Monday, 24 December 2018

युवा और गणतन्त्र

26 जनवरी को भारत के लिए गणतांत्रिक व्यवस्था स्वीकार करके भारत की जनता ने आगे बढ़ने का संकल्प प्रस्तुत किया था। संविधान बना जिसमें इस विराट् राष्ट्र का जन अधिकार पत्र देखा जा सकता है। जनवरी में ही ‘युवा दिवस’ आता है। स्वामी विवेकानन्द की मान्यता थी कि यदि सर्वश्रेष्ठ मानव का जन्म हो सकता है तो वह भारत के गाँव में ही हो सकता है, जहाँ आधे-से देवता और आधे-से भगवान रहते हैं।

युवा शब्द ‘यु’ धातु से बनता है जिसका अर्थ है- मिश्रण और अमिश्रण। देश और दुनिया की अनेक समस्याएँ होती हैं। युवक उनमें से एक के साथ जुड़ कर और अन्य से दूर हट कर उसका समाधान खोजता है। इसी क्रम में एक-एक कर के वह सभी समस्याओं का हल खोज लेता है। इसलिए वह युवा है। जितनी बड़ी चुनौती होती है, वह उतना ही बड़ा हो जाता है- जैसे समुद्र पार करने के लिए हनुमान ‘कनकमूथराकार’ हो गए थे। 

युवा को तरुण भी कहा जाता है। तरुण का अर्थ है- तैराक, तैर कर पार करने वाला। वेद में आता है-
अश्मनवती रीयते संरभ्ध्वम्। उत्तिष्ठत प्रतरत सखायः।

पथरीली नदी बह रही है, उसमें तैरना संभव नहीं है। बड़ी से बड़ी चुनौती है तो उसी के अनुरूप बन जाओ। समारम्भ करो। उसी ओर सब सखा मिलकर उसे पार कर जाओ। जैसे तैर नहीं सकते, वहाँ युक्तिपूर्वक नदी पार करो।

भारत युवाओं का देश है। वे देश के विकास के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जायेंगे। कोई प्रेरक चाहिए। विवेकानन्द चाहते थे कि भारत के युवा जागें। वे लोहे की तरह शरीर बना लें और हृदय में करुणा का स्रोत हो। सेवा में सबसे आगे रहें। भतृहरि ने कहा है -  सेवाधर्म परम गहनो यो गिनायाम्यमभ्यः। 

प्रजातंत्र वह जिसमें सब प्र-ज = प्रदष्टजन्मा हो। लोकतंत्र वह है जिसमें सब अवलोकन क्षम हो। जनतंत्र वह है जिसमें सब दिव्यजन्मा बन सकें। गणतंत्र वह है जिसमें सब नागरिक गण्य-मान्य है। हमारी व्यवस्था इनमें से कुछ भी नहीं है क्योंकि अपनी व्यवस्था में प्रत्येक नागरिक को कुछ बनना पड़ता है। नागरिक कुछ भी न बनेगा तो कोई व्यवस्था भी नहीं होगी।

भारतीय समाज एक अखण्ड परिवार की तरह से है। परिवार वह है जिसमें प्रत्येक सदस्य को अपने दोषों को दूर करने के लिए वातावरण और अवसर मिलता है- परितः वरियति स्वदोषान् यस्मिन् सः। परिवार संसार का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय है, सबसे बड़ा प्रशिक्षणालय है, सबसे बड़ा चिकित्सालय है और सबसे बड़ा साधना केन्द्र है।

दुर्भाग्य से देश की नई सरकार ने योजनाबद्ध षड्यंत्र करके परिवार पर ही आक्रमण किया। छोटा परिवार के नाम से समाज को बाँटा। ‘हम दो हमारे दो’ या ‘हम दो हमारा एक’ के नारे लगाए। परिवार कभी छोटा हो ही नहीं सकता। विश्वकुटुम्ब की भावना कैसे साकार होगी।

परिवार में भाई, बहिन, भतीजे, भांजे, दौहित्र, बुआ, फूफा, मौसी, मौसा, पति, जेठ, देवर आदि अनेक सम्बन्ध बनते हैं और उनमें पवित्रता बनाये रखने पर बल दिया जाता है। यह भूल जाने के कारण समाज में कई समस्याएँ पैदा हो गई है। कन्या भ्रूण हत्या, अपहरण, बलात्कार की समस्याएँ नई हैं। कन्याओं को तो कामना करने योग्य मान कर अष्ट मंगलों में स्थान दिया गया था।
परिवार पर आक्रमण होने से जनसंख्या वृद्धि की समस्या ने जन्म लिया। पहले संयुक्त परिवार में पाँच भाइयों में एक बेटा या बेटी हो तो वह सब की सन्तान मानी जाती थी। हम दो - हमारे दो की सोच से आबादी बढ़ी। किसी को किसी से कोई लगाव नहीं रहा। सन्तान भी विद्रोही हो गई। सामंजस्य का धागा टूट गया।

परिवार का निर्माण कुलवधू करती थी। वेद का वचन है - जायेदस्तम् = जाया इत् अस्तम् - जाया ही घर है- ‘गृहिणी गृहः उच्यते।’ (मनुस्मृति)

परिवार (व्यवस्था) शिथिल हुआ तो स्त्री का दर्जा कम हुआ है। मनु ने कहा था - यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता। जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवता भी रमण करते हैं। नारी की अवमानना हुई तो परिवार टूटने लगे। परिवार भारत की मानव जाति के इतिहास को महत्त्वपूर्ण सबसे बड़ी देन है। इससे भारतीय सनातन परम्परा कमजोर हुई। गणतंत्र गण्य-मान्य बनने का मार्ग खोजें।