Wednesday, 21 August 2019

गुरु की महिमा अनन्त


‘‘गुरु पूर्णिमा’’ का नाम सुनते ही मन श्रद्धा के भाव से भर जाता है। गुरु शब्द की महिमा भी अनंत है। गुरु के बिना तो जीवन में कुछ भी संभव नहीं। पढ़ना, लिखना, बोलना, बताना आदि जो कुछ भी सीखते हैं वह सब गुरु की कृपा से ही! भारतीय विचारधारा के अनुरूप जीवन के प्रत्येक कार्य-क्षेत्र में गुरु का संग होना आवश्यक समझा जाता है। बिना गुरु के ज्ञान पूर्ण नहीं होता, ज्ञान की प्रामाणिकता सिद्ध नहीं होती है। हम किसी भी क्षेत्र में कितने भी योग्य क्यों न हो जायें लेकिन यदि हमारे सिर पर गुरु का हाथ न हो तो हमारा सारा ज्ञान अप्रामाणिक होता है, हमारे ज्ञान की पुष्टि नहीं होती और मन में भ्रम बना रहता है। इसलिए गुरु का महत्व और भी व्यापक हो जाता है। शिशु के जन्मदाता, शिशु की सेवा करने वाली दाई, नाम रखने वाले पण्डित, शिक्षा देने वाले शिक्षक, विवाह सम्पन्न करने वाले पुरोहित, मंत्र देने वाला धार्मिक व्यक्ति तथा अंतिम संस्कार करने वाला सामाजिक व्यक्ति- ये सभी तो गुरु माने जाते हैं। इन सभी से श्रेष्ठ और महान् वह गुरु है जो जीव को भव-बन्धन से मुक्त कर दिव्य जीवन प्रदान करता है। इसी गुरु को ‘‘सद्गुरु’’ की उपाधि मिलती है। सद्गुरु के समान अधिकारी, मनुष्यों में तो कोई है ही नहीं, देव-वर्ग भी इस श्रेणी में नहीं आते।
वेदोपनिषद में प्रणव मंत्र को प्रथम स्थान पर पूजने की विधि बताई गई है। यह कार अ, ऊ और म से मिलकर बना है, इसका तात्पर्य है उत्त्पत्ति, संवर्धन और लय। अपने यहाँ विनाश की संकल्पना नहीं है। क्योंकि कुछ भी समाप्त नहीं होता। हमारी संस्कृति में विसर्जन कहा जाता है अर्थात् विशेषत्व से जिसका सर्जन होता है। इसलिए ॐ विनाश नहीं करता, वह निर्माण, संवर्धन और विसर्जन कर पुनः सृजन करने की शक्ति का स्रोत है। हम महर्षि वेदव्यास की जयंती को गुरु पूर्णिमाके रूप में मनाते हैं। महर्षि वेदव्यास ने लक्षावधि वैदिक ऋचाओं को संकलित और सम्पादित किया, इतना ही नहीं तो उसे उचित ढंग से वर्गीकृत भी किया। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के साथ ही भागवत पुराण और श्रीमद्भगवद्गीता को समाज के लिए लिपिबद्ध किया। उन्हीं की कृपा है कि आज हम भाषा, ज्ञान, अनुभव और अपनी जिज्ञासा की पूर्ति के लिए जिस प्रकार की भी सहायता चाहते हैं वह भगवान वेदव्यास द्वारा रचित वेदों और 18 पुराण से प्राप्त होता है।
ॐ का उच्चारण करते ही हम वैदिक परम्परा से जुड़ जाते हैं। ॐ स्वयं ब्रम्ह का प्रतीक है, इसलिए विवेकानन्द केन्द्र ने ॐ को गुरु माना है। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर अपने अंतःकरण के संकल्प को गुरु चरणों में अर्पित कर हम अपने सामाजिक दायित्व को पूर्ण करने की शक्ति प्राप्त कर सकते हैं। संयम, शुचिता और धैर्य बहुत आवश्यक गुण है। जिस तरह तुरटी (फिटकरी) दूषित और मटमैले जल को शुद्ध कर देती है, उसी तरह इन गुणों को आत्मसात करने से अन्दर का दोष दूर हो जाता है। मनुष्य के जीवन में ये सारे गुण गुरु की कृपा से ही आते हैं।

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