Wednesday, 21 August 2019

देशप्रेम और देशभक्ति

15 अगस्त को हम स्वतंत्रता दिवस के रूप में बड़े उत्साह में मनाते हैं। इस दिन देशभक्ति के गीत के स्वर हर गली, चौराहे, विद्यालय, महाविद्यालय तथा विभिन्न संस्थाओं के कार्यालय में सुबह से सुनाई देते हैं। देशप्रेम के भाव तो सबके भीतर विद्यमान है। वास्तव में मानवीय जीवन में प्रेम को सबसे अधिक महत्त्व प्राप्त हुआ है। महापुरुषों ने प्रेम की महिमा गाई है। सद्गुरु कबीर साहब ने प्रेमविहीन मनुष्य हृदय के सम्बन्ध में कहा है,

“जा घट प्रेम न संचरे, सो घट जान मसान।
जैसे खाल लुहार की, सांस लेतु बिन प्रान।।”

स्वामी विवेकानन्द जब साढ़े तीन वर्षों के बाद अमेरिका से भारत लौट रहे थे, तब उनके एक विदेशी मित्र ने पूछा, “स्वामीजी, आप तीन वर्षों तक वैभवशाली देश में रहकर अपने गरीब देश भारत में लौट रहे हैं। अब अपने देश के प्रति आपकी कैसी भावना है?”

स्वामीजी ने बहुत मार्मिक उत्तर दिया जिससे प्रेम और भक्ति की अवधारणा स्पष्ट हो जाएगी।
स्वामी विवेकानन्दजी ने कहा, “पहले तो मैं अपनी मातृभूमि से प्रेम ही करता था अब तो इसका कण–कण मेरे लिए तीर्थ हो गया है।” अर्थात प्रेम से ऊपर का भाव भक्ति है। ‘हिंदी साहित्य का इतिहास” के लेखक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने निबंध “श्रद्धा-भक्ति” में कहा है, “प्रेम का कारण बहुत कुछ अनिर्दिष्ट और अज्ञात होता है; पर श्रद्धा का कारण निर्दिष्ट और ज्ञात होता है।” आचार्य शुक्ल ने आगे कहा कि, “श्रद्धा और प्रेम के योग का नाम भक्ति है।” इससे स्पष्ट होता है कि समर्पण की भावना का पहला आयाम प्रेम है, उसके बाद श्रद्धा और फिर भक्ति। समर्पण की सर्वोच्च स्थिति “भक्ति” है। इसलिए प्रेम, श्रद्धा और भक्ति की अवधारणा को समझे बिना देशप्रेम और देशभक्ति की संकल्पना को नहीं समझा जा सकता।

यूं तो हमारे मीडिया जगत में देशभक्ति और देशप्रेम की गाथा को बहुत बार दोहराया जाता है। विशेषकर, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में 15 अगस्त और 26 जनवरी, क्रिकेट या युद्ध के दौरान देशभक्तों का गुणगान करने और देशभक्ति जगाने के लिए सिनेमा के गीतों को दिखाने की परम्परा रही है। पर मीडिया में देशभक्ति की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कोई कार्यक्रम नहीं दिखाया जाता।

देशभक्ति के प्रगटीकरण के भी कुछ आयाम होते हैं। क्या इस बात पर हमने कभी अनुसंधान किया है? नहीं। यदि ऐसा होता तो क्रिकेट में जीत के बाद अथवा 15 अगस्त और 26 जनवरी को सड़कों पर डीजे की धुन में हो-हल्ला मचाते, थिरकते युवाओं के असभ्य और अनुशासनहीन कृत्यों को अनुशासित कृति में परिवर्तित करने के लिए कोई अभियान चलाया जाता।

हमारे देश में तो क्रिकेट, युद्ध, 15 अगस्त और 26 जनवरी के दौरान ही देशवासियों की “लिमिटेड देशभक्ति” सड़कों पर भिन्न-भिन्न प्रकार से दिखाई देती है। ऐसा नहीं है कि देशप्रेम अथवा देशभक्ति हमारे नागरिकों में है ही नहीं। निश्चित रूप से देशभक्त, देशप्रेमी अपने जीवन के महत्वपूर्ण समय निराश्रित बालकों के पोषण, स्वस्थ्य और शिक्षा के लिए लगाते हैं। सीमा पर जवान, देश में किसान, समाज में विद्वान् यहां तक कि सफाई कर्मचारी अपने कर्मों के द्वारा भारतमाता की पूजा करते हैं। पर ऐसे समर्पित लोग कभी हो-हल्ला नहीं मचाते। इसलिए देशभक्ति के आयाम को भीहमें समझना होगा।

9 फरवरी, 1897 को मद्रास (चेन्नई) के विक्टोरिया पब्लिक हॉल में “मेरी क्रांतिकारी योजना” नामक अपने व्याख्यान में स्वामी विवेकानन्द ने ‘देशभक्ति’ की तीन सीढ़ियां बतलाई। स्वामीजी ने कहा, “लोग देशभक्ति की चर्चा करते हैं। मैं भी देशभक्ति में विश्वास करता हूं, और देशभक्ति के सम्बन्ध में मेरा भी एक आदर्श है। बड़े काम करने के लिए तीन बातों की आवश्यकता होती है। पहला है – हृदय की अनुभव शक्ति। बुद्धि या विचारशक्ति में क्या है? वह तो कुछ दूर जाती है और बस वहीं रुक जाती है। पर हृदय तो प्रेरणास्त्रोत है! प्रेम असंभव द्वारों को भी उद्घाटित कर देता है। यह प्रेम ही जगत के सब रहस्यों का द्वार है। अतएव, ऐ मेरे भावी सुधारकों, मेरे भावी देशभक्तों, तुम अनुभव करो! क्या तुम अनुभव करते हो कि देव और ऋषियों की करोड़ों संतानें आज पशु-तुल्य हो गयीं हैं? क्या तुम हृदय से अनुभव करते हो कि लाखों आदमी आज भूखे मर रहे हैं, और लाखों लोग शताब्दियों से इसी भांति भूखों मरते आए हैं? क्या तुम अनुभव करते हो कि अज्ञान के काले बदल ने सारे भारत को ढंक लिया है? क्या तुम यह सब सोचकर बेचैन हो जाते हो? क्या इस भावना ने तुमको निद्राहीन कर दिया है? क्या यह भावना तुम्हारे रक्त के साथ मिलकर तुम्हारी धमनियों में बहती है? क्या वह तुम्हारे हृदय के स्पंदन से मिल गयी है? क्या उसने तुम्हें पागल-सा बना दिया है?

क्या देश की दुर्दशा की चिंता ही तुम्हारे ध्यान का एकमात्र विषय बन बैठी है? और क्या इस चिंता में विभोर हो जाने से तुम अपने नाम-यश, पुत्र-कलत्र, धन-संपत्ति, यहां तक कि अपने शरीर की भी सुध बिसर गए हो? तो जानो, कि तुमने देशभक्त होने की पहली सीढ़ी पर पैर रखा है- हां, केवल पहली ही सीढ़ी पर!”

स्वामी विवेकानन्द ने आगे कहा, “अच्छा, माना कि तुम अनुभव करते हो; पर पूछता हूं, क्या केवल व्यर्थ की बातों में शक्तिक्षय न करके इस दुर्दशा का निवारण करने के लिए तुमने कोई यथार्थ कर्तव्य-पथ निश्चित किया है? क्या लोगों की भर्त्सना न कर उनकी सहायता का कोई उपाय सोचा है? क्या स्वदेशवासियों को उनकी इस जीवन्मृत अवस्था से बाहर निकालने के लिए कोई मार्ग ठीक किया है? क्या उनके दुखों को कम करने के लिए दो सांत्वनादायक शब्दों को खोजा है? यही दूसरी बात है। किन्तु इतने से ही पूरा न होगा!” 

उन्होंने कहा, “क्या तुम पर्वताकार विघ्न-बाधाओं को लांघकर कार्य करने के लिए तैयार हो? यदि सारी दुनिया हाथ में तलवार लेकर तुम्हारे विरोध में खड़ी हो जाए, तो भी क्या तुम जिसे सत्य समझते हो उसे पूरा करने का साहस करोगे? यदि तुम्हारे सगे-सम्बन्धी तुम्हारे विरोधी हो जाएं, भाग्यलक्ष्मी तुमसे रूठकर चली जाए, नाम-कीर्ति भी तुम्हारा साथ छोड़ दे, तो भी क्या तुम उस सत्य में संलग्न रहोगे? फिर भी क्या तुम उसके पीछे लगे रहकर अपने लक्ष्य की ओर सतत बढ़ते रहोगे? क्या तुममे ऐसी दृढ़ता है? बस यही तीसरी बात है।” स्वामी विवेकानन्द ने जोर देकर आगे कहा, “यदि तुममे ये तीन बातें हैं, तो तुममे से प्रत्येक अद्भुत कार्य कर सकता है। तब तुम्हें समाचारपत्रों में छपवाने की अथवा व्याख्यान देते फिरने की आवश्यकता न होगी। स्वयं तुम्हारा मुख ही दीप्त हो उठेगा! फिर तुम चाहे पर्वत की कन्दरा में रहो, तो भी तुम्हारे विचार चट्टानों को भेदकर बाहर निकल आयेंगे और सैकड़ों वर्ष तक सारे संसार में प्रतिध्वनित होते रहेंगे। और हो सकता है तब तक ऐसे ही रहें, जब तक उन्हें किसी मस्तिष्क का आधार न मिल जाए, और वे उसी के माध्यम से क्रियाशील हो उठें। विचार, निष्कपटता और पवित्र उद्देश्य में ऐसी ही जबर्दस्त शक्ति है।”

स्वामी विवेकानन्दजी का यह कथन देशप्रेम और देशभक्ति के मर्म को समझने के लिए पर्याप्त सरल है।

गुरु की महिमा अनन्त


‘‘गुरु पूर्णिमा’’ का नाम सुनते ही मन श्रद्धा के भाव से भर जाता है। गुरु शब्द की महिमा भी अनंत है। गुरु के बिना तो जीवन में कुछ भी संभव नहीं। पढ़ना, लिखना, बोलना, बताना आदि जो कुछ भी सीखते हैं वह सब गुरु की कृपा से ही! भारतीय विचारधारा के अनुरूप जीवन के प्रत्येक कार्य-क्षेत्र में गुरु का संग होना आवश्यक समझा जाता है। बिना गुरु के ज्ञान पूर्ण नहीं होता, ज्ञान की प्रामाणिकता सिद्ध नहीं होती है। हम किसी भी क्षेत्र में कितने भी योग्य क्यों न हो जायें लेकिन यदि हमारे सिर पर गुरु का हाथ न हो तो हमारा सारा ज्ञान अप्रामाणिक होता है, हमारे ज्ञान की पुष्टि नहीं होती और मन में भ्रम बना रहता है। इसलिए गुरु का महत्व और भी व्यापक हो जाता है। शिशु के जन्मदाता, शिशु की सेवा करने वाली दाई, नाम रखने वाले पण्डित, शिक्षा देने वाले शिक्षक, विवाह सम्पन्न करने वाले पुरोहित, मंत्र देने वाला धार्मिक व्यक्ति तथा अंतिम संस्कार करने वाला सामाजिक व्यक्ति- ये सभी तो गुरु माने जाते हैं। इन सभी से श्रेष्ठ और महान् वह गुरु है जो जीव को भव-बन्धन से मुक्त कर दिव्य जीवन प्रदान करता है। इसी गुरु को ‘‘सद्गुरु’’ की उपाधि मिलती है। सद्गुरु के समान अधिकारी, मनुष्यों में तो कोई है ही नहीं, देव-वर्ग भी इस श्रेणी में नहीं आते।
वेदोपनिषद में प्रणव मंत्र को प्रथम स्थान पर पूजने की विधि बताई गई है। यह कार अ, ऊ और म से मिलकर बना है, इसका तात्पर्य है उत्त्पत्ति, संवर्धन और लय। अपने यहाँ विनाश की संकल्पना नहीं है। क्योंकि कुछ भी समाप्त नहीं होता। हमारी संस्कृति में विसर्जन कहा जाता है अर्थात् विशेषत्व से जिसका सर्जन होता है। इसलिए ॐ विनाश नहीं करता, वह निर्माण, संवर्धन और विसर्जन कर पुनः सृजन करने की शक्ति का स्रोत है। हम महर्षि वेदव्यास की जयंती को गुरु पूर्णिमाके रूप में मनाते हैं। महर्षि वेदव्यास ने लक्षावधि वैदिक ऋचाओं को संकलित और सम्पादित किया, इतना ही नहीं तो उसे उचित ढंग से वर्गीकृत भी किया। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के साथ ही भागवत पुराण और श्रीमद्भगवद्गीता को समाज के लिए लिपिबद्ध किया। उन्हीं की कृपा है कि आज हम भाषा, ज्ञान, अनुभव और अपनी जिज्ञासा की पूर्ति के लिए जिस प्रकार की भी सहायता चाहते हैं वह भगवान वेदव्यास द्वारा रचित वेदों और 18 पुराण से प्राप्त होता है।
ॐ का उच्चारण करते ही हम वैदिक परम्परा से जुड़ जाते हैं। ॐ स्वयं ब्रम्ह का प्रतीक है, इसलिए विवेकानन्द केन्द्र ने ॐ को गुरु माना है। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर अपने अंतःकरण के संकल्प को गुरु चरणों में अर्पित कर हम अपने सामाजिक दायित्व को पूर्ण करने की शक्ति प्राप्त कर सकते हैं। संयम, शुचिता और धैर्य बहुत आवश्यक गुण है। जिस तरह तुरटी (फिटकरी) दूषित और मटमैले जल को शुद्ध कर देती है, उसी तरह इन गुणों को आत्मसात करने से अन्दर का दोष दूर हो जाता है। मनुष्य के जीवन में ये सारे गुण गुरु की कृपा से ही आते हैं।

Saturday, 8 June 2019

योग का वास्तविक प्रभाव कैसे दिखेगा ?

भई, ज्येष्ठ का महीना है और गर्मी का बड़ा ही जोर है। गर्मी के कारण गला सूखता है, और प्यास भी लगती है। हम अपनी प्यास बुझाने के लिए जलस्रोतों की ओर चल पड़ते हैं। जिन क्षेत्रों में पर्याप्त जल है वहां नलों तथा कूपों से बड़ी आसानी से जल मिल जाता है। जबकि अनेक स्थानों पर नदी, तालाब आदि सूखने लगते हैं। पर ऐसे समय में वह नदी, वह जलस्रोत हमें पूजनीय लगता है जो भीषण गर्मी के बावजूद हमारी प्यास बुझाता है। 

सद्गुरु कबीर साहब ने भक्तिभाव के निरन्तर बने रहने के सम्बन्ध में बड़ी मार्मिक बात कही है :-   
भक्ति भाव भादो नदी, सबे चले उतराय।
सरिता सोई सराहिये, जेठ मास ठहराय।।
अर्थात् भादो के महीने में तो हर नदी, तालाब लबालब भरे होते हैं; परन्तु ज्येष्ठ माह में प्रत्येक नदी में पानी नहीं होता। वह नदी सराहनीय है जिसमें ज्येष्ठ माह के दौरान भी पर्याप्त जलराशि होती है। उपर्युक्त साखी में भक्तिभाव को भादो नदी कहा गया है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि भक्ति भादो के महीने में ही प्रगट होती है, वरन भक्ति की नदी प्रतिपल, निरन्तर, सदैव प्रवाहित होती रहती है। इसलिए अपने भीतर विद्यमान भक्तिभाव का अवलोकन करना आवश्यक है कि वह कब-कब प्रगट होता है? या फिर वह भाव हमारे मन, वचन और कर्म में निरंतन प्रगट हो रहा है अथवा नहीं।         

भारत का विश्व के लिए सर्वश्रेष्ठ उपहार है – “योग”। 21 जून को सारा विश्व “अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस” मना रहा है। भारत में भी सभी राज्यों में बड़े-बड़े मैदान से लेकर छोटे से छोटे प्रांगण में 21 जून को योगासन-प्राणायाम कर इस दिन को बड़े उत्साह और श्रद्धा से मनाया जाता है। इस दिन विशेष बात यह भी होती है कि जो लोग चादर तानकर वर्षभर सोते हैं, वे भी सुबह उठकर योग करते दिखाई देते हैं। ऐसे में क्या लाभ? सिर्फ फोटोबाजी करने के लिए आसन किया जाएगा तो भला शरीर मजबूत कैसे होगा? हमें नियमित आसन-प्राणायाम करना होगा, तभी शरीर और मन शुद्ध होगा।    

फिर सवाल उठता है कि क्या शरीर के स्वास्थ्य, मजबूती अथवा सुगठन के लिए ही योग किया जाना चाहिए या फिर उसके आगे भी कुछ है। जो लोग नित्य रूप से बाग-बगीचे में एकत्रित होकर योगासन करते हैं उनके शरीर, मन, बुद्धि पर निश्चित रूप से सकारात्मक प्रभाव तो पड़ता ही है। पर केवल आसन, प्राणायाम और सूर्यनमस्कार को ही योग समझ लेना सही नहीं है। 

योग के आठ अंग हैं – यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। इनमें से प्रारम्भिक दो अंगों का महत्त्व सबसे अधिक है। इसलिए उन्हें सबसे प्रथम स्थान दिया गया है। यम और नियम का पालन करने का अर्थ मनुष्यत्व का सवर्तोन्मुखी विकास है। योग का आरम्भ मनुष्यत्व की पूर्णता के साथ आरम्भ होता है। बिना इसके साधना का कुछ प्रयोजन नहीं। इसलिए यम और नियम को छोड़कर हम केवल आसन और प्राणायाम पर केन्द्रित हो जाएं तो बात नहीं बनेगी। 

यम के पांच आयाम हैं : अहिंसा (अपने विचार, शब्द और कृति से किसी को भी पीड़ा नहीं देना) सत्य (विचारों में सत्यता, परम-सत्य में स्थित रहना, सत्य का पालन) अस्तेय (चोर-प्रवृत्ति का न होना), ब्रम्हचर्य (ब्रम्ह का साक्षात्कार और इन्द्रिय संयम) और अपरिग्रह (आवश्यकतानुरूप संचय)। इसी तरह नियम के भी पांच अंग हैं : शौच (शरीर और मन की शुद्धि), संतोष (संतुष्ट और प्रसन्न रहना) , तप (स्वयं से अनुशासित रहना), स्वाध्याय (आत्मचिंतन करना) तथा ईश्वर-प्रणिधान (ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण)। 

“युज्यते अनेन इति योगः” अर्थात् योग जुड़ने की प्रक्रिया है। आत्मा को परमात्मा से, व्यक्ति को परिवार से, परिवार को समाज से, समाज को राष्ट्र से और फिर समष्टि से जोड़ने की साधना है योग। 

योग के ऐसे अनेक सूत्र हमारे मनीषियों ने दिए हैं। हम आसन को देखकर उसके अनुरूप अपनी स्थिति तो बना सकते हैं, अपने शरीर को स्वस्थ भी रख सकते हैं पर चित्त की शुद्धि, मन की पवित्रता आदि के लिए यम और नियम का पालन तो करना ही होगा। यम-नियम को अपने आचरण का अंग बनाना होगा। तभी विश्व में योग का वास्तविक प्रभाव दिखेगा।

Wednesday, 1 May 2019

ग्रीष्मकालीन अवकाश : संस्कार सिंचन का अवसर

स्कूली बच्चे बहुत प्रसन्न हैं कि परीक्षा समाप्त हो गई है और अब वे सोच रहे हैं कि हम ग्रीष्मकालीन छुट्टी का लाभ उठाएंगे, आनंद लेंगे। वहीं विद्यालय के संचालक गण ‘विज्ञापन का बीज’ बोने लगे हैं ताकि अगले वर्ष अधिकाधिक बच्चों का एडमिशन उनके विद्यालय में हो सके। कुछ विद्यालय में तो गायन, वादन, नृत्य, कराटे, स्केटिंग, चित्रकला आदि कलाओं पर आधारित वर्ग चलाए जाते हैं। अभिभावकों के मन में योजना बन रही होगी कि बच्चों को इस अवकाश में क्या सिखाया जाए? या फिर कहीं घूमने के लिए परिवार सहित जाएं। यह सब स्वाभाविक है।

विद्यार्थी वर्षभर स्कूल के होमवर्क, विविध प्रतियोगिताओं तथा परीक्षा की तैयारी में व्यस्त रहते हैं। इसलिए कम से कम ग्रीष्मकाल के अवकाश में वे चिन्ताविमुक्त होकर आनंदित रहना पसंद करते हैं। स्कूली जीवन की व्यस्तताएं इतनी अधिक है कि स्कूल के पाठ्यक्रम से इतर वे कुछ भी पढ़ नहीं पाते। वहीं गणित, विज्ञान, अंग्रेजी आदि विषयों के ट्यूशन के चलते बच्चों का मैदान में दिखना, मानो दुर्लभ हो गया है। जब बालक मैदान में नहीं खेलेगा तो भला वह मजबूत कैसे बनेगा? कभी अभिभावकों से चर्चा होती है तो उनका जोर केवल बच्चे की मार्कशीट पर ही होता है। हर कोई चाहता है कि उनके बच्चे कक्षा में अव्वल आए और कुछ अभिभावक इतने अधिक महत्वाकांक्षी होते हैं कि देश में उनका ही पुत्र या पुत्री सबसे आगे हो। अभिभावकों का ऐसा सोचना अनुचित नहीं है। फिर इस सोच में कमी किस बात की है, इसपर विचार करना होगा। 

प्रतिस्पर्धा के इस युग में दृढ़ता से खड़े होने के लिए केवल परीक्षा में अव्वल आना ही पर्याप्त नहीं है। बुद्धि के साथ ही शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक बल की आवश्यकता होती है और भावनात्मक रूप से भी मजबूत होना पड़ता है। शरीर, मन, बुद्धि, हृदय और विचार सब एक दूसरे से जुड़े हैं, परस्पर पूरक हैं। इसलिए सर्वांगीण विकास के लिए प्रयत्न करना चाहिए। शरीर स्वस्थ होगा तो प्रत्येक चुनौती से लड़ा जा सकता है। पढ़ने के लिए बैठक क्षमता को बढ़ाना होगा। मन की एकाग्रता के बिना स्मरणशक्ति का विकास नहीं हो सकता। निर्भयता, समझ, आत्मविश्वास और धैर्य बल को प्राप्त किये बिना सफलता भी नहीं मिलती। 

स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि, “प्रत्येक आत्मा एक अव्यक्त ब्रम्ह है।” उन्होंने यह भी कहा था कि, “शिक्षा का अर्थ है, - उस पूर्णता की अभिव्यक्ति, जो सब मनुष्यों में पहले ही से विद्यमान है।"

ये ‘पूर्णता’ और ‘अभिव्यक्ति’ बहुत गम्भीर विषय है। भला बालक इसे कैसे समझ सकता है? यह प्रश्न हमारे मन में उठना स्वाभाविक है। परन्तु स्वामीजी के उक्त कथन पर हम विचार करते हैं तो प्रतीत होता है कि पूर्णता तो हमारे भीतर है ही, उसे बस अभिव्यक्त करना है। जीवन में ऐसी अनेक समस्याएं या चुनौतियां आती हैं जिसका सामना करना हमारे लिए अनिवार्य होता है, और नियति हमसे वह करवा भी लेती है। अतः आवश्यक है कि अपनेआप को जानना, अपनी क्षमताओं को पहचानना और उसे निरन्तर विकसित करना, इसी में मनुष्य जीवन की सार्थकता निहित है। फिर प्रश्न उठता है कि क्या बालकों का सर्वांगीण विकास संभव है? इसका उत्तर है- “हाँ। सम्भव है।”

बालकों का सर्वांगीण विकास उनके आयुनुसार, उनकी रुचिनुसार और उनकी आवश्यकता के अनुसार किया जा सकता है। विवेकानन्द केन्द्र कन्याकुमारी की देशभर में फैली शाखाओं के माध्यम से विद्यालयीन बाल-बालिकाओं के लिए संस्कार वर्ग चलाए जाते हैं। संस्कार वर्ग में प्रार्थना, स्तोत्र पठन, देशभक्ति गीत, योग-सूर्यनमस्कार, मैदानी खेल, कथाकथन और प्रति सप्ताह एक छोटा, किन्तु महत्वपूर्ण संकल्प का समावेश होता है जो विद्यार्थियों के मानसपटल पर अमिट छाप छोड़ते हैं। इस ग्रीष्मकालीन अवकाश के समय में देशभर केन्द्र की सभी शाखाओं के माध्यम से छात्र-छात्राओं के लिए व्यक्तित्व विकास शिविर, संस्कार वर्ग प्रशिक्षण शिविर, युवाओं के लिए युवा प्रेरणा शिविर आदि का आयोजन किया जाता है। इन शिविरों में साहस, आत्मविश्वास, धैर्य, अनुशासन, सदाचार, देशभक्ति आदि गुणों के सिंचन के लिए व्यवस्थित पाठ्यक्रम और दिनचर्या बनाई जाती है। हजारों विद्यार्थी इस शिविर में सहभागी होते हैं। महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा लेकर अपने जीवन को गढ़ने का यह स्वर्णिम अवसर होता है। अतः विवेकानन्द केन्द्र का आह्वान है कि इन शिविरों तथा संस्कार वर्ग में अपने-अपने नौनिहालों को सहभागी होने के लिए प्रेरित करें, उन्हें भेजें। 

Monday, 1 April 2019

मनाएं अपना “भारतीय नववर्ष”

विश्व की सर्वाधिक वैज्ञानिक कालगणना का नववर्ष है - चैत्र शुक्ल वर्ष प्रतिपदा। वर्ष प्रतिपदा, गुढ़ीपाड़वा, नवसंवत्सर, संवत्सरी, चेट्रीचंद आदि नामों से मनाया जानेवाला यह वर्ष के स्वागत का पर्व काल के माहात्म्य का पर्व है। इसका एक नाम युगादी है जिसे उगादी भी कहा जाता है। युग का आदि अर्थात प्रारम्भ का दिन। इस दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना की। सृजन के साथ ही समय का प्रारम्भ हुआ। वास्तव में यह अत्यन्त वैज्ञानिक संकल्पना है। हिन्दू धर्म का नववर्ष इसी दिन प्रारम्भ होता है। हिंदी पंचांग में इस तिथि का बहुत अधिक महत्व है। यह अनेक ऐतिहासिक पलों या फिर कई घटनाओं का स्मरण करने का दिन है। वैज्ञानिक मान्यता है कि हिन्दू पंचांग व कालगणना सबसे अधिक वैज्ञानिक है।

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा सृष्टि के आरम्भ का दिन है। अपनी यह कालगणना सबसे प्राचीन है। सृष्टि के आरम्भ से अब तक १ अरब, ९५ करोड़, ५८ लाख, ८५ हजार ९९ वर्ष से अधिक वर्ष बीत चुके हैं। यह गणना ज्योतिष विज्ञान के द्वारा निर्मित है। आधुनिक वैज्ञानिक भी सृष्टि की उत्पति का समय एक अरब वर्ष से अधिक बता रहे हैं। भारत में कई प्रकार से कालगणना की जाती है। युगाब्द (कलियुग का प्रारंभ) श्रीकृष्ण संवत्, विक्रमी संवत्, शक संवत् आदि। वर्ष प्रतिपदा का दिन एक प्रकार से मौसम परिवर्तन का भी प्रतीक है। बसंत ऋतु का आरम्भ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है। यह उल्लास, उमंग, खुशी तथा चारों ओर पीले पुष्पों की सुगन्ध  से भरी होती है। इस समय नई फसलें भी पककर तैयार हो जाती हैं। नक्षत्र शुभ स्थिति में होते हैं किसी भी कार्य को प्रारम्भ करने का शुभ समय चैत्र शुक्ल प्रतिपदा ही होता है।

कहा जाता है कि इसी दिन सूर्योदय से ब्रहमाजी ने जगत् की रचना प्रारम्भ की। २०७५ वर्ष पहले सम्राट् विक्रमादित्य ने अपना राज्य स्थापित किया था जिनके नाम पर विक्रमी सम्वत् आरम्भ हुआ। इसी दिन लंका विजय के बाद अयोध्या वापस आने के बाद प्रभु श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ था। अतः यह दिन श्रीराम के राज्याभिषेक दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। शक्ति और भक्ति का प्रतीक नवरात्रि का पर्व भी इसी दिन से प्रारम्भ होता है। एक प्रकार से नवरात्रि स्थापना का पहला दिन यही है। सिखों के द्वितीय गुरू अंगददेवजी का प्राकट्योत्सव  भी मनाया जाता है। स्वामी दयानंद सरस्वती ने इसी दिन आर्य समाज की स्थापना की थी। सिन्ध प्रांत के समाज रक्षक वरूणावतार संत झूलेलाल इसी दिन प्रकट हुए। अतः यह दिन चेट्रीचंद के रूप में सिंधी समाज बड़े ही उत्साह के साथ मनाता है। पूरे देशभर में सांस्कृतिक समारोह का आयोजन किया जाता है। झांकिया आदि निकाली जाती हैं। विक्रमादित्य की भांति उनके पौत्र शालिवाहन ने हूणों को परासत करके दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने के लिए शालिवाहन सम्वत्सर का प्रारम्भ किया। सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशवराम बलिराम हेडगेवार का जन्म हुआ था।

अपनी कालगणना हिन्दू जीवन के रोम-रोम एवं भारत के कण-कण से अत्यंत गहराई से जुड़ी है। भारत की सामान्य ग्रामीण जनता भी अच्छी तरह से जानती है कि अष्टमी कब है या नवमी कब है। देश का किसान व गरीब जनता भी चन्द्रमा की गति से परिचित होता है। हिन्दू नववर्ष के दिन हिन्दू घरों में नवरात्रि के प्रारम्भ के अवसर पर कलश स्थापना की जाती है। घरों में पताका, ध्वज आदि लगाये जाते हैं तथा पूरा नववर्ष सफलतापूर्वक बीते इसके लिए माता-पिता सहित सभी बड़ों का आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। लोग नौ दिनों तक फलाहारी व्रत रहकर माँ की आराधना करते हैं तथा उनका पुण्य प्राप्त करते हैं।

आइए, हम अपना नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन जो इस वर्ष 6 अप्रैल को है, मनाएं और यह सन्देश घर-घर पहुंचाएं।

Friday, 1 March 2019

पाकिस्तान के विरुद्ध निर्णायक कार्रवाई हो...

गत 14 फरवरी को जम्मू-कश्मीर के पुलवामा जिले में “जैश-ए-मोहम्मद” के एक आत्मघाती बम हमलावर ने विस्फोटकों से लदी एक गाड़ी सीआरपीएफ की एक बस से टकरा दी। फलस्वरूप विस्फोट में केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के 40 जवान शहीद हो गए और कई अन्य गम्भीर रूप से घायल हुए। पुलवामा के अवंतिपुरा में हुए इस आत्मघाती हमले के बाद पूरे देश में रोष फैल गया और हर तरफ से आतंक और पाकिस्तान के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करने का मांग उठने लगी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश को आश्वस्त किया है कि आतंकी संगठन और उनके सरपरस्त गुनाहगारों को उनके इस अपराध की सजा जरूर मिलेगी। उरी हमले के तीन साल बाद कश्मीर घाटी में हुए इस हमले के बाद केंद्रीय मंत्रीमण्डल सुरक्षा समिति की बैठक में पाकिस्तान को सबक सिखाने की दृष्टि से सरकार ने दो मुख्य निर्णय लिए हैं। इनमें एक, भारत द्वारा पाक को मोस्ट फेवर नेशन का दर्जा वापस लिया है और दूसरा, सेना को कार्रवाई के लिए पूर्ण स्वतंत्रता दे दी है। इन निर्णयों से यह उम्मीद जगी है कि अब प्रधानमंत्री मोदी पाक के विरुद्ध कठोर कार्यवाही करेंगे। 

प्रधानमंत्री मोदी विश्व पटल पर भले ही कूटनीति के रंग दिखाने में सफल हों, लेकिन अपने देश की आंतरिक स्थिति को सुधारने और पाकिस्तान को सबक सिखाने की दृष्टि से उनकी रणनीति को सफलता मिलना अभी शेष है। सीमा के भीतर से सैन्य ठिकानों पर आतंकी हमलों की सूची लम्बी है। हंदवाड़ा, शोपियां, पुलवामा, तंगधार, कुपवाड़ा, पंपोर, श्रीनगर, सोपोर, राजौरीम, बड़गाम, उरी और पठानकोट में हुए हमलों में हमने अपने सैनिकों के रूप में बड़ी कीमत चुकाई है। भारत की ओर से संबंधों में सुधार की तमाम कोशिशों के बावजूद पाकिस्तान ने साफ कर दिया है कि वह शांति कायम रखने और निर्धारित शर्तों को मानने के लिए कतई गम्भीर नहीं हैं। अब समय आ गया है कि पाकिस्तान संबंधी नीतियों में आमूलचूल परिवर्तन किया जाए। साथ ही कश्मीर के परिप्रेक्ष्य में भी नई और ठोस रणनीति अमल में लाई जाए।

भारत ने पाकिस्तान से अनुकूल (फेवरेट) नेशन का दर्जा वापस लेकर एक अच्छी पहल की है। इससे दुनिया से व्यापार के स्तर पर पाक की जो मजबूत साख बनी हुई है, इससे पाक की अंतर्राष्ट्रीय साख पर बट्टा लगेगा। यह अपनी जगह ठीक है, लेकिन शोक, आक्रोश एवं दुख की इस घड़ी में केवल और केवल घाटी की इस लड़ाई को निर्णायक लड़ाई में बदलने की जरूरत है। क्योंकि पाकिस्तान आर्थिक प्रतिबंध की भाषा समझता नहीं है, इसलिए उसे केवल ताकत की भाषा से सबक सिखाने की जरूरत है। 2016 में पाक अधिकृत कश्मीर में घुसकर भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक करके आतंकी शिविरों पर जो हमला बोला था, यह सिलसिला पाकिस्तान की जमीन पर जारी रखना होगा। जरूरत पड़े तो 1971 की लड़ाई की तरह पाक से सीधी लड़ाई भी लड़नी होगी। इस समय पाकिस्तान की अर्थव्यस्था पूरी तरह चरमरा रही है, इसलिए यह गरम लोहे पर चोट करने का सही समय है। अब पाक के साथ निर्णायक और बहुकोणीय लड़ाई लड़ने की जरूरत है। पत्थरबाज यदि सामने आते हैं तो उन्हें भी न केवल सबक सिखाने की जरूरत है, बल्कि इस तरह के मामलों को मानवाधिकार के दायरे से भी बाहर करना होगा।

राष्ट्र की सुरक्षा के लिए अपनी प्राण हथेली पर लिए हमारी भारतीय सेना प्रतिपल अपने कर्तव्य का पालन कर रही है। हम सभी देशवासी सेना के पराक्रम को नमन करते हैं, और ईश्वर से हम प्रार्थना करते हैं कि भारत के शत्रुओं के विरुद्ध चलाए जानेवाले सभी अभियानों में हमारे वीर जवानों को विजय प्राप्त हो।

पुलवामा में शहीद हुए सभी जवानों को हम सभी की ओर विनम्र श्रद्धांजलि...शत शत नमन...




Friday, 1 February 2019

आ वसन्त

माघ शुक्ला पंचमी को वसन्त पंचमी कहा जाता है। सरस्वती की पूजा करके, वसन्त का स्वागत किया जाता है। मधु और माधव - चैत्र और वैशाख महीने को वसन्त ऋतु कहा जाता है। आज वसन्त कालचक्र में आता है। वसन्त अपने आप नहीं आता। उसे बुलाना पड़ता है। हम वसन्त प्रारम्भ होने के सवा महीने पहले ही वसन्त को न्यौता देते हैं। महाकवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ ने गाया-
धीरे धीरे उतर क्षितिज से
आ वसन्त रजनी !
सौ वर्ष हो गए। हिन्दी साहित्य में छायावाद का आरम्भ हुआ। जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानन्दन पन्त, सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला, महादेवी वर्मा, रामकुमार वर्मा, भगवतीचरण वर्मा आदि ने अपनी छायावादी रचनाओं को माध्यम बनाकर, वसन्त को निमंत्रण दिया।


वसन्त प्रकृति का यौवन होता है। उसका आह्वान ताजा फूलों से किया जाता है- बासी फूलों से नहीं- प्रकृति के यौवन का शृंगार - करेंगे, कभी न बासी फूल। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपने ‘वसन्त आ गया है’ निबन्ध में कहा है कि वसन्त को आमंत्रित करो तो वसन्त आएगा- बिना बुलाये कभी नहीं आ सकता। निराला ने माता सरस्वती को पुकारा-
भारति ! जय-विजय करे !
प्रिय स्वतंत्र रव, अमिय मंत्र नव, भारत में भर दे।
नये अमृतगान से सरस्वती के माध्यम से वसन्त को निमंत्रित किया जाता है। दिनकर ने ‘मेरे नगपति मेरे विशाल- मेरी जननी के स्वर्ण भाल कह कर, यौवन का आह्वान किया। माखन लाल चतुर्वेदी ने गाया-
सिर पर पाग आगे हाथों में लेचानी का घड़ा
जवानी देख की प्रियतम खड़ा!
जयशंकर प्रसाद ने गाया-
हिमाद्रि तुम श्रृंग से, प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयंप्रभा समुज्ज्वला स्वतन्त्रता पुकारती
अमत्र्य वीर पुत्र हो, दृढ़-प्रतिज्ञ सोच लो
प्रशस्त पुण्य पन्थ है, बढ़े चलो बढ़े चलो।
सारा छायावादी काव्य, प्रकृति के यौवन का आह्वान है- वसन्त का आह्वान है। सौ वर्ष के साहित्य के विकास का अध्ययन करके, अगले सौ वर्ष के विकास की रूपरेखा बनानी चाहिए। वसन्त पंचमी को सरस्वती पूजन करके, ऐसा किया जा सकता है। भारत युवाओं का देश है। आबादी का 61 प्रतिशत भाग युवाओं का है। स्वामी विवेकानन्द युवकों का आह्वान करते हुए कहते थे- प्राण वायु का ऐसा कण, अनन्त निष्प्राणों में प्राण का संचार करता है। ज्योति का एक कण अनेक अंधकार में खोये हुओं को ज्योतिर्मय बना सकता है- तुम तो प्राणमय हो, ज्योतिर्मय भी- प्राणमय ज्योति, ज्योतिर्मय प्राण! क्या नहीं कर सकते?

स्वामी विवेकानन्द युवाओं को फौलादी मन और करुणा से द्रवीभूत मन (हृदयों) वाला देखना चाहते थे। ऐसे युवाओं में ही वसंत का आगमन होता है। चिर वसन्त की कामना, भारत में ही की जा सकती है। कोई भी बूढ़े भारत की कल्पना और कामना नहीं करना चाहता।

वस् आच्छादन धातु से वसन्त शब्द बनता है। वस्-प्रकटीकरणे धातु भी है। वसन्त इसी धातु से बना हुआ शब्द है। व्यक्ति अपनी शक्तियों का प्रकटीकरण करता है- स्वयं को अभिव्यक्त करता है- आत्माभिव्यक्ति करता है। आत्माभिव्यक्ति करके, व्यक्ति अपने वासन्ती व्यक्तित्व का परिचय कराता है।
श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया है-
उच्छरेद् आत्मनात्मानं नात्मानमव सादयेत्।।
अपना उद्धार स्वयं करें। अपना अपमान कभी न करें। 
वासन्ती व्यक्तित्व का धनी व्यक्ति ही ऐसा कर सकता है। वह युवा तो होगा ही।
कोकिल को वसन्त के आगमन का सन्देश वाहक माना जाता है-
कोकिल बोल
कनरस घोला
आया वह
बन कर वसन्त का दूत।
भगवती सरस्वती जाड़े की जड़ता को दूर करती हुई, वसन्त को आमंत्रित करती है। जड़ता को दूर करना विद्या की देवी का प्रथम कर्तव्य है- जादयान्धकारावहाम्। इस गीत में वसन्त का आह्वान है-
नमन चषक रीते है
ज्योति मदिर पीने दो !
सपना सा जाग गया नीले आकाश तले
हरियाली गोदी में सौरभ के लाल पले।
बहक बहक पवन के
झकोरे रस पीने दो
फागुन में छलक गई मान भरी गागरी
सुधि को बटोर लाई मधुकर की रागनी।
मन की मनुहार सखी
सपनों में सोने दो
रंग भरे आंगन में मधु की बरसात री
दूध दुही चाँदनियाँ प्रीति भरी रात री
मुधकासी पाहुन को मन भर कर जीने दो।

Tuesday, 1 January 2019

युवा और गणतन्त्र

26 जनवरी को भारत के लिए गणतांत्रिक व्यवस्था स्वीकार करके भारत की जनता ने आगे बढ़ने का संकल्प प्रस्तुत किया था। संविधान बना जिसमें इस विराट् राष्ट्र का जन अधिकार पत्र देखा जा सकता है। जनवरी में ही ‘युवा दिवस’ आता है। स्वामी विवेकानन्द की मान्यता थी कि यदि सर्वश्रेष्ठ मानव का जन्म हो सकता है तो वह भारत के गाँव में ही हो सकता है, जहाँ आधे-से देवता और आधे-से भगवान रहते हैं।

युवा शब्द ‘यु’ धातु से बनता है जिसका अर्थ है- मिश्रण और अमिश्रण। देश और दुनिया की अनेक समस्याएँ होती हैं। युवक उनमें से एक के साथ जुड़ कर और अन्य से दूर हट कर उसका समाधान खोजता है। इसी क्रम में एक-एक कर के वह सभी समस्याओं का हल खोज लेता है। इसलिए वह युवा है। जितनी बड़ी चुनौती होती है, वह उतना ही बड़ा हो जाता है- जैसे समुद्र पार करने के लिए हनुमान ‘कनकमूथराकार’ हो गए थे। 

युवा को तरुण भी कहा जाता है। तरुण का अर्थ है- तैराक, तैर कर पार करने वाला। वेद में आता है-
अश्मनवती रीयते संरभ्ध्वम्। उत्तिष्ठत प्रतरत सखायः।

पथरीली नदी बह रही है, उसमें तैरना संभव नहीं है। बड़ी से बड़ी चुनौती है तो उसी के अनुरूप बन जाओ। समारम्भ करो। उसी ओर सब सखा मिलकर उसे पार कर जाओ। जैसे तैर नहीं सकते, वहाँ युक्तिपूर्वक नदी पार करो।

भारत युवाओं का देश है। वे देश के विकास के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जायेंगे। कोई प्रेरक चाहिए। विवेकानन्द चाहते थे कि भारत के युवा जागें। वे लोहे की तरह शरीर बना लें और हृदय में करुणा का स्रोत हो। सेवा में सबसे आगे रहें। भतृहरि ने कहा है -  सेवाधर्म परम गहनो यो गिनायाम्यमभ्यः। 

प्रजातंत्र वह जिसमें सब प्र-ज = प्रदष्टजन्मा हो। लोकतंत्र वह है जिसमें सब अवलोकन क्षम हो। जनतंत्र वह है जिसमें सब दिव्यजन्मा बन सकें। गणतंत्र वह है जिसमें सब नागरिक गण्य-मान्य है। हमारी व्यवस्था इनमें से कुछ भी नहीं है क्योंकि अपनी व्यवस्था में प्रत्येक नागरिक को कुछ बनना पड़ता है। नागरिक कुछ भी न बनेगा तो कोई व्यवस्था भी नहीं होगी।

भारतीय समाज एक अखण्ड परिवार की तरह से है। परिवार वह है जिसमें प्रत्येक सदस्य को अपने दोषों को दूर करने के लिए वातावरण और अवसर मिलता है- परितः वरियति स्वदोषान् यस्मिन् सः। परिवार संसार का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय है, सबसे बड़ा प्रशिक्षणालय है, सबसे बड़ा चिकित्सालय है और सबसे बड़ा साधना केन्द्र है।

दुर्भाग्य से देश की नई सरकार ने योजनाबद्ध षड्यंत्र करके परिवार पर ही आक्रमण किया। छोटा परिवार के नाम से समाज को बाँटा। ‘हम दो हमारे दो’ या ‘हम दो हमारा एक’ के नारे लगाए। परिवार कभी छोटा हो ही नहीं सकता। विश्वकुटुम्ब की भावना कैसे साकार होगी।

परिवार में भाई, बहिन, भतीजे, भांजे, दौहित्र, बुआ, फूफा, मौसी, मौसा, पति, जेठ, देवर आदि अनेक सम्बन्ध बनते हैं और उनमें पवित्रता बनाये रखने पर बल दिया जाता है। यह भूल जाने के कारण समाज में कई समस्याएँ पैदा हो गई है। कन्या भ्रूण हत्या, अपहरण, बलात्कार की समस्याएँ नई हैं। कन्याओं को तो कामना करने योग्य मान कर अष्ट मंगलों में स्थान दिया गया था।
परिवार पर आक्रमण होने से जनसंख्या वृद्धि की समस्या ने जन्म लिया। पहले संयुक्त परिवार में पाँच भाइयों में एक बेटा या बेटी हो तो वह सब की सन्तान मानी जाती थी। हम दो - हमारे दो की सोच से आबादी बढ़ी। किसी को किसी से कोई लगाव नहीं रहा। सन्तान भी विद्रोही हो गई। सामंजस्य का धागा टूट गया।

परिवार का निर्माण कुलवधू करती थी। वेद का वचन है - जायेदस्तम् = जाया इत् अस्तम् - जाया ही घर है- ‘गृहिणी गृहः उच्यते।’ (मनुस्मृति)

परिवार (व्यवस्था) शिथिल हुआ तो स्त्री का दर्जा कम हुआ है। मनु ने कहा था - यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता। जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवता भी रमण करते हैं। नारी की अवमानना हुई तो परिवार टूटने लगे। परिवार भारत की मानव जाति के इतिहास को महत्त्वपूर्ण सबसे बड़ी देन है। इससे भारतीय सनातन परम्परा कमजोर हुई। गणतंत्र गण्य-मान्य बनने का मार्ग खोजें।