Thursday, 5 July 2018

गुरु पूर्णिमा

गुरु पूर्णिमा इस साल 27 जुलाई को आनेवाली है। विवेकानन्द केन्द्र में हम इस उत्सव को मुख्यतः कार्यकर्ताओं के संवर्धन के लिए मनाते हैं। हम राष्ट्र के मूल को मजबूत करने, या यूँ कहें कि राष्ट्रीय पुनरुत्थान के लिए काम कर रहे हैं। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, ‘प्रत्येक राष्ट्र के पास देने के लिए एक संदेश है, उसे पूरा करना ही उसका भाग्य और मिशन है’। भारत की नियति है आध्यात्मिकता में दुनिया का मार्गदर्शन करना अर्थात् जीवन के सभी क्षेत्रों में एकत्व की अभिव्यक्ति। वेदों ने ‘‘एकत्व - एक से अनेक की उत्पत्ति’’ की इस दृष्टि को संदर्भित किया, निकाला, पोषण किया, उस पर चर्चा की और उसका वर्णन किया।

वेदों को संरक्षित करने के लिए (अस्तित्व के शाश्वत सत्य को प्रकट करनेवाले मन्त्रों का संग्रह), महर्षि श्री व्यास ने गुरु परम्परा स्थापित की। वह जानते थे कि किसी भी ज्ञान की निरंतरता, ज्ञान को आगे बढ़ाने हेतु प्रतिबद्ध और चरित्रवान व्यक्तियों की शृंखला पर निर्भर है। उन्होंने गुरु परम्परा बनाकर और ज्ञान की प्रत्येक शाखा को अलग-अलग परिवारों को सौंपकर इसे यथार्थ बना दिया।

महर्षि वेदव्यास के ये प्रयास और दृष्टि इतनी सफल थी कि भारत एक ऐसी भूमि बन गई जहाँ गुरु से शिष्य या पिता से पुत्र को ज्ञान की विभिन्न शाखाएँ प्राप्त होती रहीं । गुरु से शिष्य दृ गुरु परंपरा ने ज्ञान के इस प्रवाह को संरक्षित और समृद्ध करके, प्रत्येक युग के लिए इसे प्रासंगिक किया। इस प्रकार भारतमाता, जिसके जीवन में सनातन धर्म स्थापित है और सनातन धर्म जो नित्य नूतन और चिर पुरातन है, सदैव प्रासंगिक और शाश्वत हो गए। भगवान वेदव्यास द्वारा निर्मित गुरु परम्परा की यह प्रथा इतनी अनोखी थी कि उनकी जन्मतिथि अर्थात आषाढ़ पूर्णिमा को हमारी इस भूमि पर इसे गुरुपूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है।

भारत आंतरिक रूप से पूर्ण व्यवस्थित और आक्रमणों का सामना करने के लिए अच्छी तरह सुसज्जित था। लेकिन जब भारत में संगठित सेन्य बल और हिंसक विचारधाराओं का आगमन प्रारम्भ हुआ, तो हम असफल सिद्ध हुए। विभिन्न संगठित शत्रुतापूर्ण ताकतों और विचारधाराओं की शक्ति ने हमारी विभिन्न प्रणालियों को नष्ट कर दिया। अतः, संगठित होकर काम करने की आवश्यकता उत्पन्न हुई। यह समय की माँग है कि जो लोग राष्ट्र के बारे में चिंतित हैं, वे एक साथ आएँ और इसलिए धर्म को पुनः स्थापित करने के लिए, रामकृष्ण मिशन, चिन्मय मिशन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विवेकानन्द केन्द्र, माता अमृतानंदमयी मिशन और कई अन्य संस्थाएँ अस्तित्व में आईं।

संगठित कार्य आवश्यकता बन गई है। हमारा हिन्दू समाज बहु-स्तरीय है और इसमें विभिन्न सम्प्रदाय समाहित हैं। स्वामी विवेकानन्द जानते थे कि हमें व्यवस्थित होना है, लोगों को एक साथ लाने की आवश्यकता है। उन्होंने लिखा, ‘‘हमारे पास एक मंदिर होना चाहिए, क्योंकि हिन्दुओं के लिए, धर्म पहले आना चाहिए। फिर, आप कह सकते हैं, सभी सम्प्रदाय इसके बारे में झगड़ा करेंगे। लेकिन हम गैर-साम्प्रदायिक मंदिर बनायेंगे, जिसमें प्रतीक के रूप में केवल ‘‘ॐ’’ होगा, जो किसी भी सम्प्रदाय का सबसे बड़ा प्रतीक होगा। यदि यहाँ कोई ऐसा सम्प्रदाय है, जो मानता है कि ‘‘ॐ’’ प्रतीक नहीं होना चाहिए, तो उसे स्वयं को हिन्दू कहने का कोई अधिकार नहीं है... इसके बाद मंदिर के संबंध में शिक्षकों को प्रशिक्षित करने के लिए एक संस्थान होना चाहिए जो धर्म प्रचार करे और हमारे लोगों को धर्मनिरपेक्ष शिक्षा दे... फिर यह काम इन शिक्षकों और प्रचारकों के माध्यम से आगे बढ़ाया जाएगा, और धीरे-धीरे हमारे पास अन्य स्थानों पर भी ऐसे ही मंदिर होंगे, जब तक कि हम पूरे भारत को कवर न कर लें। यही मेरी योजना है। यह विशाल दिख सकती है, लेकिन यह बहुत जरूरी है। आप पूछ सकते हैं, इसके लिए पैसा कहां है। पैसे की जरूरत नहीं है... मनुष्य कहां हैं? यह सवाल है। मनुष्य, केवल मनुष्य की ही आवश्यकता हैः बाकी सब तो स्वतः हो जाएगा, लेकिन शक्तिवान, सामथ्र्यवान, आस्थावान युवा पुरुष जिनकी रीढ़ की हड्डी शुद्ध हो, जरूरी हैं।“
यही स्वामी विवेकानन्द की योजना थी, जिसने माननीय एकनाथजी को विवेकानन्द केन्द्र के लिए प्रेरित किया। युवा, अग्निपुंज और जीवंत युवाओं को सक्षम बनाने की दृष्टि से एकनाथजी ने विवेकानन्द केन्द्र की स्थापना की। केन्द्र में ‘‘ॐ’’ हमारे गुरु हैं। ॐकार अर्थात ईश्वर, जो लोगों को एक साथ लाने, संगठित तरीके से टीमवर्क के साथ काम करने हेतु मार्गदर्शक है। अतः हम अपने प्रार्थना कक्ष में ‘‘ॐ’’ के सामने प्रार्थना करते हैं। ॐ भगवान का नाम है, जो किसी भी भाषा से संबंधित नहीं है। भगवान का कोई भी अन्य नाम किसी विशिष्ट भाषा के मूल शब्दों से संबंधित है जो विशिष्ट अर्थ देता है और इस प्रकार उस भाषा को समझने वाले भक्त में सम्मान, भक्ति, प्रशंसा आदि के स्पन्दन पैदा करता है। लेकिन ॐकार किसी भी विशिष्ट भाषा तक सीमित नहीं है। यह भाषा से परे है और इस प्रकार सभी भाषाओं में भगवान के लिए आदर्श अभिव्यक्ति बन जाता है। ॐकार ब्रह्मांड के सभी चरणों- सृजन, जीवन और विसर्जन का प्रतिनिधित्व करता है। यह सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ है। यह सभी लोगों के देवी-देवताओं का प्रतिनिधित्व करता है। यह सर्व समावेशी है- इसमें सभी जातियाँ और पंथ समाहित है। योगशास्त्र कहते हैं, ‘‘तस्या वाचका प्रणवः’’ ॐकार ईश्वर की सबसे गहन अभिव्यक्ति है। ॐ ईश्वर है, जो हम सभी के लिए प्रेरणा का सदासर्वदा स्रोत है।

हम ऐसी भूमि पर पैदा हुए हैं जिसने सदैव संसार का मार्गदर्शन किया है और भविष्य में भी उसे दुनिया का मार्गदर्शन करना है। संगठन, जो धर्म स्थापित करने के लिए अस्तित्व में आया है, ईश्वरीय कार्य करने के लिए है, हमारे लिए ईश्वरीय है। अतः, जैसे गुरु को महत्व दिया जाता है, इसी प्रकार हम संगठन को महत्व देते हैं। हमारी इस भूमि ने अपने बच्चों को यही सिखाया है कि अपने सभी बुजुर्गों को गुरु के रूप में देखें, ताकि प्रत्येक में गुरुता-महानता और दिव्यता को देखा जा सके। यह वह जगह है जहां न केवल मनुष्यों बल्कि जानवरों और पक्षियों समेत पूरी प्रकृति को कई लोगों द्वारा गुरु के रूप में सम्मानित किया है, और किसी ने नहीं, बल्कि स्वयं दत्तात्रेयजी ने दृ जिन्हें ब्रह्मा, विष्णु, महेश का संयुक्त अवतार माना जाता है। ऐसा कहा जा सकता है कि चूँकि दत्तात्रेयजी ने अपने आस-पास गुरुता को देखा, अपने आस-पास की हर चीज से सीखने के लिए अपने दिमाग को प्रशिक्षित किया, अतः वे गुरुओं के गुरु बन गए। जब हम कहते हैं कि ॐकार हमारा गुरु है तो हमें इसका गहरा अर्थ समझना होगा। ॐकार से ही सृजन हुआ है, अतः ईश्वर हर जगह है। हमें अपने दिमाग को दत्तात्रेय जैसे ही, अपने आसपास के उन सभी से सीखने के लिए प्रशिक्षित करना है।

कभी-कभी कार्यकर्ता आसपास की स्थिति को देखकर निराशा का अनुभव करता है या दैनंदिन गतिविधि में यांत्रिक बन जाता है, या श्रद्धा की कमी के कारण रूचि खो देता है। ऐसा क्यों होता है? कहीं न कहीं व्यक्ति केवल दूसरों की कमियों और दुर्गुणों को देखता है और प्रत्येक वस्तु में गुरुता को देखने में विफल रहता है। या आत्मविश्वास की कमी से जूझता है, या ’मैं पृथ्वी पर और इस संगठन में क्यों हूँ’ यह प्रश्न महत्वहीन हो जाता है, या टीम के स्थान पर ’मैं’ बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। ऐसे समय में ॐकार से सीखना यानी हमारे चारों ओर की सब चीजों से सीखना, विभिन्न स्तरों पर हमारी टीमों में यह भाव जरूरी है। जैसा कि माननीय एकनाथजी ‘‘साधना आॅफ सर्विस’’ में कहते हैं, ‘‘हमें केवल बहरा और गूंगा बनकर हर बात पर आत्मसमर्पण नहीं करना चाहिए, बल्कि हमारे आस-पास की हर चीज के प्रति एक प्रबुद्ध दृष्टिकोण होना चाहिए। समीक्षकों की तरह अपने चारों ओर देखो और आप पाएंगे कि प्रतिक्षण और प्रकृति की महत्वहीन चीजों में भी आपके लिए एक सन्देश है, जो आपके लिए लाभकारी और प्रगति के लिए है। बस उन संदेशों को सुनने के लिए और उचित प्रकाश में उन्हें समझने और विमुक्त होने के लिए ग्रहणशील कान और एक चैकस मन होना चाहिए। हमारे चारों ओर सबकुछ के अर्थ को समझने की कोशिश करें। ये सब चीजें वहां क्यों हैं? उनमें क्या अर्थ निहित है और उनका उद्देश्य क्या है? मेरा जन्म क्यों हुआ? मुझे कन्याकुमारी (विवेकानन्द केन्द्र) क्यों लाया गया है? जब मैं अपनी शिक्षा प्राप्त कर रहा था तब तो मैंने कभी इसका सपना भी नहीं देखा।... अब जब यह निर्धारित किया गया है कि मुझे यहां होना चाहिए, तो मुझे अपने भविष्य को एक योग्य तरीके से आकार देना है। मेरा दृष्टिकोण सही होना चाहिए। कई बार मैंने देखा है कि लोग अपनी बस मिस कर देते हैं। यह अपने साथ नहीं होने दो। मैं यहाँ इस प्राचीन पवित्र भूमि में हूँ, न कि अमेरिका या जर्मनी में। क्यों?... हमें अपने आस-पास की दुनिया को सही तरीके से देखना है। अन्यथा सुस्त दिनचर्या के कारण जीवन नीरस और उबाऊ हो जाता है। उन सभी लोगों में यह असंबद्ध एकता है, जिनमें इस दृष्टिकोण की कमी हैं क्योंकि वे बाह्य प्रकृति को देखने और इसके अर्थ को समझने के कौशल से सुसज्जित नहीं हैं। हमारे आस-पास की दुनिया और घटनाओं में हमारे लिए निहित सन्देश को समझकर सही भावना से अनुकरण करनेवाला प्रत्येक व्यक्ति अच्छे समापन की ओर जाता है। ईश्वरीय प्रस्तावों पर अडिग रहना और उन्हें हल्के में न लेना ही एकमात्र तरीका है।’’

हमारे लिए गुरुपूर्णिमा का अर्थ है कि हम स्वयं को ईश्वरीय प्रस्तावों से जोड़ते हैं, ‘हमें भारत को विश्वगुरु बनाकर मानवता के लिए काम करने हेतु एक साथ लाया गया है’।

पिछले साल से, हम विषय ‘जल ही मूल है’ विषय पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि हम एकत्व-आत्मीयता जैसे उद्देश्यपूर्ण सिद्धांतों पर काम करते हुए, निरर्थक प्रयासों में समय बर्बाद न करें और स्वयं का विलय उस चमू में कर दें जिनके साथ हम काम करते हैं - ‘मैं’ नहीं ‘हम’। तभी हमारे टीमों का विस्तार होगा, अधिक कार्यकर्ता हमारे पास आएंगे। सभी स्तरों पर विस्तार और समावेशी चमुओं का निर्माण करने की आवश्यकता है। हम प्रत्येक के अच्छे गुणों की सराहना करना सीखते हैं और टीम के हित में स्वयं को विलय करने के लिए बड़ा दिल रखते हैं, ताकि हम टीमों का निर्माण कर सकें। गुरु-उपासना, हमारे लिए आध्यात्मिक साधना ही है।

इस वर्ष गुरुपूर्णिमा के उत्सव के लिए हम अपने सभी परिचितों - कार्यकर्ताओं, संरक्षकों, शुभचिंतकों, सभी योग सत्रों और अब तक किए गए सभी वर्गों के प्रतिभागियों, हमारी पत्रिकाओं के सदस्यों आदि को बुला सकते हैं। वे सभी गुरुपूर्णिमा उत्सव में शामिल हो सकते हैं, साथ ही साथ विवेकानन्द केन्द्र की गतिविधियों के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए ताकि वे देश के लिए अपना समय और ऊर्जा प्रदान कर सकें। कम से कम ‘राष्ट्र के लिए सप्ताह में एक घंटे’ देने के लिए और इस प्रकार उन्हें केन्द्र के वर्गों में सहभागी होने के लिए अपील की जा सकती है। जैसे-जैसे वे नियमित रूप से आते हैं, देश के लिए और अधिक समय देने के प्रति उनकी रुचि विकसित होगी।

गुरु पूर्णिमा का अवसर - ॐकार उपासना, सृष्टि में दिव्यता को देखने के लिए साधना शुरू करने का सही समय है, प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं की टीमों में ‘‘स्व’’ को विसर्जित कर उसके लिए कार्य करना।


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Monday, 4 June 2018

समरसता

मन एवं मनुष्याणां कारणं बन्ध मोक्षयोः अर्थात् बन्धन और मोक्ष का कारण मन है। यह श्रीमद्भगवद्गीता का वचन है। वहीं यह भी कहा गया है कि मन को वश में करना बड़ा कठिन है पर अभ्यास और वैराग्य से मन को जीता जा सकता है। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।

मन की तीन वृत्तियाँ हैं - इच्छा, ज्ञान और क्रिया। ये मिलकर एक रस हो जाए तब समरसता पैदा होती है। महाकवि जयशंकर प्रसाद ने कहा है - समरस थे जड़ और चेतन आनन्द अखण्ड घना था।

कामायनी में उनका आनन्द दर्शन विशद् रूप में प्रकट हुआ है। उसमें इच्छा, ज्ञान और क्रिया - मन की तीनों वृत्तियाँ मिलकर एक हो जाती हैं। ये समरस न हों तब तक आनन्द की सृष्टि नहीं हो सकती। तीनों वृत्तियाँ समरस हो जावें, तब मन विज्ञानमय कोश में आत्मसात् हो जाता है। विवेक का उदय होता है। आनन्दमय कोष में अखण्ड आनन्द की अनुभूति होती है।

सुख-दुःख की परिभाषा की गई - अनुकूलवेदनीयं सुखम्; प्रतिकूल वेदनीयं दुःखम्।
 
शरीर प्रकृति से बना है। उसमें समता-समानता नहीं होती। हाथ की पाँच अँगुलियाँ तक समान नहीं होतीं। चार अँगुलियाँ और अँगूठे में समरसता होती है।

परिवार के सब लोग एक-दूसरे के पूरक बनकर, परस्पर मदद करते हैं। मदद ही नहीं करते एक-दूसरे की उन्नति में सहायक भी होते हैं। वेद का वचन है - उद्-यानम् ते नावद्रव मानम् अर्थात् हे मनुष्य तुम्हारे लिए केवल ऊपर जाने का मार्ग है, उन्नति का मार्ग है न कि अद्योगति का।

परिवार का बड़ा रूप समाज होता है। जिसमें लोग साथ-साथ गति करें उसे समाज कहा जाता है - समं अजन्ते इति समाजः। मनु ने कहा है कि यह मेरा है, वह तेरा है - यह छोटी बुद्धिवाले सोचते हैं। उदारचरित व्यक्तियों के लिए तो वसुधा ही कुटुम्ब के समान है।
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।   (मनुस्मृति)

संसार भर के मनुष्य, एक ही मनुष्य जाति के हैं जिनका धर्म मानवता है। एक शब्द और है - जाति जिसे बोलचाल में न्यात कहा जाता है। जाति वह जिससे व्यक्ति की पहचान होती है। सोने का काम करे वह स्वर्णकार, चमड़े का काम करे वह चर्मकार, लोहे का काम करे वह लौहकार, लकड़ी का काम करे वह वर्द्धकि, कपड़े धोने का काम करे वह धोबी, घड़ा बनाए वह कुम्भकार (कुम्हार)। समाज के ये सभी लोग समरसतापूर्वक एक दूसरे की आवष्यकता की पूर्ति करते हैं। यह परिवार से बड़ा संगठन है।

भारत कृषिजीवी लोगों का देश है। कृषि सामूहिक श्रम का क्षेत्र है। इसमें अनेक मानवीय सम्बन्धों का विकास होता है और उन सम्बन्धों की पवित्रता की रक्षा भी की जाती है। यह सामाजिक समरसता का प्रमाण है। जाति और जाति का अन्तर न समझने के कारण हमारे प्रगतिशील लोग जाति-पाँति तोड़ने के लिए कटिबद्ध होकर बैठे हैं। भारत के सामाजिक ढाँचे को न समझने के कारण ऐसा होता है। जाति को गाली देने का अर्थ है - जन्मदात्री माता को गाली देना। जाति को तोड़ने का अर्थ है - सामाजिक समरसता को तोड़-मरोड़ कर नष्ट करना। दोनों ही अपराध हैं।

वेद का वचन है - कृषिमित् कृशस्व मादीन्यत् अर्थात् खेती ही करो जीवन को जुआँ मत बनाओ। लोक में भी प्रसिद्ध है - उत्तम खेती, मध्यम वणिज, अधम चाकरी। आज भारतीय समरसता की जीवन पद्धति को भूल जाने के कारण लोग नौकरियों के लिए गलकांट होड़ लगा रहे हैं। राजनीतिक दल नौकरियाँ बाँटने के नाम पर उनको बहका रहे हैं। वे आसानी से बहकावे में आ जाते हैं। भारत को सुनागरिकों का देश बनाना है अथवा नौकरों का देश बनाना है - इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। मानवीय श्रम का सौदा बन्द होना चाहिए।


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Sunday, 6 May 2018

त्वं हि ब्रह्मा बभूविथ

राष्ट्रमण्डल खेलों में भारतीय खिलाड़ियों ने 26 स्वर्ण पदक सहित कुल 66 पदक जीत कर भारत का गौरव बढ़ाया। पदक विजेताओं में अधिक उल्लेखनीय यह है कि अग्रणी पंक्ति में महिलाएं रहीं। उन्होंने कई मानक भी स्थापित किए। खिलाड़ी दल का ध्वज साक्षी ने संभाला था। इससे देशवासियों में जो आशा बंधी थी, वह पूरी हुई।

संयोग की ही बात थी कि सायना नेहवाल से साक्षी को भिड़ना पड़ा। नेहवाल को स्वर्ण पदक और साक्षी को रजत पदक मिला। दोनों अलग अलग खेलतीं तो दोनों स्वर्ण पदक प्राप्त करतीं। महिला शक्ति के सफल और सार्थक प्रदर्शन को देखकर यह अनिवार्य हो गया है कि खेलनीति बने और महिलाओं को अधिकाधिक अवसर दिया जाय। पहलवानी, भारोत्तोलन, भाला फेंक, दौड़, सर्वत्र महिलाएं छाई रहीं।
 
इसी वर्ष छोटी-सी महिला वायुयान चालिका ने अपना सर्वोत्तम प्रदर्शन करके सबसे बड़े युद्धकजेट विमान को उड़ाया। दूसरी ने नागरिक विमान उड़ाकर सर्वोत्तम प्रदर्शन किया। स्थल सेना की महिला विंग ने भी अपना सर्वोत्तम प्रदर्शन किया। हाकी, क्रिकेट, फुटबाल जैसे खेलों में भी भारत को गौरव, महिलाओं द्वारा मिला।
 
कभी कल्पना चावला ने अंतरिक्ष यात्रा द्वारा भारत का नाम प्रोज्ज्वल किया था। आने वाले समय में हमारी अंतरिक्ष यात्रा में फिर महिला जाने वाली है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधानशाला में कई महिलाएं काम कर रही हैं। प्रक्षेपणास्त्र निर्माण में भी उनका अभूतपूर्व योÛदान है। परमाणु आयुध निर्माण में भी एपीजे अब्दुलकलाम के दायित्व को संभाल रही हैं।
 
निर्मला सीतारामन् इस समय देश की रक्षा मंत्री हैं और वे भारत को रक्षा के क्षेत्र में सर्वोत्तम बनाने का संकल्प कर चुकी है। अध्यात्म चिन्तन में कभी गार्गी, मैत्रेयी, आम्भृणी के नाम प्रसिद्ध रहे हैं, मातृत्व के क्षेत्र में मदालसा का नाम अग्रणी रहा है, जिसने अपने पुत्रों को निवृत्ति के पुत्रों मार्ग पर भी आगे बढ़ाया और प्रवृत्ति के मार्ग पर भी। माता पार्वती ने देव सेनापति स्कन्द स्वामी को जन्म दिया था।
 
लकड़हारे से कालिदास बनाने वाली पत्नी को कैसे भुलाया जा सकता है? शकुन्तला ने दुश्यन्त से प्रेम करके सर्वदमन भरत को जन्म दिया था। अहल्या, आत्रेयी, अंजना, कौसल्या, कैकेयी, आत्रेयी, सुमित्रा, जनकनन्दिनी, महारानी लक्ष्मीबाई, चांद बीबी, रजिया, जीजा बाई, दुर्गावती, हाडा रानी आदि के मातृत्व, पत्नीत्व, वीरत्व को ऐतिहासिक गौरव प्राप्त है। पन्ना धाय के त्याग को कैसे भुलाया जा सकता है। इन्दिरा गांधी ने प्रधानमंत्री के रूप में भारतीय प्रायद्वीप का इतिहास भी बदल दिया और भूगोल भी। पाकिस्तान की 93000 सैनिकों की सैनिक टुकड़ी का आत्म समर्पण करवा दिया। पाकिस्तान का गर्व चूर-चूर कर दिया।

वनवासिनी शबरी को राम ने भामिनी कहा है - प्रकाशवती। अकिंचनता अतिथि सत्कार में बाधक नहीं हुई। बेर ही उपहार बन गए।

माताएं पलने में बच्चों को झुलाते हुए हालरिये गा कर पुत्र को मातृभूमि के लि, बलिदान देने का पाठ पढ़ाती हैं-
 
इळा न देणी आपणी, हालरिये हुलराय।
पूत सिखावे पालणे मरण बड़ाई माय।।
                                                          - वीर सतसई


साहित्य के क्षेत्र में महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चैहान, मृदुला सिन्हा आदि ने नाम कमाया है। राजनीति के क्षेत्र में वसुन्धरा राजे, नजमा हैपतुल्ला,आनन्दी बेन पटेल काम कर रही हैं।

घर घर में कुलवधू के रूप में घर में अपने कौशल को प्रकट करने वाली गृहिणी किसी भी वीरांगना से कम नहीं कही जा सकती। वेद की उक्ति है - जायेदस्तम् = जाया इत् अस्तम् = जाया ही घर है। इसी के आधार पर मनु ने कहा था - गृहिणी गृहम् उच्यते। वह उस घर का निर्माण करती है, जिससे राम के नाम जैसा पवित्र घर बनता है - तुलसी रघुनाथ नाम आपुनो सो घर है।
राम ने कहा था -
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।

सन्तान को संस्कार प्रदान करके, मनुष्य बनाने वाली माता ही होती है। परिवार, संस्कार निर्माण का केन्द्र होता है। वह संस्कार का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय है, सबसे बड़ा चिकित्साल्य है और सबसे बड़ा साधना केन्द्र है। उसमें सभी सदस्यों को अपने दोषों को दूर भगाने की सुविधा प्राप्त होती है -
परित: (नि-) वारयज्ञति स्वदोषान् यत्र तत् परिवारः।

इसका निर्माण कुलवधुएं करती हैं। अपने-पराये के भेद को दूर करके, उस चारित्रिक उदारता को महिलाएं ही जन्म देती हैं, जिससे विश्व-परिवार का भाव जागता है -
अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।
                                                           -मनु स्मृति

इसी कारण वेद में कहा गया है - त्वं हि ब्रह्मा बभूविथ - हे माता तू तो साक्षात् ब्रह्मा बन गई है। माता की गोद आकाश और धरती से भी बड़ी होती है। उसी में सन्तान पलती है।