Tuesday, 4 September 2018

जड़ों को सींचें

हमारा कार्य, मूलभूत कार्य है। हमें जड़ों को सींचना है। हमें जड़ों को सींचना है यानी क्या करना है? अपना राष्ट्र, अपनी संस्कृति की जड़ें क्या है, यह जानने का प्रयास करते हैं, तो पाते हैं कि वेद हमारा मूल हैं, हमारी जड़ें हैं। इस वेदके मर्म को समझना होगा। वेद अर्थात अस्तित्व का सनातन नियम, हमारा जीवन दर्शन है। यही हमारी संस्कृति का मूल है, राष्ट्र का मूल है। क्योंकि यह राष्ट्र ही सांस्कृतिक राष्ट्र है। जब-जब अपने राष्ट्र पर आक्रमण हुए, कठिनाइयां आईं तब-तब हमने अपने जड़ों को पहचाना और उसे सींचा, तब हमारी संस्कृति का विकास हुआ। ऐसे तत्व जीवन में धारण करनेवाले जितने लोग समाज में रहें, उतना ही इस समाज का, इस राष्ट्र का विकास हुआ है। जब-जब यह तत्व छूट गया या आचरण में नहीं रहा, तब-तब कठिनाइयों का सामना करते समय हमारे पांव लडखड़ाए या हम सामना नहीं कर पाए, या हम अपना विकास नहीं कर पाए।
 
विवेकानन्द केन्द्र में मा. एकनाथजी ने भी उसी के ऊपर जोर दिया था, और हम सब जानते ही हैं कि, इसीलिए उन्होंने विवेकानन्द केन्द्र की स्थापना की। आज हम देखते हैं कि हमें स्वतंत्रता तो प्राप्त हो गई और हमारी बाह्य विकास, आर्थिक स्थिति भी सुधर रही है। समाज भी संगठित हो रहा है। लेकिन ये तत्व हमारे जीवन से चले जायेंगे, हमारी चेतना में नहीं रहेंगे तो यह राष्ट्र बाह्य रूप से विकसित होते हुये भी दुर्बल रहेगा और विकास स्थायी नहीं रहेगा। इसलिए ही अपने भारत राष्ट्र में इन तत्वों को हमारे जीवन में धारण करते हुए, अपने व्यवहार से जड़ों को सींचते हुए लोगों को जोड़ने का कार्य हमें सातत्य से करना है। 

माननीय एकनाथजी ने विवेकानन्द केन्द्र को एक प्रखर वैचारिक आंदोलन के रूप में खड़ा किया क्योंकि विवेकानन्द केन्द्र का प्रयोजन जड़ों को सींचना हैं। यदि इन तत्वों को भूलकर हम कार्यक्रम के लिए कार्यक्रम (एक्टिविटीस के लिए एक्टिविटी) करते रहेंगे तो कभी-कभी हमारे मन में प्रश्न आ सकता है कि सच में हम जो कर रहे हैं, उसका कोई प्रयोजन है क्या? वैचारिक आन्दोलन के रूप में हमारा प्रयोजन निश्चित है। हम इस प्रयोजन को हम अपनी आँखों से, अपने चेतन स्तर पर या अपने व्यवहार से ओझल नहीं होने दें। जड़ों को सींचनाही हमारा कार्य है। स्वामी विवेकानन्द ने कहा है कि जब-जब भारत राष्ट्र का विकास हुआ, जब भी यह राष्ट्र और भी प्रभावी रूप से उभरा उसके पहले आध्यात्मिक विचारों का यानी वेद तत्वों का प्रसार समाज में हुआ था। अपने राष्ट्र में इस दृष्टि से अनेक उदाहरण हैं। विद्यारण्य स्वामी पहले आए, हरिहर बुक्क ने विजयनगर साम्राज्य खड़ा किया। स्वामी रामदास ने फिर से इसमें ध्यान केन्द्रित किया और उसी को जीवन में लाकर कार्य करनेवाले श्रीमान् योगी शिवाजी महाराज ने फिर से आदिलशाही, निजामशाही, कुतुबशाही, मुगलशाही जैसे मुस्लिम आक्रान्ताओं की जो सत्ता बढ़ रही थी किन्तु युद्ध में हिन्दू मर रहे थे ऐसी जो स्थिति बनी थी उसको ही उन्होंने बदल दिया। इसी तरह रामकृष्ण-विवेकानन्द हैं। ऐसे अनेक उदाहरण ले सकते हैं। चाहे स्थानिक स्तर पर या अखिल भारतीय स्तर पर पद्धति यही रही हैं आध्यात्मिक तत्वों का समाज में और जीवन में विकास और उसके बाद कठिनाइयों को पार कर वैभवशाली इतिहास।  ऐसे अनेक उदाहरण स्थानीय स्तर पर या अखिल भारतीय स्तर पर दिखते हैं। जब-जब हम अपने संस्कृति के मूल तत्व- जिसमें एकात्मता, आत्मीयता, संयम, नियम आदि का समावेश है, - को आचरण में उतारकर सम्मानपूर्वक जीवन जी रहे थे, तब-तब हमने निश्चित रूप से कठिनाइयों को पार किया और फिर से समाज को वैभवशाली बनाया।  

एक उदाहरण है तमिलनाडु का - बिशप काल्डवेल ने षड्यंत्र के तहत 1901 में शुरू किया कि तमिल लोग हिन्दू नहीं हैं, ये द्रविड़ संस्कृति अलग है। द्रविड़ अलग हैं, आर्यों ने यहां (भारत में) आकर उनको नीचे ढकेला आदि-आदि। इस प्रकार के जहर के बीज बिशप काल्डवेल ने बोए, उस समय तो लोग हँसे। उनको पता था यह सही नहीं है। उदाहरणार्थ, १९०१ के सिर्फ तीन बरस पहले सन 1897 में अमेरिका से भारत लौटने के बाद स्वामी विवेकानन्द जब मद्रास आए थे, तो पहले दिन बहुत सारे लोग उनको सुनने आए। सभागृह के बाहर सभी जोर-जोर से स्वामीजी की जयजयकार के नारे लगा रहे थे। भवन के अंदर जितने लोग थे, सभागार के बाहर उससे 10 गुना लोग उपस्थित थे। लोग स्वामीजी को देखने गए थे, पर देख नहीं पा रहे थे इसलिए वे नारे लगा रहे थे। इन नारों के बीच स्वामीजी ज्यादा बोल नहीं पाए और स्वामीजी बाहर आ गए। बाहर एक रथ खड़ा था जिसपर स्वामीजी को बैठाकर सभागार तक लाया गया था, उसमें खड़े रहकर उन्होंने एक छोटा सा भाषण दिया। उस समय माईक की सुविधा नहीं थी। इतने सारे लोग आए थे और उस भीड़ के बीच भाषण दिया और उस भाषण के समाप्त होने के बाद भारतमाता की जयऔर आर्य धर्म की जय जयका उद्घोष हुआ। कल्पना कीजिए यह 1897 की बात है। 1901 में बिशप काल्डवेल ने हम आर्य नहीं द्रविड़ हैं, आर्य ने द्रविड़ियों को नीचे दक्षिण में धकेला हैऐसा कहकर जो जहर घोला था, इसका ही परिणाम था कि 1960 में डीके, डीएमके आन्दोलन तमिलनाडू में शुरू हुआ। उन्होंने बताना शुरू किया ये राम आर्य हैं, रावण द्रविड़ियन है, हमारा आदर्श रावण है। राम ने रावण को मारा, हम राम को सहन नहीं करेंगे। हम राम के मंदिर तोड़ेंगे और राम के गले में चप्पलों की माला डालेंगे। और ऐसा हुआ भी, मंदिर तोड़े गए, चप्पलों के हार पहनाएं गए और वातावरण दूषित हो गया था। ऐसे समय में कांचीकामकोटि के शंकराचार्य श्री चंद्रशेखरेन्द्र सरस्वती – जो 13 वर्ष की आयु में शंकराचार्य हुए और 104 वर्षों तक वे रहें और बहुत लम्बे समय तक उन्होंने कार्य किया-  पैदल गांव-गांव जाते थे, वे लोगों के बीच प्रवचन करते, रात को वीणा बजाते-बजाते उस पर ही सिर रखकर दो घंटे आराम कर लिया करते थे। उनका जीवन एकदम पारदर्शी था। वे गांव-गांव घूमते रहे और समाज में जो जहर डीके, डीएमके ने भरा उसे दूर किया। राम के जो मंदिर तोड़े थे, गणपति के जो मंदिर तोड़े थे, वे फिर से खड़े हुए।

इसी तरह अरूणाचल के तिरप, चांगलांग जिले में एनएससीएन (नैशनल सोशलिस्ट काउन्सिल ऑफ नागालैंड) और ईसाइयत का प्रभाव बढ़ने लगा। तीरप में सात लोगों जो समाज को अपने संस्कृति की रक्षा करने में नेतृत्व देने की योजना बना रहे थे, उनको आतंकवादियों ने मार दिया। चांगलांग में लोग इकठ्ठा आ सके, अपने इष्टदेवता की प्रार्थना कर सके इसलिए दो रंगफ्रा के मंदिर बनाए लेकिन आतंकवादियों ने दोनों मंदिर जला दिए और लोगों को धमकी दी। तब लोगों ने रातोंरात सबने मिलकर फिर से ये मंदिर बनाए। उन्होंने आतंकवादियों से यह बताना शुरू किया कि हम आपके रिलिजन के खिलाफ नहीं हैं न हम ईसा मसीह को नकारते हैं लेकिन हम अपनी संस्कृति का पालन करेंगे, सांस्कृतिक नियम से जीवन जियेंगे। वहां के जन सामान्य डटे रहे और इस निश्चय, एकता और सजगता से आज चांगलांग में 84 मंदिर विद्यमान हैं। अर्थात हम डटे रहें, और अपने सांस्कृतिक विचारों को अपने आचरण में लाते हैं तो जीवन में बदलाव आता है, समाज में बदलाव आता है। 

वेदों में कहा गया है - एकोSहमं बहुस्याम। वह एक ही है जो विविध रूपों में प्रगटित हुआ है, ये पूरा विश्व एक ही चैतन्य का विविधता भरा रूप है। विज्ञान कहता है कि शरीर छोटी-छोटी कोशिकाओं से मिलकर बना है। ये जो कोशिका है, हर कोशिका का जो प्रयोजन है, उन सबको जोड़नेवाला, जीवन देनेवाला प्राण है। इसी प्रकार हम सभी ईश्वर में ही जुड़ें हुए हैं। इसलिए हम परस्पर जुड़े हुए, परस्पर सम्बंधित, एक दूसरे के पूरक, परस्परावलम्बी हैं। इसलिए व्यक्ति-परिवार, समाज, राष्ट्र, सृष्टि, परमेष्टी का अंग है। हम सभी को जोड़नेवाली चेतना ईश्वर है। हमें सोचना चाहिए कि, ‘मेरा व्यवहार समाज में ऐसा रहे कि मैं समरसता लाऊं, आनंद लाऊं। मैं मेरे आत्मशक्ति में स्थित हो जाऊं। इसलिए मैं समाज में एकात्मता लाऊं, विघटन न करूं और समस्या आने पर मैं टूटूंगा नहीं, निराश नहीं होऊंगा। अत: दो प्रकार की साधना मुझे करनी है, - एक समाज को जोड़ने की, समाज धारणा की और दूसरी अपनेआप को दृढ़ रखने की और अंतत: ईश्वरस्वरूप होने की।’ इसलिए मुझे अपने स्वयं के भीतर के ईश्वर के विस्तार को देखना होगा जो कि मेरे स्वयं से लेकर परिवार, समाज और राष्ट्र, सृष्टि तक विस्तारित है, यह समष्टि की निःस्वार्थ होकर कार्य करने की उपासना है। स्वामीजी के अनुसार, यही मनुष्य निर्माण से राष्ट्र का पुनरुत्थानहै। इसे हम सरल भाषा में कहें तो आत्मीयता से व्यवहार करना। सभी से हमारा व्यवहार ऐसा हो जैसे कि वह मेरा ही अंग है, जैसे माँ अपनी संतान से करती है। यदि संतान गलत करे तो वह उसको थप्पड़ भी लगाती है, तो उस बालक की आँखों से आंसू आते हैं। और बाद में माँ अपने उस बच्चे का दुलार करती है, प्यार करती है। विवेकानन्द केन्द्र के कार्यकर्ता का व्यवहार आत्मीयता का होना चाहिए। अपने समाज में, राष्ट्र में इसी भाव को सर्वे भवन्तु सुखिन:कहते हैं।  

अपनी संस्कृति यज्ञ संस्कृति है। जो व्यक्ति जन्म लेता है उसका पालन पोषण पूरा समाज करता है, परिवार करता है, परिवेश करता है। इसी से वह व्यक्ति अपने जीवन में हर एक कार्य करने के लिए सुयोग्य बनता है। अपनी योग्यता के बल पर व्यक्ति अफसर, शिक्षक या जो भी है, वह कार्य करता है। उसी प्रकार माँ है तो माँ का कार्य, पिता है तो पिता का कार्य, बड़े भैया है भैया का कार्य, बहन है बहन का कार्य, दादा है तो दादा का कार्य, और नानी है तो नानी का कार्य सफलतापूर्वक करता है। ये सारी योग्यताएं समाज में रहकर, समाज के सहयोग से मनुष्य अर्जित करता है। व्यक्ति जो भी कार्य करता है उसके बदले उसे कर्मफल मिलता है, प्रतिष्ठा मिलती है। उस कर्मफल या प्रतिष्ठा के कुछ भाग को समाज की धारणा या राष्ट्र के पुनरुत्थान में समर्पित करना चाहिए, और बचा हुआ ही अपने लिए रखना है। वही आहुति है। श्रीमदभगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्अर्थात् सर्वव्यापी परमअक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है। धर्म से समाज की धारणा होती है और यज्ञ से धर्मपालन होता है। श्रीमदभगवद्गीता, में 3.15 श्रीकृष्ण कहते हैं,- यज्ञ के कारण ही धर्मचक्रचलता है। व्यक्ति में जब स्वार्थ पनपता है तो यह यज्ञ रूक जाता है। और यज्ञ रूकता है तो समाज विपन्न और विघटित होता जाता है जिससे बच्चों का योगक्षेम ठीक नहीं होता है और समाज और गिरता जाता है। तो हमें 24 घंटे समाज की धारणा का हेतु मन में रखकर उस भाव से कार्य करना है। यह 24 घंटे का कार्य हैं। ऐसा नहीं कि मैं शिक्षक हूं तो चार-पांच घंटे ही शिक्षक रहूंगा। माँ या पिता हूं तो कुछ देर के लिए ही माँ या पिता हूं। ऐसा नहीं होता, हम पूरे 24 घंटे शिक्षक हैं, माँ या पिता हैं। हम 24 घंटे समाज के अंग हैं, भले ही दायित्व के अनुसार कार्य हम कुछ घंटे करते हों। इसलिए यही तत्व कि समाज में जो कुछ करूं पूर्ण समर्पित भाव से करूं, समाज में अच्छे मूल्य प्रतिष्टित रहे इसलिए मेरा भी व्यवहार संयमित रहे, यह भाव विद्यमान रहना चाहिए। 

माननीय एकनाथजी ने उपनिषदों और वेदतत्व के प्रकाश में विवेकानन्द केन्द्र का कार्य प्रारंभ किया इसलिए हमारा काम केवल गतिविधियां करना नहीं, बल्कि समाज में उन तत्वों की स्थापना करना और उसे बनाये रखना भी है। इसलिए हम अपने भीतर दैवीय गुणों और दैवीय परिपूर्णता का अनुभव कर समाज का निर्माण करें, यह हमारा लक्ष्य है। अपने समय का नियोजन कर हम कुछ साध्य करना चाहते हैं। आध्यात्मिक शक्ति का अनुभव कर कार्य करना है, राष्ट्र का पुनरुत्थान करना है, यह भाव रहे। यह विचार माननीय एकनाथजी ने केन्द्र की स्थापना के समय एक पत्रक में प्रकाशित किया था जिसे और विस्तार से बाद में केन्द्र प्रार्थना में बताया है। 

केन्द्र प्रार्थना के पांच पंक्तियों में वेदों के तत्त्व निहित हैं जो हमारी संस्कृति की जड़ें हैं, उन्हें समझने का प्रयास करेंगे। 

१) ध्येयमार्गानुयात्राअर्थात् अपने ध्येय के मार्ग की जो यात्रा प्रारंभ की है, उसे हम त्याग, सेवा और आत्मबोध से ही विघ्नरहित बना सकते हैं। ये तीनों आयाम ध्येयप्राप्ति के लिए आवश्यक हैं। इनमें से केवल दो हों, तब भी बात पूरी नहीं होगी। तो पहला हमें त्यागके महत्व को समझना होगा। हमें कुछ न कुछ चीज का त्याग करना होगा। समय, ऊर्जा, व्यवहार या फिर अहंकार का त्याग। दूसरा,सेवाहोनी है अर्थात आत्मीयता कृति में प्रकट होनी चाहिए और तीसरा, उसका आधार एकात्मदर्शन, आत्मबोध हों। ये तीनों एक साथ हों। समाज के कई संगठन व क्लब काम करते हैं जिनमें त्याग है और सेवा है पर वेद दर्शननहीं तो वे समाज या राष्ट्र का निर्माण करेंगे, यह कह नहीं सकते। ऐसे कोई महंत होते हैं जिनके जीवन में त्याग होता है, वे वेद तत्व के महत्व को भी समझते हैं परंतु सेवा के कार्य में उसे परिणत नहीं करते इसलिए वे राष्ट्र पुनरुत्थान में प्रभावी नहीं होते हैं। इसलिए त्याग, सेवा और आत्मबोध, ये तीनों आयाम को लेकर ही हम राष्ट्र का पुनरुत्थान कर सकते हैं। एकनाथजी कहते हैं- इह जगति सदा न: त्यागसेवाSत्मबोधै:। भवतु विहतविघ्ना ध्येयमार्गानुयात्रा इह जगति सदाअर्थात हमेशा के लिएहमारे त्याग, सेवा और आत्मबोध से हम इस यात्रा को पूरा करें। त्याग, सेवा और आत्मबोध, केवल कभी-कभी नहीं तो हमारे जीवन में सदैव रखने का प्रयास करना है।  

२) वयं सुपुत्रा अमृतस्य नूनंहम ईश्वर के सुपुत्र हैं, ईश्वरस्वरूप हैं यह भाव हमारे प्रत्येक कार्यकर्ता के हर एक व्यक्ति के हृदय तक पहुंचाना होगा। हम आत्मस्वरूप हैं, हम शक्तिस्वरूप हैं, यह सबको बताना होगा, हमें पुरुषार्थी बनना होगा। जो कार्य करना है वो हम करेंगे ही उसके लिए आवश्यक शक्ति हमारे अन्दर निहित है। हम परिस्थिति से निराश नहीं होंगे लेकिन परिस्थिति बदलने की शक्ति हम में है इस विश्वास से, धैर्य से काम करनेवाले होंगे। 

३) निष्कामबुद्धयार्तविपन्नसेवा, विभो! तवाराधनमस्मदीयम् अर्थात हम ईश्वर का पूजन आर्त और विपन्नकी सेवा से करें। हम हमारे कार्य से ईश्वर की पूजा, साधना कर रहे हैं, यह भाव रहे। स्वामी विवेकानन्द कहते थे, - कार्य ही पूजा है। भगवद्गीता और उपनिषद् में भी कहा गया है कि हम इसी मार्ग से कार्य करते हुए 100 वर्ष तक जियेंगे। अपने जीवन में संयम के लिए हम व्रत और पूजा-अर्चना करना है तो जरूर करें, पर सच्ची ईश्वर पूजा आर्त और विपन्नकी सेवा ही है। ऐसा काम करने के लिए हमें 100 वर्ष तक जीना है ऐसी प्रार्थना हमारे शास्त्र सिखाते हैं। इसलिए अपना काम ठीक से करते जाएं। पहले ये सब डायनामिक्स हमारे कर्मभूमि में थे जो कहीं न कहीं अब छूट गए। लोग आज काम को टालते हैं। ऊपर से बताते हैं कि ज्यादा काम मत करिए कारण जो काम करता है उसे और ज्यादा काम दिया जाता है। अब हम तो इस मनुष्य योनि में अर्थात कर्मयोनी में काम करने के लिए ही तो आए हैं। तो काम टालना क्यों? हम जितना कर सकते हैं उससे अधिक करने का प्रयास करना है।  

४) तवैवाशिषा पूर्णतां तत्प्रयातुहां, हम कुछ कार्य शुरू करते हैं लेकिन ईश्वर की योजना कुछ और हो सकती है। विवेकानन्द शिला स्मारकइसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। लोगों ने सोचा कि स्वामीजी की एक प्रतिमा मात्र स्थापित करनी है। यदि वह बगैर बाधाओं के हो जाती तो फिर विवेकानन्द केन्द्र की स्थापना न होती। ईश्वरीय योजना कुछ और थी। विवेकानन्द के विचारों को अर्थात वेद तत्वसमाज में पहुंचाने थे इसलिए केन्द्र का सूत्रपात आवश्यक था। कठिनाइयां न होती तो न एकनाथजी उस कार्य में आते, न ऐसा भव्य स्मारक खड़ा होता और न ही विवेकानन्द केन्द्र की स्थापना होती। इसलिए कठिनाइयां आए तो पीछे न हटे, किन्तु क्षमताएं विकसित करें। हो सकता है कि मैं कार्य में अच्छी हूं, पर लोगों से ठीक संवाद नहीं कर पाती, तो मैं अपनी क्षमताओं को विकसित करूंगी। केवल कारण का रोना न रोएं। 

कारण का रोना रोने से, कभी न कोई जीता है। जो विष धारण कर सकता है वह अमृत को पीता है
इसलिए कठिनाइयों का सामना करें, रोये नहीं कि हमारी यहां तो कोई सुनता ही नहीं है, तो पता करें कि क्यों नहीं सुनते; हम उनको अपनाएं और अपनाने की आदत को विकसित करें। विचार करें, ऐसा तो नहीं कि बहुत ऑर्डर देने की मेरी आदत है, इस कारण से लोग मुझसे दूर चले जाते हैं तो अपनी इस आदत को सुधारें, सबको साथ लें। यदि हम संगठन में हैं तो सभी को साथ लेकर चलें। अपनी कमियां खोजें और स्वयं का आतंरिक विकास करें, यही जड़ों को सींचना है। 

पांचवा बिंदु है - समाज को समृद्ध, वैभवशाली करने का मंत्र और तंत्र -  वह मंत्र है जीवने यावदादानं स्यात् प्रदानं ततोधिकम्। हम जितना लेते हैं उससे बहुत ज्यादा समाज को दें और यह तभी संभव है जब कार्यकर्ता का आतंरिक विकास होगा, आत्मविकास होगा। मनुष्य का विकास दो तरह का होता है- एक, बाह्य विकास यानी कौशल्य प्राप्त करना, जैसे- संचालन करना, भाषण देना, प्रशासनिक क्षमता, संवाद कुशलता इत्यादि। इन्हें तो मनुष्य आवश्यकता के अनुसार शीघ्र सीख ही लेता है और यह करना भी है। दूसरा विकास है - आंतरिक विकास। इसे सजगता से करना होता है। आंतरिक विकास ही है - जड़ों को सींचना। आंतरिक विकास की पहल पहले स्वयं करें फिर सबका आंतरिक विकास करने में सहयोगी बनें। आंतरिक विकास के बिन्दु इस प्रकार हैं :-   

1. समय का नियोजन : आज समय का नियोजन सभी के लिए आवश्यक है, चाहे पूर्णकालिक कार्यकर्ता हों या अन्य सभी। पहले अपनी इस सुजलाम सुफलाम भूमि में हमें जीभ का संयम करना होता था इसलिए बहुत सारे व्रत भी करते थे किन्तु आज तो गेजेट्स के उपयोग में संयम की आवश्यकता है, उनमें हमारा बहुत समय जाता हैं। हमने स्वयं सोचना है की मैं कितना समय दूं। आज मोबाइल का व्रत भी बहुत जरूरी है। संयम के साथ वाट्सअप, फेसबुक आदि का प्रयोग करें। 15 मिनट या आधा घंटा से ज्यादा वाट्सअप न चलाऊं, ऐसा संकल्प हो। यदि मेरे मन में समाज के प्रति प्रेम है तो मुझे संयमलाना ही होगा।  यदि राष्ट्र के प्रति प्रेम है तो हम समय निकाल ही सकते हैं।   

2. वाणी पर नियंत्रण : आतंरिक विकास का एक और लक्षण हैं - वाणी। वाणी से कार्यकर्ता की पहचान होती है। रामायण में हनुमान की श्रीराम से जो प्रथम भेंट होती है उस समय हनुमान की वाणी से श्रीराम प्रसन्न होते हैं और कहते हैं, “यह हनुमान जिनके पास रहेगा उनका कार्य साध्य होगा ही।” सिर्फ हनुमान की वाणी से श्रीराम ने उनकी उत्तम कार्यकर्ता करके पहचान की। क्या थी हनुमान की वाणी की विशेषता?  
अ. अदीर्घम् :- कम शब्दों में अपनी बात को पूर्णता से कहना।
ब. अविलम्बितम् :-  सतत अपने कार्य के बारे तत्पर होने के कारण तथा सारी जानकारी सदैव ध्यान में रखने के कारण प्रश्न पूछते ही जवाब दे पाना।
क. असंदिग्धम् :- अपनी बात को स्पष्ट ढंग से रखना, संदिग्ध न रखना।
ड. अव्यथम् :- अपने शब्दों से दूसरों को व्यथा न हो। वाणी से किसी को दु:खी न करना। 
श्रीमद्भगवद्गीता में वाणी का संयम बताया है कि स्वाध्याय से हम अपनी वाणी पर संयम प्राप्त कर सकते हैं। अव्यथम्की साधना स्वाध्याय से होती है। 

3. निरहंकारिता : मैंनहीं, ‘हमकी साधना करें, अहंकाररहित होकर कार्य करें। मैंका लय करके कार्य करें। यह एक कठिन साधना है, यही आत्मबोध, आत्मीयता की साधना है। जितना हम आत्मबोध, त्याग और सेवा से कार्य करेंगे उतना सबको हम जोड़ पाएंगे और आत्मविश्वास से कार्य कर पाएंगे।  
केन्द्र प्रार्थना के जो पांच बिंदु हमने देखें, उसे हमें अपने जीवन में अंगीकार करने होंगे। भगिनी निवेदिता अपने आक्रामक हिन्दुत्वव्याख्यान में कहती हैं कि हमें अपनी बात को दृढ़तापूर्वक कहने का कौशल आना चाहिए तभी हम उस तत्व को समाज में स्थापित कर राष्ट्र का पुनरुत्थान कर पाएंगे। समाज से चलता हैयह भाव समाप्त कर सभी को अपनी क्षमता विकास के लिए प्रेरित करना होगा। 

शंकराचार्य श्री चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती जी कहते हैं,- यदि आप देश की अवनति को देखकर व्यथित नहीं होते हैं तो आप देशद्रोही हैं। नालंदा विश्वविद्यालय हमारा संस्कृति का अभिन्न धरोहर था उसका निर्माण फिर से हो रहा है। किन्तु हमारे दुर्भाग्य है कि नालंदा विश्वविद्यालय को देखने जाने के लिए बख्तयारपुर होकर जाना पड़ता है। ये वही बख्तियार खिलजी है जिसने भारत के बाहर से आकर नालंदा को जलाया था। अभी भी देश की आत्मा अपनी गरिमा से उठ नहीं सकती, क्योंकि हम जागरूक नहीं हैं। समाज आत्मविस्मृत होकर बैठा है। इसलिए आज इस सोए हुए समाज को अपनी गरिमा से पुन: प्रतिष्ठित करने के लिए खुद को गलाना होगा। तिल-तिल मिटकर इस राष्ट्र को फिर से खड़ा करना होगा। जड़ोंको सींचना होगा। 


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Thursday, 2 August 2018

स्वतंत्रता का मोल

स्वतंत्रता सबको प्रिय है। क्योंकि स्वतंत्रता मनुष्य का स्वभाव है। यही कारण है कि वह अपनी स्वतंत्रता के लिए छटपटाता है। हमारे देश में लगभग 1000 वर्षों तक विदेशी आक्रमण होते रहे। ग्रीक, हूण, शक, यवन और मुग़ल शासन की प्रताड़ना सहते हुए अपने सांस्कृतिक और अध्यात्मिक विरासत का जतन बड़ी सजगता के साथ हमारे पूर्वजों ने किया। तब जाकर हमारी सांस्कृतिक विरासत की रक्षा हो सकी। बाद में अंग्रेज आए और लगभग 200 वर्षों तक उन्होंने हमारे भारतवर्ष पर शासन किया। यह एक ऐसा शासन था जिसने वास्तव में हमारे देशवासियों के मन को गुलाम करने में सफलता पायी। देश अपना, भूमि अपनी, खेत अपने, इतिहास अपना, लोग अपने फिर भी सब पर शासन अंग्रेजों का ही चलता था। हम नहीं चाहते थे कि अपने भूमि, भवन, धर्म, संस्कृति और शिक्षा व्यवस्था पर अंग्रेजों की अधीनता रहे। इसलिए तो हमारे पूर्वजों ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया, हजारों देशभक्तों ने अपने प्राणों की आहुति दी, लाखों परिवारों इस स्वाधीनता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। और अंततोगत्वा 15 अगस्त, 1947 को हमारा देश “भारत” स्वतंत्र हुआ। पर क्या हम हमारे बलिदानी वीरों के ‘त्याग और सेवा’ प्राप्त स्वाधीनता के मोल को समझ पाए हैं, इस पर विचार होना चाहिए।

स्वतंत्रता का श्रेय केवल ‘एक’ को नहीं  

कई लोग कहते हैं कि देश को स्वतंत्रता अहिंसा से मिली, यह स्वतंत्रता महात्मा गांधी ने दिलाई। कई लोग कहते है कि अंग्रेजों ने भारत को लूटकर छोड़ दिया और हमें स्वतंत्रता मिल गई। स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजों के साथ युद्ध नहीं करना पड़ा। कई बुद्धिजीवी तो यहां तक कहते हैं कि अंग्रेज नहीं होते तो यहां लोकतंत्र नहीं होता और न ही देश में कोई विकास हो पाता। ये सही है कि महात्मा गांधी ने ‘स्वतंत्रता’ की इच्छा को जन मन में जगाया, उन्होंने इसे आन्दोलन का स्वरूप दिया। पर केवल अहिंसक आन्दोलन के प्रभाव से अंग्रेजों ने भारत को नहीं छोड़ा। भारत के अन्दर युवा क्रांतिकारियों के बलिदान के प्रति भारतवासियों के मन में अपार श्रद्धा थी, उनसे लाखों लोग देश के लिए मर मिटने के लिए प्रेरित हुए थे। एक तरफ सशस्त्र क्रांतिकारी, दूसरी ओर अहिंसक आन्दोलन (सत्याग्रह)। स्वतंत्रता आन्दोलन में जहां चंद्रशेखर आजाद ने क्रांतिकारियों के संगठन का नेतृत्व किया, वहीं महात्मा गांधी ने अहिंसक आन्दोलन की बागडोर सम्भाली। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने एक ओर आजाद हिन्द फ़ौज का नेतृत्व किया, वहीं दूसरी ओर स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने भारतीय युवाओं को सेना में शामिल होने का आह्वान किया। द्वितीय विश्वयुद्ध चल रहा था और अंग्रेजों को सैनिकों की आवश्यकता थी। अंग्रेज अपने स्वार्थ के लिए भारतीय युवाओं को सैनिक शिक्षा देने को तैयार थे। तब सावरकर ने इस अवसर का लाभ लेने के लिए युवाओं से कहा, “एकबार सैनिक शिक्षा ले लो और जब जरुरत पड़ेगी तो तय कर लेना कि बंदूक की गोली किस ओर चलाना है। सावरकर की प्रेरणा काम कर गई और युवा भारत सैनिक प्रशिक्षण में शामिल होने के लिए दौड़ पड़े। अंग्रेज डर गए कि जब सारे युवा सैनिक बन गए तो वे अंग्रेजों से लड़कर बूरी तरह समाप्त कर देंगे। अंग्रेजों का यह भय स्वाभाविक था क्योंकि लाखों युवा सैनिक प्रशिक्षण ले चुके थे।

स्वतंत्रता का श्रेय किसके नेतृत्व को है, इसको लेकर बहुत चर्चा होती है, विशेषकर सामान्य लोगों में। स्वतंत्रता आन्दोलन का नेतृत्व अनेक धाराओं में स्वतंत्रता सेनानियों ने किया, लेकिन सारे देशभक्तों की प्रेरणास्रोत तो स्वामी विवेकानन्दजी के विचार ही रहे। चाहे गांधी हो या सुभाष, चाहे लोकमान्य तिलक हो या सावरकर, क्रांतिकारियों के ठिकानों पर कभी अंग्रेज छापे मारते तो उन्हें उन ठिकानों पर स्वामी विवेकानन्दजी के देशभक्ति जगानेवाले विचार की प्रतियां मिलती। यह भी एक विशेष बात है जिसका संज्ञान लेना आवश्यक है। वहीं देश के कवियों, गीतकारों और साहित्यकारों के देशभक्ति जगानेवाले साहित्यिक योगदान को भी कभी नहीं भूलाया जा सकता। लोकमान्य तिलक और गणेशशंकर 'विद्यार्थी' की राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत पत्रकारिता जिसने स्वतंत्रता आन्दोलन को मुखर बनाया, गांधीजी का अहिंसक आन्दोलन, सावरकर ने सेना में भर्ती होने का आह्वान किया, सुभाषचन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फ़ौज बनाई और सशस्त्र क्रांति की मशाल तो 1857 से स्वतंत्रता तक जल ही रही थी। इसलिए केवल एक व्यक्ति को स्वतंत्रता प्राप्ति का श्रेय देना लाखों स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग, तप और बलिदान का अपमान हो होगा। लेकिन देश का दुर्भाग्य ही है कि हमारे यहां अंग्रेजों की चापलूसी करनेवाले लोग तब भी थे और उनका गुणगान करनेवाले लोग अब भी हैं।

स्वतंत्रता का दुरुपयोग

गुलामी मानसिकता के लोग स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग और बलिदान का महत्त्व न पहले समझते थे और न ही अब। इसलिए आज स्वतंत्रता का दुरुपयोग करने में इन्हें मजा आता है। इस श्रेणी में सामान्य मनुष्य कम ही हैं पर बड़े पदों पर बैठे लोग इस महान स्वतंत्रता का दुरुपयोग करने में कोई मौका नहीं छोड़ते। शिक्षा संस्थानों में शिक्षा की अव्यवस्था को देखिए, राजनीति में भ्रष्टाचार को देखिए, सिनेमा जगत में स्वैराचार को देखिए, सामाजिक क्षेत्रों में फैले जातिभेद और दुराचार को देखिए, कानून व्यवस्था में ईमानदारी की दुर्गति को देखिए, ये सारे दृश्य मानो हमारे महान स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान का उपहास कर रहे हैं। 

दूसरी ओर स्वतंत्रता दिवस के उत्सव को मनाने का तरीका भी देखिए। विद्यालयों, महाविद्यालयों तथा विभिन्न संस्थानों में तिरंगा फहराया जाता है। कुछ क्षण बलिदानियों को याद किया जाता है। वहीं देश की युवा पीढ़ी मोटरसाइकिल में सवार होकर, हाथों में तिरंगा लेकर सड़कों पर डीजे की कर्कश आवाज के साथ इस उत्सव को मनमानी ढंग से सेलिब्रेट करते दिखाई देते हैं। ये ‘देशभक्ति’ भी आज की पीढ़ी के लिए बड़ी कमाल की चीज हो गई है। फेसबुक, ट्विटर और वाट्सएप प्रोफाइल या चेहरे, कपड़े अथवा ब्रेसलेट पर तिरंगा लगा लो तो आप देशभक्त बन जाते हैं। क्या यही देशभक्ति है? तिरंगा का आदर तो होना ही चाहिए क्योंकि वह हमारे देश का राष्ट्रीय ध्वज है। पर केवल तिरंगे का प्रोफाइल फोटो बना देनेभर से क्या हमारी देशभक्ति साबित हो जाती है? क्यों क्रिकेट, 15 अगस्त और 26 जनवरी को ही जागती है हमारी लिमिटेड राष्ट्रभक्ति? इस बात पर भी चिन्तन होना चाहिए।

स्वतंत्रता मिली है - “राष्ट्रभक्ति की भावना से, समर्पण और बलिदान से”। राष्ट्र का उत्थान भी होगा देशभक्ति भाव के जागरण से। आइए, “देशभक्ति फिर जगे, देश का ये प्राण है” इस भाव का जागरण कर समाज में राष्ट्र चेतना का अलख जगाएं।

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Thursday, 5 July 2018

गुरु पूर्णिमा

गुरु पूर्णिमा इस साल 27 जुलाई को आनेवाली है। विवेकानन्द केन्द्र में हम इस उत्सव को मुख्यतः कार्यकर्ताओं के संवर्धन के लिए मनाते हैं। हम राष्ट्र के मूल को मजबूत करने, या यूँ कहें कि राष्ट्रीय पुनरुत्थान के लिए काम कर रहे हैं। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, ‘प्रत्येक राष्ट्र के पास देने के लिए एक संदेश है, उसे पूरा करना ही उसका भाग्य और मिशन है’। भारत की नियति है आध्यात्मिकता में दुनिया का मार्गदर्शन करना अर्थात् जीवन के सभी क्षेत्रों में एकत्व की अभिव्यक्ति। वेदों ने ‘‘एकत्व - एक से अनेक की उत्पत्ति’’ की इस दृष्टि को संदर्भित किया, निकाला, पोषण किया, उस पर चर्चा की और उसका वर्णन किया।

वेदों को संरक्षित करने के लिए (अस्तित्व के शाश्वत सत्य को प्रकट करनेवाले मन्त्रों का संग्रह), महर्षि श्री व्यास ने गुरु परम्परा स्थापित की। वह जानते थे कि किसी भी ज्ञान की निरंतरता, ज्ञान को आगे बढ़ाने हेतु प्रतिबद्ध और चरित्रवान व्यक्तियों की शृंखला पर निर्भर है। उन्होंने गुरु परम्परा बनाकर और ज्ञान की प्रत्येक शाखा को अलग-अलग परिवारों को सौंपकर इसे यथार्थ बना दिया।

महर्षि वेदव्यास के ये प्रयास और दृष्टि इतनी सफल थी कि भारत एक ऐसी भूमि बन गई जहाँ गुरु से शिष्य या पिता से पुत्र को ज्ञान की विभिन्न शाखाएँ प्राप्त होती रहीं । गुरु से शिष्य दृ गुरु परंपरा ने ज्ञान के इस प्रवाह को संरक्षित और समृद्ध करके, प्रत्येक युग के लिए इसे प्रासंगिक किया। इस प्रकार भारतमाता, जिसके जीवन में सनातन धर्म स्थापित है और सनातन धर्म जो नित्य नूतन और चिर पुरातन है, सदैव प्रासंगिक और शाश्वत हो गए। भगवान वेदव्यास द्वारा निर्मित गुरु परम्परा की यह प्रथा इतनी अनोखी थी कि उनकी जन्मतिथि अर्थात आषाढ़ पूर्णिमा को हमारी इस भूमि पर इसे गुरुपूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है।

भारत आंतरिक रूप से पूर्ण व्यवस्थित और आक्रमणों का सामना करने के लिए अच्छी तरह सुसज्जित था। लेकिन जब भारत में संगठित सेन्य बल और हिंसक विचारधाराओं का आगमन प्रारम्भ हुआ, तो हम असफल सिद्ध हुए। विभिन्न संगठित शत्रुतापूर्ण ताकतों और विचारधाराओं की शक्ति ने हमारी विभिन्न प्रणालियों को नष्ट कर दिया। अतः, संगठित होकर काम करने की आवश्यकता उत्पन्न हुई। यह समय की माँग है कि जो लोग राष्ट्र के बारे में चिंतित हैं, वे एक साथ आएँ और इसलिए धर्म को पुनः स्थापित करने के लिए, रामकृष्ण मिशन, चिन्मय मिशन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विवेकानन्द केन्द्र, माता अमृतानंदमयी मिशन और कई अन्य संस्थाएँ अस्तित्व में आईं।

संगठित कार्य आवश्यकता बन गई है। हमारा हिन्दू समाज बहु-स्तरीय है और इसमें विभिन्न सम्प्रदाय समाहित हैं। स्वामी विवेकानन्द जानते थे कि हमें व्यवस्थित होना है, लोगों को एक साथ लाने की आवश्यकता है। उन्होंने लिखा, ‘‘हमारे पास एक मंदिर होना चाहिए, क्योंकि हिन्दुओं के लिए, धर्म पहले आना चाहिए। फिर, आप कह सकते हैं, सभी सम्प्रदाय इसके बारे में झगड़ा करेंगे। लेकिन हम गैर-साम्प्रदायिक मंदिर बनायेंगे, जिसमें प्रतीक के रूप में केवल ‘‘ॐ’’ होगा, जो किसी भी सम्प्रदाय का सबसे बड़ा प्रतीक होगा। यदि यहाँ कोई ऐसा सम्प्रदाय है, जो मानता है कि ‘‘ॐ’’ प्रतीक नहीं होना चाहिए, तो उसे स्वयं को हिन्दू कहने का कोई अधिकार नहीं है... इसके बाद मंदिर के संबंध में शिक्षकों को प्रशिक्षित करने के लिए एक संस्थान होना चाहिए जो धर्म प्रचार करे और हमारे लोगों को धर्मनिरपेक्ष शिक्षा दे... फिर यह काम इन शिक्षकों और प्रचारकों के माध्यम से आगे बढ़ाया जाएगा, और धीरे-धीरे हमारे पास अन्य स्थानों पर भी ऐसे ही मंदिर होंगे, जब तक कि हम पूरे भारत को कवर न कर लें। यही मेरी योजना है। यह विशाल दिख सकती है, लेकिन यह बहुत जरूरी है। आप पूछ सकते हैं, इसके लिए पैसा कहां है। पैसे की जरूरत नहीं है... मनुष्य कहां हैं? यह सवाल है। मनुष्य, केवल मनुष्य की ही आवश्यकता हैः बाकी सब तो स्वतः हो जाएगा, लेकिन शक्तिवान, सामथ्र्यवान, आस्थावान युवा पुरुष जिनकी रीढ़ की हड्डी शुद्ध हो, जरूरी हैं।“
यही स्वामी विवेकानन्द की योजना थी, जिसने माननीय एकनाथजी को विवेकानन्द केन्द्र के लिए प्रेरित किया। युवा, अग्निपुंज और जीवंत युवाओं को सक्षम बनाने की दृष्टि से एकनाथजी ने विवेकानन्द केन्द्र की स्थापना की। केन्द्र में ‘‘ॐ’’ हमारे गुरु हैं। ॐकार अर्थात ईश्वर, जो लोगों को एक साथ लाने, संगठित तरीके से टीमवर्क के साथ काम करने हेतु मार्गदर्शक है। अतः हम अपने प्रार्थना कक्ष में ‘‘ॐ’’ के सामने प्रार्थना करते हैं। ॐ भगवान का नाम है, जो किसी भी भाषा से संबंधित नहीं है। भगवान का कोई भी अन्य नाम किसी विशिष्ट भाषा के मूल शब्दों से संबंधित है जो विशिष्ट अर्थ देता है और इस प्रकार उस भाषा को समझने वाले भक्त में सम्मान, भक्ति, प्रशंसा आदि के स्पन्दन पैदा करता है। लेकिन ॐकार किसी भी विशिष्ट भाषा तक सीमित नहीं है। यह भाषा से परे है और इस प्रकार सभी भाषाओं में भगवान के लिए आदर्श अभिव्यक्ति बन जाता है। ॐकार ब्रह्मांड के सभी चरणों- सृजन, जीवन और विसर्जन का प्रतिनिधित्व करता है। यह सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ है। यह सभी लोगों के देवी-देवताओं का प्रतिनिधित्व करता है। यह सर्व समावेशी है- इसमें सभी जातियाँ और पंथ समाहित है। योगशास्त्र कहते हैं, ‘‘तस्या वाचका प्रणवः’’ ॐकार ईश्वर की सबसे गहन अभिव्यक्ति है। ॐ ईश्वर है, जो हम सभी के लिए प्रेरणा का सदासर्वदा स्रोत है।

हम ऐसी भूमि पर पैदा हुए हैं जिसने सदैव संसार का मार्गदर्शन किया है और भविष्य में भी उसे दुनिया का मार्गदर्शन करना है। संगठन, जो धर्म स्थापित करने के लिए अस्तित्व में आया है, ईश्वरीय कार्य करने के लिए है, हमारे लिए ईश्वरीय है। अतः, जैसे गुरु को महत्व दिया जाता है, इसी प्रकार हम संगठन को महत्व देते हैं। हमारी इस भूमि ने अपने बच्चों को यही सिखाया है कि अपने सभी बुजुर्गों को गुरु के रूप में देखें, ताकि प्रत्येक में गुरुता-महानता और दिव्यता को देखा जा सके। यह वह जगह है जहां न केवल मनुष्यों बल्कि जानवरों और पक्षियों समेत पूरी प्रकृति को कई लोगों द्वारा गुरु के रूप में सम्मानित किया है, और किसी ने नहीं, बल्कि स्वयं दत्तात्रेयजी ने दृ जिन्हें ब्रह्मा, विष्णु, महेश का संयुक्त अवतार माना जाता है। ऐसा कहा जा सकता है कि चूँकि दत्तात्रेयजी ने अपने आस-पास गुरुता को देखा, अपने आस-पास की हर चीज से सीखने के लिए अपने दिमाग को प्रशिक्षित किया, अतः वे गुरुओं के गुरु बन गए। जब हम कहते हैं कि ॐकार हमारा गुरु है तो हमें इसका गहरा अर्थ समझना होगा। ॐकार से ही सृजन हुआ है, अतः ईश्वर हर जगह है। हमें अपने दिमाग को दत्तात्रेय जैसे ही, अपने आसपास के उन सभी से सीखने के लिए प्रशिक्षित करना है।

कभी-कभी कार्यकर्ता आसपास की स्थिति को देखकर निराशा का अनुभव करता है या दैनंदिन गतिविधि में यांत्रिक बन जाता है, या श्रद्धा की कमी के कारण रूचि खो देता है। ऐसा क्यों होता है? कहीं न कहीं व्यक्ति केवल दूसरों की कमियों और दुर्गुणों को देखता है और प्रत्येक वस्तु में गुरुता को देखने में विफल रहता है। या आत्मविश्वास की कमी से जूझता है, या ’मैं पृथ्वी पर और इस संगठन में क्यों हूँ’ यह प्रश्न महत्वहीन हो जाता है, या टीम के स्थान पर ’मैं’ बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। ऐसे समय में ॐकार से सीखना यानी हमारे चारों ओर की सब चीजों से सीखना, विभिन्न स्तरों पर हमारी टीमों में यह भाव जरूरी है। जैसा कि माननीय एकनाथजी ‘‘साधना आॅफ सर्विस’’ में कहते हैं, ‘‘हमें केवल बहरा और गूंगा बनकर हर बात पर आत्मसमर्पण नहीं करना चाहिए, बल्कि हमारे आस-पास की हर चीज के प्रति एक प्रबुद्ध दृष्टिकोण होना चाहिए। समीक्षकों की तरह अपने चारों ओर देखो और आप पाएंगे कि प्रतिक्षण और प्रकृति की महत्वहीन चीजों में भी आपके लिए एक सन्देश है, जो आपके लिए लाभकारी और प्रगति के लिए है। बस उन संदेशों को सुनने के लिए और उचित प्रकाश में उन्हें समझने और विमुक्त होने के लिए ग्रहणशील कान और एक चैकस मन होना चाहिए। हमारे चारों ओर सबकुछ के अर्थ को समझने की कोशिश करें। ये सब चीजें वहां क्यों हैं? उनमें क्या अर्थ निहित है और उनका उद्देश्य क्या है? मेरा जन्म क्यों हुआ? मुझे कन्याकुमारी (विवेकानन्द केन्द्र) क्यों लाया गया है? जब मैं अपनी शिक्षा प्राप्त कर रहा था तब तो मैंने कभी इसका सपना भी नहीं देखा।... अब जब यह निर्धारित किया गया है कि मुझे यहां होना चाहिए, तो मुझे अपने भविष्य को एक योग्य तरीके से आकार देना है। मेरा दृष्टिकोण सही होना चाहिए। कई बार मैंने देखा है कि लोग अपनी बस मिस कर देते हैं। यह अपने साथ नहीं होने दो। मैं यहाँ इस प्राचीन पवित्र भूमि में हूँ, न कि अमेरिका या जर्मनी में। क्यों?... हमें अपने आस-पास की दुनिया को सही तरीके से देखना है। अन्यथा सुस्त दिनचर्या के कारण जीवन नीरस और उबाऊ हो जाता है। उन सभी लोगों में यह असंबद्ध एकता है, जिनमें इस दृष्टिकोण की कमी हैं क्योंकि वे बाह्य प्रकृति को देखने और इसके अर्थ को समझने के कौशल से सुसज्जित नहीं हैं। हमारे आस-पास की दुनिया और घटनाओं में हमारे लिए निहित सन्देश को समझकर सही भावना से अनुकरण करनेवाला प्रत्येक व्यक्ति अच्छे समापन की ओर जाता है। ईश्वरीय प्रस्तावों पर अडिग रहना और उन्हें हल्के में न लेना ही एकमात्र तरीका है।’’

हमारे लिए गुरुपूर्णिमा का अर्थ है कि हम स्वयं को ईश्वरीय प्रस्तावों से जोड़ते हैं, ‘हमें भारत को विश्वगुरु बनाकर मानवता के लिए काम करने हेतु एक साथ लाया गया है’।

पिछले साल से, हम विषय ‘जल ही मूल है’ विषय पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि हम एकत्व-आत्मीयता जैसे उद्देश्यपूर्ण सिद्धांतों पर काम करते हुए, निरर्थक प्रयासों में समय बर्बाद न करें और स्वयं का विलय उस चमू में कर दें जिनके साथ हम काम करते हैं - ‘मैं’ नहीं ‘हम’। तभी हमारे टीमों का विस्तार होगा, अधिक कार्यकर्ता हमारे पास आएंगे। सभी स्तरों पर विस्तार और समावेशी चमुओं का निर्माण करने की आवश्यकता है। हम प्रत्येक के अच्छे गुणों की सराहना करना सीखते हैं और टीम के हित में स्वयं को विलय करने के लिए बड़ा दिल रखते हैं, ताकि हम टीमों का निर्माण कर सकें। गुरु-उपासना, हमारे लिए आध्यात्मिक साधना ही है।

इस वर्ष गुरुपूर्णिमा के उत्सव के लिए हम अपने सभी परिचितों - कार्यकर्ताओं, संरक्षकों, शुभचिंतकों, सभी योग सत्रों और अब तक किए गए सभी वर्गों के प्रतिभागियों, हमारी पत्रिकाओं के सदस्यों आदि को बुला सकते हैं। वे सभी गुरुपूर्णिमा उत्सव में शामिल हो सकते हैं, साथ ही साथ विवेकानन्द केन्द्र की गतिविधियों के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए ताकि वे देश के लिए अपना समय और ऊर्जा प्रदान कर सकें। कम से कम ‘राष्ट्र के लिए सप्ताह में एक घंटे’ देने के लिए और इस प्रकार उन्हें केन्द्र के वर्गों में सहभागी होने के लिए अपील की जा सकती है। जैसे-जैसे वे नियमित रूप से आते हैं, देश के लिए और अधिक समय देने के प्रति उनकी रुचि विकसित होगी।

गुरु पूर्णिमा का अवसर - ॐकार उपासना, सृष्टि में दिव्यता को देखने के लिए साधना शुरू करने का सही समय है, प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं की टीमों में ‘‘स्व’’ को विसर्जित कर उसके लिए कार्य करना।


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Monday, 4 June 2018

समरसता

मन एवं मनुष्याणां कारणं बन्ध मोक्षयोः अर्थात् बन्धन और मोक्ष का कारण मन है। यह श्रीमद्भगवद्गीता का वचन है। वहीं यह भी कहा गया है कि मन को वश में करना बड़ा कठिन है पर अभ्यास और वैराग्य से मन को जीता जा सकता है। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।

मन की तीन वृत्तियाँ हैं - इच्छा, ज्ञान और क्रिया। ये मिलकर एक रस हो जाए तब समरसता पैदा होती है। महाकवि जयशंकर प्रसाद ने कहा है - समरस थे जड़ और चेतन आनन्द अखण्ड घना था।

कामायनी में उनका आनन्द दर्शन विशद् रूप में प्रकट हुआ है। उसमें इच्छा, ज्ञान और क्रिया - मन की तीनों वृत्तियाँ मिलकर एक हो जाती हैं। ये समरस न हों तब तक आनन्द की सृष्टि नहीं हो सकती। तीनों वृत्तियाँ समरस हो जावें, तब मन विज्ञानमय कोश में आत्मसात् हो जाता है। विवेक का उदय होता है। आनन्दमय कोष में अखण्ड आनन्द की अनुभूति होती है।

सुख-दुःख की परिभाषा की गई - अनुकूलवेदनीयं सुखम्; प्रतिकूल वेदनीयं दुःखम्।
 
शरीर प्रकृति से बना है। उसमें समता-समानता नहीं होती। हाथ की पाँच अँगुलियाँ तक समान नहीं होतीं। चार अँगुलियाँ और अँगूठे में समरसता होती है।

परिवार के सब लोग एक-दूसरे के पूरक बनकर, परस्पर मदद करते हैं। मदद ही नहीं करते एक-दूसरे की उन्नति में सहायक भी होते हैं। वेद का वचन है - उद्-यानम् ते नावद्रव मानम् अर्थात् हे मनुष्य तुम्हारे लिए केवल ऊपर जाने का मार्ग है, उन्नति का मार्ग है न कि अद्योगति का।

परिवार का बड़ा रूप समाज होता है। जिसमें लोग साथ-साथ गति करें उसे समाज कहा जाता है - समं अजन्ते इति समाजः। मनु ने कहा है कि यह मेरा है, वह तेरा है - यह छोटी बुद्धिवाले सोचते हैं। उदारचरित व्यक्तियों के लिए तो वसुधा ही कुटुम्ब के समान है।
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।   (मनुस्मृति)

संसार भर के मनुष्य, एक ही मनुष्य जाति के हैं जिनका धर्म मानवता है। एक शब्द और है - जाति जिसे बोलचाल में न्यात कहा जाता है। जाति वह जिससे व्यक्ति की पहचान होती है। सोने का काम करे वह स्वर्णकार, चमड़े का काम करे वह चर्मकार, लोहे का काम करे वह लौहकार, लकड़ी का काम करे वह वर्द्धकि, कपड़े धोने का काम करे वह धोबी, घड़ा बनाए वह कुम्भकार (कुम्हार)। समाज के ये सभी लोग समरसतापूर्वक एक दूसरे की आवष्यकता की पूर्ति करते हैं। यह परिवार से बड़ा संगठन है।

भारत कृषिजीवी लोगों का देश है। कृषि सामूहिक श्रम का क्षेत्र है। इसमें अनेक मानवीय सम्बन्धों का विकास होता है और उन सम्बन्धों की पवित्रता की रक्षा भी की जाती है। यह सामाजिक समरसता का प्रमाण है। जाति और जाति का अन्तर न समझने के कारण हमारे प्रगतिशील लोग जाति-पाँति तोड़ने के लिए कटिबद्ध होकर बैठे हैं। भारत के सामाजिक ढाँचे को न समझने के कारण ऐसा होता है। जाति को गाली देने का अर्थ है - जन्मदात्री माता को गाली देना। जाति को तोड़ने का अर्थ है - सामाजिक समरसता को तोड़-मरोड़ कर नष्ट करना। दोनों ही अपराध हैं।

वेद का वचन है - कृषिमित् कृशस्व मादीन्यत् अर्थात् खेती ही करो जीवन को जुआँ मत बनाओ। लोक में भी प्रसिद्ध है - उत्तम खेती, मध्यम वणिज, अधम चाकरी। आज भारतीय समरसता की जीवन पद्धति को भूल जाने के कारण लोग नौकरियों के लिए गलकांट होड़ लगा रहे हैं। राजनीतिक दल नौकरियाँ बाँटने के नाम पर उनको बहका रहे हैं। वे आसानी से बहकावे में आ जाते हैं। भारत को सुनागरिकों का देश बनाना है अथवा नौकरों का देश बनाना है - इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। मानवीय श्रम का सौदा बन्द होना चाहिए।


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Sunday, 6 May 2018

त्वं हि ब्रह्मा बभूविथ

राष्ट्रमण्डल खेलों में भारतीय खिलाड़ियों ने 26 स्वर्ण पदक सहित कुल 66 पदक जीत कर भारत का गौरव बढ़ाया। पदक विजेताओं में अधिक उल्लेखनीय यह है कि अग्रणी पंक्ति में महिलाएं रहीं। उन्होंने कई मानक भी स्थापित किए। खिलाड़ी दल का ध्वज साक्षी ने संभाला था। इससे देशवासियों में जो आशा बंधी थी, वह पूरी हुई।

संयोग की ही बात थी कि सायना नेहवाल से साक्षी को भिड़ना पड़ा। नेहवाल को स्वर्ण पदक और साक्षी को रजत पदक मिला। दोनों अलग अलग खेलतीं तो दोनों स्वर्ण पदक प्राप्त करतीं। महिला शक्ति के सफल और सार्थक प्रदर्शन को देखकर यह अनिवार्य हो गया है कि खेलनीति बने और महिलाओं को अधिकाधिक अवसर दिया जाय। पहलवानी, भारोत्तोलन, भाला फेंक, दौड़, सर्वत्र महिलाएं छाई रहीं।
 
इसी वर्ष छोटी-सी महिला वायुयान चालिका ने अपना सर्वोत्तम प्रदर्शन करके सबसे बड़े युद्धकजेट विमान को उड़ाया। दूसरी ने नागरिक विमान उड़ाकर सर्वोत्तम प्रदर्शन किया। स्थल सेना की महिला विंग ने भी अपना सर्वोत्तम प्रदर्शन किया। हाकी, क्रिकेट, फुटबाल जैसे खेलों में भी भारत को गौरव, महिलाओं द्वारा मिला।
 
कभी कल्पना चावला ने अंतरिक्ष यात्रा द्वारा भारत का नाम प्रोज्ज्वल किया था। आने वाले समय में हमारी अंतरिक्ष यात्रा में फिर महिला जाने वाली है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधानशाला में कई महिलाएं काम कर रही हैं। प्रक्षेपणास्त्र निर्माण में भी उनका अभूतपूर्व योÛदान है। परमाणु आयुध निर्माण में भी एपीजे अब्दुलकलाम के दायित्व को संभाल रही हैं।
 
निर्मला सीतारामन् इस समय देश की रक्षा मंत्री हैं और वे भारत को रक्षा के क्षेत्र में सर्वोत्तम बनाने का संकल्प कर चुकी है। अध्यात्म चिन्तन में कभी गार्गी, मैत्रेयी, आम्भृणी के नाम प्रसिद्ध रहे हैं, मातृत्व के क्षेत्र में मदालसा का नाम अग्रणी रहा है, जिसने अपने पुत्रों को निवृत्ति के पुत्रों मार्ग पर भी आगे बढ़ाया और प्रवृत्ति के मार्ग पर भी। माता पार्वती ने देव सेनापति स्कन्द स्वामी को जन्म दिया था।
 
लकड़हारे से कालिदास बनाने वाली पत्नी को कैसे भुलाया जा सकता है? शकुन्तला ने दुश्यन्त से प्रेम करके सर्वदमन भरत को जन्म दिया था। अहल्या, आत्रेयी, अंजना, कौसल्या, कैकेयी, आत्रेयी, सुमित्रा, जनकनन्दिनी, महारानी लक्ष्मीबाई, चांद बीबी, रजिया, जीजा बाई, दुर्गावती, हाडा रानी आदि के मातृत्व, पत्नीत्व, वीरत्व को ऐतिहासिक गौरव प्राप्त है। पन्ना धाय के त्याग को कैसे भुलाया जा सकता है। इन्दिरा गांधी ने प्रधानमंत्री के रूप में भारतीय प्रायद्वीप का इतिहास भी बदल दिया और भूगोल भी। पाकिस्तान की 93000 सैनिकों की सैनिक टुकड़ी का आत्म समर्पण करवा दिया। पाकिस्तान का गर्व चूर-चूर कर दिया।

वनवासिनी शबरी को राम ने भामिनी कहा है - प्रकाशवती। अकिंचनता अतिथि सत्कार में बाधक नहीं हुई। बेर ही उपहार बन गए।

माताएं पलने में बच्चों को झुलाते हुए हालरिये गा कर पुत्र को मातृभूमि के लि, बलिदान देने का पाठ पढ़ाती हैं-
 
इळा न देणी आपणी, हालरिये हुलराय।
पूत सिखावे पालणे मरण बड़ाई माय।।
                                                          - वीर सतसई


साहित्य के क्षेत्र में महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चैहान, मृदुला सिन्हा आदि ने नाम कमाया है। राजनीति के क्षेत्र में वसुन्धरा राजे, नजमा हैपतुल्ला,आनन्दी बेन पटेल काम कर रही हैं।

घर घर में कुलवधू के रूप में घर में अपने कौशल को प्रकट करने वाली गृहिणी किसी भी वीरांगना से कम नहीं कही जा सकती। वेद की उक्ति है - जायेदस्तम् = जाया इत् अस्तम् = जाया ही घर है। इसी के आधार पर मनु ने कहा था - गृहिणी गृहम् उच्यते। वह उस घर का निर्माण करती है, जिससे राम के नाम जैसा पवित्र घर बनता है - तुलसी रघुनाथ नाम आपुनो सो घर है।
राम ने कहा था -
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।

सन्तान को संस्कार प्रदान करके, मनुष्य बनाने वाली माता ही होती है। परिवार, संस्कार निर्माण का केन्द्र होता है। वह संस्कार का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय है, सबसे बड़ा चिकित्साल्य है और सबसे बड़ा साधना केन्द्र है। उसमें सभी सदस्यों को अपने दोषों को दूर भगाने की सुविधा प्राप्त होती है -
परित: (नि-) वारयज्ञति स्वदोषान् यत्र तत् परिवारः।

इसका निर्माण कुलवधुएं करती हैं। अपने-पराये के भेद को दूर करके, उस चारित्रिक उदारता को महिलाएं ही जन्म देती हैं, जिससे विश्व-परिवार का भाव जागता है -
अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।
                                                           -मनु स्मृति

इसी कारण वेद में कहा गया है - त्वं हि ब्रह्मा बभूविथ - हे माता तू तो साक्षात् ब्रह्मा बन गई है। माता की गोद आकाश और धरती से भी बड़ी होती है। उसी में सन्तान पलती है।



Tuesday, 17 April 2018

दिशा बोध : कर्म देवो भव एवं कार्य का तंत्र

(23, 24 और 25 फरवरी, 2018 को विवेकानन्द केन्द्र की अखिल भारतीय अधिकारी बैठक असम के नलबारी में स्थित विवेकानन्द केन्द्र विद्यालय में सम्पन्न हुई। बैठक में केन्द्र के अखिल भारतीय उपाध्यक्ष माननीय बालकृष्णनजी और माननीय निवेदिता दीदी ने अधिकारियों को संबोधित किया। प्रस्तुत है उनके संबोधन का सारांश...) 

कर्म देवो भव 


आज जब हम अखिल भारतीय अधिकारी बैठक के उद्घाटन सत्र में एकत्रित हुए हैं और भगिनी निवेदिता की सार्ध शती चल रही है, तो आज मैं भगिनी निवेदिता, केन्द्र कार्य तथा कार्यकर्ता इन तीनों के सन्दर्भ में कुछ कहूँगा। भगिनी निवेदिता 1897 में भारत आईं और 1911 तक उन्होंने भारत के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। स्वामी विवेकानन्द ने 11 वर्ष तो भगिनी ने 13 वर्ष भारतवासियों को जागृत करने के लिए अखंड, अविरत परिश्रम किया। यह बिल्कुल सत्य है कि स्वामी विवेकानन्दजी और भगिनी निवेदिता ने भारत की स्वतंत्रता की नींव रखी। भगिनी निवेदिता के जीवन के कुछ मुख्य अंश, प्रसंग बहुत ही प्रेरणादायक है जिसे हमें अपने भीतर उतरना ही होगा। 

आक्रामक हिंदुत्व (Aggressive Hinduism), आक्रामक आदर्श (Aggressive Idealism) तथा आक्रामक समर्पण (Aggressive Dedication) इन तीन शब्दों की शक्ति को देखिए, अद्भुत है। यह मुझे बहुत अच्छा लगता है। भगिनी निवेदिता कहती हैं कि हिंदुत्व हो पर आक्रामक, हमारे आदर्श हों वह भी आक्रामक, और समर्पण भी हमारा आक्रामक होना चाहिए। हमारे देश में सुस्ती छाई थी, अब भी है, शिथिलता है इसलिए इसे झकझोरने के लिए, आलस्य और विषाद को तोड़ने के लिए इस "आक्रामकता" की महती आवश्यकता है। इसलिए भगिनी निवेदिता के कथन को समझिए। भगिनी ने सिर्फ बातें नहीं की वरन अपने जीवन में हिंदुत्व, आदर्श और समर्पण को बड़ी आक्रामकता से प्रगट भी किया। 

पाश्चात्य देश से आई भगिनी निवेदिता आह्वान करती है कि प्रत्येक भारतीय के मन में आक्रामक देशभक्ति होनी चाहिए। प्रत्येक भारतीय के रग-रग में भारतभक्ति होना आवश्यक है, तभी वह आक्रामक ढंग से देश के लिए कार्य कर सकेगा। सेवा साधना में माननीय एकनाथजी रानडे ने ``Systematic bind of mind’’ की बात कही है। यानी मन को व्यवस्थित रखना। अपने आदर्शों से किसी भी कीमत पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए। मन को सदैव अपने कार्य के अनुरूप दिशा में रखें, भटके नहीं। इसलिए विचार कीजिए कि हम जैसा बोलते हैं वैसा करते हैं क्या ? मेरा आदर्श, मेरी सोच, मेरी वाणी, मेरा आचरण, मेरी कृति एक समान है क्या ? यह बहुत ही महत्वपूर्ण है।  
सब लोग भारत के बारे में बोलते रहते हैं पर भगिनी निवेदिता ने भारत के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया और जो कुछ भी उस समय आवश्यक था, उन्होंने किया। उन्होंने Hindusim की बात कही थी यह तब की आवश्यकता थी। उस समय वैचारिक जागरण की आवश्यकता थी। अपने यहाँ हिन्दू धर्म की बातें होती थीं, वहीं पाश्चात्य जगत् में अलग-अलग वैचारिक शब्द का प्रचलन हो रहा था, ऐसे समय भगिनी ने हिन्दू धर्म के लिए "Hinduism (हिंदुत्व)" शब्द का प्रयोग किया। उन्होंने जोर देकर कहा था कि विश्व के अस्तित्व की रक्षा के लिए हिंदुत्व को जीवित रहना होगा। भगिनी निवेदिता के जीवन को हम देखते हैं तो पाते हैं कि उनके हृदय में हिंदुत्व का विशेष स्थान था। उनके रग-रग में भारतीयता थी। बंगाल में जब प्लेग महामारी फैल गई तब भगिनी ने पूर्ण समर्पण भाव से सेवा कार्य किया। उन्होंने ग्राम-शहर की नालियों को साफ किया, रोगियों की सेवा-सुश्रुषा की। इतना ही नहीं उन्होंने युवकों को एकत्रित कर उन्हें सेवाकार्य में योगदान देने के लिए प्रेरित किया। 

युवाओं से संवाद के समय भगिनी कहा करती थीं कि शिक्षा अर्जित करो, बड़े बनों। तुम जो कुछ करो, देश के लिए करो। शिक्षक, डाक्टर, इंजिनियर, वकील, पत्रकार जो भी बनना है जरुर बनों, देश के लिए बनों। देश के लिए त्याग और सेवा हो, यह आत्मबोध भगिनी ने अपने सम्पर्क में आये प्रत्येक युवाओं के हृदय में जगाया। 

त्याग और सेवा, मोक्ष प्राप्ति के लिए नहीं है। संसार में लाने-ले जाने का काम भगवान का है। इसलिए मोक्ष प्राप्ति की इच्छा से सेवाकार्य नहीं करना चाहिए। त्याग और सेवा निःस्वार्थ भाव से होनी चाहिए। हमारे विद्यालय, प्रकल्प, कार्य पद्धति, उत्सव आदि सबकुछ राष्ट्र जागरण के लिए है, मनुष्य निर्माण के लिए हैं। 

भगिनी ने वेद, उपनिषद्, रामायण, गीता का अध्ययन किया और हिन्दू धर्म के इस महान् सन्देश को समझकर उन्होंने बड़े भाव से कहा कि विश्व के कल्याण के लिए भारत को जीना ही होगा। अपने देश में तुष्टिकरण तो पहले से चला आ रहा है। सन् 1905 में जब अंग्रेजों ने बंगाल प्रान्त के विभाजन का षड़यंत्र रचा तब भगिनी ने इसका कड़ा विरोध किया। भगिनी ने अपनी लेखनी और वक्तृता से भारत को जगाया। पंजाब में लाला लाजपत राय, महाराष्ट्र में बाल गंगाधर तिलक तथा बंगाल में बिपिन चन्द्र पाल ने बंग-भंग आन्दोलन का नेतृत्व किया, पर वैचारिक जागरण की पहल तो भगिनी निवेदिता ने ही की थी। भगिनी ने इस आन्दोलन को दिशा दी थी, युवकों को एकत्रित करने में बड़ी भूमिका निभाई, इसलिए मैं कहता हूँ कि भगिनी निवेदिता ने स्वतंत्रता आन्दोलन की नींव रखी। विदेश में जाकर उन्होंने अंग्रेजों को फटकारा कि वे भारत के विरुद्ध षड्यंत्र कर रहे हैं। भगिनी निवेदिता ने डंके की चोट पर कहा कि अंग्रेजों ने भारत को सिर्फ लूटा है। ^^पूर्ण स्वराज्य** यह भगिनी निवेदिता का कथन है। यह उनके जीवन का आक्रामक स्वर है। आक्रामकता यह भगिनी के जीवन में कई बार देखने को मिलती है। भगिनी को जब ज्ञात हुआ कि उनके आक्रामक विचारों से रामकृष्ण मिशन को नुकसान पहुँच सकता है तो वह मिशन से अलग हो गई। 

मैं कहता हूँ कि हमें भी बड़े आक्रामकता से कार्य करना चाहिए। इसका तात्पर्य यह नहीं कि हम धरना दें या हड़ताल पर बैठ जाएं। आक्रामकता का अर्थ है एकाग्रता से, गति से, प्रखरता से, मुखर होकर अपना कार्य करें। युवा भारती के पूर्व सम्पादक साधु रंगराजन जो अब बंगलुरु में रहते हैं, उनसे मेरी भगिनी निवेदिता के सन्दर्भ में बातें हुईं। तब उस समय यह ज्ञात हुआ कि भगिनी निवेदिता एक और महत्वपूर्ण बात कहा करती थीं, वह है - ^^कर्म देवो भव** कर्म को भगवान मानकर करते रहना, यह कितनी बड़ी बात है। इस भाव से यदि हम कर्म करते हैं तो कार्य करने की प्रेरणा मिलती है। इस भाव से कार्य करने से कार्यकर्ताओं में जागृति आएगी और साधारण से कार्यकर्ता असाधारण कार्य कर सकेंगे। कर्म ही ईश्वर है, इस समर्पण भाव को हम ।हहतमेेपअम ढंग से अपने में धारण करते हैं तो हममें से प्रत्येक कार्यकर्ता अपने दायित्व को अच्छी तरह निभा सकेंगे। 

1973 में रामकृष्ण मिशन के अध्यक्ष स्वामी रंगनाथानन्दजी कन्याकुमारी आए थे तब उन्होंने एकनाथजी से कहा था कि, ``We wear this ochre robe to remind us that we are Sanyasis,’’ अर्थात् हम संन्यासी हैं इस बात को स्मरण रखने के लिए हमने भगवा वस्त्र धारण किया है। तब एकनाथजी ने उन्हें उत्तर दिया था। ``We are creating such workers who have renounced even ochre robe.’’ अर्थात् हम ऐसे कार्यकर्ताओं का निर्माण कर रहे हैं, जिन्होंने भगवे वस्त्र का भी त्याग कर दिया है। 

इसलिए एकनाथजी की अपेक्षा के अनुसार विवेकानन्द केन्द्र का कार्यकर्ता होना साधारण बात नहीं है। “आया राम गया राम” यह हमारे जीवन में नहीं होना चाहिए। एक बार केन्द्र कार्य का दायित्व लिया तो जीवनभर कार्य करना है। छोटा घर छोड़ा और बड़े घर का हो गया, वही कार्यकर्ता है। 

कार्य का तंत्र 


हम सभी कार्यकर्ता हैं। पूर्णकालिक हों या स्थानिक 24 घंटे हम केन्द्र कार्य का चिंतन करते हैं। अपने परिवार, व्यवसाय, नौकरी के साथ हम केन्द्र का कार्य करते हैं, इसलिए हम कार्य के प्रतिनिधि हैं। समाज भी हमें केन्द्र कार्य का साकार रूप मानता है। स्विमिंग क्लब जैसे किसी क्लब से जुड़े लोगों के लिए कोई नियम होता है जिसका पालन क्लब के भीतर ही करना पड़ता है, पर हमारा संगठन क्लब नहीं है। हम विवेकानन्द केन्द्र के कार्यकर्ता हैं। इसलिए हमें सजग रहना है। हमारे व्यवहार को लोग देखते हैं। यदि कार्यकर्ता का व्यवहार उचित नहीं है तो लोग संगठन को ही नहीं वरन कार्य की ही बदनामी करते हैं। इसलिए हमारा व्यवहार निर्दोष हो। ऐसे निर्दोष कार्यकर्ता कार्य और संगठन की गरिमा बढ़ाते हैं। ये समर्पण से आता है। समर्पण का अर्थ क्या है? जो रात-रात भर जागकर कार्य करता है, क्या वह समर्पण है, नहीं ऐसा नहीं है। 

कार्यकर्ता को कार्य का तंत्र ज्ञात होना चाहिए। उसके अनुरूप वह कार्य करता है तो वह समर्पण है। ^मनः पूतं समाचरे त* जैसा मन करे वैसा चलेंगे ऐसी मनमानी नहीं चलेगी। जैसे कोई कन्या विवाह के पूर्व अपने हिसाब से जीवन जीती है, पर विवाह के बाद क्या वह स्वच्छंदता या मनमाने तरीके से जीवन व्यतीत कर सकती है? नहीं न! वह ऐसा नहीं करती क्योंकि विवाह एक Commitment (वचनबद्धता) है, जिम्मेदारी है। संगठन भी ऐसा ही है। संगठन को हम सबने अपनाया है। इसलिए संगठनात्मक मन, सांघिक मन तैयार करना होता है, पर यह सांघिक मन आएगा कैसे ? 

जनतंत्र (लोकतंत्र) में वोटिंग होती है और चुने हुए प्रतिनिधि निर्णय लेते हैं जिसे सबको मानना होता है। इसी तरह जो डिक्टेटर होता है, उसके निर्देशों का पालन करना पड़ता है। वहीं राजतन्त्र में राजा के आदेश या निर्णय को मानना ही पड़ता है। आध्यात्मिक गुरु के सन्दर्भ में भी यही बात है, गुरु जो कहते हैं, वह सभी शिष्यों को मानना ही होता है। 

अपने संगठन ने "ॐ" को अपना गुरु माना है। यह "ॐ" गुरु हमसे प्रत्यक्ष बात तो नहीं करता। वह तो सांघिक मन से बात करता है। फिर विवेकानन्द केन्द्र के कार्य का तंत्र क्या है ? हमारा कार्य तंत्र है - आत्मीयता। हर स्तर पर चमू, सांघिक निर्णय पर चमू का नेतृत्व करनेवाला कोई गुरु, डिक्टेटर या राजा नहीं होता। वह राजा की तरह आदेश नहीं देता। हमारे चमू का नेतृत्व सबको साथ लेकर कार्य करता है। मैं बहुत अच्छा कार्य करती हूँ। खूब मेहनत करती हूं। पर मुझे चमू का निर्णय मान्य नहीं है तो यह समर्पण नहीं हो सकता है। सबकी बात सुनना और फिर नेतृत्व अपने चमू के साथियों की तैयारी, उनकी समझ को समझते हुए चमुत्व मन के अनुरूप निर्णय लेता है।

पहले जनतंत्र की पद्धति अलग थी। आपस में चर्चा करके सामूहिक चिन्तन से विवेकपूर्ण निर्णय लिया जाता था। इसलिए उसे पंचमुखी परमेश्वर की संज्ञा दी गई थी। इसलिए हम विचार करें कि मेरा व्यवहार संगठन की नीति के अनुरूप हो, उसी के अनुरूप निर्णय हो। मेरा व्यवहार केन्द्र के कार्य तंत्र से सुसंगत होवे। हमारी कार्यपद्धति "सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्" का रूप है। साथ चलने का, मिलकर आगे बढ़ने का अर्थात सांघिक भाव की प्रेरणा हमारी कार्यपद्धति से मिलती है। 

रामायण का एक प्रसंग है - श्रीराम और रावण के बीच जब युद्ध होनेवाला था तब युद्ध से पहले वानरराज सुग्रीव ने अपना आपा खो दिया। रावण को देखकर उसे बहुत क्रोध आया और वह किसी से संवाद किये बिना, सीधे अकेले ही रावण से लड़ने चले गए। परिणाम यह हुआ कि रावण ने सुग्रीव को बुरी तरह पीटकर छोड़ दिया। सुग्रीव जब लज्जित होकर लौटे तब श्रीराम ने क्या कहा, यह बहुत महत्वपूर्ण है। श्रीराम ने कहा, ^^सुग्रीव! मेरे मित्र, आप अकेले ही रावण से लड़ने चले गए। आप बड़े वीर हैं, हमें आपकी वीरता पर तनिक भी शंका नहीं है। पर सोचो मित्र! यदि आपको कुछ हो जाता तो क्या यह वानर सेना आपके बिना युद्ध कर पाती ? क्या आपका यह मित्र रावण का सामना कर पाता ? श्रीराम के इस कथन से सुग्रीव का हृदय पिघल गया। उन्हें अपनी गलती का अनुभव हुआ। यहाँ श्रीराम के संवाद में कहीं भी फटकार नहीं है, वरन् अपने मित्र के सम्मान को ठेस पहुंचाए बिना उन्होंने अपनी बात रखी। 

रामायण का ही एक और उदाहरण है- रावण ने जब अपने भाई विभीषण को धुधकार कर लंका से बाहर निकाल दिया, तब विभीषण अपने 4 साथियों के साथ श्रीराम के शिविर में आए। विभीषण को अपने साथियों के साथ आता देखकर वानर सेना उनपर टूट पड़ी। श्रीराम ने महावीर हनुमान को मध्यस्थता करने भेजा। तब हनुमानजी ने वानरों से कहा, ^^इस सम्बन्ध में निर्णय प्रभु श्रीराम के सम्मुख सभी मिलकर लेंगे।** हनुमानजी विभीषण को अपने साथ लेकर श्रीराम के पास आते हैं। विभीषण श्रीराम को प्रणाम करते हैं और कहते हैं कि मैं आपकी शरण में आया हूँ। बहुत से वानरों को लगता है कि यह भी रावण का कोई षड्यंत्र है पर श्रीराम बहुत ही सहजता से स्थिति को संभालते हैं। वे वानर सेना के वरिष्ठ सेनानायकों से पूछते हैं कि विभीषण के सम्बन्ध में आपका क्या मत है ? तब कई वानर सैनिक विभीषण के सम्बन्ध में सोच-विचार कर निर्णय लेने के लिए कहते हैं तो कुछ उन्हें न अपनाने की बात करते हैं। ऐसे में श्रीरामजी हनुमान से उनका मत पूछते हैं तो महावीर हनुमान बड़ी विनम्रता से उत्तर देते हैं कि, "जब मैं माता जानकी की खोज में लंका गया था तब मेरी भेंट विभीषण से हुई थी। जब रावण ने अपनी सभा में मुझे मृत्युदंड देने की बात कही तब विभीषणजी ने रावण को सुझाव दिया कि वे ऐसा न करें। राजदूत के साथ उचित व्यवहार होना चाहिए, मृत्यदंड राजदूत को नहीं दिया जा सकता। विभीषण सत्यनिष्ठ हैं, वे नीतिवान पुरुष हैं।" हनुमानजी के इस कथन के बाद श्रीराम विभीषण को अपनी सेना में सम्मिलित करते हैं। उन्हें अपना मित्र घोषित करते हैं। 

यहाँ हनुमान के उत्तर के बाद श्रीराम का निर्णय लेना, बहुत महत्वपूर्ण बात है। क्योंकि हनुमान ने लंका जाकर रावण के महत्वपूर्ण स्थलों तथा प्रवेश द्वार को जलाया था, सीतामाता की खोज की थी। इसलिए पराक्रम करनेवाले कार्यकर्ता का अपना महत्व है। कार्य सिद्ध करनेवाले कार्यकर्ताओं के विचारों का महत्व है। इसलिए निर्णय लेते समय ऐसे धैर्य और समझदारी की आवश्यकता होती है। हमारा हृदय भी विशाल होना चाहिए। नए-नए लोगों को जोड़कर उन्हें संगठन के कार्य में आगे बढ़ाया जा सकता है। 

विनम्रता - यह कार्यकर्ता का महत्वपूर्ण गुण है। रामायण का एक और प्रसंग है- जब श्रीराम का राज्याभिषेक होनेवाला था, तब राजा दशरथ ने श्रीराम से कहा था कि तुम तो पहले से ही विनम्र हो, पर राजा बनने के बाद तुन्हें और भी विनम्र होना होगा। यानी जब दायित्व आता है तो हमें और भी विनम्र होने की आवश्यकता है। 

हमें साधन भाव से कार्य करने की आवश्यकता है। बंगाली गीत का एक सुन्दर पद है- "साकोलि तुम्हारी इच्छा" या "आमी यंत्र तुमी यंत्री", इस भाव से हम कार्य करें। संगठन में जहां "मैं" आता है, वहां काम नहीं होता है। "मैं" जहां समाप्त हो जाता है, वहां "अध्यात्म" प्रवेश करता है। हमारे संगठन में "मैं" का भाव नहीं है, इसलिए विवेकानन्द केन्द्र अध्यात्म प्रेरित सेवा संगठन है। 

हमपर (हिन्दू समाज/भारत पर) तो हजारों वर्षों तक आक्रमण होता रहा है और हमारे पूर्वजों ने अपने बलिदान से इस धरा व संस्कृति को सींचा है। उनका त्याग, तपस्या और बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। माननीय एकनाथजी ने हमें विवेकानन्द केन्द्र के रूप में तंत्र-मंत्र और यंत्र दिया है, जिसके अनुगामी होकर हम ईश्वर के हाथ का साधन-यंत्र बनकर अपना-अपना कार्य निरन्तर करते रहेंगे। आइए, हम इस सांघिक भाव से, साधन भाव से कार्य करें।

Saturday, 3 March 2018

नव संवत्सर

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नया विक्रम संवत्सर 2075 प्रारम्भ हो रहा है। हमारे सारे त्यौहार चान्द्र वर्ष से हैं। नव संवत्सर का उत्सव भी चान्द्र वर्ष से मनाया जाता है। 365 दिन के वर्ष में हम 366 उत्सव मनाते हैं। इसलिए हम भारतवासियों को उत्सव जीवी कहा जाता है। भीष्म पितामह ने कहा था - गणान् उत्सव संकेतान् अर्थात् गण राज्यों की उत्सव से पहचान होती है।

वैष्य गणराज्य का उत्सव दीपावली और आमीर गणराज्य का उत्सव होली आज राष्ट्रीय उत्सव हैं। विक्रम संवत्सर का प्रवर्तक गुप्त साम्राज्य का संस्थापक चन्द्रगुप्त थे। दिल्ली-महारौली की लोह-लाट पर जिस चन्द्र महीपति की प्रशस्ति उट्टंकित है। वह चन्द्र महीपति कदाचित् यही चन्द्रगुप्त था। इसी वंश का समुद्रगुप्त का पुत्र रूपकृती चन्द्रगुप्त था] जिसने देवी का रूप धारण करके शकराज ध्रुव स्वामी को मार कर ऐतिहासिक विजय प्राप्त की थी।

संवत् प्रवर्तक शासक को शाक पार्थिव कहा जाता रहा है। कुछ विद्वानों ने शाक-पार्थिव का अर्थ साम खाने वाले राजा कर दिया। उनके मतानुसार शेष राजा मांसाहारी होते थे। ऐसे लोगों ने गोसव करने वाले परम भागवत रन्तिदेव को भी मांसाहारी ही माना है। यह नितान्त मिथ्या धारणा है। शाक (शक्नोति इति) शब्द सामथ्य का संकेतक है। कृती चन्द्रगुप्त ने जो संवत्सर चलाया वह सौर-गणना पर आधारित होने के कारण संसार में सर्वाधिक शुद्ध है। भारत सरकार ने उसको इसी विशेषता के आधार पर अपना राष्ट्रीय संवत्सर स्वीकार किया है। शाके (संवत्सर) को स्वीकार तो कर लिया पर उसे किसी शक राजा द्वारा प्रवर्तित मान लिया। यह भी गलत धारणा है। ऋग्वेद में इन्द्र को पुरुशाक (अत्यधिक शक्तिमान) कहा गया है।

इस धारणा के कारण ही यह राष्ट्रीय पंचांग उपेक्षा का विषय बना रहा। राष्ट्रपति से लेकर सन्तरी तक कोई भी इसको याद नहीं करता। राष्ट्रीय प्रतीक की अवमानना के दोषी हम सब बन गये हैं। आवश्यकता इस बात की है कि शक संवत्सर के महत्त्व को समझे और उसको जीवन में अपनायें भी।

रूपकृती चन्द्रगुप्त द्वारा चलाया हुआ संवत्सर शाके 1940 भी इसी मार्च की 22 तारीख को आरम्भ होगा। प्रति वर्ष मार्च] 22 से ही आरम्भ होता है। इसके महत्त्व के विषय में समझें। चान्द्रवर्श 355 दिन का होता है। वैसे वर्ष 365-244----- दिन का होता है। 32 महीने] 17 दिन बाद अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) होता है। ऋग्वेद के वरुण सूक्त में चान्द्र वर्ष और अधिक मास के संकेत मिलते हैं। चान्द्र गणना पर आधारित सभी संवत्सर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारम्भ होता है।

शाके की गणना इतनी शुद्ध है कि 365 दिन के बाद शेष अन्तर भी गणना में छोड़ा नहीं गया है। 137 वर्ष में और 19 वर्ष में एक क्षय मास आता है। 1934 में क्षय मास था। 11 महीने का वर्ष था। इसके बाद 1983 में क्षय मास आया था। अब 137 वर्ष बाद क्षय मास आयेगा। इसके बाद फिर 19 वर्ष वार। ग्रिगेरियन कलेण्डर को पोप ग्रेगरी ने शुद्ध किया था। अब फिर वह गड़बड़ा गया है। कोई नया संशोधन उसे शुद्ध करेगा।

कालिदास ने अष्टधा प्रवृत्ति के शिव की स्तुति की है। उसमें सूर्य और चन्द्रमा को काल-मापन का साधन माना गया है। - "ये द्वे कातं विद्यत्तः।" यो तो "दिनं दिनं सुदिनत्वम्" के अनुसार प्रत्येक दिन को सुदिन मान कर उसका स्वागत किया जाना चाहिए। वेदात् सर्वं प्रसिद्धयति की मान्यता प्रसिद्ध है। तब नया संवत्सर कहने की क्या आवश्यकता है

नव संवत्सर में नव शब्द नु धातु से बना है जिसका अर्थ होता है – स्तुत्य, प्रशंसा करने योग्य। सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला जानते थे कि नव गति जीवन में नई लय पैदा करती है। काल के प्रवाह में एकदम नयापन की ताजगी अनुभव की जा सकती हैं।

भारतीय मान्यता के अनुसार - ऋणं ह वै जायमानः। जन्म लेने वाला मनुष्य तो ऋण स्वरूप होता है। मानवी माता से ऋण मनुश्य] ब्राह्मण माता से ऋण ब्राह्मण] क्षत्रिय माता से ऋण क्षत्रिय] वैश्य माता से ऋण वैश्य और शूद्र माता से ऋण शूद्र पैदा होते हैं। सबको जीवन ऋण से धन बनने के लिए मिला है। धन्यता की यह साधना अरंकृत करके इनको आर्य बनाती है - द्विजत्व प्रदान करती है।

भारतीय सनातन जीवन शैली में नवसंवत्सर ताजगी जगाता है। मनुष्य बनने की प्रक्रिया को अथक बनाता है - न थकाने वाली। उत्सव है उत्कृष्ट सव-यज्ञ। यज्ञ श्रेष्ठ कर्म होता है - यज्ञो वै श्रेष्ठतम कर्म। यजुर्वेद के अनुसार "आयुः यज्ञेन कल्पताम्।" आयु को यज्ञ बनाने के लिए क्षण-क्षण ताजगी चाहिए - अथकता चाहिए। थक गये तो लक्ष्य छूने की उमंग कहा से आयेगी?  सजगता कहाँ से आयेगी?

"वयं राष्ट्रेजागृयाम पुरोहिताः" - हम राष्ट्र भाव में जागे और अनुकरणीय व्यक्तित्व वाले बनें। राष्ट्र भाव में कैसे जागे? जब श्रेष्ठ आचार और विचार से हमारे भीतर सात्त्विकता का उद्रेक होगा तो हमारे भीतर राष्ट्र (प्रकाशमत्ता, द्युतिमत्ता) का उदय होगा। सत्त्वं लघु प्रकाशकम् - महर्षि पतंजलि की उक्ति है। साधक का व्यक्तित्व राष्ट्र बन जायेगा। ऐसा राष्ट्र ही अनुकरणीय (पुरोहित) भी होगा। राष्ट्र संज्ञक व्यक्ति जहाँ बसें वह भी राष्ट्र होगा।

ऐसी जीवन साधना के लिए नवता चाहिए। नितनवीनता चाहिए। नवसंत्वसर की प्रतिपदा इसकी पूर्ति करती है। ताजगी जगाती है। वेद की उक्ति है - सर्वा आशा मम मित्रं भवन्तु - सारी दिशाएँ मेरी मित्र हो जाएँ।

जीवन साधना साधना केन्द्र में सफल होती है। संसार का सबसे बड़ा साधना केन्द्र, सबसे बड़ा विश्वविद्यालय, चिकित्सालय परिवार होता है। मानव जाति के विकास में परिवार भारतीय समाज की सबसे बड़ी देन है, जिसमें प्रत्येक सदस्य को अपने दोषों को निवारित करने का अवसर मिलता है - परितः वारयति स्वदोषान् यस्मिन् इति। परिवार को महिला बनाती है। 'महिला' से अधिक गरिमामय शब्द संसार की किसी भाषा में नहीं हो सकता - महस्य इला - उत्सव की जन्मभूमि, जिसके होने मात्र से जीवन उत्सव बन जाता है।

वही परिवार को बनाती है। वेद की उक्ति है - आमेदस्तम् - जाया इत् अस्तम् - जाया ही घर है। इसी के आधार पर मनु ने कहा - गृहिणी गृहम् उच्यते। मनु ने यह भी कहा है -
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः
जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है वहाँ देवता रमण करते हैं। जीवन को उत्सव बनने वाली और घर-परिवार का निर्माण करने वाली नारी के प्रति समादर करके व्यक्ति कृतज्ञता ही व्यक्त करता है। 

संवत्सर का अर्थ है - जिस कालखण्ड में संवत्स बनकर लोग रमण करते हैं - संवत्साः यत्र रमन्ते इति। साधक सत्यक् वत्स - संवत्स बनता है तब सिद्धों, साधकों, साधुओं को वात्सल्य प्राप्त होता है। जैन परम्परा में कहा गया है - वच्छल्लं (वात्सल्यं) परमो धर्मः। जैन परिवार में साधकों-मुनियों को गोचरी के लिए आमंत्रित किया जाता है।
धम्मपद में भगवान् बुद्ध का वचन है - आर्याणां गोचरे रताः। इसी तरह भागवत पुराण में ग्यारहवें स्कन्ध में आता है - गोचर्या नैगमश्चरेत् अर्थात् वेदानुयायी गोचरी को आचरण का विषय बनाएँ। स्पष्ट है कि वैदिक, जैन और बौद्ध एक ही सनातन परम्परा के अंग है।

नव संवत्सर मनाते समय अपनी सनातन परम्परा को याद करके आत्मगौरव का अनुभव करें। यजुर्वेद में कहा गया है - सा प्रथम संस्कृतिः विश्ववारा अर्थात् मनुष्य मात्र की संस्कारशीलता एक है और वही श्रेष्ठ है। उसको अनुभव का विषय बनाएँ।
आयुर्वेज्ञेन कल्पताम् - अपने सम्पूर्ण जीवन को यज्ञ - विषय कर्म के रूप में ढालें। नये संवत्सर का नवोत्साह इसमें सहायक होगा। शाके 1940 का प्रारम्भ 22 मार्च को राष्ट्रीय नवसंवत्सर को भी मनाएँ और 2075 को चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन आरम्भ होता हुआ, भी देखें। नये साल की ताजगी आपके सब मनोरथों को पूरा करेगी - यह न भूलें।