Tuesday, 17 April 2018

दिशा बोध : कर्म देवो भव एवं कार्य का तंत्र

(23, 24 और 25 फरवरी, 2018 को विवेकानन्द केन्द्र की अखिल भारतीय अधिकारी बैठक असम के नलबारी में स्थित विवेकानन्द केन्द्र विद्यालय में सम्पन्न हुई। बैठक में केन्द्र के अखिल भारतीय उपाध्यक्ष माननीय बालकृष्णनजी और माननीय निवेदिता दीदी ने अधिकारियों को संबोधित किया। प्रस्तुत है उनके संबोधन का सारांश...) 

कर्म देवो भव 


आज जब हम अखिल भारतीय अधिकारी बैठक के उद्घाटन सत्र में एकत्रित हुए हैं और भगिनी निवेदिता की सार्ध शती चल रही है, तो आज मैं भगिनी निवेदिता, केन्द्र कार्य तथा कार्यकर्ता इन तीनों के सन्दर्भ में कुछ कहूँगा। भगिनी निवेदिता 1897 में भारत आईं और 1911 तक उन्होंने भारत के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। स्वामी विवेकानन्द ने 11 वर्ष तो भगिनी ने 13 वर्ष भारतवासियों को जागृत करने के लिए अखंड, अविरत परिश्रम किया। यह बिल्कुल सत्य है कि स्वामी विवेकानन्दजी और भगिनी निवेदिता ने भारत की स्वतंत्रता की नींव रखी। भगिनी निवेदिता के जीवन के कुछ मुख्य अंश, प्रसंग बहुत ही प्रेरणादायक है जिसे हमें अपने भीतर उतरना ही होगा। 

आक्रामक हिंदुत्व (Aggressive Hinduism), आक्रामक आदर्श (Aggressive Idealism) तथा आक्रामक समर्पण (Aggressive Dedication) इन तीन शब्दों की शक्ति को देखिए, अद्भुत है। यह मुझे बहुत अच्छा लगता है। भगिनी निवेदिता कहती हैं कि हिंदुत्व हो पर आक्रामक, हमारे आदर्श हों वह भी आक्रामक, और समर्पण भी हमारा आक्रामक होना चाहिए। हमारे देश में सुस्ती छाई थी, अब भी है, शिथिलता है इसलिए इसे झकझोरने के लिए, आलस्य और विषाद को तोड़ने के लिए इस "आक्रामकता" की महती आवश्यकता है। इसलिए भगिनी निवेदिता के कथन को समझिए। भगिनी ने सिर्फ बातें नहीं की वरन अपने जीवन में हिंदुत्व, आदर्श और समर्पण को बड़ी आक्रामकता से प्रगट भी किया। 

पाश्चात्य देश से आई भगिनी निवेदिता आह्वान करती है कि प्रत्येक भारतीय के मन में आक्रामक देशभक्ति होनी चाहिए। प्रत्येक भारतीय के रग-रग में भारतभक्ति होना आवश्यक है, तभी वह आक्रामक ढंग से देश के लिए कार्य कर सकेगा। सेवा साधना में माननीय एकनाथजी रानडे ने ``Systematic bind of mind’’ की बात कही है। यानी मन को व्यवस्थित रखना। अपने आदर्शों से किसी भी कीमत पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए। मन को सदैव अपने कार्य के अनुरूप दिशा में रखें, भटके नहीं। इसलिए विचार कीजिए कि हम जैसा बोलते हैं वैसा करते हैं क्या ? मेरा आदर्श, मेरी सोच, मेरी वाणी, मेरा आचरण, मेरी कृति एक समान है क्या ? यह बहुत ही महत्वपूर्ण है।  
सब लोग भारत के बारे में बोलते रहते हैं पर भगिनी निवेदिता ने भारत के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया और जो कुछ भी उस समय आवश्यक था, उन्होंने किया। उन्होंने Hindusim की बात कही थी यह तब की आवश्यकता थी। उस समय वैचारिक जागरण की आवश्यकता थी। अपने यहाँ हिन्दू धर्म की बातें होती थीं, वहीं पाश्चात्य जगत् में अलग-अलग वैचारिक शब्द का प्रचलन हो रहा था, ऐसे समय भगिनी ने हिन्दू धर्म के लिए "Hinduism (हिंदुत्व)" शब्द का प्रयोग किया। उन्होंने जोर देकर कहा था कि विश्व के अस्तित्व की रक्षा के लिए हिंदुत्व को जीवित रहना होगा। भगिनी निवेदिता के जीवन को हम देखते हैं तो पाते हैं कि उनके हृदय में हिंदुत्व का विशेष स्थान था। उनके रग-रग में भारतीयता थी। बंगाल में जब प्लेग महामारी फैल गई तब भगिनी ने पूर्ण समर्पण भाव से सेवा कार्य किया। उन्होंने ग्राम-शहर की नालियों को साफ किया, रोगियों की सेवा-सुश्रुषा की। इतना ही नहीं उन्होंने युवकों को एकत्रित कर उन्हें सेवाकार्य में योगदान देने के लिए प्रेरित किया। 

युवाओं से संवाद के समय भगिनी कहा करती थीं कि शिक्षा अर्जित करो, बड़े बनों। तुम जो कुछ करो, देश के लिए करो। शिक्षक, डाक्टर, इंजिनियर, वकील, पत्रकार जो भी बनना है जरुर बनों, देश के लिए बनों। देश के लिए त्याग और सेवा हो, यह आत्मबोध भगिनी ने अपने सम्पर्क में आये प्रत्येक युवाओं के हृदय में जगाया। 

त्याग और सेवा, मोक्ष प्राप्ति के लिए नहीं है। संसार में लाने-ले जाने का काम भगवान का है। इसलिए मोक्ष प्राप्ति की इच्छा से सेवाकार्य नहीं करना चाहिए। त्याग और सेवा निःस्वार्थ भाव से होनी चाहिए। हमारे विद्यालय, प्रकल्प, कार्य पद्धति, उत्सव आदि सबकुछ राष्ट्र जागरण के लिए है, मनुष्य निर्माण के लिए हैं। 

भगिनी ने वेद, उपनिषद्, रामायण, गीता का अध्ययन किया और हिन्दू धर्म के इस महान् सन्देश को समझकर उन्होंने बड़े भाव से कहा कि विश्व के कल्याण के लिए भारत को जीना ही होगा। अपने देश में तुष्टिकरण तो पहले से चला आ रहा है। सन् 1905 में जब अंग्रेजों ने बंगाल प्रान्त के विभाजन का षड़यंत्र रचा तब भगिनी ने इसका कड़ा विरोध किया। भगिनी ने अपनी लेखनी और वक्तृता से भारत को जगाया। पंजाब में लाला लाजपत राय, महाराष्ट्र में बाल गंगाधर तिलक तथा बंगाल में बिपिन चन्द्र पाल ने बंग-भंग आन्दोलन का नेतृत्व किया, पर वैचारिक जागरण की पहल तो भगिनी निवेदिता ने ही की थी। भगिनी ने इस आन्दोलन को दिशा दी थी, युवकों को एकत्रित करने में बड़ी भूमिका निभाई, इसलिए मैं कहता हूँ कि भगिनी निवेदिता ने स्वतंत्रता आन्दोलन की नींव रखी। विदेश में जाकर उन्होंने अंग्रेजों को फटकारा कि वे भारत के विरुद्ध षड्यंत्र कर रहे हैं। भगिनी निवेदिता ने डंके की चोट पर कहा कि अंग्रेजों ने भारत को सिर्फ लूटा है। ^^पूर्ण स्वराज्य** यह भगिनी निवेदिता का कथन है। यह उनके जीवन का आक्रामक स्वर है। आक्रामकता यह भगिनी के जीवन में कई बार देखने को मिलती है। भगिनी को जब ज्ञात हुआ कि उनके आक्रामक विचारों से रामकृष्ण मिशन को नुकसान पहुँच सकता है तो वह मिशन से अलग हो गई। 

मैं कहता हूँ कि हमें भी बड़े आक्रामकता से कार्य करना चाहिए। इसका तात्पर्य यह नहीं कि हम धरना दें या हड़ताल पर बैठ जाएं। आक्रामकता का अर्थ है एकाग्रता से, गति से, प्रखरता से, मुखर होकर अपना कार्य करें। युवा भारती के पूर्व सम्पादक साधु रंगराजन जो अब बंगलुरु में रहते हैं, उनसे मेरी भगिनी निवेदिता के सन्दर्भ में बातें हुईं। तब उस समय यह ज्ञात हुआ कि भगिनी निवेदिता एक और महत्वपूर्ण बात कहा करती थीं, वह है - ^^कर्म देवो भव** कर्म को भगवान मानकर करते रहना, यह कितनी बड़ी बात है। इस भाव से यदि हम कर्म करते हैं तो कार्य करने की प्रेरणा मिलती है। इस भाव से कार्य करने से कार्यकर्ताओं में जागृति आएगी और साधारण से कार्यकर्ता असाधारण कार्य कर सकेंगे। कर्म ही ईश्वर है, इस समर्पण भाव को हम ।हहतमेेपअम ढंग से अपने में धारण करते हैं तो हममें से प्रत्येक कार्यकर्ता अपने दायित्व को अच्छी तरह निभा सकेंगे। 

1973 में रामकृष्ण मिशन के अध्यक्ष स्वामी रंगनाथानन्दजी कन्याकुमारी आए थे तब उन्होंने एकनाथजी से कहा था कि, ``We wear this ochre robe to remind us that we are Sanyasis,’’ अर्थात् हम संन्यासी हैं इस बात को स्मरण रखने के लिए हमने भगवा वस्त्र धारण किया है। तब एकनाथजी ने उन्हें उत्तर दिया था। ``We are creating such workers who have renounced even ochre robe.’’ अर्थात् हम ऐसे कार्यकर्ताओं का निर्माण कर रहे हैं, जिन्होंने भगवे वस्त्र का भी त्याग कर दिया है। 

इसलिए एकनाथजी की अपेक्षा के अनुसार विवेकानन्द केन्द्र का कार्यकर्ता होना साधारण बात नहीं है। “आया राम गया राम” यह हमारे जीवन में नहीं होना चाहिए। एक बार केन्द्र कार्य का दायित्व लिया तो जीवनभर कार्य करना है। छोटा घर छोड़ा और बड़े घर का हो गया, वही कार्यकर्ता है। 

कार्य का तंत्र 


हम सभी कार्यकर्ता हैं। पूर्णकालिक हों या स्थानिक 24 घंटे हम केन्द्र कार्य का चिंतन करते हैं। अपने परिवार, व्यवसाय, नौकरी के साथ हम केन्द्र का कार्य करते हैं, इसलिए हम कार्य के प्रतिनिधि हैं। समाज भी हमें केन्द्र कार्य का साकार रूप मानता है। स्विमिंग क्लब जैसे किसी क्लब से जुड़े लोगों के लिए कोई नियम होता है जिसका पालन क्लब के भीतर ही करना पड़ता है, पर हमारा संगठन क्लब नहीं है। हम विवेकानन्द केन्द्र के कार्यकर्ता हैं। इसलिए हमें सजग रहना है। हमारे व्यवहार को लोग देखते हैं। यदि कार्यकर्ता का व्यवहार उचित नहीं है तो लोग संगठन को ही नहीं वरन कार्य की ही बदनामी करते हैं। इसलिए हमारा व्यवहार निर्दोष हो। ऐसे निर्दोष कार्यकर्ता कार्य और संगठन की गरिमा बढ़ाते हैं। ये समर्पण से आता है। समर्पण का अर्थ क्या है? जो रात-रात भर जागकर कार्य करता है, क्या वह समर्पण है, नहीं ऐसा नहीं है। 

कार्यकर्ता को कार्य का तंत्र ज्ञात होना चाहिए। उसके अनुरूप वह कार्य करता है तो वह समर्पण है। ^मनः पूतं समाचरे त* जैसा मन करे वैसा चलेंगे ऐसी मनमानी नहीं चलेगी। जैसे कोई कन्या विवाह के पूर्व अपने हिसाब से जीवन जीती है, पर विवाह के बाद क्या वह स्वच्छंदता या मनमाने तरीके से जीवन व्यतीत कर सकती है? नहीं न! वह ऐसा नहीं करती क्योंकि विवाह एक Commitment (वचनबद्धता) है, जिम्मेदारी है। संगठन भी ऐसा ही है। संगठन को हम सबने अपनाया है। इसलिए संगठनात्मक मन, सांघिक मन तैयार करना होता है, पर यह सांघिक मन आएगा कैसे ? 

जनतंत्र (लोकतंत्र) में वोटिंग होती है और चुने हुए प्रतिनिधि निर्णय लेते हैं जिसे सबको मानना होता है। इसी तरह जो डिक्टेटर होता है, उसके निर्देशों का पालन करना पड़ता है। वहीं राजतन्त्र में राजा के आदेश या निर्णय को मानना ही पड़ता है। आध्यात्मिक गुरु के सन्दर्भ में भी यही बात है, गुरु जो कहते हैं, वह सभी शिष्यों को मानना ही होता है। 

अपने संगठन ने "ॐ" को अपना गुरु माना है। यह "ॐ" गुरु हमसे प्रत्यक्ष बात तो नहीं करता। वह तो सांघिक मन से बात करता है। फिर विवेकानन्द केन्द्र के कार्य का तंत्र क्या है ? हमारा कार्य तंत्र है - आत्मीयता। हर स्तर पर चमू, सांघिक निर्णय पर चमू का नेतृत्व करनेवाला कोई गुरु, डिक्टेटर या राजा नहीं होता। वह राजा की तरह आदेश नहीं देता। हमारे चमू का नेतृत्व सबको साथ लेकर कार्य करता है। मैं बहुत अच्छा कार्य करती हूँ। खूब मेहनत करती हूं। पर मुझे चमू का निर्णय मान्य नहीं है तो यह समर्पण नहीं हो सकता है। सबकी बात सुनना और फिर नेतृत्व अपने चमू के साथियों की तैयारी, उनकी समझ को समझते हुए चमुत्व मन के अनुरूप निर्णय लेता है।

पहले जनतंत्र की पद्धति अलग थी। आपस में चर्चा करके सामूहिक चिन्तन से विवेकपूर्ण निर्णय लिया जाता था। इसलिए उसे पंचमुखी परमेश्वर की संज्ञा दी गई थी। इसलिए हम विचार करें कि मेरा व्यवहार संगठन की नीति के अनुरूप हो, उसी के अनुरूप निर्णय हो। मेरा व्यवहार केन्द्र के कार्य तंत्र से सुसंगत होवे। हमारी कार्यपद्धति "सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्" का रूप है। साथ चलने का, मिलकर आगे बढ़ने का अर्थात सांघिक भाव की प्रेरणा हमारी कार्यपद्धति से मिलती है। 

रामायण का एक प्रसंग है - श्रीराम और रावण के बीच जब युद्ध होनेवाला था तब युद्ध से पहले वानरराज सुग्रीव ने अपना आपा खो दिया। रावण को देखकर उसे बहुत क्रोध आया और वह किसी से संवाद किये बिना, सीधे अकेले ही रावण से लड़ने चले गए। परिणाम यह हुआ कि रावण ने सुग्रीव को बुरी तरह पीटकर छोड़ दिया। सुग्रीव जब लज्जित होकर लौटे तब श्रीराम ने क्या कहा, यह बहुत महत्वपूर्ण है। श्रीराम ने कहा, ^^सुग्रीव! मेरे मित्र, आप अकेले ही रावण से लड़ने चले गए। आप बड़े वीर हैं, हमें आपकी वीरता पर तनिक भी शंका नहीं है। पर सोचो मित्र! यदि आपको कुछ हो जाता तो क्या यह वानर सेना आपके बिना युद्ध कर पाती ? क्या आपका यह मित्र रावण का सामना कर पाता ? श्रीराम के इस कथन से सुग्रीव का हृदय पिघल गया। उन्हें अपनी गलती का अनुभव हुआ। यहाँ श्रीराम के संवाद में कहीं भी फटकार नहीं है, वरन् अपने मित्र के सम्मान को ठेस पहुंचाए बिना उन्होंने अपनी बात रखी। 

रामायण का ही एक और उदाहरण है- रावण ने जब अपने भाई विभीषण को धुधकार कर लंका से बाहर निकाल दिया, तब विभीषण अपने 4 साथियों के साथ श्रीराम के शिविर में आए। विभीषण को अपने साथियों के साथ आता देखकर वानर सेना उनपर टूट पड़ी। श्रीराम ने महावीर हनुमान को मध्यस्थता करने भेजा। तब हनुमानजी ने वानरों से कहा, ^^इस सम्बन्ध में निर्णय प्रभु श्रीराम के सम्मुख सभी मिलकर लेंगे।** हनुमानजी विभीषण को अपने साथ लेकर श्रीराम के पास आते हैं। विभीषण श्रीराम को प्रणाम करते हैं और कहते हैं कि मैं आपकी शरण में आया हूँ। बहुत से वानरों को लगता है कि यह भी रावण का कोई षड्यंत्र है पर श्रीराम बहुत ही सहजता से स्थिति को संभालते हैं। वे वानर सेना के वरिष्ठ सेनानायकों से पूछते हैं कि विभीषण के सम्बन्ध में आपका क्या मत है ? तब कई वानर सैनिक विभीषण के सम्बन्ध में सोच-विचार कर निर्णय लेने के लिए कहते हैं तो कुछ उन्हें न अपनाने की बात करते हैं। ऐसे में श्रीरामजी हनुमान से उनका मत पूछते हैं तो महावीर हनुमान बड़ी विनम्रता से उत्तर देते हैं कि, "जब मैं माता जानकी की खोज में लंका गया था तब मेरी भेंट विभीषण से हुई थी। जब रावण ने अपनी सभा में मुझे मृत्युदंड देने की बात कही तब विभीषणजी ने रावण को सुझाव दिया कि वे ऐसा न करें। राजदूत के साथ उचित व्यवहार होना चाहिए, मृत्यदंड राजदूत को नहीं दिया जा सकता। विभीषण सत्यनिष्ठ हैं, वे नीतिवान पुरुष हैं।" हनुमानजी के इस कथन के बाद श्रीराम विभीषण को अपनी सेना में सम्मिलित करते हैं। उन्हें अपना मित्र घोषित करते हैं। 

यहाँ हनुमान के उत्तर के बाद श्रीराम का निर्णय लेना, बहुत महत्वपूर्ण बात है। क्योंकि हनुमान ने लंका जाकर रावण के महत्वपूर्ण स्थलों तथा प्रवेश द्वार को जलाया था, सीतामाता की खोज की थी। इसलिए पराक्रम करनेवाले कार्यकर्ता का अपना महत्व है। कार्य सिद्ध करनेवाले कार्यकर्ताओं के विचारों का महत्व है। इसलिए निर्णय लेते समय ऐसे धैर्य और समझदारी की आवश्यकता होती है। हमारा हृदय भी विशाल होना चाहिए। नए-नए लोगों को जोड़कर उन्हें संगठन के कार्य में आगे बढ़ाया जा सकता है। 

विनम्रता - यह कार्यकर्ता का महत्वपूर्ण गुण है। रामायण का एक और प्रसंग है- जब श्रीराम का राज्याभिषेक होनेवाला था, तब राजा दशरथ ने श्रीराम से कहा था कि तुम तो पहले से ही विनम्र हो, पर राजा बनने के बाद तुन्हें और भी विनम्र होना होगा। यानी जब दायित्व आता है तो हमें और भी विनम्र होने की आवश्यकता है। 

हमें साधन भाव से कार्य करने की आवश्यकता है। बंगाली गीत का एक सुन्दर पद है- "साकोलि तुम्हारी इच्छा" या "आमी यंत्र तुमी यंत्री", इस भाव से हम कार्य करें। संगठन में जहां "मैं" आता है, वहां काम नहीं होता है। "मैं" जहां समाप्त हो जाता है, वहां "अध्यात्म" प्रवेश करता है। हमारे संगठन में "मैं" का भाव नहीं है, इसलिए विवेकानन्द केन्द्र अध्यात्म प्रेरित सेवा संगठन है। 

हमपर (हिन्दू समाज/भारत पर) तो हजारों वर्षों तक आक्रमण होता रहा है और हमारे पूर्वजों ने अपने बलिदान से इस धरा व संस्कृति को सींचा है। उनका त्याग, तपस्या और बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। माननीय एकनाथजी ने हमें विवेकानन्द केन्द्र के रूप में तंत्र-मंत्र और यंत्र दिया है, जिसके अनुगामी होकर हम ईश्वर के हाथ का साधन-यंत्र बनकर अपना-अपना कार्य निरन्तर करते रहेंगे। आइए, हम इस सांघिक भाव से, साधन भाव से कार्य करें।

Saturday, 3 March 2018

नव संवत्सर

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नया विक्रम संवत्सर 2075 प्रारम्भ हो रहा है। हमारे सारे त्यौहार चान्द्र वर्ष से हैं। नव संवत्सर का उत्सव भी चान्द्र वर्ष से मनाया जाता है। 365 दिन के वर्ष में हम 366 उत्सव मनाते हैं। इसलिए हम भारतवासियों को उत्सव जीवी कहा जाता है। भीष्म पितामह ने कहा था - गणान् उत्सव संकेतान् अर्थात् गण राज्यों की उत्सव से पहचान होती है।

वैष्य गणराज्य का उत्सव दीपावली और आमीर गणराज्य का उत्सव होली आज राष्ट्रीय उत्सव हैं। विक्रम संवत्सर का प्रवर्तक गुप्त साम्राज्य का संस्थापक चन्द्रगुप्त थे। दिल्ली-महारौली की लोह-लाट पर जिस चन्द्र महीपति की प्रशस्ति उट्टंकित है। वह चन्द्र महीपति कदाचित् यही चन्द्रगुप्त था। इसी वंश का समुद्रगुप्त का पुत्र रूपकृती चन्द्रगुप्त था] जिसने देवी का रूप धारण करके शकराज ध्रुव स्वामी को मार कर ऐतिहासिक विजय प्राप्त की थी।

संवत् प्रवर्तक शासक को शाक पार्थिव कहा जाता रहा है। कुछ विद्वानों ने शाक-पार्थिव का अर्थ साम खाने वाले राजा कर दिया। उनके मतानुसार शेष राजा मांसाहारी होते थे। ऐसे लोगों ने गोसव करने वाले परम भागवत रन्तिदेव को भी मांसाहारी ही माना है। यह नितान्त मिथ्या धारणा है। शाक (शक्नोति इति) शब्द सामथ्य का संकेतक है। कृती चन्द्रगुप्त ने जो संवत्सर चलाया वह सौर-गणना पर आधारित होने के कारण संसार में सर्वाधिक शुद्ध है। भारत सरकार ने उसको इसी विशेषता के आधार पर अपना राष्ट्रीय संवत्सर स्वीकार किया है। शाके (संवत्सर) को स्वीकार तो कर लिया पर उसे किसी शक राजा द्वारा प्रवर्तित मान लिया। यह भी गलत धारणा है। ऋग्वेद में इन्द्र को पुरुशाक (अत्यधिक शक्तिमान) कहा गया है।

इस धारणा के कारण ही यह राष्ट्रीय पंचांग उपेक्षा का विषय बना रहा। राष्ट्रपति से लेकर सन्तरी तक कोई भी इसको याद नहीं करता। राष्ट्रीय प्रतीक की अवमानना के दोषी हम सब बन गये हैं। आवश्यकता इस बात की है कि शक संवत्सर के महत्त्व को समझे और उसको जीवन में अपनायें भी।

रूपकृती चन्द्रगुप्त द्वारा चलाया हुआ संवत्सर शाके 1940 भी इसी मार्च की 22 तारीख को आरम्भ होगा। प्रति वर्ष मार्च] 22 से ही आरम्भ होता है। इसके महत्त्व के विषय में समझें। चान्द्रवर्श 355 दिन का होता है। वैसे वर्ष 365-244----- दिन का होता है। 32 महीने] 17 दिन बाद अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) होता है। ऋग्वेद के वरुण सूक्त में चान्द्र वर्ष और अधिक मास के संकेत मिलते हैं। चान्द्र गणना पर आधारित सभी संवत्सर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारम्भ होता है।

शाके की गणना इतनी शुद्ध है कि 365 दिन के बाद शेष अन्तर भी गणना में छोड़ा नहीं गया है। 137 वर्ष में और 19 वर्ष में एक क्षय मास आता है। 1934 में क्षय मास था। 11 महीने का वर्ष था। इसके बाद 1983 में क्षय मास आया था। अब 137 वर्ष बाद क्षय मास आयेगा। इसके बाद फिर 19 वर्ष वार। ग्रिगेरियन कलेण्डर को पोप ग्रेगरी ने शुद्ध किया था। अब फिर वह गड़बड़ा गया है। कोई नया संशोधन उसे शुद्ध करेगा।

कालिदास ने अष्टधा प्रवृत्ति के शिव की स्तुति की है। उसमें सूर्य और चन्द्रमा को काल-मापन का साधन माना गया है। - "ये द्वे कातं विद्यत्तः।" यो तो "दिनं दिनं सुदिनत्वम्" के अनुसार प्रत्येक दिन को सुदिन मान कर उसका स्वागत किया जाना चाहिए। वेदात् सर्वं प्रसिद्धयति की मान्यता प्रसिद्ध है। तब नया संवत्सर कहने की क्या आवश्यकता है

नव संवत्सर में नव शब्द नु धातु से बना है जिसका अर्थ होता है – स्तुत्य, प्रशंसा करने योग्य। सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला जानते थे कि नव गति जीवन में नई लय पैदा करती है। काल के प्रवाह में एकदम नयापन की ताजगी अनुभव की जा सकती हैं।

भारतीय मान्यता के अनुसार - ऋणं ह वै जायमानः। जन्म लेने वाला मनुष्य तो ऋण स्वरूप होता है। मानवी माता से ऋण मनुश्य] ब्राह्मण माता से ऋण ब्राह्मण] क्षत्रिय माता से ऋण क्षत्रिय] वैश्य माता से ऋण वैश्य और शूद्र माता से ऋण शूद्र पैदा होते हैं। सबको जीवन ऋण से धन बनने के लिए मिला है। धन्यता की यह साधना अरंकृत करके इनको आर्य बनाती है - द्विजत्व प्रदान करती है।

भारतीय सनातन जीवन शैली में नवसंवत्सर ताजगी जगाता है। मनुष्य बनने की प्रक्रिया को अथक बनाता है - न थकाने वाली। उत्सव है उत्कृष्ट सव-यज्ञ। यज्ञ श्रेष्ठ कर्म होता है - यज्ञो वै श्रेष्ठतम कर्म। यजुर्वेद के अनुसार "आयुः यज्ञेन कल्पताम्।" आयु को यज्ञ बनाने के लिए क्षण-क्षण ताजगी चाहिए - अथकता चाहिए। थक गये तो लक्ष्य छूने की उमंग कहा से आयेगी?  सजगता कहाँ से आयेगी?

"वयं राष्ट्रेजागृयाम पुरोहिताः" - हम राष्ट्र भाव में जागे और अनुकरणीय व्यक्तित्व वाले बनें। राष्ट्र भाव में कैसे जागे? जब श्रेष्ठ आचार और विचार से हमारे भीतर सात्त्विकता का उद्रेक होगा तो हमारे भीतर राष्ट्र (प्रकाशमत्ता, द्युतिमत्ता) का उदय होगा। सत्त्वं लघु प्रकाशकम् - महर्षि पतंजलि की उक्ति है। साधक का व्यक्तित्व राष्ट्र बन जायेगा। ऐसा राष्ट्र ही अनुकरणीय (पुरोहित) भी होगा। राष्ट्र संज्ञक व्यक्ति जहाँ बसें वह भी राष्ट्र होगा।

ऐसी जीवन साधना के लिए नवता चाहिए। नितनवीनता चाहिए। नवसंत्वसर की प्रतिपदा इसकी पूर्ति करती है। ताजगी जगाती है। वेद की उक्ति है - सर्वा आशा मम मित्रं भवन्तु - सारी दिशाएँ मेरी मित्र हो जाएँ।

जीवन साधना साधना केन्द्र में सफल होती है। संसार का सबसे बड़ा साधना केन्द्र, सबसे बड़ा विश्वविद्यालय, चिकित्सालय परिवार होता है। मानव जाति के विकास में परिवार भारतीय समाज की सबसे बड़ी देन है, जिसमें प्रत्येक सदस्य को अपने दोषों को निवारित करने का अवसर मिलता है - परितः वारयति स्वदोषान् यस्मिन् इति। परिवार को महिला बनाती है। 'महिला' से अधिक गरिमामय शब्द संसार की किसी भाषा में नहीं हो सकता - महस्य इला - उत्सव की जन्मभूमि, जिसके होने मात्र से जीवन उत्सव बन जाता है।

वही परिवार को बनाती है। वेद की उक्ति है - आमेदस्तम् - जाया इत् अस्तम् - जाया ही घर है। इसी के आधार पर मनु ने कहा - गृहिणी गृहम् उच्यते। मनु ने यह भी कहा है -
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः
जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है वहाँ देवता रमण करते हैं। जीवन को उत्सव बनने वाली और घर-परिवार का निर्माण करने वाली नारी के प्रति समादर करके व्यक्ति कृतज्ञता ही व्यक्त करता है। 

संवत्सर का अर्थ है - जिस कालखण्ड में संवत्स बनकर लोग रमण करते हैं - संवत्साः यत्र रमन्ते इति। साधक सत्यक् वत्स - संवत्स बनता है तब सिद्धों, साधकों, साधुओं को वात्सल्य प्राप्त होता है। जैन परम्परा में कहा गया है - वच्छल्लं (वात्सल्यं) परमो धर्मः। जैन परिवार में साधकों-मुनियों को गोचरी के लिए आमंत्रित किया जाता है।
धम्मपद में भगवान् बुद्ध का वचन है - आर्याणां गोचरे रताः। इसी तरह भागवत पुराण में ग्यारहवें स्कन्ध में आता है - गोचर्या नैगमश्चरेत् अर्थात् वेदानुयायी गोचरी को आचरण का विषय बनाएँ। स्पष्ट है कि वैदिक, जैन और बौद्ध एक ही सनातन परम्परा के अंग है।

नव संवत्सर मनाते समय अपनी सनातन परम्परा को याद करके आत्मगौरव का अनुभव करें। यजुर्वेद में कहा गया है - सा प्रथम संस्कृतिः विश्ववारा अर्थात् मनुष्य मात्र की संस्कारशीलता एक है और वही श्रेष्ठ है। उसको अनुभव का विषय बनाएँ।
आयुर्वेज्ञेन कल्पताम् - अपने सम्पूर्ण जीवन को यज्ञ - विषय कर्म के रूप में ढालें। नये संवत्सर का नवोत्साह इसमें सहायक होगा। शाके 1940 का प्रारम्भ 22 मार्च को राष्ट्रीय नवसंवत्सर को भी मनाएँ और 2075 को चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन आरम्भ होता हुआ, भी देखें। नये साल की ताजगी आपके सब मनोरथों को पूरा करेगी - यह न भूलें।

Tuesday, 6 February 2018

मनुष्य बन

यों तो भारतीय समाज एक ही आस्था के साथ जीता है] पर लोगों में वोट की राजनीति ने लोगों में दूरियाँ पैदा कर दी है। इससे आदमी अकेला और सुरक्षित हो गया। अभी अभी जयपुर में श्रीमद्भगवद्गीता पर आयोजित निबन्ध प्रतियोगिता में एक मुस्लिम बालक ने भाग लेकर प्रथम स्थान प्राप्त किया। उसके पिता सामान्य मजदूरी करते हैं। बालक को वातावरण नहीं मिला फिर भी उसने अपनी उपलब्धि से प्रषंसा पाई। बालक मिडिल स्कूल में पड़ता है। दो अन्य छात्रों ने भी उल्लेखनीय स्थान प्राप्त किया।
 

अजमेर में भारत विकास परिषद् की ओर से आयोजित ज्ञान प्रतियोगिता में एक सातवीं कक्षा की मुस्लिम छात्रा ने कहा - ये बड़े-बूढ़े हम बच्चों पर विश्वास नहीं करते वरना 45 प्रश्नों में से 36 के उत्तर क्यों माँगे गए \ में पूरे 45 प्रश्नों के उत्तर दे रही है। यदि एक भी उत्तर गलत हो तो मुझे शून्य अंक दिए जाएँ। उसके पूरे में से पूरे अंक मिले।
 

जयपुर के छात्र-छात्राओं ने तो यह भी कहा कि उनके संस्कृत अध्यापक उनको संस्कृत बोलना नहीं सिखाते। वे कह देते हैं कि संस्कृत श्लोकों के अर्थ हिन्दी में लिख दो - इतना पर्याप्त है। इस प्रवृत्ति से संस्कृत को व्यापक प्रचार-प्रसार नहीं मिलता। बच्चों को संस्कृत बोलने का अभ्यास भी कराया जाना आवश्यक है। नसीराबाद का रेलवे में काम करने वाला एक परिवार रामायणी परिवार है। उसमें रामचरित मानस को कण्ठस्थ करने की माता-पिता और बच्चों में होड़ लगी रहती है। वह भी मुस्लिम परिवार है। ये संस्कार उनको भारत की भूमि से ही मिले हैं। किसी ने उन पर दबाव नहीं डाला। भारतीय अखण्ड समाज को प्रमाणित करने वाले उदाहरण हैं ये।

इंग्लैण्ड में एक सर्वेक्षण में 23 गाँव ऐसे निकले जो संस्कृत भाषी हैं। उनको किसी ने भारत से जाकर संस्कृत नहीं पढ़ाई। हमारे भारतीय परिवार ही कभी वहाँ जाकर बसे होंगे। अमरीका में ‘मोयी’ समुदाय के लोग नित्य प्रति अग्निहोत्र करते हैं। यज्ञ परम्परा की समझ न होने पर भी कर्तव्य कर्म मान कर ऐसा करते हैं।
 

रूस में मास्को नदी के किनारे एक लम्बा-चैड़ा नगर उत्खनन में मिला है। उसमें भी सभी घरों में यज्ञवेदियाँ मिली हैं। लोग अग्निहोत्र करते रहे होंगे। संसार की सब भाषाएँ संस्कृत से निःसृत हुई हैं। सब जगह संस्कृत बोलने वाले रहते होंगे तभी ऐसा संभव है। भारत तो उदयाचल (प्रशान्त महासागर के किनारे) से अस्ताचल (भूमध्यसागर का टेरेसां) तक है।
 

यह भरतखण्ड है। सम्पूर्ण एषिया जम्बूद्वीप है। भारतीयों के आदर्श और श्रेष्ठ चरित्र के कारण इसको आर्यावर्त कहा जाता है। आर्य कोई जाति नहीं है। जिसका श्रेष्ठ आचरण हो उसी को आर्य कहा जाता है। अर्यस्य अपत्यम् आर्यम् उक्ति के अनुसार आर्य ईश्वर पुत्र होते हैं। वेद में आता है - शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः कथन के अनुसार आर्य अमृत स्वरूप परमात्मा के पुत्र होते हैं।
 

वेद मानवता का संविधान है। उसमें मंत्रद्रष्टा ऋषियों की विविध दृष्टियाँ संकलित हैं। उनमें से अपनी रुचि और प्रकृति के अनुसार किसी भी दृष्टि को अपना कर श्रेष्ठ मनुष्य बनाया जा सकता है। वेद का आदेश है - मनुर्भव जनया दिव्यं जनम्।