधी थी, वह पूरी हुई।
संयोग की ही बात थी कि सायना नेहवाल से साक्षी को भिड़ना पड़ा। नेहवाल को स्वर्ण पदक और साक्षी को रजत पदक मिला। दोनों अलग अलग खेलतीं तो दोनों स्वर्ण पदक प्राप्त करतीं। महिला शक्ति के सफल और सार्थक प्रदर्शन को देखकर यह अनिवार्य हो गया है कि खेलनीति बने और महिलाओं को अधिकाधिक अवसर दिया जाय। पहलवानी, भारोत्तोलन, भाला फेंक, दौड़, सर्वत्र महिलाएं छाई रहीं।
इसी वर्ष छोटी-सी महिला वायुयान चालिका ने अपना सर्वोत्तम प्रदर्शन करके सबसे बड़े युद्धकजेट विमान को उड़ाया। दूसरी ने नागरिक विमान उड़ाकर सर्वोत्तम प्रदर्शन किया। स्थल सेना की महिला विंग ने भी अपना सर्वोत्तम प्रदर्शन किया। हाकी, क्रिकेट, फुटबाल जैसे खेलों में भी भारत को गौरव, महिलाओं द्वारा मिला।
कभी कल्पना चावला ने अंतरिक्ष यात्रा द्वारा भारत का नाम प्रोज्ज्वल किया था। आने वाले समय में हमारी अंतरिक्ष यात्रा में फिर महिला जाने वाली है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधानशाला में कई महिलाएं काम कर रही हैं। प्रक्षेपणास्त्र निर्माण में भी उनका अभूतपूर्व योÛदान है। परमाणु आयुध निर्माण में भी एपीजे अब्दुलकलाम के दायित्व को संभाल रही हैं।
निर्मला सीतारामन् इस समय देश की रक्षा मंत्री हैं और वे भारत को रक्षा के क्षेत्र में सर्वोत्तम बनाने का संकल्प कर चुकी है। अध्यात्म चिन्तन में कभी गार्गी, मैत्रेयी, आम्भृणी के नाम प्रसिद्ध रहे हैं, मातृत्व के क्षेत्र में मदालसा का नाम अग्रणी रहा है, जिसने अपने पुत्रों को निवृत्ति के पुत्रों मार्ग पर भी आगे बढ़ाया और प्रवृत्ति के मार्ग पर भी। माता पार्वती ने देव सेनापति स्कन्द स्वामी को जन्म दिया था।
लकड़हारे से कालिदास बनाने वाली पत्नी को कैसे भुलाया जा सकता है? शकुन्तला ने दुश्यन्त से प्रेम करके सर्वदमन भरत को जन्म दिया था। अहल्या, आत्रेयी, अंजना, कौसल्या, कैकेयी, आत्रेयी, सुमित्रा, जनकनन्दिनी, महारानी लक्ष्मीबाई, चांद बीबी, रजिया, जीजा बाई, दुर्गावती, हाडा रानी आदि के मातृत्व, पत्नीत्व, वीरत्व को ऐतिहासिक गौरव प्राप्त है। पन्ना धाय के त्याग को कैसे भुलाया जा सकता है। इन्दिरा गांधी ने प्रधानमंत्री के रूप में भारतीय प्रायद्वीप का इतिहास भी बदल दिया और भूगोल भी। पाकिस्तान की 93000 सैनिकों की सैनिक टुकड़ी का आत्म समर्पण करवा दिया। पाकिस्तान का गर्व चूर-चूर कर दिया।
वनवासिनी शबरी को राम ने भामिनी कहा है - प्रकाशवती। अकिंचनता अतिथि सत्कार में बाधक नहीं हुई। बेर ही उपहार बन गए।
माताएं पलने में बच्चों को झुलाते हुए हालरिये गा कर पुत्र को मातृभूमि के लि, बलिदान देने का पाठ पढ़ाती हैं-
इळा न देणी आपणी, हालरिये हुलराय।
पूत सिखावे पालणे मरण बड़ाई माय।।
- वीर सतसई
पूत सिखावे पालणे मरण बड़ाई माय।।
- वीर सतसई
साहित्य के क्षेत्र में महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चैहान, मृदुला सिन्हा आदि ने नाम कमाया है। राजनीति के क्षेत्र में वसुन्धरा राजे, नजमा हैपतुल्ला,आनन्दी बेन पटेल काम कर रही हैं।
घर घर में कुलवधू के रूप में घर में अपने कौशल को प्रकट करने वाली गृहिणी किसी भी वीरांगना से कम नहीं कही जा सकती। वेद की उक्ति है - जायेदस्तम् = जाया इत् अस्तम् = जाया ही घर है। इसी के आधार पर मनु ने कहा था - गृहिणी गृहम् उच्यते। वह उस घर का निर्माण करती है, जिससे राम के नाम जैसा पवित्र घर बनता है - तुलसी रघुनाथ नाम आपुनो सो घर है।
राम ने कहा था -
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।
सन्तान को संस्कार प्रदान करके, मनुष्य बनाने वाली माता ही होती है। परिवार, संस्कार निर्माण का केन्द्र होता है। वह संस्कार का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय है, सबसे बड़ा चिकित्साल्य है और सबसे बड़ा साधना केन्द्र है। उसमें सभी सदस्यों को अपने दोषों को दूर भगाने की सुविधा प्राप्त होती है -
परित: (नि-) वारयज्ञति स्वदोषान् यत्र तत् परिवारः।
इसका निर्माण कुलवधुएं करती हैं। अपने-पराये के भेद को दूर करके, उस चारित्रिक उदारता को महिलाएं ही जन्म देती हैं, जिससे विश्व-परिवार का भाव जागता है -
अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।
-मनु स्मृति
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।
-मनु स्मृति
इसी कारण वेद में कहा गया है - त्वं हि ब्रह्मा बभूविथ - हे माता तू तो साक्षात् ब्रह्मा बन गई है। माता की गोद आकाश और धरती से भी बड़ी होती है। उसी में सन्तान पलती है।
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Monday, 7 August 2017
राष्ट्र का रक्षा कवच
वेद का वचन है - पुमान् पुमांसं परिपातु विश्वतः। मनुष्य मनुष्य की रक्षा करे सब ओर से। मनुष्य कैसे करे मनुष्य की रक्षा ? मनुष्य का धर्म मनुष्यता है - मानवता है। उस धर्म का पालन करने से मनुष्य के साथ ही सभी प्राणियों की रक्षा होगी। पुरानी परम्परागत मान्यता है - धर्मो रक्षति रक्षतिः। धर्म की रक्षा करने से वह सबकी रक्षा करता है।
लोक में रक्षाबन्धन का त्यौहार प्रचलित है। उसमें सामान्यतः बहिनें भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बाँधती हैं। सर्वप्रथम शची पौलोगी ने अपने पति और देवों की रक्षा के लिए रक्षा सूत्र बाँधा था। प्रेरणा थी देव-गुरु बृहस्पति की। कुलगुरु यजमान के राखी बाँधता है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर शान्ति निकेतन में सभी छात्रों की कलाई में राखी बाँधते थे।
रक्षासूत्र रक्षणीय पदार्थ - राष्ट्र, वेद, धर्म, संस्कृति और भाषा की रक्षा के लिए बाँधा जाता है। श्रावणी पूर्णिमा को ऋग्वेदीय परम्परा की, हरतालिका को सामवेदीय परम्परा की, ऋषि पंचमी को यजुर्वेदीय परम्परा की और विजयादशमी को अथर्व वेदीय परम्परा की राखी होती है। वस्तुतः इन दिनों से वेदारम्भ या विद्यारंभ संस्कार होते थे।
वेदारम्भ संस्कार करते समय आचार्य प्रवेशार्थी छात्रों को रक्षा सूत्र बाँधकर उनको राष्ट्र, वेद, धर्म, संस्कृति और भाषा की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध करते थे। चारों वेदों के आचार्यों के शिक्षा सत्र इन दिनों शुरू होते थे। वैसे हर धार्मिक कार्य को करने के लिए कलाई पर व्रत धारण करने की ‘वर्णी’ बाँधी जाती है। वह भी रक्षासूत्र ही है।
1965 में युद्ध के लिए भारतीय सेना की तीन बटालियनों सीमा पर युद्ध के लिए जा रही थी उस समय राजकीय महाविद्यालय, किशनगढ़ के छात्र-छात्राओं ने रेलवे-स्टेशन पर पहुँच कर सबको राखी बाँधी और उनको फल-मिठाई खिलाई। अद्भुत दृश्य था वह ! फल-मिठाई का भुगतान संकाय सदस्यों ने किया। युद्ध प्रयाण का परम्परागत क्षण जीवित हुआ।
1971 के भारत-पाक युद्ध में पाकिस्तान के जनरल नियाजी ने 93 हजार सैनिकों के साथ आत्मसमर्पण किया। बांग्लादेश बन गया पूर्वी पाकिस्तान। कारगिल युद्ध में भी पाकिस्तान ने मुँह की खाई। यदि अब पाकिस्तान ने दुस्साहस किया तो उसके टुकड़े-टुकड़े हो जाएँगे।
भारत के पास रक्षा कवच के रूप में परिवार है। संसार का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय, चिकित्सालय, प्रशिक्षणालय और साधना केन्द्र है परिवार। उसमें प्रत्येक सदस्य को अपने दोष दूर भगाने का अवसर मिलता है। परितः वारयति स्वदोशान् यस्मिन् इति। वह किले की तरह होता है जिसका निर्माण कुलवधू करती है - जायेदस्तम् - जाया ही घर है - गृहिणी गृहम् उच्यते। चारित्रिक दृढ़ता सम्पन्न उस किले में सभी की रक्षा होती है। पारिवारिक एकता ही उसे रक्षा-सामथ्र्य प्रदान करता है।
Thursday, 4 August 2016
राष्ट्र चेतना अंक
भारत की
सनातन परम्परा में प्रत्येक साधक की पहली चाह होती है - जगने की,
जागरूक रहने की। यजुर्वेद में इसी चाह को शब्द दिए
गए हैं - हम राष्ट्र में पुरोहित बन कर जागें - वयं राष्ट्रs जागृयाम पुरोहिताः।
राष्ट्र का अर्थ होता है
- प्रकाशमान्, द्युतिमान,
दीप्तिमान्। श्रेष्ठ आचार और विचार से जीवन में
सत्त्व गुण का उद्रेक होता है तब मनुष्य
में प्रकाश प्रकट होता है। ‘सत्त्वं लघु प्रकाशकम्’ - सत्त्वगुण स्फूर्ति और प्रकाश पैदा करता है। तब व्यक्ति प्रकाश पुंज - राष्ट्र बन जाता है।
ऐसे
व्यक्तियों का समूह भी राष्ट्र होता है और वे जहाँ रहते हैं वह भूखण्ड भी राष्ट्र बन जाता है। भारत-भा-रत = प्रकाश में लीन है। भारत शब्द राष्ट्र का पर्याय है। यह राष्ट्र शब्द राज-दीप्तौ धातु से बनता है। इस नाम की सार्थकता तभी है जब प्रत्येक
व्यक्ति राष्ट्र बने - राजा बने। प्रत्येक माता अपने बेटे को ‘राजा बेटा’ बनाना चाहती है -
बेटी को ‘रानी बेटी’
बनाता चाहती है।
माता
संस्कार दात्री होती है। इसलिए उसमें यह क्षमता होती है कि वह अपनी सन्तान को
प्रकाशमान्-प्रकाशमती बना दे। इसीलिए माता महीयसी होती है। वाल्मीकि ने कहा है -
जननी जन्मभूमिष्च स्वर्गादपि गरीयसी ।
राष्ट्र संज्ञक नागरिक जब
भूखण्ड को राष्ट्र संज्ञा प्रदान करते हैं तो उसके निकट से निकट होने की साध एक मंत्र में
प्रकट की गई है - उप सर्प मातरम् भूमिम्। अथर्ववेद के पृथिवीसूक्त में कहा गया है
- माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः - भूमि माता है और मैं पृथिवी का पुत्र हूँ।
मैथिलीषरण गुप्त ने कहा था -
हे मातृभूमि ! तू सत्य ही, सगुणमूर्ति सर्वेश की ।
भूमि की
उपासना को भोंम-ब्रह्म की उपासना कहा गया है।
भारत को
त्यागभूमि कहा जाता है और भोगभूमियों से उसे पृथक् माना गया है। भारतवासी
त्यागपूर्वक ‘भोग त्यक्तेन
भुंजीथाः’ में विश्वास करते
हैं। इसके लिए दूसरा राष्ट्र शब्द है - रा-दाने धातु से बहुलार्थक = या ष्ट्रन् प्रत्यय से बना हुआ है। राज-धातु से बने
हुए राष्ट्र शब्द से यह नितान्त भिन्न है - इसी कारण अर्थ भिन्न है।
ये दोनों राष्ट्र शब्द अलग-अलग अर्थ
के वाचक हैं। डा. फतहसिंह का कहना है कि जिनकी रीतियाँ समान हों उस मानव-समुदाय को
राष्ट्र कहा जाता है। ‘अराति’ उसे कहा जाता है
जो दूसरे संगी-साथियों को उनका प्राप्य नहीं देता - न राति स अरातिः ।
भारत की
भिन्न प्रकार की एक पहचान और है - वह है - जहाँ कृष्णसार - कस्तूरी मृग
निद्र्वन्द्व होकर विचरते हों - कस्तूरी जैसी महंगी गन्ध को प्राप्त करने के लिए
उनको मारा न जाता हो - वह भारतवर्ष है अर्थात् नितान्त निर्लोभवृत्ति के लोग जहाँ रहते हों वह है भारतवर्ष।
विष्णु
पुराण में कहा गया है कि जिसके गीत देवता भी गाते हैं और स्वर्ग-अपवर्ग से
महत्त्वपूर्ण जिस भूमि में अमरत्व छोड़कर देवता भी जन्म लेने को लालायित रहते हैं -
वह है भारतवर्ष।
गयन्ति देवाः किल गीतिकानि धन्योऽयं भारतभूमिः भागः।
स्वर्गापवर्गास्पद मार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषा सुरत्त्वात् ।।
वर्षं तद्भारतं ज्ञेयः भारती यस्य सन्ततिः।
मनु के
अनुसार यह भारत पूर्व समुद्र (प्रशान्त महासागर) से पश्चिम सागर (भूमध्य सागर,
कृष्ण सागर, लाल सागर और मृत सागर का संयुक्त रूप) तक विस्तीर्ण है। उदयाचल पर्वत (प्रशान्त
महासागर का तट) से अस्ताचल तक (सिनाई प्रायद्वीप के टेरेसाँ पर्वत तक फैला हुआ है।
इसी के लिए जयशंकर प्रसाद ने कहा है -
हिमालय के आँगन में जिसे प्रथम किरणों का दे उपहार,
उशा ने हँस अभिनन्दन किया और पहनाया हीरक हार ।
इस विराट्
राष्ट्र में एक अखण्ड
परिवार रहता है। भाशा भले ही भिन्न-भिन्न बोलते हों, धर्म-आचार-पद्धतियाँ भले ही पृथक्-पृथक् हों; अलग-अलग क्षेत्रों में भले ही बसते हों, विचार भले ही पृथक् पृथक् हों - पर, है यह एक अखण्ड परिवार। सब प्रकार के मतभेदों से ऊपर उठकर - एक होकर जीने
का मार्ग हमने खोज लिया है।
अपने-पराये
के भेद को भूलकर उदारचरित बन कर वसुधा को कुटुम्ब बनाकर जीने का अभ्यास भी हमने
किया है -
अयं निजः परो बेति गुणना लघुचेतसाम् ।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ।।
(मनुस्मृति)
धर्मप्राण
भारत ने याज्ञवल्क्य के इस कथन को माना है -
अयं तु परमो धर्मः यद् योगेन आत्मदर्शनम् ।
(याज्ञवल्क्य स्मृति)
सब प्राणियों
में, कण-कण में आत्म-साक्षात्कार करने की
विधि हमने खोज ली है। हम सृष्टि संवत् 1974927118 को स्मरण करते रहते हैं। सब वेद से प्रसिद्ध होता है - यह भी हम जानते
हैं - वेदात् सर्वं प्रसिद्ध यति। वेद ही अखिल धर्म का मूल है। इसीलिए यह वेदभूमि
है।
परिवार संसार
का सबसे बड़ा विष्वविद्यालय है। सबसे बड़ा चिकित्सालय है। सबसे बड़ी पाठशाला है। इसका
निर्माण गृहिणी करती है - गृहिणी गृहम् उच्यते। मनुस्मृति के इस कथन का वैदिक आधार
है - जायेदस्तम् - जाया इत् अस्तम् = जाया ही घर है। नारी की सुरक्षा और सम्मान परिवार में संभव है। परिवार
में हर सदस्य को अपने दोषों को दूर करने की छूट होती है - परितः (नि-) वारयति स्व
दोषान् यस्मिन्। परिवार नामक संस्था को सुरक्षित रखने से ही भारत राष्ट्र सुरक्षित
है।
Friday, 5 February 2016
सबके श्रद्धापात्र
संपादकीय
रामकृष्ण
परमहंस मठ में माँ काली के पुजारी थे। साधना के बल पर दिव्य व्यक्तित्व का विकास
करके वे जन-जन के आदर्श बन गये। उनको परमहंस इसलिए कहा गया कि उन्होंने अपने जीवन
में सभी धर्मों की आचार - पद्धति अपनाकर सीमित अवधि में साधनापूर्ण जीवन जिया था।
वे भारत की
यज्ञ-योगमयी जीवन-पद्धति में से विश्वास करते थे। याज्ञवल्क्य ने कहा था कि
योगपूर्वक सबमें आत्मदर्षन ही परम धर्म है। इसको रामकृष्ण ने प्रयोग करके दिखाया।
उनकी सबसे बड़ी देन है - विवेकानन्द। नरेन्द्र के रूप में जो केवल तर्क करता था, ईश्वर
को नकारता था उस नरेन्द्र को उन्होंने शक्तिपात के द्वारा विराट् व्यक्तित्व
प्रदान किया।
नरेन्द्र पहली
बार उनके पास आया तब उसने प्रश्न किया था - क्या आपने ईश्वर को देखा है ? उनका
उत्तर था - ‘हाँ, देखा है। वैसे ही, जैसे तुम्हें देख रहा हूँ।’
नरेन्द्र ने
जिज्ञासा की कि मुझे भी दर्शन कराइये। तब उन्होंने नरेन्द्र को दूसरे दिन निश्चित
समय पर अपने पास बुलाया। वे उस समय समाधि में बैठे हुए थे। उनके पास आकर नरेन्द्र
बैठ गया। रामकृष्ण ने अपना हाथ नरेन्द्र के सिर पर रख दिया। शक्तिपात हुआ।
रामकृष्ण ने
समाधि टूटने पर नरेन्द्र से प्रश्न पूछा - बोलो क्या देखना-जानना चाहते हो ? नरेन्द्र का
उत्तर था - कुछ नहीं पूछना। जो जानना था - वह जान लिया।
परिवार की
अकिंचनता नरेन्द्र के लिए चिन्ता का कारण थी। रामकृष्ण ने कहा - जा, काली
माता से जो चाहे माँग ले। वे मंदिर में गए। चिन्मयी माता के सामने हाथ जोड़कर खड़े
हुए और माँगा - माँ मुझे ज्ञान दो, भक्ति दो, वैराग्य दो।
मनुष्य को
परमात्मा ने बुद्धि दी है जिसकी वृत्ति है - विवेक। अपने हित-अहित की पहचान तो
पशु-पक्षी भी कर लेते हैं। मनुष्य स्वविवेक से हित-अहित की पहचान करता है। ‘विवेकानन्द’ यह
नाम तो खेतड़ी में महाराज अजीतसिंह ने दिया; पर विवेकी रामकृष्ण परमहंस ने ही बनाया।
लोक कल्याण के
लिए स्वामी विवेकानन्द ने ‘रामकृष्ण मिशन’ की स्थापना की।
उन्होंने रामकृष्ण के आशीर्वाद से देशभर
में आम आदमी के लिए शिक्षण संस्थाएँ, चिकित्सा केन्द्र और ध्यान योग केन्द्र स्थापित किए।
ठाकुर का विवाह
माँ सारदा से हुआ था, इसके बावजूद भी उन्होंने कभी सांसारिक जीवन नहीं जिया। उनके साधनामय
जीवन से माता सारदा को कोई शिकायत या असुविधा नहीं थी। उनके सान्निध्य में वे
स्वयं साधिका बन गयी थी।
रामकृष्ण तर्क
से अधिक भावना को महत्त्व देते थे। साधना को सुविधा से अधिक महत्त्व देते थे। उनके
उपदेश सुनकर कई लोगों के जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन आ गया। उनके जीवन की दशा ही
बदल गई।
स्वामी दयानन्द
भी उनसे मिलने के लिए गए थे। मिलने के पहले स्वामी दयानन्द हाथ में दण्ड लेकर
जल्दी-जल्दी घूम रहे थे। समाधि टूटने पर रामकृष्ण को उनके शिष्य ने बताया कि
स्वामी दयानन्द आपसे मिलने आये हैं। रामकृष्ण ने पूछा कि ये इतने उतावले क्यों है।
इस तरह तो इनको मोक्ष नहीं मिलेगा। शिष्य ने कहा कि ये समाज का उत्थान चाहते है।
समाज में वेद को प्रतिष्ठित करना चाहते हैं। ये मोक्ष नहीं चाहते। यह सुनकर
रामकृष्ण दयानन्द से बहुत प्रभावित हुए और उनसे आदरपूर्वक मिले।
अपने विकास और
उद्धार के लिए तो सब प्रयास करते हैं; रामकृष्ण परमहंस ने दूसरों के विकास में रुचि
ली। इसलिए उनको महान् व्यक्ति निर्माता और समाज निर्माता के रूप में प्रसिद्ध मिली
और वे सबकी श्रद्धा के पात्र बन गये।
Sunday, 6 September 2015
संपूर्णता यानि श्रीकृष्ण
संपादकीय
मनुष्य के जीवन
का ऐसा कोई कोना नहीं है, जिसे कृष्ण ने न छुआ हो। जिन्दगी के हर
पहलू पर कृष्ण की नज़र रही और बड़ी संजीदगी के साथ उसका सरल समाधान भी दिया। वैसे
तो हर युग में अनेक महापुरुषों ने लोगों का मार्गदर्शन किया, परन्तु अकेले कृष्ण ही थे, जिन्होंने जीवन
के सभी आयामों पर गहरी दृष्टि डाली और सहज, सरल
अनुगामी दिशा-बोध दिया। संपूर्ण जगत् के मानव मन की व्यथा-कथा को जानते हुए,
श्रीकृष्ण ने ऐसे-ऐसे अद्भुत उपाय प्रस्तुत किए, जिनको अपनाकर प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन की संपूर्णता को आसानी से
प्राप्त कर सकता है। ईश्वर-अवतार तो कई हुए हैं, लेकिन
कृष्ण जैसा हरफनमौला-आलराउन्डर मिलना मुश्किल है। लगभग सवा पाँच हजार बरस पहले के
लोग और समाज कैसा रहा होगा, आज से काफी उन्नत। फिर भी उनको कृष्ण
की जरूरत पड़ी। मानव स्वभाव की शायद यही नियति है, जो
हर युग में अपना रंग दिखाती है।
कृष्ण के बारे
में प्रायः सभी जानते हैं कि उनकी लीलाएँ कितनी अनुठी और हम सबके जीवन का आईना थी।
यदि उनको गहराई से समझकर अनुसरण करें, तो यह जीवन सफल
हो जाए, संपूर्णता को प्राप्त कर ले। समाज के कंटकों,
दुराचारियों से निपटना, अपनी मातृभूमि
की रक्षा, रासलीलाओं द्वारा वासना-शून्य प्रेम, प्रगाढ़ मित्रता का निर्वहन, सफल कूटनीति,
उत्कृष्ट प्रबन्धन, त्याग की पराकाष्ठा, ज्ञान की प्रभुता, सच्चा मार्गदर्शन, दलित-मसीहा, न्यायप्रिय, सकारात्मक
बोध, अद्वितीय साहस, विलक्षण
चातुर्य आदि जीवन के ऐसे महत्वपूर्ण घटक हैं, जिनका
व्यावहारिक प्रयोग करके, कृष्ण ने हमारा मार्गदर्शन किया।
मनुष्य के भीतर बैठी पशुता जब-जब भी उछाल मारती है, तब-तब
अस्थिरता जन्म लेकर दुःखी बना देती है। कृष्ण ने दुःख निवारण की वह दिशा बताई,
जो मानव कल्याण में अत्यन्त उपयोगी है, गतिमान
जीवन की प्राण-वायु है।
कृष्ण का
कर्म-दर्शन जीवन की समग्रता को समेटे हुए है। यदि सकाम और निष्काम की गूढ़ता समझ आ
जाए और उसे जीवन में उतार लिया जाए, तो यह जीवन
यात्रा सुगम हो सकती है। उनका प्रकृति प्रेम अपनाकर पर्यावरण सुधारा जा सकता है।
संतुलित आहार-विहार-योग के द्वारा आरोग्य पाया जा सकता है।
कर्म-ज्ञान-भक्ति-सांख्य योग जीवन के दिशा-निर्धारक हैं। कृष्ण की दुःख-सुख में
समभाव की देशना, अवसाद और निराशा से बचा सकती है। उनका कुशल नेतृत्व जीवन की सफलता
का बोधक है। उनका सौन्दर्यबोध जीवन को सकारात्मकता से भर सकता है। मोह-माया से
बचकर, इस नश्वर-अनित्य शरीर के कर्म को व्यष्टि से
समष्टि की ओर ले जाने का कृष्ण का सन्देश, जन-जन को
खुशियों से भर सकता है। कृष्ण के वासना-रहित प्रेम को यदि व्यवहार में उतारा जाए,
तो समाज में फैल रहा व्यभिचार घट सकता है। कृष्ण की गौ-सेवा और पशु-प्रेम
हमें जीव-दया की ओर प्रेरित करता है। करुणा के सागर कृष्ण की सीख हृदय में प्रेम
भरकर, समाज में भाई-चारा और शांति ला सकती है।
आधुनिक युग में
स्वामी विवेकानन्द ने भी प्रायः वही काम किया, जो
कृष्ण किया करते थे। जाति-पांति, धर्म आदि से ऊपर उठकर, सभी मनुष्यों को एक मानकर, मनुष्य निर्माण
की दिशा में स्वामीजी का योगदान अविस्मरणीय है। मातृभूमि से प्यार, चरित्र-निर्माण, युवकों में साहस भरने और उनको बलशाली
बने रहने की प्रेरणा देने में, वे अग्रणी रहे। निर्बल और दलित के
प्रति प्रेम, करुणा की अवधारणा के साथ दरिद्र को
नारायण मानकर, उसकी सेवा करने का आह्वान, मानव-कल्याण की दिशा में उनकी अद्भुत सोच थी, जो
आज अधिक प्रासंगिक है। भारत को वैभव की ओर ले जाने में स्वामीजी के अथक प्रयासों की
सफलता, अब वर्तमान युवाओं के कंधों पर है। कृष्ण और
स्वामीजी के बताए मार्ग पर चलकर, चारित्रिक-समाज की रचना संभव है। जीवन
के प्रत्येक क्षेत्र में परिपूर्णता और संपूर्णता की अभिलाषा हर मन में होती है।
इसकी प्राप्ति के लिए कृष्ण को अपनाना होगा। केवल पूजा-पाठ, वंदना
करके कृष्ण को नहीं पाया जा सकता। उनके जीवन-मूल्यों के अधिकाधिक अंशों को स्वयं
के जीवन में उतारना जरूरी है। पग-पग पर उत्सव मनाने वाले कृष्ण को, इसलिए कहा जाता है - संपूर्णता यानि कृष्ण
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