Showing posts with label monthly magazine. Show all posts
Showing posts with label monthly magazine. Show all posts

Wednesday, 21 August 2019

देशप्रेम और देशभक्ति

15 अगस्त को हम स्वतंत्रता दिवस के रूप में बड़े उत्साह में मनाते हैं। इस दिन देशभक्ति के गीत के स्वर हर गली, चौराहे, विद्यालय, महाविद्यालय तथा विभिन्न संस्थाओं के कार्यालय में सुबह से सुनाई देते हैं। देशप्रेम के भाव तो सबके भीतर विद्यमान है। वास्तव में मानवीय जीवन में प्रेम को सबसे अधिक महत्त्व प्राप्त हुआ है। महापुरुषों ने प्रेम की महिमा गाई है। सद्गुरु कबीर साहब ने प्रेमविहीन मनुष्य हृदय के सम्बन्ध में कहा है,

“जा घट प्रेम न संचरे, सो घट जान मसान।
जैसे खाल लुहार की, सांस लेतु बिन प्रान।।”

स्वामी विवेकानन्द जब साढ़े तीन वर्षों के बाद अमेरिका से भारत लौट रहे थे, तब उनके एक विदेशी मित्र ने पूछा, “स्वामीजी, आप तीन वर्षों तक वैभवशाली देश में रहकर अपने गरीब देश भारत में लौट रहे हैं। अब अपने देश के प्रति आपकी कैसी भावना है?”

स्वामीजी ने बहुत मार्मिक उत्तर दिया जिससे प्रेम और भक्ति की अवधारणा स्पष्ट हो जाएगी।
स्वामी विवेकानन्दजी ने कहा, “पहले तो मैं अपनी मातृभूमि से प्रेम ही करता था अब तो इसका कण–कण मेरे लिए तीर्थ हो गया है।” अर्थात प्रेम से ऊपर का भाव भक्ति है। ‘हिंदी साहित्य का इतिहास” के लेखक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने निबंध “श्रद्धा-भक्ति” में कहा है, “प्रेम का कारण बहुत कुछ अनिर्दिष्ट और अज्ञात होता है; पर श्रद्धा का कारण निर्दिष्ट और ज्ञात होता है।” आचार्य शुक्ल ने आगे कहा कि, “श्रद्धा और प्रेम के योग का नाम भक्ति है।” इससे स्पष्ट होता है कि समर्पण की भावना का पहला आयाम प्रेम है, उसके बाद श्रद्धा और फिर भक्ति। समर्पण की सर्वोच्च स्थिति “भक्ति” है। इसलिए प्रेम, श्रद्धा और भक्ति की अवधारणा को समझे बिना देशप्रेम और देशभक्ति की संकल्पना को नहीं समझा जा सकता।

यूं तो हमारे मीडिया जगत में देशभक्ति और देशप्रेम की गाथा को बहुत बार दोहराया जाता है। विशेषकर, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में 15 अगस्त और 26 जनवरी, क्रिकेट या युद्ध के दौरान देशभक्तों का गुणगान करने और देशभक्ति जगाने के लिए सिनेमा के गीतों को दिखाने की परम्परा रही है। पर मीडिया में देशभक्ति की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कोई कार्यक्रम नहीं दिखाया जाता।

देशभक्ति के प्रगटीकरण के भी कुछ आयाम होते हैं। क्या इस बात पर हमने कभी अनुसंधान किया है? नहीं। यदि ऐसा होता तो क्रिकेट में जीत के बाद अथवा 15 अगस्त और 26 जनवरी को सड़कों पर डीजे की धुन में हो-हल्ला मचाते, थिरकते युवाओं के असभ्य और अनुशासनहीन कृत्यों को अनुशासित कृति में परिवर्तित करने के लिए कोई अभियान चलाया जाता।

हमारे देश में तो क्रिकेट, युद्ध, 15 अगस्त और 26 जनवरी के दौरान ही देशवासियों की “लिमिटेड देशभक्ति” सड़कों पर भिन्न-भिन्न प्रकार से दिखाई देती है। ऐसा नहीं है कि देशप्रेम अथवा देशभक्ति हमारे नागरिकों में है ही नहीं। निश्चित रूप से देशभक्त, देशप्रेमी अपने जीवन के महत्वपूर्ण समय निराश्रित बालकों के पोषण, स्वस्थ्य और शिक्षा के लिए लगाते हैं। सीमा पर जवान, देश में किसान, समाज में विद्वान् यहां तक कि सफाई कर्मचारी अपने कर्मों के द्वारा भारतमाता की पूजा करते हैं। पर ऐसे समर्पित लोग कभी हो-हल्ला नहीं मचाते। इसलिए देशभक्ति के आयाम को भीहमें समझना होगा।

9 फरवरी, 1897 को मद्रास (चेन्नई) के विक्टोरिया पब्लिक हॉल में “मेरी क्रांतिकारी योजना” नामक अपने व्याख्यान में स्वामी विवेकानन्द ने ‘देशभक्ति’ की तीन सीढ़ियां बतलाई। स्वामीजी ने कहा, “लोग देशभक्ति की चर्चा करते हैं। मैं भी देशभक्ति में विश्वास करता हूं, और देशभक्ति के सम्बन्ध में मेरा भी एक आदर्श है। बड़े काम करने के लिए तीन बातों की आवश्यकता होती है। पहला है – हृदय की अनुभव शक्ति। बुद्धि या विचारशक्ति में क्या है? वह तो कुछ दूर जाती है और बस वहीं रुक जाती है। पर हृदय तो प्रेरणास्त्रोत है! प्रेम असंभव द्वारों को भी उद्घाटित कर देता है। यह प्रेम ही जगत के सब रहस्यों का द्वार है। अतएव, ऐ मेरे भावी सुधारकों, मेरे भावी देशभक्तों, तुम अनुभव करो! क्या तुम अनुभव करते हो कि देव और ऋषियों की करोड़ों संतानें आज पशु-तुल्य हो गयीं हैं? क्या तुम हृदय से अनुभव करते हो कि लाखों आदमी आज भूखे मर रहे हैं, और लाखों लोग शताब्दियों से इसी भांति भूखों मरते आए हैं? क्या तुम अनुभव करते हो कि अज्ञान के काले बदल ने सारे भारत को ढंक लिया है? क्या तुम यह सब सोचकर बेचैन हो जाते हो? क्या इस भावना ने तुमको निद्राहीन कर दिया है? क्या यह भावना तुम्हारे रक्त के साथ मिलकर तुम्हारी धमनियों में बहती है? क्या वह तुम्हारे हृदय के स्पंदन से मिल गयी है? क्या उसने तुम्हें पागल-सा बना दिया है?

क्या देश की दुर्दशा की चिंता ही तुम्हारे ध्यान का एकमात्र विषय बन बैठी है? और क्या इस चिंता में विभोर हो जाने से तुम अपने नाम-यश, पुत्र-कलत्र, धन-संपत्ति, यहां तक कि अपने शरीर की भी सुध बिसर गए हो? तो जानो, कि तुमने देशभक्त होने की पहली सीढ़ी पर पैर रखा है- हां, केवल पहली ही सीढ़ी पर!”

स्वामी विवेकानन्द ने आगे कहा, “अच्छा, माना कि तुम अनुभव करते हो; पर पूछता हूं, क्या केवल व्यर्थ की बातों में शक्तिक्षय न करके इस दुर्दशा का निवारण करने के लिए तुमने कोई यथार्थ कर्तव्य-पथ निश्चित किया है? क्या लोगों की भर्त्सना न कर उनकी सहायता का कोई उपाय सोचा है? क्या स्वदेशवासियों को उनकी इस जीवन्मृत अवस्था से बाहर निकालने के लिए कोई मार्ग ठीक किया है? क्या उनके दुखों को कम करने के लिए दो सांत्वनादायक शब्दों को खोजा है? यही दूसरी बात है। किन्तु इतने से ही पूरा न होगा!” 

उन्होंने कहा, “क्या तुम पर्वताकार विघ्न-बाधाओं को लांघकर कार्य करने के लिए तैयार हो? यदि सारी दुनिया हाथ में तलवार लेकर तुम्हारे विरोध में खड़ी हो जाए, तो भी क्या तुम जिसे सत्य समझते हो उसे पूरा करने का साहस करोगे? यदि तुम्हारे सगे-सम्बन्धी तुम्हारे विरोधी हो जाएं, भाग्यलक्ष्मी तुमसे रूठकर चली जाए, नाम-कीर्ति भी तुम्हारा साथ छोड़ दे, तो भी क्या तुम उस सत्य में संलग्न रहोगे? फिर भी क्या तुम उसके पीछे लगे रहकर अपने लक्ष्य की ओर सतत बढ़ते रहोगे? क्या तुममे ऐसी दृढ़ता है? बस यही तीसरी बात है।” स्वामी विवेकानन्द ने जोर देकर आगे कहा, “यदि तुममे ये तीन बातें हैं, तो तुममे से प्रत्येक अद्भुत कार्य कर सकता है। तब तुम्हें समाचारपत्रों में छपवाने की अथवा व्याख्यान देते फिरने की आवश्यकता न होगी। स्वयं तुम्हारा मुख ही दीप्त हो उठेगा! फिर तुम चाहे पर्वत की कन्दरा में रहो, तो भी तुम्हारे विचार चट्टानों को भेदकर बाहर निकल आयेंगे और सैकड़ों वर्ष तक सारे संसार में प्रतिध्वनित होते रहेंगे। और हो सकता है तब तक ऐसे ही रहें, जब तक उन्हें किसी मस्तिष्क का आधार न मिल जाए, और वे उसी के माध्यम से क्रियाशील हो उठें। विचार, निष्कपटता और पवित्र उद्देश्य में ऐसी ही जबर्दस्त शक्ति है।”

स्वामी विवेकानन्दजी का यह कथन देशप्रेम और देशभक्ति के मर्म को समझने के लिए पर्याप्त सरल है।

गुरु की महिमा अनन्त


‘‘गुरु पूर्णिमा’’ का नाम सुनते ही मन श्रद्धा के भाव से भर जाता है। गुरु शब्द की महिमा भी अनंत है। गुरु के बिना तो जीवन में कुछ भी संभव नहीं। पढ़ना, लिखना, बोलना, बताना आदि जो कुछ भी सीखते हैं वह सब गुरु की कृपा से ही! भारतीय विचारधारा के अनुरूप जीवन के प्रत्येक कार्य-क्षेत्र में गुरु का संग होना आवश्यक समझा जाता है। बिना गुरु के ज्ञान पूर्ण नहीं होता, ज्ञान की प्रामाणिकता सिद्ध नहीं होती है। हम किसी भी क्षेत्र में कितने भी योग्य क्यों न हो जायें लेकिन यदि हमारे सिर पर गुरु का हाथ न हो तो हमारा सारा ज्ञान अप्रामाणिक होता है, हमारे ज्ञान की पुष्टि नहीं होती और मन में भ्रम बना रहता है। इसलिए गुरु का महत्व और भी व्यापक हो जाता है। शिशु के जन्मदाता, शिशु की सेवा करने वाली दाई, नाम रखने वाले पण्डित, शिक्षा देने वाले शिक्षक, विवाह सम्पन्न करने वाले पुरोहित, मंत्र देने वाला धार्मिक व्यक्ति तथा अंतिम संस्कार करने वाला सामाजिक व्यक्ति- ये सभी तो गुरु माने जाते हैं। इन सभी से श्रेष्ठ और महान् वह गुरु है जो जीव को भव-बन्धन से मुक्त कर दिव्य जीवन प्रदान करता है। इसी गुरु को ‘‘सद्गुरु’’ की उपाधि मिलती है। सद्गुरु के समान अधिकारी, मनुष्यों में तो कोई है ही नहीं, देव-वर्ग भी इस श्रेणी में नहीं आते।
वेदोपनिषद में प्रणव मंत्र ‘ॐ’ को प्रथम स्थान पर पूजने की विधि बताई गई है। यह ‘ॐ’ कार अ, ऊ और म से मिलकर बना है, इसका तात्पर्य है उत्त्पत्ति, संवर्धन और लय। अपने यहाँ विनाश की संकल्पना नहीं है। क्योंकि कुछ भी समाप्त नहीं होता। हमारी संस्कृति में विसर्जन कहा जाता है अर्थात् विशेषत्व से जिसका सर्जन होता है। इसलिए ॐ विनाश नहीं करता, वह निर्माण, संवर्धन और विसर्जन कर पुनः सृजन करने की शक्ति का स्रोत है। हम महर्षि वेदव्यास की जयंती को ‘गुरु पूर्णिमा’ के रूप में मनाते हैं। महर्षि वेदव्यास ने लक्षावधि वैदिक ऋचाओं को संकलित और सम्पादित किया, इतना ही नहीं तो उसे उचित ढंग से वर्गीकृत भी किया। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के साथ ही भागवत पुराण और श्रीमद्भगवद्गीता को समाज के लिए लिपिबद्ध किया। उन्हीं की कृपा है कि आज हम भाषा, ज्ञान, अनुभव और अपनी जिज्ञासा की पूर्ति के लिए जिस प्रकार की भी सहायता चाहते हैं वह भगवान वेदव्यास द्वारा रचित वेदों और 18 पुराण से प्राप्त होता है।
ॐ का उच्चारण करते ही हम वैदिक परम्परा से जुड़ जाते हैं। ॐ स्वयं ब्रम्ह का प्रतीक है, इसलिए विवेकानन्द केन्द्र ने ॐ को गुरु माना है। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर अपने अंतःकरण के संकल्प को गुरु चरणों में अर्पित कर हम अपने सामाजिक दायित्व को पूर्ण करने की शक्ति प्राप्त कर सकते हैं। संयम, शुचिता और धैर्य बहुत आवश्यक गुण है। जिस तरह तुरटी (फिटकरी) दूषित और मटमैले जल को शुद्ध कर देती है, उसी तरह इन गुणों को आत्मसात करने से अन्दर का दोष दूर हो जाता है। मनुष्य के जीवन में ये सारे गुण गुरु की कृपा से ही आते हैं।

Wednesday, 1 May 2019

ग्रीष्मकालीन अवकाश : संस्कार सिंचन का अवसर

स्कूली बच्चे बहुत प्रसन्न हैं कि परीक्षा समाप्त हो गई है और अब वे सोच रहे हैं कि हम ग्रीष्मकालीन छुट्टी का लाभ उठाएंगे, आनंद लेंगे। वहीं विद्यालय के संचालक गण ‘विज्ञापन का बीज’ बोने लगे हैं ताकि अगले वर्ष अधिकाधिक बच्चों का एडमिशन उनके विद्यालय में हो सके। कुछ विद्यालय में तो गायन, वादन, नृत्य, कराटे, स्केटिंग, चित्रकला आदि कलाओं पर आधारित वर्ग चलाए जाते हैं। अभिभावकों के मन में योजना बन रही होगी कि बच्चों को इस अवकाश में क्या सिखाया जाए? या फिर कहीं घूमने के लिए परिवार सहित जाएं। यह सब स्वाभाविक है।

विद्यार्थी वर्षभर स्कूल के होमवर्क, विविध प्रतियोगिताओं तथा परीक्षा की तैयारी में व्यस्त रहते हैं। इसलिए कम से कम ग्रीष्मकाल के अवकाश में वे चिन्ताविमुक्त होकर आनंदित रहना पसंद करते हैं। स्कूली जीवन की व्यस्तताएं इतनी अधिक है कि स्कूल के पाठ्यक्रम से इतर वे कुछ भी पढ़ नहीं पाते। वहीं गणित, विज्ञान, अंग्रेजी आदि विषयों के ट्यूशन के चलते बच्चों का मैदान में दिखना, मानो दुर्लभ हो गया है। जब बालक मैदान में नहीं खेलेगा तो भला वह मजबूत कैसे बनेगा? कभी अभिभावकों से चर्चा होती है तो उनका जोर केवल बच्चे की मार्कशीट पर ही होता है। हर कोई चाहता है कि उनके बच्चे कक्षा में अव्वल आए और कुछ अभिभावक इतने अधिक महत्वाकांक्षी होते हैं कि देश में उनका ही पुत्र या पुत्री सबसे आगे हो। अभिभावकों का ऐसा सोचना अनुचित नहीं है। फिर इस सोच में कमी किस बात की है, इसपर विचार करना होगा। 

प्रतिस्पर्धा के इस युग में दृढ़ता से खड़े होने के लिए केवल परीक्षा में अव्वल आना ही पर्याप्त नहीं है। बुद्धि के साथ ही शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक बल की आवश्यकता होती है और भावनात्मक रूप से भी मजबूत होना पड़ता है। शरीर, मन, बुद्धि, हृदय और विचार सब एक दूसरे से जुड़े हैं, परस्पर पूरक हैं। इसलिए सर्वांगीण विकास के लिए प्रयत्न करना चाहिए। शरीर स्वस्थ होगा तो प्रत्येक चुनौती से लड़ा जा सकता है। पढ़ने के लिए बैठक क्षमता को बढ़ाना होगा। मन की एकाग्रता के बिना स्मरणशक्ति का विकास नहीं हो सकता। निर्भयता, समझ, आत्मविश्वास और धैर्य बल को प्राप्त किये बिना सफलता भी नहीं मिलती। 

स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि, “प्रत्येक आत्मा एक अव्यक्त ब्रम्ह है।” उन्होंने यह भी कहा था कि, “शिक्षा का अर्थ है, - उस पूर्णता की अभिव्यक्ति, जो सब मनुष्यों में पहले ही से विद्यमान है।"

ये ‘पूर्णता’ और ‘अभिव्यक्ति’ बहुत गम्भीर विषय है। भला बालक इसे कैसे समझ सकता है? यह प्रश्न हमारे मन में उठना स्वाभाविक है। परन्तु स्वामीजी के उक्त कथन पर हम विचार करते हैं तो प्रतीत होता है कि पूर्णता तो हमारे भीतर है ही, उसे बस अभिव्यक्त करना है। जीवन में ऐसी अनेक समस्याएं या चुनौतियां आती हैं जिसका सामना करना हमारे लिए अनिवार्य होता है, और नियति हमसे वह करवा भी लेती है। अतः आवश्यक है कि अपनेआप को जानना, अपनी क्षमताओं को पहचानना और उसे निरन्तर विकसित करना, इसी में मनुष्य जीवन की सार्थकता निहित है। फिर प्रश्न उठता है कि क्या बालकों का सर्वांगीण विकास संभव है? इसका उत्तर है- “हाँ। सम्भव है।”

बालकों का सर्वांगीण विकास उनके आयुनुसार, उनकी रुचिनुसार और उनकी आवश्यकता के अनुसार किया जा सकता है। विवेकानन्द केन्द्र कन्याकुमारी की देशभर में फैली शाखाओं के माध्यम से विद्यालयीन बाल-बालिकाओं के लिए संस्कार वर्ग चलाए जाते हैं। संस्कार वर्ग में प्रार्थना, स्तोत्र पठन, देशभक्ति गीत, योग-सूर्यनमस्कार, मैदानी खेल, कथाकथन और प्रति सप्ताह एक छोटा, किन्तु महत्वपूर्ण संकल्प का समावेश होता है जो विद्यार्थियों के मानसपटल पर अमिट छाप छोड़ते हैं। इस ग्रीष्मकालीन अवकाश के समय में देशभर केन्द्र की सभी शाखाओं के माध्यम से छात्र-छात्राओं के लिए व्यक्तित्व विकास शिविर, संस्कार वर्ग प्रशिक्षण शिविर, युवाओं के लिए युवा प्रेरणा शिविर आदि का आयोजन किया जाता है। इन शिविरों में साहस, आत्मविश्वास, धैर्य, अनुशासन, सदाचार, देशभक्ति आदि गुणों के सिंचन के लिए व्यवस्थित पाठ्यक्रम और दिनचर्या बनाई जाती है। हजारों विद्यार्थी इस शिविर में सहभागी होते हैं। महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा लेकर अपने जीवन को गढ़ने का यह स्वर्णिम अवसर होता है। अतः विवेकानन्द केन्द्र का आह्वान है कि इन शिविरों तथा संस्कार वर्ग में अपने-अपने नौनिहालों को सहभागी होने के लिए प्रेरित करें, उन्हें भेजें। 

Tuesday, 1 January 2019

युवा और गणतन्त्र

26 जनवरी को भारत के लिए गणतांत्रिक व्यवस्था स्वीकार करके भारत की जनता ने आगे बढ़ने का संकल्प प्रस्तुत किया था। संविधान बना जिसमें इस विराट् राष्ट्र का जन अधिकार पत्र देखा जा सकता है। जनवरी में ही ‘युवा दिवस’ आता है। स्वामी विवेकानन्द की मान्यता थी कि यदि सर्वश्रेष्ठ मानव का जन्म हो सकता है तो वह भारत के गाँव में ही हो सकता है, जहाँ आधे-से देवता और आधे-से भगवान रहते हैं।

युवा शब्द ‘यु’ धातु से बनता है जिसका अर्थ है- मिश्रण और अमिश्रण। देश और दुनिया की अनेक समस्याएँ होती हैं। युवक उनमें से एक के साथ जुड़ कर और अन्य से दूर हट कर उसका समाधान खोजता है। इसी क्रम में एक-एक कर के वह सभी समस्याओं का हल खोज लेता है। इसलिए वह युवा है। जितनी बड़ी चुनौती होती है, वह उतना ही बड़ा हो जाता है- जैसे समुद्र पार करने के लिए हनुमान ‘कनकमूथराकार’ हो गए थे। 

युवा को तरुण भी कहा जाता है। तरुण का अर्थ है- तैराक, तैर कर पार करने वाला। वेद में आता है-
अश्मनवती रीयते संरभ्ध्वम्। उत्तिष्ठत प्रतरत सखायः।

पथरीली नदी बह रही है, उसमें तैरना संभव नहीं है। बड़ी से बड़ी चुनौती है तो उसी के अनुरूप बन जाओ। समारम्भ करो। उसी ओर सब सखा मिलकर उसे पार कर जाओ। जैसे तैर नहीं सकते, वहाँ युक्तिपूर्वक नदी पार करो।

भारत युवाओं का देश है। वे देश के विकास के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जायेंगे। कोई प्रेरक चाहिए। विवेकानन्द चाहते थे कि भारत के युवा जागें। वे लोहे की तरह शरीर बना लें और हृदय में करुणा का स्रोत हो। सेवा में सबसे आगे रहें। भतृहरि ने कहा है -  सेवाधर्म परम गहनो यो गिनायाम्यमभ्यः। 

प्रजातंत्र वह जिसमें सब प्र-ज = प्रदष्टजन्मा हो। लोकतंत्र वह है जिसमें सब अवलोकन क्षम हो। जनतंत्र वह है जिसमें सब दिव्यजन्मा बन सकें। गणतंत्र वह है जिसमें सब नागरिक गण्य-मान्य है। हमारी व्यवस्था इनमें से कुछ भी नहीं है क्योंकि अपनी व्यवस्था में प्रत्येक नागरिक को कुछ बनना पड़ता है। नागरिक कुछ भी न बनेगा तो कोई व्यवस्था भी नहीं होगी।

भारतीय समाज एक अखण्ड परिवार की तरह से है। परिवार वह है जिसमें प्रत्येक सदस्य को अपने दोषों को दूर करने के लिए वातावरण और अवसर मिलता है- परितः वरियति स्वदोषान् यस्मिन् सः। परिवार संसार का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय है, सबसे बड़ा प्रशिक्षणालय है, सबसे बड़ा चिकित्सालय है और सबसे बड़ा साधना केन्द्र है।

दुर्भाग्य से देश की नई सरकार ने योजनाबद्ध षड्यंत्र करके परिवार पर ही आक्रमण किया। छोटा परिवार के नाम से समाज को बाँटा। ‘हम दो हमारे दो’ या ‘हम दो हमारा एक’ के नारे लगाए। परिवार कभी छोटा हो ही नहीं सकता। विश्वकुटुम्ब की भावना कैसे साकार होगी।

परिवार में भाई, बहिन, भतीजे, भांजे, दौहित्र, बुआ, फूफा, मौसी, मौसा, पति, जेठ, देवर आदि अनेक सम्बन्ध बनते हैं और उनमें पवित्रता बनाये रखने पर बल दिया जाता है। यह भूल जाने के कारण समाज में कई समस्याएँ पैदा हो गई है। कन्या भ्रूण हत्या, अपहरण, बलात्कार की समस्याएँ नई हैं। कन्याओं को तो कामना करने योग्य मान कर अष्ट मंगलों में स्थान दिया गया था।
परिवार पर आक्रमण होने से जनसंख्या वृद्धि की समस्या ने जन्म लिया। पहले संयुक्त परिवार में पाँच भाइयों में एक बेटा या बेटी हो तो वह सब की सन्तान मानी जाती थी। हम दो - हमारे दो की सोच से आबादी बढ़ी। किसी को किसी से कोई लगाव नहीं रहा। सन्तान भी विद्रोही हो गई। सामंजस्य का धागा टूट गया।

परिवार का निर्माण कुलवधू करती थी। वेद का वचन है - जायेदस्तम् = जाया इत् अस्तम् - जाया ही घर है- ‘गृहिणी गृहः उच्यते।’ (मनुस्मृति)

परिवार (व्यवस्था) शिथिल हुआ तो स्त्री का दर्जा कम हुआ है। मनु ने कहा था - यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता। जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवता भी रमण करते हैं। नारी की अवमानना हुई तो परिवार टूटने लगे। परिवार भारत की मानव जाति के इतिहास को महत्त्वपूर्ण सबसे बड़ी देन है। इससे भारतीय सनातन परम्परा कमजोर हुई। गणतंत्र गण्य-मान्य बनने का मार्ग खोजें।

Tuesday, 4 December 2018

हे भारत! क्या तुम्हें याद है?

25 दिसम्बर को दुनियाभर में ‘‘क्रिसमस’’ पर्व की धूम रहती है। भारत में भी जगह-जगह क्रिसमस की शुभकामनाओं वाले पोस्टर्स, बैनर, ग्रीटिंग्स का माहौल दिखाई देता है, पर 25 दिसम्बर, हम भारतीयों के लिए क्या महत्व रखता है, इस बात को समझना होगा। 25 दिसम्बर भारतीय इतिहास का वह स्वर्णिम दिवस है जिसका अध्ययन, स्मरण और चिंतन मात्र से हमारे भीतर अपने जीवन के उद्देश्य को टटोलने की प्रेरणा मिलती है। इसलिए हम भारतीयों को इस दिन के महत्व को जानना अति आवश्यक है। 

स्वामी विवेकानन्द ने पूरे देश का परिव्राजक के रूप में भ्रमण करने के बाद सन् 1892 को कन्याकुमारी में, हिन्द महासागर के मध्य स्थित श्रीपाद शिला पर ध्यान किया था। 25 दिसम्बर को ही इस ध्यान का प्रारम्भ हुआ था। उसी स्थान पर आज भव्य विवेकानन्द शिला स्मारक की स्थापना हुई है। स्मारक के प्रणेता माननीय एकनाथजी रानडे कहा करते थे कि स्वामीजी के जीवन में इस शिला का वही महत्व है जो गौतम बुद्ध के जीवन में गया के बोधिवृक्ष का।

18वीं सदी में अंग्रेजों के शासनकाल में भारतीय लोग अपनेआप को ‘भारतीय’ कहलाने में हीनता का अनुभव करते थे। एक तरफ अंग्रेज जनसामान्य पर अत्याचार करते थे, तो दूसरी ओर ईसाई मिशनरियों के द्वारा भारत के ऋषिमुनियों, संतों, देवी-देवताओं और सब धर्मग्रंथों को झूठा कहकर उसकी निंदा की जाती थी। अंग्रेजों के अत्याचारों और शैक्षिक षड्यंत्रों के कारण भारतीय जनमानस अपने ‘हिन्दू’ कहलाए जाने पर ग्लानि का अनुभव करते थे। भारत की आत्मा ‘धर्म’ का अपमान इस तरह किया जाने लगा कि उससे उबरना असंभव सा प्रतीत होने लगा। विदेशी शासन, प्रशासन, शैक्षिक और मानसिक गुलामी से ग्रस्त भारत की स्थिति आज से भी विकट थी। ऐसे में भारतीय समाज की इस आत्माग्लानि को दूर करने के लिए एक 29 वर्षीय युवा संन्यासी भारत की आत्मा को टटोलने के लिए भारत-भ्रमण के लिए निकल पड़ा। यह संन्यासी संस्कृत के साथ ही अंग्रेजी भाषा भी अच्छी तरह जानता था। भारतीय संस्कृति, इतिहास, धर्म, पुराण, संगीत का ज्ञाता तो था ही, वह पाश्चात्य दर्शनशास्त्र का भी प्रकांड पंडित था। ऐसे बहुमुखी प्रतिभा से सम्पन्न संन्यासी को पाकर भारतवर्ष धन्य हो गया। ऐसा लगता है जैसे, इतिहास उस महापुरुष की बेसब्री से प्रतिक्षा कर रहा था। भारतमाता अपने इस सुपुत्र की बाट निहार रही थी जो भारतीय समाज के स्वाभिमान का जागरण कर उनमें आत्मविश्वास का अलख जगा सके। यह वही युवा संन्यासी है जिन्होंने मात्र 39 वर्ष की आयु में अपने ज्ञान, सामथ्र्य और कार्य योजना से सम्पूर्ण विश्व को ‘एकात्मता’ के सामूहिक चिंतन के लिए बाध्य कर दिया।

29 वर्ष की आयु में सम्पूर्ण भारत का भ्रमण कर, स्वामी विवेकानन्द ने भारत की स्थिति को जाना। भारत भ्रमण के दौरान वे गरीब से गरीब तथा बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं से मिले। उन्होंने देखा कि भारत में एक तरफ धनवानों की टोली है, तो दूसरी ओर दुखी, असहाय और बेबस जनता मुट्ठीभर अन्न के लिए तरस रहे हैं। विभिन्न जाति, समुदाय और मतों के बीच व्याप्त वैमनस्य को देखकर स्वामीजी का हृदय द्रवित हो गया। भारत में व्याप्त दरिद्रता, विषमता, भेदभाव तथा आत्मग्लानि से उनका मन पीड़ा से भर उठा। भारत की इस दयनीय परिस्थिति को दूर करने के लिए उनका मन छटपटाने लगा। अंत में वे भारत के अंतिम छोर कन्याकुमारी पहुँचे। देवी कन्याकुमारी के मंदिर में माँ के चरणों से वे लिपट गए। माँ को उन्होंने साष्टांग प्रणाम किया और भारत की व्यथा को दूर करने की प्रार्थना के साथ वे फफक-फफक कर रोने लगे।

भारत के पुनरुत्थान के लिए व्याकुल, इस संन्यासी ने हिंद महासागर में छलांग लगाई और पहुँच गए उस श्रीपाद शिला पर जहाँ देवी कन्याकुमारी ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए तप किया था। 25 दिसम्बर, 1892 को इसी शिला पर बैठकर स्वामी विवेकानन्द ध्यानस्थ हो गए। 25, 26 और 27 दिसम्बर ऐसे तीन दिन-तीन रात बिना खाए-पिए वे अपने ध्यान में लीन रहे। यह ध्यान व्यक्तिगत मुक्ति या सिद्धियों की प्राप्ति के लिए नहीं था, वरन् भारत के गौरवशाली अतीत, तत्कालीन दयनीय परिस्थिति और भारत के उज्जवल भविष्य के लिए किया गया तप था। इस राष्ट्रचिंतन में स्वामीजी ने भारत के गौरवशाली अतीत, चिंताजनक वर्तमान व स्वर्णिम भविष्य का साक्षात्कार किया था। भारत के खोए हुए आत्मविश्वास और खोई हुई आत्मश्रद्धा को दूर करने की व्यापक योजना स्वामी विवेकानन्द ने इसी समय बनाई थी। यह वही राष्ट्रध्यान था जिसके प्रताप से स्वामीजी ने विश्व का मार्गदर्शन किया। स्वामी विवेकानन्द ने बाद में बताया कि माँ भारती के अंतिम छोर पर मुझे मेरे जीवन की कार्ययोजना प्राप्त हुई। उन्हें इस ध्यान के द्वारा उनके जीवन का ध्येय प्राप्त हुआ।

भारत के ध्येय को अपना जीवन ध्येय बनाकर स्वामीजी ने आजीवन कार्य किया। उन्होंने 11 सितम्बर, 1893 को अपने केवल 07 मिनट के छोटे से भाषण से संपूर्ण विश्व का हृदय जीत लिया। स्वामी विवेकानन्दजी के विचारों ने देशभक्त क्रांतिकारियों को जन्म दिया। सुभाषचन्द्र बोस हो या सावरकर या फिर महात्मा गाँधी, सम्भवतः ऐसा कोई भारतभक्त नहीं, जिन्होंने स्वामीजी से प्रेरणा नहीं पाई। 25 दिसम्बर का दिन वास्तव में प्रत्येक भारतीयों को देश-धर्म के कार्य की प्रेरणा देता है। भारत के ध्येय को अपना ध्येय बनाने का विचार देता है। आइए स्वामी विवेकानन्दजी के इस राष्ट्रध्यान के शुभ दिन पर राष्ट्र पुनरुत्थान के कार्य में अधिकाधिक सहभागिता का संकल्प लें।

Tuesday, 4 September 2018

जड़ों को सींचें

हमारा कार्य, मूलभूत कार्य है। हमें जड़ों को सींचना है। हमें जड़ों को सींचना है यानी क्या करना है? अपना राष्ट्र, अपनी संस्कृति की जड़ें क्या है, यह जानने का प्रयास करते हैं, तो पाते हैं कि वेद हमारा मूल हैं, हमारी जड़ें हैं। इस ‘वेद’ के मर्म को समझना होगा। वेद अर्थात अस्तित्व का सनातन नियम, हमारा जीवन दर्शन है। यही हमारी संस्कृति का मूल है, राष्ट्र का मूल है। क्योंकि यह राष्ट्र ही सांस्कृतिक राष्ट्र है। जब-जब अपने राष्ट्र पर आक्रमण हुए, कठिनाइयां आईं तब-तब हमने अपने जड़ों को पहचाना और उसे सींचा, तब हमारी संस्कृति का विकास हुआ। ऐसे तत्व जीवन में धारण करनेवाले जितने लोग समाज में रहें, उतना ही इस समाज का, इस राष्ट्र का विकास हुआ है। जब-जब यह तत्व छूट गया या आचरण में नहीं रहा, तब-तब कठिनाइयों का सामना करते समय हमारे पांव लडखड़ाए या हम सामना नहीं कर पाए, या हम अपना विकास नहीं कर पाए।
 
विवेकानन्द केन्द्र में मा. एकनाथजी ने भी उसी के ऊपर जोर दिया था, और हम सब जानते ही हैं कि, इसीलिए उन्होंने विवेकानन्द केन्द्र की स्थापना की। आज हम देखते हैं कि हमें स्वतंत्रता तो प्राप्त हो गई और हमारी बाह्य विकास, आर्थिक स्थिति भी सुधर रही है। समाज भी संगठित हो रहा है। लेकिन ये तत्व हमारे जीवन से चले जायेंगे, हमारी चेतना में नहीं रहेंगे तो यह राष्ट्र बाह्य रूप से विकसित होते हुये भी दुर्बल रहेगा और विकास स्थायी नहीं रहेगा। इसलिए ही अपने भारत राष्ट्र में इन तत्वों को हमारे जीवन में धारण करते हुए, अपने व्यवहार से जड़ों को सींचते हुए लोगों को जोड़ने का कार्य हमें सातत्य से करना है। 

माननीय एकनाथजी ने विवेकानन्द केन्द्र को एक प्रखर वैचारिक आंदोलन के रूप में खड़ा किया क्योंकि विवेकानन्द केन्द्र का प्रयोजन जड़ों को सींचना हैं। यदि इन तत्वों को भूलकर हम कार्यक्रम के लिए कार्यक्रम (एक्टिविटीस के लिए एक्टिविटी) करते रहेंगे तो कभी-कभी हमारे मन में प्रश्न आ सकता है कि सच में हम जो कर रहे हैं, उसका कोई प्रयोजन है क्या? वैचारिक आन्दोलन के रूप में हमारा प्रयोजन निश्चित है। हम इस प्रयोजन को हम अपनी आँखों से, अपने चेतन स्तर पर या अपने व्यवहार से ओझल नहीं होने दें। ‘जड़ों को सींचना’ ही हमारा कार्य है। स्वामी विवेकानन्द ने कहा है कि जब-जब भारत राष्ट्र का विकास हुआ, जब भी यह राष्ट्र और भी प्रभावी रूप से उभरा उसके पहले आध्यात्मिक विचारों का यानी वेद तत्वों का प्रसार समाज में हुआ था। अपने राष्ट्र में इस दृष्टि से अनेक उदाहरण हैं। विद्यारण्य स्वामी पहले आए, हरिहर बुक्क ने विजयनगर साम्राज्य खड़ा किया। स्वामी रामदास ने फिर से इसमें ध्यान केन्द्रित किया और उसी को जीवन में लाकर कार्य करनेवाले श्रीमान् योगी शिवाजी महाराज ने फिर से आदिलशाही, निजामशाही, कुतुबशाही, मुगलशाही जैसे मुस्लिम आक्रान्ताओं की जो सत्ता बढ़ रही थी किन्तु युद्ध में हिन्दू मर रहे थे ऐसी जो स्थिति बनी थी उसको ही उन्होंने बदल दिया। इसी तरह रामकृष्ण-विवेकानन्द हैं। ऐसे अनेक उदाहरण ले सकते हैं। चाहे स्थानिक स्तर पर या अखिल भारतीय स्तर पर पद्धति यही रही हैं आध्यात्मिक तत्वों का समाज में और जीवन में विकास और उसके बाद कठिनाइयों को पार कर वैभवशाली इतिहास।  ऐसे अनेक उदाहरण स्थानीय स्तर पर या अखिल भारतीय स्तर पर दिखते हैं। जब-जब हम अपने संस्कृति के मूल तत्व- जिसमें एकात्मता, आत्मीयता, संयम, नियम आदि का समावेश है, - को आचरण में उतारकर सम्मानपूर्वक जीवन जी रहे थे, तब-तब हमने निश्चित रूप से कठिनाइयों को पार किया और फिर से समाज को वैभवशाली बनाया।  

एक उदाहरण है तमिलनाडु का - बिशप काल्डवेल ने षड्यंत्र के तहत 1901 में शुरू किया कि तमिल लोग हिन्दू नहीं हैं, ये द्रविड़ संस्कृति अलग है। द्रविड़ अलग हैं, आर्यों ने यहां (भारत में) आकर उनको नीचे ढकेला आदि-आदि। इस प्रकार के जहर के बीज बिशप काल्डवेल ने बोए, उस समय तो लोग हँसे। उनको पता था यह सही नहीं है। उदाहरणार्थ, १९०१ के सिर्फ तीन बरस पहले सन 1897 में अमेरिका से भारत लौटने के बाद स्वामी विवेकानन्द जब मद्रास आए थे, तो पहले दिन बहुत सारे लोग उनको सुनने आए। सभागृह के बाहर सभी जोर-जोर से स्वामीजी की जयजयकार के नारे लगा रहे थे। भवन के अंदर जितने लोग थे, सभागार के बाहर उससे 10 गुना लोग उपस्थित थे। लोग स्वामीजी को देखने गए थे, पर देख नहीं पा रहे थे इसलिए वे नारे लगा रहे थे। इन नारों के बीच स्वामीजी ज्यादा बोल नहीं पाए और स्वामीजी बाहर आ गए। बाहर एक रथ खड़ा था जिसपर स्वामीजी को बैठाकर सभागार तक लाया गया था, उसमें खड़े रहकर उन्होंने एक छोटा सा भाषण दिया। उस समय माईक की सुविधा नहीं थी। इतने सारे लोग आए थे और उस भीड़ के बीच भाषण दिया और उस भाषण के समाप्त होने के बाद ‘भारतमाता की जय’ और ‘आर्य धर्म की जय जय’ का उद्घोष हुआ। कल्पना कीजिए यह 1897 की बात है। 1901 में बिशप काल्डवेल ने ‘हम आर्य नहीं द्रविड़ हैं, आर्य ने द्रविड़ियों को नीचे दक्षिण में धकेला है’ ऐसा कहकर जो जहर घोला था, इसका ही परिणाम था कि 1960 में डीके, डीएमके आन्दोलन तमिलनाडू में शुरू हुआ। उन्होंने बताना शुरू किया ये राम आर्य हैं, रावण द्रविड़ियन है, हमारा आदर्श रावण है। राम ने रावण को मारा, हम राम को सहन नहीं करेंगे। हम राम के मंदिर तोड़ेंगे और राम के गले में चप्पलों की माला डालेंगे। और ऐसा हुआ भी, मंदिर तोड़े गए, चप्पलों के हार पहनाएं गए और वातावरण दूषित हो गया था। ऐसे समय में कांचीकामकोटि के शंकराचार्य श्री चंद्रशेखरेन्द्र सरस्वती – जो 13 वर्ष की आयु में शंकराचार्य हुए और 104 वर्षों तक वे रहें और बहुत लम्बे समय तक उन्होंने कार्य किया-  पैदल गांव-गांव जाते थे, वे लोगों के बीच प्रवचन करते, रात को वीणा बजाते-बजाते उस पर ही सिर रखकर दो घंटे आराम कर लिया करते थे। उनका जीवन एकदम पारदर्शी था। वे गांव-गांव घूमते रहे और समाज में जो जहर डीके, डीएमके ने भरा उसे दूर किया। राम के जो मंदिर तोड़े थे, गणपति के जो मंदिर तोड़े थे, वे फिर से खड़े हुए।

इसी तरह अरूणाचल के तिरप, चांगलांग जिले में एनएससीएन (नैशनल सोशलिस्ट काउन्सिल ऑफ नागालैंड) और ईसाइयत का प्रभाव बढ़ने लगा। तीरप में सात लोगों जो समाज को अपने संस्कृति की रक्षा करने में नेतृत्व देने की योजना बना रहे थे, उनको आतंकवादियों ने मार दिया। चांगलांग में लोग इकठ्ठा आ सके, अपने इष्टदेवता की प्रार्थना कर सके इसलिए दो रंगफ्रा के मंदिर बनाए लेकिन आतंकवादियों ने दोनों मंदिर जला दिए और लोगों को धमकी दी। तब लोगों ने रातोंरात सबने मिलकर फिर से ये मंदिर बनाए। उन्होंने आतंकवादियों से यह बताना शुरू किया कि हम आपके रिलिजन के खिलाफ नहीं हैं न हम ईसा मसीह को नकारते हैं लेकिन हम अपनी संस्कृति का पालन करेंगे, सांस्कृतिक नियम से जीवन जियेंगे। वहां के जन सामान्य डटे रहे और इस निश्चय, एकता और सजगता से आज चांगलांग में 84 मंदिर विद्यमान हैं। अर्थात हम डटे रहें, और अपने सांस्कृतिक विचारों को अपने आचरण में लाते हैं तो जीवन में बदलाव आता है, समाज में बदलाव आता है। 

वेदों में कहा गया है - ‘एकोSहमं बहुस्याम’। वह एक ही है जो विविध रूपों में प्रगटित हुआ है, ये पूरा विश्व एक ही चैतन्य का विविधता भरा रूप है। विज्ञान कहता है कि शरीर छोटी-छोटी कोशिकाओं से मिलकर बना है। ये जो कोशिका है, हर कोशिका का जो प्रयोजन है, उन सबको जोड़नेवाला, जीवन देनेवाला प्राण है। इसी प्रकार हम सभी ईश्वर में ही जुड़ें हुए हैं। इसलिए हम परस्पर जुड़े हुए, परस्पर सम्बंधित, एक दूसरे के पूरक, परस्परावलम्बी हैं। इसलिए व्यक्ति-परिवार, समाज, राष्ट्र, सृष्टि, परमेष्टी का अंग है। हम सभी को जोड़नेवाली चेतना ईश्वर है। हमें सोचना चाहिए कि, ‘मेरा व्यवहार समाज में ऐसा रहे कि मैं समरसता लाऊं, आनंद लाऊं। मैं मेरे आत्मशक्ति में स्थित हो जाऊं। इसलिए मैं समाज में एकात्मता लाऊं, विघटन न करूं और समस्या आने पर मैं टूटूंगा नहीं, निराश नहीं होऊंगा। अत: दो प्रकार की साधना मुझे करनी है, - एक समाज को जोड़ने की, समाज धारणा की और दूसरी अपनेआप को दृढ़ रखने की और अंतत: ईश्वरस्वरूप होने की।’ इसलिए मुझे अपने स्वयं के भीतर के ईश्वर के विस्तार को देखना होगा जो कि मेरे स्वयं से लेकर परिवार, समाज और राष्ट्र, सृष्टि तक विस्तारित है, यह समष्टि की निःस्वार्थ होकर कार्य करने की उपासना है। स्वामीजी के अनुसार, यही ‘मनुष्य निर्माण से राष्ट्र का पुनरुत्थान’ है। इसे हम सरल भाषा में कहें तो आत्मीयता से व्यवहार करना। सभी से हमारा व्यवहार ऐसा हो जैसे कि वह मेरा ही अंग है, जैसे माँ अपनी संतान से करती है। यदि संतान गलत करे तो वह उसको थप्पड़ भी लगाती है, तो उस बालक की आँखों से आंसू आते हैं। और बाद में माँ अपने उस बच्चे का दुलार करती है, प्यार करती है। विवेकानन्द केन्द्र के कार्यकर्ता का व्यवहार आत्मीयता का होना चाहिए। अपने समाज में, राष्ट्र में इसी भाव को ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ कहते हैं।  

अपनी संस्कृति यज्ञ संस्कृति है। जो व्यक्ति जन्म लेता है उसका पालन पोषण पूरा समाज करता है, परिवार करता है, परिवेश करता है। इसी से वह व्यक्ति अपने जीवन में हर एक कार्य करने के लिए सुयोग्य बनता है। अपनी योग्यता के बल पर व्यक्ति अफसर, शिक्षक या जो भी है, वह कार्य करता है। उसी प्रकार माँ है तो माँ का कार्य, पिता है तो पिता का कार्य, बड़े भैया है भैया का कार्य, बहन है बहन का कार्य, दादा है तो दादा का कार्य, और नानी है तो नानी का कार्य सफलतापूर्वक करता है। ये सारी योग्यताएं समाज में रहकर, समाज के सहयोग से मनुष्य अर्जित करता है। व्यक्ति जो भी कार्य करता है उसके बदले उसे कर्मफल मिलता है, प्रतिष्ठा मिलती है। उस कर्मफल या प्रतिष्ठा के कुछ भाग को समाज की धारणा या राष्ट्र के पुनरुत्थान में समर्पित करना चाहिए, और बचा हुआ ही अपने लिए रखना है। वही ‘आहुति’ है। श्रीमदभगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्’ अर्थात् सर्वव्यापी परमअक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है। धर्म से समाज की धारणा होती है और यज्ञ से धर्मपालन होता है। श्रीमदभगवद्गीता, में 3.15 श्रीकृष्ण कहते हैं,- यज्ञ के कारण ही ‘धर्मचक्र’ चलता है। व्यक्ति में जब स्वार्थ पनपता है तो यह यज्ञ रूक जाता है। और यज्ञ रूकता है तो समाज विपन्न और विघटित होता जाता है जिससे बच्चों का योगक्षेम ठीक नहीं होता है और समाज और गिरता जाता है। तो हमें 24 घंटे समाज की धारणा का हेतु मन में रखकर उस भाव से कार्य करना है। यह 24 घंटे का कार्य हैं। ऐसा नहीं कि मैं शिक्षक हूं तो चार-पांच घंटे ही शिक्षक रहूंगा। माँ या पिता हूं तो कुछ देर के लिए ही माँ या पिता हूं। ऐसा नहीं होता, हम पूरे 24 घंटे शिक्षक हैं, माँ या पिता हैं। हम 24 घंटे समाज के अंग हैं, भले ही दायित्व के अनुसार कार्य हम कुछ घंटे करते हों। इसलिए यही तत्व कि समाज में जो कुछ करूं पूर्ण समर्पित भाव से करूं, समाज में अच्छे मूल्य प्रतिष्टित रहे इसलिए मेरा भी व्यवहार संयमित रहे, यह भाव विद्यमान रहना चाहिए। 

माननीय एकनाथजी ने उपनिषदों और वेदतत्व के प्रकाश में विवेकानन्द केन्द्र का कार्य प्रारंभ किया इसलिए हमारा काम केवल गतिविधियां करना नहीं, बल्कि समाज में उन तत्वों की स्थापना करना और उसे बनाये रखना भी है। इसलिए हम अपने भीतर दैवीय गुणों और दैवीय परिपूर्णता का अनुभव कर समाज का निर्माण करें, यह हमारा लक्ष्य है। अपने समय का नियोजन कर हम कुछ साध्य करना चाहते हैं। आध्यात्मिक शक्ति का अनुभव कर कार्य करना है, राष्ट्र का पुनरुत्थान करना है, यह भाव रहे। यह विचार माननीय एकनाथजी ने केन्द्र की स्थापना के समय एक पत्रक में प्रकाशित किया था जिसे और विस्तार से बाद में केन्द्र प्रार्थना में बताया है। 

केन्द्र प्रार्थना के पांच पंक्तियों में वेदों के तत्त्व निहित हैं जो हमारी संस्कृति की जड़ें हैं, उन्हें समझने का प्रयास करेंगे। 

१) ‘ध्येयमार्गानुयात्रा’ अर्थात् अपने ध्येय के मार्ग की जो यात्रा प्रारंभ की है, उसे हम ‘त्याग, सेवा और आत्मबोध’ से ही विघ्नरहित बना सकते हैं। ये तीनों आयाम ध्येयप्राप्ति के लिए आवश्यक हैं। इनमें से केवल दो हों, तब भी बात पूरी नहीं होगी। तो पहला हमें ‘त्याग’ के महत्व को समझना होगा। हमें कुछ न कुछ चीज का त्याग करना होगा। समय, ऊर्जा, व्यवहार या फिर अहंकार का त्याग। दूसरा, ‘सेवा’ होनी है अर्थात आत्मीयता कृति में प्रकट होनी चाहिए और तीसरा, उसका आधार एकात्मदर्शन, आत्मबोध हों। ये तीनों एक साथ हों। समाज के कई संगठन व क्लब काम करते हैं जिनमें त्याग है और सेवा है पर ‘वेद दर्शन’ नहीं तो वे समाज या राष्ट्र का निर्माण करेंगे, यह कह नहीं सकते। ऐसे कोई महंत होते हैं जिनके जीवन में त्याग होता है, वे वेद तत्व के महत्व को भी समझते हैं परंतु सेवा के कार्य में उसे परिणत नहीं करते इसलिए वे राष्ट्र पुनरुत्थान में प्रभावी नहीं होते हैं। इसलिए त्याग, सेवा और आत्मबोध, ये तीनों आयाम को लेकर ही हम राष्ट्र का पुनरुत्थान कर सकते हैं। एकनाथजी कहते हैं- ‘इह जगति सदा न: त्यागसेवाSत्मबोधै:। भवतु विहतविघ्ना ध्येयमार्गानुयात्रा’। ‘इह जगति सदा’ अर्थात ‘हमेशा के लिए’ हमारे त्याग, सेवा और आत्मबोध से हम इस यात्रा को पूरा करें। त्याग, सेवा और आत्मबोध, केवल कभी-कभी नहीं तो हमारे जीवन में सदैव रखने का प्रयास करना है।  

२) ‘वयं सुपुत्रा अमृतस्य नूनं’ हम ईश्वर के सुपुत्र हैं, ईश्वरस्वरूप हैं यह भाव हमारे प्रत्येक कार्यकर्ता के हर एक व्यक्ति के हृदय तक पहुंचाना होगा। हम आत्मस्वरूप हैं, हम शक्तिस्वरूप हैं, यह सबको बताना होगा, हमें पुरुषार्थी बनना होगा। जो कार्य करना है वो हम करेंगे ही उसके लिए आवश्यक शक्ति हमारे अन्दर निहित है। हम परिस्थिति से निराश नहीं होंगे लेकिन परिस्थिति बदलने की शक्ति हम में है इस विश्वास से, धैर्य से काम करनेवाले होंगे। 

३) ‘निष्कामबुद्धयार्तविपन्नसेवा, विभो! तवाराधनमस्मदीयम्’ अर्थात हम ईश्वर का पूजन ‘आर्त और विपन्न’ की सेवा से करें। हम हमारे कार्य से ईश्वर की पूजा, साधना कर रहे हैं, यह भाव रहे। स्वामी विवेकानन्द कहते थे, - ‘कार्य ही पूजा है’। भगवद्गीता और उपनिषद् में भी कहा गया है कि हम इसी मार्ग से कार्य करते हुए 100 वर्ष तक जियेंगे। अपने जीवन में संयम के लिए हम व्रत और पूजा-अर्चना करना है तो जरूर करें, पर सच्ची ईश्वर पूजा ‘आर्त और विपन्न’ की सेवा ही है। ऐसा काम करने के लिए हमें 100 वर्ष तक जीना है ऐसी प्रार्थना हमारे शास्त्र सिखाते हैं। इसलिए अपना काम ठीक से करते जाएं। पहले ये सब डायनामिक्स हमारे कर्मभूमि में थे जो कहीं न कहीं अब छूट गए। लोग आज काम को टालते हैं। ऊपर से बताते हैं कि ज्यादा काम मत करिए कारण जो काम करता है उसे और ज्यादा काम दिया जाता है। अब हम तो इस मनुष्य योनि में अर्थात कर्मयोनी में काम करने के लिए ही तो आए हैं। तो काम टालना क्यों? हम जितना कर सकते हैं उससे अधिक करने का प्रयास करना है।  

४) “तवैवाशिषा पूर्णतां तत्प्रयातु” हां, हम कुछ कार्य शुरू करते हैं लेकिन ईश्वर की योजना कुछ और हो सकती है। ‘विवेकानन्द शिला स्मारक’ इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। लोगों ने सोचा कि स्वामीजी की एक प्रतिमा मात्र स्थापित करनी है। यदि वह बगैर बाधाओं के हो जाती तो फिर विवेकानन्द केन्द्र की स्थापना न होती। ईश्वरीय योजना कुछ और थी। विवेकानन्द के विचारों को अर्थात ‘वेद तत्व’ समाज में पहुंचाने थे इसलिए केन्द्र का सूत्रपात आवश्यक था। कठिनाइयां न होती तो न एकनाथजी उस कार्य में आते, न ऐसा भव्य स्मारक खड़ा होता और न ही विवेकानन्द केन्द्र की स्थापना होती। इसलिए कठिनाइयां आए तो पीछे न हटे, किन्तु क्षमताएं विकसित करें। हो सकता है कि मैं कार्य में अच्छी हूं, पर लोगों से ठीक संवाद नहीं कर पाती, तो मैं अपनी क्षमताओं को विकसित करूंगी। केवल कारण का रोना न रोएं। 

‘कारण का रोना रोने से, कभी न कोई जीता है। जो विष धारण कर सकता है वह अमृत को पीता है’।
इसलिए कठिनाइयों का सामना करें, रोये नहीं कि हमारी यहां तो कोई सुनता ही नहीं है, तो पता करें कि क्यों नहीं सुनते; हम उनको अपनाएं और अपनाने की आदत को विकसित करें। विचार करें, ऐसा तो नहीं कि बहुत ऑर्डर देने की मेरी आदत है, इस कारण से लोग मुझसे दूर चले जाते हैं तो अपनी इस आदत को सुधारें, सबको साथ लें। यदि हम संगठन में हैं तो सभी को साथ लेकर चलें। अपनी कमियां खोजें और स्वयं का आतंरिक विकास करें, यही जड़ों को सींचना है। 

पांचवा बिंदु है - समाज को समृद्ध, वैभवशाली करने का मंत्र और तंत्र -  वह मंत्र है ‘जीवने यावदादानं स्यात् प्रदानं ततोधिकम्’। हम जितना लेते हैं उससे बहुत ज्यादा समाज को दें और यह तभी संभव है जब कार्यकर्ता का आतंरिक विकास होगा, आत्मविकास होगा। मनुष्य का विकास दो तरह का होता है- एक, बाह्य विकास यानी कौशल्य प्राप्त करना, जैसे- संचालन करना, भाषण देना, प्रशासनिक क्षमता, संवाद कुशलता इत्यादि। इन्हें तो मनुष्य आवश्यकता के अनुसार शीघ्र सीख ही लेता है और यह करना भी है। दूसरा विकास है - आंतरिक विकास। इसे सजगता से करना होता है। आंतरिक विकास ही है - जड़ों को सींचना। आंतरिक विकास की पहल पहले स्वयं करें फिर सबका आंतरिक विकास करने में सहयोगी बनें। आंतरिक विकास के बिन्दु इस प्रकार हैं :-   

1. समय का नियोजन : आज समय का नियोजन सभी के लिए आवश्यक है, चाहे पूर्णकालिक कार्यकर्ता हों या अन्य सभी। पहले अपनी इस सुजलाम सुफलाम भूमि में हमें जीभ का संयम करना होता था इसलिए बहुत सारे व्रत भी करते थे किन्तु आज तो गेजेट्स के उपयोग में संयम की आवश्यकता है, उनमें हमारा बहुत समय जाता हैं। हमने स्वयं सोचना है की ‘मैं कितना समय दूं’। आज मोबाइल का व्रत भी बहुत जरूरी है। संयम के साथ वाट्सअप, फेसबुक आदि का प्रयोग करें। 15 मिनट या आधा घंटा से ज्यादा वाट्सअप न चलाऊं, ऐसा संकल्प हो। यदि मेरे मन में समाज के प्रति प्रेम है तो मुझे ‘संयम’ लाना ही होगा।  यदि राष्ट्र के प्रति प्रेम है तो हम समय निकाल ही सकते हैं।   

2. वाणी पर नियंत्रण : आतंरिक विकास का एक और लक्षण हैं - वाणी। वाणी से कार्यकर्ता की पहचान होती है। रामायण में हनुमान की श्रीराम से जो प्रथम भेंट होती है उस समय हनुमान की वाणी से श्रीराम प्रसन्न होते हैं और कहते हैं, “यह हनुमान जिनके पास रहेगा उनका कार्य साध्य होगा ही।” सिर्फ हनुमान की वाणी से श्रीराम ने उनकी उत्तम कार्यकर्ता करके पहचान की। क्या थी हनुमान की वाणी की विशेषता?  
अ. अदीर्घम् :- कम शब्दों में अपनी बात को पूर्णता से कहना।
ब. अविलम्बितम् :-  सतत अपने कार्य के बारे तत्पर होने के कारण तथा सारी जानकारी सदैव ध्यान में रखने के कारण प्रश्न पूछते ही जवाब दे पाना।
क. असंदिग्धम् :- अपनी बात को स्पष्ट ढंग से रखना, संदिग्ध न रखना।
ड. अव्यथम् :- अपने शब्दों से दूसरों को व्यथा न हो। वाणी से किसी को दु:खी न करना। 
श्रीमद्भगवद्गीता में वाणी का संयम बताया है कि स्वाध्याय से हम अपनी वाणी पर संयम प्राप्त कर सकते हैं। ‘अव्यथम्’ की साधना स्वाध्याय से होती है। 

3. निरहंकारिता : ‘मैं’ नहीं, ‘हम’ की साधना करें, अहंकाररहित होकर कार्य करें। ‘मैं’ का लय करके कार्य करें। यह एक कठिन साधना है, यही आत्मबोध, आत्मीयता की साधना है। जितना हम आत्मबोध, त्याग और सेवा से कार्य करेंगे उतना सबको हम जोड़ पाएंगे और आत्मविश्वास से कार्य कर पाएंगे।  
केन्द्र प्रार्थना के जो पांच बिंदु हमने देखें, उसे हमें अपने जीवन में अंगीकार करने होंगे। भगिनी निवेदिता अपने ‘आक्रामक हिन्दुत्व’ व्याख्यान में कहती हैं कि हमें अपनी बात को दृढ़तापूर्वक कहने का कौशल आना चाहिए तभी हम उस तत्व को समाज में स्थापित कर राष्ट्र का पुनरुत्थान कर पाएंगे। समाज से ‘चलता है’ यह भाव समाप्त कर सभी को अपनी क्षमता विकास के लिए प्रेरित करना होगा। 

शंकराचार्य श्री चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती जी कहते हैं,- ‘यदि आप देश की अवनति को देखकर व्यथित नहीं होते हैं तो आप देशद्रोही हैं। नालंदा विश्वविद्यालय हमारा संस्कृति का अभिन्न धरोहर था उसका निर्माण फिर से हो रहा है। किन्तु हमारे दुर्भाग्य है कि नालंदा विश्वविद्यालय को देखने जाने के लिए बख्तयारपुर होकर जाना पड़ता है। ये वही बख्तियार खिलजी है जिसने भारत के बाहर से आकर नालंदा को जलाया था। अभी भी देश की आत्मा अपनी गरिमा से उठ नहीं सकती, क्योंकि हम जागरूक नहीं हैं। समाज आत्मविस्मृत होकर बैठा है। इसलिए आज इस सोए हुए समाज को अपनी गरिमा से पुन: प्रतिष्ठित करने के लिए खुद को गलाना होगा। तिल-तिल मिटकर इस राष्ट्र को फिर से खड़ा करना होगा। जड़ोंको सींचना होगा। 


Subscribe Online     or      Get Online eMagazine

Thursday, 5 July 2018

गुरु पूर्णिमा

गुरु पूर्णिमा इस साल 27 जुलाई को आनेवाली है। विवेकानन्द केन्द्र में हम इस उत्सव को मुख्यतः कार्यकर्ताओं के संवर्धन के लिए मनाते हैं। हम राष्ट्र के मूल को मजबूत करने, या यूँ कहें कि राष्ट्रीय पुनरुत्थान के लिए काम कर रहे हैं। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, ‘प्रत्येक राष्ट्र के पास देने के लिए एक संदेश है, उसे पूरा करना ही उसका भाग्य और मिशन है’। भारत की नियति है आध्यात्मिकता में दुनिया का मार्गदर्शन करना अर्थात् जीवन के सभी क्षेत्रों में एकत्व की अभिव्यक्ति। वेदों ने ‘‘एकत्व - एक से अनेक की उत्पत्ति’’ की इस दृष्टि को संदर्भित किया, निकाला, पोषण किया, उस पर चर्चा की और उसका वर्णन किया।

वेदों को संरक्षित करने के लिए (अस्तित्व के शाश्वत सत्य को प्रकट करनेवाले मन्त्रों का संग्रह), महर्षि श्री व्यास ने गुरु परम्परा स्थापित की। वह जानते थे कि किसी भी ज्ञान की निरंतरता, ज्ञान को आगे बढ़ाने हेतु प्रतिबद्ध और चरित्रवान व्यक्तियों की शृंखला पर निर्भर है। उन्होंने गुरु परम्परा बनाकर और ज्ञान की प्रत्येक शाखा को अलग-अलग परिवारों को सौंपकर इसे यथार्थ बना दिया।

महर्षि वेदव्यास के ये प्रयास और दृष्टि इतनी सफल थी कि भारत एक ऐसी भूमि बन गई जहाँ गुरु से शिष्य या पिता से पुत्र को ज्ञान की विभिन्न शाखाएँ प्राप्त होती रहीं । गुरु से शिष्य दृ गुरु परंपरा ने ज्ञान के इस प्रवाह को संरक्षित और समृद्ध करके, प्रत्येक युग के लिए इसे प्रासंगिक किया। इस प्रकार भारतमाता, जिसके जीवन में सनातन धर्म स्थापित है और सनातन धर्म जो नित्य नूतन और चिर पुरातन है, सदैव प्रासंगिक और शाश्वत हो गए। भगवान वेदव्यास द्वारा निर्मित गुरु परम्परा की यह प्रथा इतनी अनोखी थी कि उनकी जन्मतिथि अर्थात आषाढ़ पूर्णिमा को हमारी इस भूमि पर इसे गुरुपूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है।

भारत आंतरिक रूप से पूर्ण व्यवस्थित और आक्रमणों का सामना करने के लिए अच्छी तरह सुसज्जित था। लेकिन जब भारत में संगठित सेन्य बल और हिंसक विचारधाराओं का आगमन प्रारम्भ हुआ, तो हम असफल सिद्ध हुए। विभिन्न संगठित शत्रुतापूर्ण ताकतों और विचारधाराओं की शक्ति ने हमारी विभिन्न प्रणालियों को नष्ट कर दिया। अतः, संगठित होकर काम करने की आवश्यकता उत्पन्न हुई। यह समय की माँग है कि जो लोग राष्ट्र के बारे में चिंतित हैं, वे एक साथ आएँ और इसलिए धर्म को पुनः स्थापित करने के लिए, रामकृष्ण मिशन, चिन्मय मिशन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विवेकानन्द केन्द्र, माता अमृतानंदमयी मिशन और कई अन्य संस्थाएँ अस्तित्व में आईं।

संगठित कार्य आवश्यकता बन गई है। हमारा हिन्दू समाज बहु-स्तरीय है और इसमें विभिन्न सम्प्रदाय समाहित हैं। स्वामी विवेकानन्द जानते थे कि हमें व्यवस्थित होना है, लोगों को एक साथ लाने की आवश्यकता है। उन्होंने लिखा, ‘‘हमारे पास एक मंदिर होना चाहिए, क्योंकि हिन्दुओं के लिए, धर्म पहले आना चाहिए। फिर, आप कह सकते हैं, सभी सम्प्रदाय इसके बारे में झगड़ा करेंगे। लेकिन हम गैर-साम्प्रदायिक मंदिर बनायेंगे, जिसमें प्रतीक के रूप में केवल ‘‘ॐ’’ होगा, जो किसी भी सम्प्रदाय का सबसे बड़ा प्रतीक होगा। यदि यहाँ कोई ऐसा सम्प्रदाय है, जो मानता है कि ‘‘ॐ’’ प्रतीक नहीं होना चाहिए, तो उसे स्वयं को हिन्दू कहने का कोई अधिकार नहीं है... इसके बाद मंदिर के संबंध में शिक्षकों को प्रशिक्षित करने के लिए एक संस्थान होना चाहिए जो धर्म प्रचार करे और हमारे लोगों को धर्मनिरपेक्ष शिक्षा दे... फिर यह काम इन शिक्षकों और प्रचारकों के माध्यम से आगे बढ़ाया जाएगा, और धीरे-धीरे हमारे पास अन्य स्थानों पर भी ऐसे ही मंदिर होंगे, जब तक कि हम पूरे भारत को कवर न कर लें। यही मेरी योजना है। यह विशाल दिख सकती है, लेकिन यह बहुत जरूरी है। आप पूछ सकते हैं, इसके लिए पैसा कहां है। पैसे की जरूरत नहीं है... मनुष्य कहां हैं? यह सवाल है। मनुष्य, केवल मनुष्य की ही आवश्यकता हैः बाकी सब तो स्वतः हो जाएगा, लेकिन शक्तिवान, सामथ्र्यवान, आस्थावान युवा पुरुष जिनकी रीढ़ की हड्डी शुद्ध हो, जरूरी हैं।“
यही स्वामी विवेकानन्द की योजना थी, जिसने माननीय एकनाथजी को विवेकानन्द केन्द्र के लिए प्रेरित किया। युवा, अग्निपुंज और जीवंत युवाओं को सक्षम बनाने की दृष्टि से एकनाथजी ने विवेकानन्द केन्द्र की स्थापना की। केन्द्र में ‘‘ॐ’’ हमारे गुरु हैं। ॐकार अर्थात ईश्वर, जो लोगों को एक साथ लाने, संगठित तरीके से टीमवर्क के साथ काम करने हेतु मार्गदर्शक है। अतः हम अपने प्रार्थना कक्ष में ‘‘ॐ’’ के सामने प्रार्थना करते हैं। ॐ भगवान का नाम है, जो किसी भी भाषा से संबंधित नहीं है। भगवान का कोई भी अन्य नाम किसी विशिष्ट भाषा के मूल शब्दों से संबंधित है जो विशिष्ट अर्थ देता है और इस प्रकार उस भाषा को समझने वाले भक्त में सम्मान, भक्ति, प्रशंसा आदि के स्पन्दन पैदा करता है। लेकिन ॐकार किसी भी विशिष्ट भाषा तक सीमित नहीं है। यह भाषा से परे है और इस प्रकार सभी भाषाओं में भगवान के लिए आदर्श अभिव्यक्ति बन जाता है। ॐकार ब्रह्मांड के सभी चरणों- सृजन, जीवन और विसर्जन का प्रतिनिधित्व करता है। यह सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ है। यह सभी लोगों के देवी-देवताओं का प्रतिनिधित्व करता है। यह सर्व समावेशी है- इसमें सभी जातियाँ और पंथ समाहित है। योगशास्त्र कहते हैं, ‘‘तस्या वाचका प्रणवः’’ ॐकार ईश्वर की सबसे गहन अभिव्यक्ति है। ॐ ईश्वर है, जो हम सभी के लिए प्रेरणा का सदासर्वदा स्रोत है।

हम ऐसी भूमि पर पैदा हुए हैं जिसने सदैव संसार का मार्गदर्शन किया है और भविष्य में भी उसे दुनिया का मार्गदर्शन करना है। संगठन, जो धर्म स्थापित करने के लिए अस्तित्व में आया है, ईश्वरीय कार्य करने के लिए है, हमारे लिए ईश्वरीय है। अतः, जैसे गुरु को महत्व दिया जाता है, इसी प्रकार हम संगठन को महत्व देते हैं। हमारी इस भूमि ने अपने बच्चों को यही सिखाया है कि अपने सभी बुजुर्गों को गुरु के रूप में देखें, ताकि प्रत्येक में गुरुता-महानता और दिव्यता को देखा जा सके। यह वह जगह है जहां न केवल मनुष्यों बल्कि जानवरों और पक्षियों समेत पूरी प्रकृति को कई लोगों द्वारा गुरु के रूप में सम्मानित किया है, और किसी ने नहीं, बल्कि स्वयं दत्तात्रेयजी ने दृ जिन्हें ब्रह्मा, विष्णु, महेश का संयुक्त अवतार माना जाता है। ऐसा कहा जा सकता है कि चूँकि दत्तात्रेयजी ने अपने आस-पास गुरुता को देखा, अपने आस-पास की हर चीज से सीखने के लिए अपने दिमाग को प्रशिक्षित किया, अतः वे गुरुओं के गुरु बन गए। जब हम कहते हैं कि ॐकार हमारा गुरु है तो हमें इसका गहरा अर्थ समझना होगा। ॐकार से ही सृजन हुआ है, अतः ईश्वर हर जगह है। हमें अपने दिमाग को दत्तात्रेय जैसे ही, अपने आसपास के उन सभी से सीखने के लिए प्रशिक्षित करना है।

कभी-कभी कार्यकर्ता आसपास की स्थिति को देखकर निराशा का अनुभव करता है या दैनंदिन गतिविधि में यांत्रिक बन जाता है, या श्रद्धा की कमी के कारण रूचि खो देता है। ऐसा क्यों होता है? कहीं न कहीं व्यक्ति केवल दूसरों की कमियों और दुर्गुणों को देखता है और प्रत्येक वस्तु में गुरुता को देखने में विफल रहता है। या आत्मविश्वास की कमी से जूझता है, या ’मैं पृथ्वी पर और इस संगठन में क्यों हूँ’ यह प्रश्न महत्वहीन हो जाता है, या टीम के स्थान पर ’मैं’ बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। ऐसे समय में ॐकार से सीखना यानी हमारे चारों ओर की सब चीजों से सीखना, विभिन्न स्तरों पर हमारी टीमों में यह भाव जरूरी है। जैसा कि माननीय एकनाथजी ‘‘साधना आॅफ सर्विस’’ में कहते हैं, ‘‘हमें केवल बहरा और गूंगा बनकर हर बात पर आत्मसमर्पण नहीं करना चाहिए, बल्कि हमारे आस-पास की हर चीज के प्रति एक प्रबुद्ध दृष्टिकोण होना चाहिए। समीक्षकों की तरह अपने चारों ओर देखो और आप पाएंगे कि प्रतिक्षण और प्रकृति की महत्वहीन चीजों में भी आपके लिए एक सन्देश है, जो आपके लिए लाभकारी और प्रगति के लिए है। बस उन संदेशों को सुनने के लिए और उचित प्रकाश में उन्हें समझने और विमुक्त होने के लिए ग्रहणशील कान और एक चैकस मन होना चाहिए। हमारे चारों ओर सबकुछ के अर्थ को समझने की कोशिश करें। ये सब चीजें वहां क्यों हैं? उनमें क्या अर्थ निहित है और उनका उद्देश्य क्या है? मेरा जन्म क्यों हुआ? मुझे कन्याकुमारी (विवेकानन्द केन्द्र) क्यों लाया गया है? जब मैं अपनी शिक्षा प्राप्त कर रहा था तब तो मैंने कभी इसका सपना भी नहीं देखा।... अब जब यह निर्धारित किया गया है कि मुझे यहां होना चाहिए, तो मुझे अपने भविष्य को एक योग्य तरीके से आकार देना है। मेरा दृष्टिकोण सही होना चाहिए। कई बार मैंने देखा है कि लोग अपनी बस मिस कर देते हैं। यह अपने साथ नहीं होने दो। मैं यहाँ इस प्राचीन पवित्र भूमि में हूँ, न कि अमेरिका या जर्मनी में। क्यों?... हमें अपने आस-पास की दुनिया को सही तरीके से देखना है। अन्यथा सुस्त दिनचर्या के कारण जीवन नीरस और उबाऊ हो जाता है। उन सभी लोगों में यह असंबद्ध एकता है, जिनमें इस दृष्टिकोण की कमी हैं क्योंकि वे बाह्य प्रकृति को देखने और इसके अर्थ को समझने के कौशल से सुसज्जित नहीं हैं। हमारे आस-पास की दुनिया और घटनाओं में हमारे लिए निहित सन्देश को समझकर सही भावना से अनुकरण करनेवाला प्रत्येक व्यक्ति अच्छे समापन की ओर जाता है। ईश्वरीय प्रस्तावों पर अडिग रहना और उन्हें हल्के में न लेना ही एकमात्र तरीका है।’’

हमारे लिए गुरुपूर्णिमा का अर्थ है कि हम स्वयं को ईश्वरीय प्रस्तावों से जोड़ते हैं, ‘हमें भारत को विश्वगुरु बनाकर मानवता के लिए काम करने हेतु एक साथ लाया गया है’।

पिछले साल से, हम विषय ‘जल ही मूल है’ विषय पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि हम एकत्व-आत्मीयता जैसे उद्देश्यपूर्ण सिद्धांतों पर काम करते हुए, निरर्थक प्रयासों में समय बर्बाद न करें और स्वयं का विलय उस चमू में कर दें जिनके साथ हम काम करते हैं - ‘मैं’ नहीं ‘हम’। तभी हमारे टीमों का विस्तार होगा, अधिक कार्यकर्ता हमारे पास आएंगे। सभी स्तरों पर विस्तार और समावेशी चमुओं का निर्माण करने की आवश्यकता है। हम प्रत्येक के अच्छे गुणों की सराहना करना सीखते हैं और टीम के हित में स्वयं को विलय करने के लिए बड़ा दिल रखते हैं, ताकि हम टीमों का निर्माण कर सकें। गुरु-उपासना, हमारे लिए आध्यात्मिक साधना ही है।

इस वर्ष गुरुपूर्णिमा के उत्सव के लिए हम अपने सभी परिचितों - कार्यकर्ताओं, संरक्षकों, शुभचिंतकों, सभी योग सत्रों और अब तक किए गए सभी वर्गों के प्रतिभागियों, हमारी पत्रिकाओं के सदस्यों आदि को बुला सकते हैं। वे सभी गुरुपूर्णिमा उत्सव में शामिल हो सकते हैं, साथ ही साथ विवेकानन्द केन्द्र की गतिविधियों के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए ताकि वे देश के लिए अपना समय और ऊर्जा प्रदान कर सकें। कम से कम ‘राष्ट्र के लिए सप्ताह में एक घंटे’ देने के लिए और इस प्रकार उन्हें केन्द्र के वर्गों में सहभागी होने के लिए अपील की जा सकती है। जैसे-जैसे वे नियमित रूप से आते हैं, देश के लिए और अधिक समय देने के प्रति उनकी रुचि विकसित होगी।

गुरु पूर्णिमा का अवसर - ॐकार उपासना, सृष्टि में दिव्यता को देखने के लिए साधना शुरू करने का सही समय है, प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं की टीमों में ‘‘स्व’’ को विसर्जित कर उसके लिए कार्य करना।


Subscribe Online     or      Get Online eMagazine

Monday, 1 January 2018

गर्वित हो तब तरुणाई

धर्मो रक्षति रक्षितः धर्म की रक्षा करने पर धर्म हमारी रक्षा करता है। धर्म की रक्षा करने का काम देश के युवा करते हैं। सौभाग्य से भारत की 61 प्रतिशत आबादी युवाओं की है। इस तरह भारत युवा देश है। 

युवा शब्द यु मिश्रणे-अपमिश्रणणे धातु से बना है, जिसका अर्थ है वह, जो जुड़ता है और अलग हो जाता है। युवा जब किसी काम को करने का दायित्व हाथ में लेता है तो सब कामों का भार एक साथ खड़ा नहीं करता। वह एक जिम्मेदारी का सामना करता है और सफलता प्राप्त करता है – attach to one, detach from every one. वह एक एक करके सभी दायित्वों को निभाता हुआ सभी में सफलता प्राप्त कर लेता है। इसलिए उसे युवा कहा जाता है। 

वैदिक राष्ट्रीय गति (यजु. २२ /२२)  में जयशील, सभासद, रधारो ही, युवा पुत्र हों यजमान के - यह कामना की गई है - जिष्णू स्थेष्टा सभयो युवा अस्य यजमानस्य वीरो जायताम्। राष्ट्र को युवा शक्ति ही चलाती है। वृद्ध मार्गदर्शन का काम करते हैं। संसद भवन के सामने लिखा है - न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः, वृद्धा न तेयेन प्रवदन्ति धर्मम्। सभा में बैठने योग्य हो वही सभ्य या सभेय होते है -          
स-भा = प्रकाश सहित। 

युवा शब्द का पर्यायवाची शब्द तरुण है] जिसका अर्थ है - तैर कर पार कर जाने वाला - संसार की सभी समस्याओं का समाधान खोज कर वह तैर कर पार कर जाता है। वेद का एक मंत्र है - 

अश्मन्वती रीयते संरबध्यम्-उत्तिष्ठत] प्रतरत सखायः। 

पथरीली नदी बह रही है। उसे पार करना बड़ा कठिन है। समारम्भ करो - उत्सव मनाओ। जितनी बड़ी चुनौती है उतने ही दृढ़ संकल्प युक्त बनना होगा। समुद्र पार करने की चुनौती मिली तो हनुमान् ने कनकभूधराकार शरीरा होकर चुनौती को स्वीकार किया था। 

जल से भरी नदी को तो कोई भी व्यक्ति पार कर सकता है तैर कर। पर] पथरीली नदी को कैसे पार किया जाय। इस कार्य को संभव बनाने के लिए कहा गया है - उठो और हे सखाओ ! पार कर जाओ। स्पष्ट है कि बड़ी समस्या को] अकेले न सुलझा सको तो कई सखा मिलकर पार कर जाओ। जिनकी इन्द्रियों के कार्यकलाप एक जैसे हों वे सखा (स-खा) कहलाते है - समानानि खानि येशां ते। 

तैरने का कार्य अकेला करे या सखाओं के साथ मिल एक साथ तरुण कहा जायगा। स्वामी विवेकानन्द ने भारत के तरुणों को जगाने के लिए कहा था - प्राण वायु का एक कण अनेक प्राणियों को जीवन दे सकता है] प्रकाश की एक किरण सर्वत्र प्रकाश भर सकती है। तुम तो प्राणमय ज्याति हो और ज्योतिर्मय प्राण - क्या नहीं कर सकते। उनका यह वाक्य मुर्दों में भी प्राण फूंक सकता है। 

भारत अध्यात्मनिनिष्ठ राष्ट्र है। युवा शक्ति को अनुशासित और संकल्पित होकर राष्ट्र के इस स्वरूप को प्रकट करना चाहिए। पौष्टिक आहार न मिलने से बच्चे बड़े कमजोर होते हैं। गरीबी-साधन विपन्नता सबसे बड़ी बीमारी है। अंकुरित धान्य और जवारे खाकर शरीर को मजबूत बनाया जा सकता है। पुरानी उक्ति है - शरीर माद्यं खलु धर्म साधनम्। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का निवास होता है। जैसा खाये अन्न वैसा होये मन। युवक हितभुक्, मितभुक् और अमृतभुक् बने। अमृतभुक् ईमानदारी की कमाई खाता है। 

परिवार में युवक को अनुशासित होने का अवसर मिलता है। यदि दुर्भाग्य से ऐसा परिवार मिलने की स्थिति न हो तो पास-पड़ोस के सात्त्विक परिवार में संपर्क बढ़ा कर स्वयं को अनुशासित कर ले। हताशा और अकर्मण्यता से बचें। सतत् उत्साह उल्लासपूर्वक जीवन जीने का अभ्यास करें। सच्चरित्र बन कर युग का मार्गदर्शन करें।

Tuesday, 5 December 2017

वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः

राष्ट्र शब्द ‘नेशन’ का समानार्थ नहीं है। हिन्दी में दो अलग-अलग अर्थों के वाचक राष्ट्र शब्द प्रचलित हैं। एक शब्द राज् धातु से बना हुआ शब्द है - राज-दीप्तौ़त्र प्रत्यय त्र अतिशय प्रकाशमान्, द्युतिमान्, दीप्तिमान। यह दीप्ति मनुष्य में पैदा होती है। वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहितः - वेद की उक्ति है - हम राष्ट्रभाव में जागरूक होकर अग्रणी बनें।

जब व्यक्ति में सच्चरित्र और विचारों में सत्त्व गुण का उद्रेक होता है तो वह दीप्तिमान् हो जाता है। उस समय उसे राश्ट्र कहा जाता है। ऐसे कई राष्ट्रसंज्ञर्क व्यक्ति जहाँ रहते हैं वह भूमि भी राष्ट्र कही जाती है। महर्षि पतंजलि ने सत्त्व गुण का लक्षण लिखा है - सत्त्वं लघु प्रकाशकम्। सात्त्विक गुण ही व्यक्ति को राष्ट्र बनाता है। यह राष्ट्र संज्ञक दीप्ति चारित्रि दीप्ति के रूप में भी पहचान बनाती है। इस सदीप्ति से सम्पन्न व्यक्ति ही इस देश के वे अग्रजन्मा होते हैं जो संसार के लोगों को अपने-अपने चरित्र की शिक्षा दिया करते हैं –

एतद्देशेप्रसूतस्य सकाशाद ग्रजन्यनः ।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्याः सर्वमानवाः ।।

(मनु स्मृति)

भारत का अर्थ है - प्रकाश में लीन - भायांरतः। जो प्रकाश में लीन होगा वह द्युतिमान् तो होगा ही।

दूसरा राष्ट्र शब्द रा-दाने धातु से ष्ट्रन् प्रत्ययपूर्वक बनता है। इसका अर्थ है - अतिशय दानशील, अतिशय त्यागषील। भारत को त्याग भूमि कहा जाता है और संसार की अन्य भूमियों को भोगभूमि। जीवन जीने की दो ही पद्धतियाँ होती हैं। पहली शैली यज्ञयोगमयी शैली है। अभी-अभी संघ प्रमुख माननीय मोहन भागवत ने कहा है कि हिन्दू जीवन शैली है। भोगमय जीवन हिन्दुत्व की पहचान नहीं है।

हिन्दू वस्तुतः हिन्धु शब्द है - हियं द्युनोति इति - जो अपने भीतर की जड़ता को दूर भगावे वह हिन्धु होता है। विप्र शब्द का अर्थ भी अपने भीतर की जड़ता को कैपा कर दूर भगाने वाला है - वेपति इति। इसी के आधार पर कहा गया है -
जन्मना जायते विप्रः संस्कार् द्विज उच्यते ।

‘ऋणं ह वै जायमानः’ उक्ति के अनुसार मानवी माता से ऋण मानव, ब्राह्मणी माता से ऋण ब्राह्मण, क्षत्रिया माता से ऋण क्षत्रिय, वैष्य माता से ऋण वैष्य और शूद्र माता से ऋण शूद्र पैदा होता है। इनमें से प्रत्येक को धन मानव, धन ब्राह्मण, धन क्षत्रिय, धन वैष्य और धन शूद्र बनना पड़ता है। इसी से ये सब धन्य होते हैं।

इसी तरह व्यक्ति प्र-ज - प्रकृष्ट जन्मा बने तो प्रजातंत्र सफल होगा। जन नया जन्म लेने में सक्षम हो तो जनतंत्र बनेगा। अवलोकनक्षम बनने पर लोकतंत्र सफल होगा और गणमान्यों से गणतंत्र सफल होता है। नागरिक कुछ भी न बनने की स्थिति में हो तो कोई भी तंत्र सफल नहीं होगा। जिम्मेदार नागरिक ही राष्ट्र बनकर राष्ट्र संज्ञा को सार्थक बनाते हैं। मातृभूमि को राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने सर्वेशर की सगुण मूर्ति कहा है।

अथर्ववेद में कहा गया है - माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः। ऋग्वेद में कहा गया है - उप सवर्प मातरं भूमिम्। भूमि की उपासना को भौम ब्रह्म की उपासना कहा गया है। भौम ब्रह्म की उपासना करने वाला राष्ट्राराधन के पुण्य का भागी बन जाता है।