Thursday, 11 October 2018



माँ दुर्गा के नौ रूपों के पूजन का पर्व है नवरात्रि

(नवरात्रि उत्सव पर विशेष)

आश्विन मास में शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से प्रारम्भ होकर नौ दिन तक चलने वाला नवरात्रि शारदीय नवरात्रि कही जाती है। शारदीय नवरात्रि में दिन छोटे होने लगते हैं और रात्रि बड़ी। कहा जाता है कि ऋतुओं के परिवर्तन काल का असर मानव जीवन पर नहीं पड़े इसीलिए साधना के बहाने ऋषि-मुनियों ने इन नौ दिनों में उपवास का विधान किया था। नवरात्रि का समापन विजयादशमी के साथ होता है।

माँ दुर्गा के नौ रूपों में पहला स्वरूप 'शैलपुत्री' के नाम से विख्यात है। कहा जाता है कि पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम 'शैलपुत्री' पड़ा। दूसरे दिन माँ के दूसरे स्वरूप 'ब्रह्मचारिणी' की पूजा अर्चना की जाती है। दुर्गाजी का तीसरा स्वरूप माँ 'चंद्रघंटा' का है। तीसरे दिन की पूजा का अत्यधिक महत्व माना गया है। पूजन के चौथे दिन कूष्माण्डा देवी के स्वरूप की उपासना की जाती है। पांचवां दिन स्कंदमाता की उपासना का दिन होता है। स्कंदमाता अपने भक्तों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति करती हैं। दुर्गाजी के छठे स्वरूप का नाम कात्यायनी और सातवें स्वरूप का नाम कालरात्रि है। मान्यता है कि सातवें दिन माँ कालरात्रि की पूजा से ब्रह्मांड की समस्त सिद्धियों का द्वार खुलने लगता है। दुर्गाजी की आठवें स्वरूप का नाम महागौरी है। यह मनवांछित फलदायिनी हैं। दुर्गा जी के नौवें स्वरूप का नाम सिद्धिदात्री है। ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देनेवाली हैं।

नवरात्रि पर्व की धूम देश के हर भाग में अलग-अलग तरह से देखने को मिलती है जहां उत्तर भारत में मंदिरों में माँ भगवती का पूरे शृंगार के साथ पूजन किया जाता है वहीं गुजरात और महाराष्ट्र में गरबा का आयोजन किया जाता है तो बंगाल में मनाया जाने वाला दुर्गोत्सव अलग ही छटा बिखेरता है। माँ के मंदिरों विशेष रूप से जम्मू के कटरा स्थित माता वैष्णों देवी में तो नवरात्र में श्रद्धालुओं का तांता ही लग जाता है। शारदीय नवरात्रि के दौरान पूरा बंगाल दुर्गामय हो जाता है। यहां विभिन्न सोसायटियों और संस्थाओं की ओर से दुर्गा पूजा के बड़े बड़े और भव्य पंडाल लगाये जाते हैं जोकि समय के साथ-साथ आधुनिक होते जा रहे हैं। इन पंडालों के माध्यम से धार्मिक के साथ ही सामाजिक संदेश भी दिये जाते रहे हैं और हर साल सभी पंडालों के लिए एक थीम तय कर दी जाती है जिससे यह श्रद्धालुओं के लिए और आकर्षक हो जाते हैं।

इस व्रत के दिन प्रातःकाल उठकर स्नान आदि करके मंदिर में जाकर माता की पूजा करनी चाहिए या फिर घर पर ही माता की चौकी स्थापित करनी चाहिए। कन्याओं के लिए यह व्रत विशेष रूप से लाभदायक बताया गया है। माता की चौकी को स्थापित करने के दौरान जिन वस्तुओं की आवश्यकता पड़ती है उनमें गंगाजल, रोली, मौली, पान, सुपारी, धूपबत्ती, घी का दीपक, फल, फूल की माला, बिल्वपत्र, चावल, केले का खम्भा, चंदन, घट, नारियल, आम के पत्ते, हल्दी की गांठ, पंचरत्न, लाल वस्त्र, चावल से भरा पात्र, जौ, बताशा, सुगन्धित तेल, सिंदूर, कपूर, पंच सुगन्ध, नैवेद्य, पंचामृत, दूध, दही, मधु, चीनी, गाय का गोबर, दुर्गा जी की मूर्ति, कुमारी पूजन के लिए वस्त्र, आभूषण तथा श्रृंगार सामग्री आदि प्रमुख हैं।

कथा सुनने के बाद माता की आरती करें और उसके बाद देवीसूक्तम का पाठ अवश्य करें। देवीसूक्तम का श्रद्धा व विश्वास से पाठ करने पर अभीष्ट फल प्राप्त होता है। भगवती दुर्गा ही संपूर्ण विश्व को सत्ता, स्फूर्ति तथा सरसता प्रदान करती हैं। इन्हीं की शक्ति से देवता बनते हैं, जिनसे विश्व की उत्पत्ति होती है। इन्हीं की शक्ति से विष्णु और शिव प्रकट होकर विश्व का पालन और संहार करते हैं। दया, क्षमा, निद्रा, स्मृति, क्षुधा, तृष्णा, तृप्ति, श्रद्धा, भक्ति, धृति, मति, तुष्टि, पुष्टि, शांति, कांति, लज्जा आदि इन्हीं महाशक्ति की शक्तियां हैं। ये ही गोलोक में श्रीराधा, साकेत में श्रीसीता, श्रीरोदसागर में लक्ष्मी, दक्षकन्या सती, दुर्गितनाशिनी मेनकापुत्री दुर्गा हैं। ये ही वाणी, विद्या, सरस्वती, सावित्री और गायत्री हैं।

माँ दुर्गा के सभी नौ रूपों का अलग अलग महत्व है।

शैलपुत्री  

वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशंस्विनिम।।

माँ दुर्गा का पहला स्वरूप शैलपुत्री का है। पर्वतराज हिमालय के यहां पुत्री के रूप में उत्पन्न होने के कारण इनको शैलपुत्री कहा गया। यह वृषभ पर आरूढ़ दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में पुष्प कमल धारण किए हुए हैं। यह नव दुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। नवरात्रि पूजन में पहले दिन इन्हीं का पूजन होता है। प्रथम दिन की पूजा में योगीजन अपने मन को मूलाधार चक्र में स्थित करते हैं। यहीं से उनकी योग साधना शुरू होती है।


ब्रह्मचारिणी

दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।

माँ दुर्गा की नौ शक्तियों में से दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी का है। यहां ब्रह्मा शब्द का अर्थ तपस्या से है। ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप की चारिणी यानि तप का आचरण करने वाली। ब्रह्मचारिणी देवी का स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय एवं अत्यंत भव्य है। इसके बाएं हाथ में कमण्डल और दाएं हाथ में जप की माला रहती है। माँ दुर्गा का यह स्वरूप भक्तों और सिद्धों को अनंत फल प्रदान करने वाला है। इनकी उपासना से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार और संयम की वृद्धि होती है। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन इन्हीं की उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन स्वाधिष्ठान चक्र में स्थित होता है। इस चक्र में अवस्थित मन वाला योगी उनकी कृपा और भक्ति प्राप्त करता है।


चंद्रघण्टा

पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते महयं चंद्रघण्टेति विश्रुता।।

माँ दुर्गा की तीसरी शक्ति का नाम चंद्रघण्टा है। नवरात्र उपासना में तीसरे दिन इन्हीं के विग्रह का पूजन व आराधना की जाती है। इनका स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। इनके मस्तक में घण्टे के आकार का अर्धचन्द्र है। इसी कारण इस देवी का नाम चंद्रघण्टा पड़ा। इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है। इनका वाहन सिंह है। हमें चाहिए कि हम मन, वचन, कर्म एवं शरीर से शुद्ध होकर विधि−विधान के अनुसार, माँ चंद्रघ.टा की शरण लेकर उनकी उपासना व आराधना में तत्पर हों। इनकी उपासना से हम समस्त सांसारिक कष्टों से छूटकर सहज ही परमपद के अधिकारी बन सकते हैं।


कूष्माण्डा

सुरासम्पूर्णकलशं रूधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तुमे।।

माता दुर्गा के चौथे स्वरूप का नाम कूष्माण्डा है। अपनी मंद, हल्की हंसी द्वारा ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इनका नाम कूष्माण्डा पड़ा। नवरात्रों में चौथे दिन कूष्माण्डा देवी के स्वरूप की उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन अनाहज चक्र में स्थित होता है। अतः पवित्र मन से पूजा−उपासना के कार्य में लगना चाहिए। माँ की उपासना मनुष्य को स्वाभाविक रूप से भवसागर से पार उतारने के लिए सुगम और श्रेयस्कर मार्ग है। माता कूष्माण्डा की उपासना मनुष्य को आधिव्याधियों से विमुक्त करके उसे सुख, समृद्धि और उन्नति की ओर ले जाती है। अतः अपनी लौकिक, परलौकिक उन्नति चाहने वालों को कूष्माण्डा की उपासना में हमेशा तत्पर रहना चाहिए।


स्कन्दमाता

सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी।।

माँ दुर्गा के पांचवें स्वरूप को स्कन्दमाता कहा जाता है। ये भगवान स्कन्द 'कुमार कार्तिकेय' के नाम से भी जाने जाते हैं। इन्हीं भगवान स्कन्द अर्थात कार्तिकेय की माता होने के कारण माँ दुर्गा के इस पांचवें स्वरूप को स्कन्दमाता के नाम से जाना जाता है। इनकी उपासना नवरात्रि पूजा के पांचवें दिन की जाती है इस दिन साधक का मन विशुद्ध चक्र में स्थित रहता है। इनका वर्ण शुभ्र है। ये कमल के आसन पर विराजमान हैं। इसलिए इन्हें पद्मासन देवी भी कहा जाता है। इनका वाहन भी सिंह है। नवरात्रि पूजन के पांचवें दिन का शास्त्रों में पुष्कल महत्व बताया गया है। इस चक्र में अवस्थित रहने वाले साधक की समस्त बाह्य क्रियाएं एवं चित्र वृत्तियों का लोप हो जाता है।


कात्यायनी

चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शाईलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी।।

माँ दुर्गा के छठे स्वरूप को कात्यायनी कहते हैं। कात्यायनी महर्षि कात्यायन की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर उनकी इच्छानुसार उनके यहां पुत्री के रूप में पैदा हुई थीं। महर्षि कात्यायन ने सर्वप्रथम इनकी पूजा की थी इसलिए ये कात्यायनी के नाम से प्रसिद्ध हुईं। माँ कात्यायनी अमोद्य फलदायिनी हैं। दुर्गा पूजा के छठे दिन इनके स्वरूप की पूजा की जाती है। इस दिन साधक का मन आज्ञा चक्र में स्थित रहता है। योग साधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत ही महत्वपूर्ण स्थान है। इस चक्र में स्थित मन वाला साधक माँ कात्यायनी के चरणों में अपना सब कुछ न्यौछावर कर देता है। भक्त को सहजभाव से माँ कात्यायनी के दर्शन प्राप्त होते हैं। इनका साधक इस लोक में रहते हुए भी अलौकिक तेज से युक्त होता है।


कालरात्रि

एक वेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकणी तैलाभ्यक्तशरीरणी।।
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टक भूषणा।
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयड्करी।।

माँ दुर्गा के सातवें स्वरूप को कालरात्रि कहा जाता है। माँ कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यंत भयानक है लेकिन ये सदैव शुभ फल देने वाली मानी जाती हैं। इसलिए इन्हें शुभड्करी भी कहा जाता है। दुर्गा पूजा के सप्तम दिन माँ कालरात्रि की पूजा का विधान है। इस दिन साधक का मन सहस्त्रार चक्र में स्थित रहता है। उसके लिए ब्रह्मांड की समस्त सिद्धियों के द्वार खुलने लगते हैं। इस चक्र में स्थित साधक का मन पूर्णतः माँ कालरात्रि के स्वरूप में अवस्थित रहता है। माँ कालरात्रि दुष्टों का विनाश और ग्रह बाधाओं को दूर करने वाली हैं। जिससे साधक भयमुक्त हो जाता है।


महागौरी

श्वेते वृषे समरूढ़ा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा।।

माँ दुर्गा के आठवें स्वरूप का नाम महागौरी है। दुर्गा पूजा के आठवें दिन महागौरी की उपासना का विधान है। इनकी शक्ति अमोघ और फलदायिनी है। इनकी उपासना से भक्तों के सभी कलुष धुल जाते हैं।


सिद्धिदात्री

सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।
सेव्यामाना सदा भूयात सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।।

माँ दुर्गा की नौवीं शक्ति को सिद्धिदात्री कहते हैं। जैसा कि नाम से प्रकट है ये सभी प्रकार की सिद्धियों को प्रदान करने वाली हैं। नव दुर्गाओं में माँ सिद्धिदात्री अंतिम हैं। इनकी उपासना के बाद भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। देवी के लिए बनाए नैवेद्य की थाली में भोग का सामान रखकर प्रार्थना करनी चाहिए।

(संकलित)
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Tuesday, 9 October 2018


बुनियादी शिक्षा
- मीनल जोशी
पढ़ाई! पढ़ाई! पढ़ाई! कितने बार? क्यों? मुझे नहीं पढ़ना। मुझे खेलना है। नाचना है, गाना है।... यही है आज के बच्चों की पुकार!
वर्तमान शिक्षा प्रणाली ने बच्चों को यंत्रवत बना दिया है। स्कूल जाओ, निर्धारित पाठ्यक्रम पढ़ो, ट्यूशन जाओ, परीक्षा दो, अंक प्राप्त करो। बस! यही शिक्षा हैं। अंक अच्छे मिले तो ठीक नहीं तो छात्र, जीवन के सभी स्तर पर निकम्मा हो जाता है। उस बच्चे को इसी नजरिये से देखा जाता है। वह अपना आत्मसम्मान खो बैठता है। ऐसे में बच्चे का भविष्य क्या होगा? स्वतंत्र भारत के करोड़ों बच्चों को आधुनिक शिक्षा द्वारा आखिर हम क्या दे रहे हैं?  
हमारी शिक्षा व्यवस्था के विषय में हमें गंभिरता से सोचने की आवश्यकता है। महात्मा गांधी के शिक्षा विषयक विचार आज भी उतने ही मौलिक है। गांधीजी ने शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य के देह, मन, बुद्धि का सर्वांगीण विकास माना हैं। जिस में मनुष्य का आध्यात्मिक विकास भी अंतर्भूत है। वे कहते हैं, “आध्यात्मिक विकास की नीव शील निर्माण है। अक्षर ज्ञान की अपेक्षा चरित्र निर्माण शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए।”
गांधीजी मातृभाषा द्वारा शिक्षा के पुरस्कर्ता थे। मातृभाषा में अध्ययन करने से विद्यार्थी को सहजता से विषयों का आकलन होता है। वह स्वतंत्र रूप से विचार करने का सामर्थ्य प्राप्त करता है। अपनी भावनाओं और विचारों को सहजता पूर्वक और स्पष्ट रूप से अभिव्यक्ति कर सकता है। आज हम अप्बे बच्चों को बचपन से ही केवल अंग्रेजी सिखाने के पीछे पड़े हैं। जिससे हम बालक की संवेदन क्षमता को संकुचित करते हैं। बालक अपनी क्षमताओं को सीमित पाकर असहायता महसूस करता है। जिसका परिणाम उसके कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों के विकास पर होता है। गांधीजी कहते हैं, “कोई जापानी अपने को इतना असहाय अनुभव नहीं करता जितना हम अपने को समझते जान पड़ते हैं।”    
भाषा का संबंध अपनी संस्कृति से है। गांधीजी कहते हैं, “विदेशी भाषा के माध्यम से भारत में शिक्षा दी जाती है। इसने हमारे राष्ट्र को हद से ज्यादा बौद्धिक और नैतिक आघात पहुँचाया है। हमें और हमारे बच्चों को अपनी निजी विरासत का निर्माण करना है। राष्ट्र अपनी भाषा के कोश को भरें। और इसके लिए संसार की अन्य भाषाओं का कोश भी अपनी देशी भाषाओं में संचित करें।” आज दुख की बात तो यह है कि हमें, हमारे बच्चों को शेक्सपीयर, न्यूटन के बारे में तो पता है, किन्तु वे कालिदास, आर्यभट्ट, वराहमिहिर आदि के साहित्य और संशोधनों से सर्वधा अनभिज्ञ हैं। गांधीजी कहते हैं, “इतना मैं आदर के साथ कहूँगा कि दूसरी संस्कृतियों का गुण या मान अपनी संस्कृति के बाद अवश्य हो सकता है, पहले कदापि नहीं। हमारी संस्कृति का भण्डार जितना भरा-पूरा है, उतना और किसी का नहीं है।” प्रान्तीय भाषाओं को उनका उचित स्थान मिलना चाहिए। तभी हमारे देश की विविधता का हम आनंद ले सकेंगे। विदेशी संस्कृति पर आधारित शिक्षा प्रणाली अपनी भारतीय संस्कृति का पोषण नहीं कर सकती। आज के युग में हमें समन्वय की आवश्यकता है। बच्चों के शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास के महत्त्व को समझते हुए प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए।
शिक्षा प्रणाली में गांधीजी श्रमप्रतिष्ठा को मूलभूत स्थान देते हैं। वे कहते हैं, “हमें हृदय और हाथ की संस्कृति पर ध्यान देना चाहिए। हम शिक्षा के विषय में केवल मस्तिष्क तक सीमित है।” शिक्षा द्वारा मनुष्य के आंतरिक विचारों का पोषण होना चाहिए। हमारे कॉलेजों में जो इतनी सारी तथाकथित शिक्षा दी जाती हैं, उससे विद्यार्थियों का मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य चौपट हो जाता है। आजकल तो बचपन से ही छात्रों में मोटापा, डायबीटीज जैसी बीमारियाँ दिखाई देती हैं। स्वयं का काम स्वयं न करने से वे शरीर श्रम को हेय समझते हैं। यही द्वेष सामाजिक कुरीतियों में परिणत होता है। शिक्षित युवक श्रम करने की अपेक्षा बेकार रहना पसंद करता है। जो लोग शारीरिक श्रम करते हैं, उन्हें नीच समझते हैं।
गांधीजी कहते हैं, “लड़के-लड़कियों को ऐसी शिक्षा कभी नहीं दी जाती जिससे वे अपने आस-पड़ोस पर अभिमान कर सके। छात्र शिक्षा में जितना आगे बढ़ता है, उतना अपने घर से दूर हो जाता है। गृह जीवन में, उसे रस नहीं आता।” आज हम देखते हैं कि लड़के-लड़कियों की विदेश में जाकर नौकरी पाने की होड़ लगी है। ब्रेन-ड्रेन की समस्या से हम गुजर रहे हैं। अपने देश की, माता-पिता की सेवा का विचार उसके मन को छूता तक नहीं। हमारे भविष्य के नागरिकों को हम स्वार्थी बना रहे हैं।
गांधीजी ने शिक्षा प्रणाली में आठ घण्टा व्यावसायिक शिक्षा और दो घण्टे अक्षर ज्ञान को देने की बात कही है। उनके मतानुसार, बच्चों की अभिरुचि के अनुसार शिक्षा व्यवस्था होनी चाहिए। बच्चें स्वावलम्बी बनें। अपनी जीविका स्वयं अर्जित करें तथा व्यवसाय प्रशिक्षण का पाठ्यक्रम राष्ट्र की आवश्यकताओं को पूरा कर सके। शालेय शिक्षा का संबंध जीवन की शिक्षा से होना चाहिए। अगर हम आज भी गांधीजी के इन विचारों को कार्यान्वित करें तो देश में बेकारी की समस्या नहीं रहेगी। हमारे देश को बाहर से सड़क बनाने के यंत्र या देश की रक्षा के लिए विदेशों से हवाई जहाज खरीदने नहीं पड़ेंगे। हमारे छात्र ही अपने देश के लिए उच्च तकनीकी ज्ञान विकसित करेंगे। उनका इस देश में उचित सम्मान भी होगा। सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी सृजनशील होगा। घर की छोटी-छोटी समस्याओं के लिए उसका परावलंबन खत्म हो जाएगा। “कौशल विकास” कार्यक्रम शालेय स्तर पर पहुँचना आवश्यक है। इससे उच्च शिक्षा भी महँगी नहीं रहेगी।
गांधीजी शिक्षा व्यवस्था में धार्मिक शिक्षा को महत्त्व देते हैं। वे कहते हैं, “धार्मिक शिक्षा पुस्तकों की अपेक्षा आचरण से होनी चाहिए। शिक्षकों के वर्तन से उसे प्राप्त किया जा सकता है।” शिक्षक का चरित्र उन्नत होना अपेक्षित है। वह उदार हृदय का तथा स्वतंत्र विचारक्षम होना चाहिए। विद्यार्थियों के साथ उसका हृदय से आंतरिक संबंध हो। शिक्षक के नैतिक आचरण का परिणाम छात्र के चारित्र निर्माण में सहायक होता है। इसका उदाहरण हम अनेक महनीय व्यक्तियों के जीवन में देखते हैं।
गांधीजी ने बुनियादी शिक्षा का प्रारूप प्रस्तुत किया। उन्होंने आश्रमवासी बच्चों और स्वयं के बच्चों पर विभिन्न शैक्षणिक प्रयोग किए। फलस्वरूप उनका विश्वास दृढ़ हुआ कि व्यक्ति का चरित्र निर्माण ही महत्त्वपूर्ण है। शिक्षा के माध्यम से हमें संकुचित नहीं वरन् उदार समाज का निर्माण करना है। प्रतिस्पर्धा की अपेक्षा सहकारिता विकसित करनी है। गांधीजी के विचारों को आधुनिक व्यवस्था में अग्रक्रम देते हुए स्वावलम्बी सत्त्वशील भारत के निर्माण में हम कृतिशील बनें।
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Monday, 8 October 2018


आधुनिक वाचस्पति : डॉ.श्याम बहादुर वर्मा
- निवेदिता रघुनाथ भिड़े
केन्द्र शिक्षा शिविर का सत्र लेकर मैं कार्यालय में मेरी पोस्ट देख रही थी। एक पुस्तक टपाल में थी – ‘भारतीय संस्कृति के अनवरत उपासक: डॉ.श्याम बहादुर वर्मा’। जैसे ही मैंने यह नाम पढ़ा मेरा मन बारह वर्ष पीछे गया।

दिल्ली में विवेकानन्द केन्द्र इंटरनेशनल का जब भवन निर्माण हो रहा था तब निधि के कार्य से कभी-कभी मेरा प्रवास दिल्ली होता था। एक दिन श्री प्रवीणजी, केन्द्र के संयुक्त महासचिव जो उस समय वहां का दायित्व सम्भाल रहे थे; उन्होंने मुझसे कहा, “चलिए, आज मैं आपको एक विशेष व्यक्ति से मिलाऊंगा।” ‘किनसे’ मैंने पूछा।

उन्होंने बताया, “श्री श्याम बहादुर वर्माजी ‘केन्द्र भारती’ के प्रथम सम्पादक, जिनके कारण ‘केन्द्र भारती’ का समाज में मान था।” केन्द्र भारती - विवेकानन्द केन्द्र की हिन्दी मासिक पत्रिका।

हम उनके फ्लैट पर पहुंचे और बेल बजाई। थोड़ी देर बाद स्वयं उन्होंने दरवाजा खोला और हँसते हुए स्वागत करते हुए हमें अन्दर बुलाया। जैसे ही हम अन्दर आए, मैं घर देखकर हैरान हो गई। सर्वत्र पुस्तकें थीं। सर्वत्र यानी – अलमारी, टेबल, पलंग, कुर्सी, बेंच और पूरे फर्श पर। उन पुस्तकों में से राह निकालते हुए हम अन्दर के कक्ष में उनके पीछे पीछे गए, वहां भी वही चित्र। थोड़ी पुस्तकें कुर्सी और बेंच से उठाकर हमने आसन ग्रहण किया।

मैं पहली बार ही मिल रही थी लेकिन जिस आत्मीयता और सहजता से उन्होंने बात की, ऐसा लगा मैं उनको बरसों से जानती हूं। बीच में वे उठकर घुटने और पाँव के दर्द के कारण लंगड़ते हुए कक्ष के बाहर गए। मैं उनके बारे में जानती तो कुछ नहीं थी, इसलिए प्रवीणजी से पूछा तो उन्होंने उनके बारे में बताया। थोड़े समय में वे चाय और बिस्कुट लेकर आए।

“लेकिन आपने मुझसे क्यों नहीं कहा, मैं बना देती” मैंने कहा।  
“नहीं, नहीं, आप पहली बार आईं हैं और यह तो मेरा रोज का काम है।” उन्होंने कहा।  

फिर हमारी गपशप चलती रही। केन्द्र का कार्य, उनका जो हिन्दी सूक्ति कोष हो गया था और हिन्दी शब्द कोष चल रहा था उसके बारे में, हँसी मजाक भी चल रहा था। आखिर हम जाने के लिए उठे। उन्होंने कहा, “नहीं, खाना खाकर जाइए।”

मैंने पूछा, ‘खाना कौन बनाता है?’
वे बोले, “है, है, ...हमारी एक लड़की आती है। दो तीन घरों का काम निपटाकर, वह आएगी।”
हमें छोड़ने का न उनका मन हो रहा था और न ही हमारा जाने का। हम और बैठे, बाद में खाना खाया। मैंने पूछा, “आप अपने पैरों का इलाज करवाइए, केरल में अच्छा इलाज होता है।”

उन्होंने कहा, “नहीं, मुझे बुलावा आने के पहले यह हिन्दी शब्द कोष पूरा करना है। समय नहीं है और काम बहुत बड़ा है।”
मैंने पूछा, “लेकिन क्या हुआ पैरों को?”
उन्होंने सहजतापूर्वक कहा, “घण्टों बैठकर काम करने के कारण उनकी स्थिति बिगड़ गई है।”  

थोड़ी देर बाद भोजन हुआ। फिर से हमने जाने का प्रयास किया और उनके आग्रह के कारण थोड़ी देर रुक गए। आखिर जब उनसे अनुमति मांगी। उन्होंने कहा, “हां, कब तक रोकूं, जाना तो होगा ही।” उनकी आत्मीयता से मेरा हृदय भर आया। पुस्तकों के बीच से राह बनाते जैसे ही हम निकले, मैं उनकी कर्तव्यनिष्ठा से अभिभूत  होकर स्वयं को ही बता रही थी, “हां, मैंने आज आधुनिक वाचस्पति मिश्र देखा।” उनपर लेख लिखने की तीव्र इच्छा हुई लेकिन व्यस्तता के कारण रह ही गया। २००९ में उनके निधन के बाद विचार तो था लेकिन फिर से रह गया। आज जब उनपर लिखी गई पुस्तक मिली तब उनकी फोटो को देखकर सोचा कितनी भी व्यस्तता क्यों न हो, अब अवश्य लेख लिखूंगी।

एक ही भेंट में शायद ही मैं किसी व्यक्ति से प्रभावित होती हूं। अब सोचती हूं तो लगता है कि श्याम बहादुर वर्माजी वाचस्पति मिश्र से थोड़े अलग हैं। वाचस्पति मिश्र पुस्तक लिखते समय उसके साथ इतने एकाकार हो गए थे कि आस-पास के लोगों का, यहां तक कि उनको अपनी पत्नी का भी भान नहीं रहा और उन्होंने ‘भामती’ जैसे बेजोड़ ग्रन्थ की रचना की। श्याम बहादुर वर्माजी ने राष्ट्र कार्य के लिए विवाह ही नहीं किया। संघ के कार्यकर्ता होने के नाते उन्होंने बहुत लोगों को भी जोड़ा। आत्मीयता से वे सभी से जुड़ते थे लेकिन साहित्य सेवा में भी उतने ही डूब जाते थे।

ऐसे भारतीय संस्कृति की अनथक, अविरत उपासना करनेवाली विभूति का जीवनचरित्र मेरी टेबल पर देखकर १२ वर्ष पहले २००६ में उनसे हुई एकमेव भेंट याद आई। स्वभावतः मैंने उनका जीवन चरित्र एक दिन में पढ़ लिया। अर्थाभाव के कारण ‘केन्द्र भारती’ का प्रकाशन कुछ वर्ष स्थगित कर दिया गया था। उनको इसका बहुत दुःख हुआ किन्तु फिर से जब केन्द्र भारती का प्रकाशन शुरू हुआ तो व्यस्तता के कारण वे इसके सम्पादक तो नहीं बने, परन्तु उनके विशाल हृदय में ‘केन्द्र भारती’ के लिए स्नेह बना रहा, और वे लेख लिखते रहे।

उनकी प्रतिभा देखकर कार्यकर्ताओं के मन में आता है, यदि उस समय आर्थिक कठिनाई के बावजूद विवेकानन्द केन्द्र की दिल्ली प्रबंधन समिति  ‘केन्द्र भारती’ का प्रकाशन स्थगित नहीं करती तो श्याम बहादुर वर्माजी के प्रतिभाशाली और समर्पित सम्पादन के कारण आज ‘केन्द्र भारती’ देश की सुप्रसिद्ध और लोकप्रिय पत्रिका होती अर्थात ‘गतं न शोच्यते’।

मैंने पूरा २२५ पन्नों का चरित्र एक ही दिन में पढ़ा। उनके छोटे भाई डॉ.धर्मेन्द्र वर्मा ने बहुत ही वास्तविक चित्रण पूरे ग्रन्थ में किया है। श्याम बहादुर वर्माजी ने ‘बृहत हिन्दी शब्द कोष’ का कार्य तो २००९ में देह छोड़ने के पहले पूरा किया लेकिन उसका प्रकाशन बाद में हुआ।

विवेकानन्द केन्द्र को उनका स्नेह सदैव प्राप्त हुआ। उनके जैसे आधुनिक वाचस्पति से प्रेरणा केन्द्र कार्यकर्ता भी नित्य लेते रहेंगे। 

- उपाध्यक्षा,
विवेकानन्द केन्द्र कन्याकुमारी
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