Tuesday, 1 October 2019

मैदान में चलो...

“पढ़ोगे, लिखोगे, बनोगे नवाब” और “खेलोगे, कूदोगे बनोगे ख़राब” इस कहावत से हम सभी परिचित हैं।  समाज में इस कहावत का भरपूर प्रभाव पड़ा और सभी पढ़ने पर जोर देने लगे। विद्यालयों और महाविद्यालयों में खेलने या पी.टी. के लिए बहुत कम समय दिया जाता है। यूं कहे तो पढ़ो, रटो, लिखो और अंक अच्छे लाकर नाम कमाओ, पैसे कमाओ। बस इसी पर जोर दिया जा रहा है। इसलिए समाज पर स्वार्थ वृत्ति हावी होता जा रहा है और लोग बिना परिश्रम के अधिकाधिक धनार्जन करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। अब ऐसा प्रतीत होने लगा है कि हमारे समाज में धीरे-धीरे श्रमदेवता की उपासना कम होने लगी है। 

इस समय मधुमेह, हृदय विकार, रक्तदाब और अनेक प्रकार के संक्रामक रोग से ग्रसित रोगियों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है। इसलिए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने 29 अगस्त को “फिट इंडिया मूवमेन्ट” का शुभारम्भ किया जिससे कि देशवासियों में स्वस्थ जीवन जीने के लिए व्यायाम करने की प्रेरणा जाग्रत हो।

महाकवि कालिदास ने अपनी रचना ‘कुमारसम्भव’ में कहा है – “शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।” अर्थात् शरीर धर्म पालन का पहला साधन है। शरीर स्वस्थ है तो हम अपने प्रत्येक कर्त्तव्य को ठीक ढंग से पूरा कर सकते हैं। इसीलिए स्वामी विवेकानन्दजी कहा करते थे, “मुझे चाहिए लोहे की मांसपेशियां, फौलाद के स्नायु। ऐसे साहसी युवा जो समुद्र को लांघ जाने का, मृत्यु से आलिंगन करने की क्षमता रखते हो।”                      

कुछ युवा खेल के प्रति समर्पित होते हैं और राज्य स्तर से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर खेल में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने के लिए अत्यधिक परिश्रम करते हैं। वहीं ये खिलाड़ी अपने इस कठोर परिश्रम और तप से दुनिया में भारत की कीर्ति फैला रहे हैं। किन्तु प्रत्येक व्यक्ति राज्य या राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी तो नहीं बन सकते। इसका मतलब ऐसा भी नहीं है कि हम खेलना ही छोड़ दें! खेल तो जीवन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। जबतक मनुष्य खेलता है तब तक वह स्वस्थ और तंदुरुस्त रहता है, इसलिए “मैदान में चलो, खेलो, कूदो, व्यायाम करो और स्वस्थ जीवन का लाभ उठाओ।”

स्वस्थ शरीर के आवश्यक है - पवित्रता, परिश्रम, आहार और व्यवस्थित दिनचर्या।

पवित्रता : नित्य रूप से श्रेष्ठ साहित्यों का स्वाध्याय, सतसंगति और आत्मचिन्तन से हमें आत्मबोध होता है, इसी से पवित्रता आती है।

परिश्रम : आचार्य विनोबा भावे कहा करते थे कि श्रमदेवता की उपासना करो, अर्थात् परिश्रम करो। जो व्यक्ति श्रम नहीं करता उसको आलस्य जकड़ लेता है। और हम जानते हैं कि आलसी व्यक्ति कभी भी अपने स्वप्न को साकार नहीं कर सकता। आलस्य को समाप्त करना है तो कठोर परिश्रम करना ही होगा।   

आहार : हित भोज अर्थात् जो हमारे लिए हितकर हैं उस अन्न को पर्याप्त मात्र में खाएं। मीत भोज अर्थात् जो भोज पदार्थ हमें अधिक स्वादिष्ट और प्रिय है उसे थोड़ा कम खाएं, और काल भोज अर्थात् समय पर खाएं।   

दिनचर्या : दुनिया में जितने भी महापुरुष अथवा सफल व्यक्ति हुए हैं या वर्तमान में हैं, उनके जीवन का यह महत्त्वपूर्ण सोपान होता है कि उनकी व्यवस्थित दिनचर्या। स्वस्थ रहने के लिए पर्याप्त नींद की आवश्यकता होती है। जिनकी दिनचर्या अच्छी होती है वे ही ठीक तरह से सो पाते हैं।     

हम समाचार चैनलों में देखते हैं कि अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार जैसे अभिनेता अपनी फिटनेस को लेकर कितने जागरूक हैं। स्वयं प्रधनामंत्री मोदी भी नियमित रूप से व्यायाम, योगासन, प्राणायाम करते हैं और दिनभर देशकाज में व्यस्त रहते हैं। महात्मा गांधी और आचार्य विनोबा भावे नित्य पैदल चलते थे; पैदल चलने की आदत ने ही उनके शरीर को स्वस्थ रखा और इसी से उनकी कार्य क्षमता भी बढ़ी। विश्वनाथन आनंद का लेख “शतरंज” बुद्धिबल वाला है तथापि वे अपनी फिटनेस के लिए रोज सायकलिंग करते हैं। चाहे बौद्धिक कार्य करना हो या शारीरिक, अपनी बैठक क्षमता (सिटिंग कैपेसिटी) को बढ़ाना हो या अपनी एकाग्रता का विकास, व्यायाम का तप तो करना ही होगा।

स्वस्थ रहने के लिए महंगे जिम जाने की आवश्यकता नहीं है। अपने घर के निकट मैदान अथवा बगीचे में जाकर हम व्यायाम कर सकते हैं। लिफ्ट की जगह सीढ़ियों का उपयोग करना चाहिए। अपने घर के काम जैसे - झाड़ू लगाना, फर्श पोंछना, स्वयं के कपड़े धोना, पेड़-पौधों को पानी देना, रोजमर्रा की जरूरतों के सामान लाने के लिए निकट दुकानों तक पैदल जाना आदि काम हमें मन लगाकर करना चाहिए। आइए, हम भी अपने को व्यवस्थित कर लें इस संकल्प के साथ कि मैं फिट रहूंगा तो परिवार, समाज और देश के लिए उत्तम योगदान कर सकूंगा।  

Tuesday, 3 September 2019

एक भारत-विजयी भारत


विवेकानन्द शिला स्मारक की स्थापना को 50वर्ष पूरे हो रहे हैं। इस उपलक्ष्य में विवेकानन्द केन्द्र ‘‘एक भारत-विजयी भारत’’ का सन्देश जन-जन तक पहुंचा रहा है। विवेकानन्द केन्द्र की हिन्दी मासिक पत्रिका होने के नाते इसी विषय को केन्द्र में रखकर इस अंक की रचना की गई है।

जब भी भारत एक ध्येय को लेकर जीता है तब उस ध्येय को निश्चित रूप से वह प्राप्त करता है। अर्थात् जब भी भारत एक होता है, वह विजयी होता है। इसलिए भारतीय इतिहास की वह गौरवगाथा जिसे पढ़कर हममें प्रेरणा जगे, हमारा आत्मविश्वास बढ़े, का अध्ययन हमें करना होगा। इतिहास को स्मरण करके वर्तमान का नियोजन करना चाहिए ताकि भविष्य उज्जवल हो। यह सोचकर हमने इतिहास के तथ्यों को अपने पाठकों तक पहुँचाने का निश्चय किया है। भारत में मुग़ल शासन के दौरान भारत के संतों ने अध्यात्म और भक्ति की धारा देशभर में प्रवाहित की जिससे सारा समाज संगठित हुआ। समाज का संतों ने प्रबोधन किया। इसलिए इस अंक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वर्तमान सहसरकार्यवाह डा. कृष्ण गोपाल जी की पुस्तक ‘‘भारत में संत परम्परा और सामाजिक समरसता’’ से विचारों को उन्हीं के शब्धों में संकलित किया है, जो कि बेहद प्रासंगिक, तथ्यपरक तथा अनुकरणीय है।

साथ ही इस अंक में भगवान श्रीराम, सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य, आदि शंकराचार्य, छत्रपति शिवाजी महाराज, गुरु गोविन्द सिंह, स्वामी विवेकानन्द, सरदार पटेल आदि पर विशेष लेख समाहित हैं। इन महापुरुषों ने भारत को विजयी बनाने के लिए किस तरह प्रयत्न किए इसका विशद वर्णन किया गया है। अंक में ‘‘दिशाबोध’’ नामक स्तम्भ विशेष उल्लेखनीय है। आगामी एक वर्ष स्थायी स्तम्भ के रूप में ‘‘एक भारत-विजयी भारत’’ पर लेखमाला प्रकाशित की जाएगी जिसमें भारत को एकसूत्र में जोड़नेवाले, भारत को विजयी बनाने वाले महानायकों के जीवन-कार्यों का वर्णन होगा।

पाठक गण अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव हमारे अणुडाक (kendrabharati@vkendra.org) पर अवश्य प्रेषित करें।

Wednesday, 21 August 2019

देशप्रेम और देशभक्ति

15 अगस्त को हम स्वतंत्रता दिवस के रूप में बड़े उत्साह में मनाते हैं। इस दिन देशभक्ति के गीत के स्वर हर गली, चौराहे, विद्यालय, महाविद्यालय तथा विभिन्न संस्थाओं के कार्यालय में सुबह से सुनाई देते हैं। देशप्रेम के भाव तो सबके भीतर विद्यमान है। वास्तव में मानवीय जीवन में प्रेम को सबसे अधिक महत्त्व प्राप्त हुआ है। महापुरुषों ने प्रेम की महिमा गाई है। सद्गुरु कबीर साहब ने प्रेमविहीन मनुष्य हृदय के सम्बन्ध में कहा है,

“जा घट प्रेम न संचरे, सो घट जान मसान।
जैसे खाल लुहार की, सांस लेतु बिन प्रान।।”

स्वामी विवेकानन्द जब साढ़े तीन वर्षों के बाद अमेरिका से भारत लौट रहे थे, तब उनके एक विदेशी मित्र ने पूछा, “स्वामीजी, आप तीन वर्षों तक वैभवशाली देश में रहकर अपने गरीब देश भारत में लौट रहे हैं। अब अपने देश के प्रति आपकी कैसी भावना है?”

स्वामीजी ने बहुत मार्मिक उत्तर दिया जिससे प्रेम और भक्ति की अवधारणा स्पष्ट हो जाएगी।
स्वामी विवेकानन्दजी ने कहा, “पहले तो मैं अपनी मातृभूमि से प्रेम ही करता था अब तो इसका कण–कण मेरे लिए तीर्थ हो गया है।” अर्थात प्रेम से ऊपर का भाव भक्ति है। ‘हिंदी साहित्य का इतिहास” के लेखक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने निबंध “श्रद्धा-भक्ति” में कहा है, “प्रेम का कारण बहुत कुछ अनिर्दिष्ट और अज्ञात होता है; पर श्रद्धा का कारण निर्दिष्ट और ज्ञात होता है।” आचार्य शुक्ल ने आगे कहा कि, “श्रद्धा और प्रेम के योग का नाम भक्ति है।” इससे स्पष्ट होता है कि समर्पण की भावना का पहला आयाम प्रेम है, उसके बाद श्रद्धा और फिर भक्ति। समर्पण की सर्वोच्च स्थिति “भक्ति” है। इसलिए प्रेम, श्रद्धा और भक्ति की अवधारणा को समझे बिना देशप्रेम और देशभक्ति की संकल्पना को नहीं समझा जा सकता।

यूं तो हमारे मीडिया जगत में देशभक्ति और देशप्रेम की गाथा को बहुत बार दोहराया जाता है। विशेषकर, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में 15 अगस्त और 26 जनवरी, क्रिकेट या युद्ध के दौरान देशभक्तों का गुणगान करने और देशभक्ति जगाने के लिए सिनेमा के गीतों को दिखाने की परम्परा रही है। पर मीडिया में देशभक्ति की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कोई कार्यक्रम नहीं दिखाया जाता।

देशभक्ति के प्रगटीकरण के भी कुछ आयाम होते हैं। क्या इस बात पर हमने कभी अनुसंधान किया है? नहीं। यदि ऐसा होता तो क्रिकेट में जीत के बाद अथवा 15 अगस्त और 26 जनवरी को सड़कों पर डीजे की धुन में हो-हल्ला मचाते, थिरकते युवाओं के असभ्य और अनुशासनहीन कृत्यों को अनुशासित कृति में परिवर्तित करने के लिए कोई अभियान चलाया जाता।

हमारे देश में तो क्रिकेट, युद्ध, 15 अगस्त और 26 जनवरी के दौरान ही देशवासियों की “लिमिटेड देशभक्ति” सड़कों पर भिन्न-भिन्न प्रकार से दिखाई देती है। ऐसा नहीं है कि देशप्रेम अथवा देशभक्ति हमारे नागरिकों में है ही नहीं। निश्चित रूप से देशभक्त, देशप्रेमी अपने जीवन के महत्वपूर्ण समय निराश्रित बालकों के पोषण, स्वस्थ्य और शिक्षा के लिए लगाते हैं। सीमा पर जवान, देश में किसान, समाज में विद्वान् यहां तक कि सफाई कर्मचारी अपने कर्मों के द्वारा भारतमाता की पूजा करते हैं। पर ऐसे समर्पित लोग कभी हो-हल्ला नहीं मचाते। इसलिए देशभक्ति के आयाम को भीहमें समझना होगा।

9 फरवरी, 1897 को मद्रास (चेन्नई) के विक्टोरिया पब्लिक हॉल में “मेरी क्रांतिकारी योजना” नामक अपने व्याख्यान में स्वामी विवेकानन्द ने ‘देशभक्ति’ की तीन सीढ़ियां बतलाई। स्वामीजी ने कहा, “लोग देशभक्ति की चर्चा करते हैं। मैं भी देशभक्ति में विश्वास करता हूं, और देशभक्ति के सम्बन्ध में मेरा भी एक आदर्श है। बड़े काम करने के लिए तीन बातों की आवश्यकता होती है। पहला है – हृदय की अनुभव शक्ति। बुद्धि या विचारशक्ति में क्या है? वह तो कुछ दूर जाती है और बस वहीं रुक जाती है। पर हृदय तो प्रेरणास्त्रोत है! प्रेम असंभव द्वारों को भी उद्घाटित कर देता है। यह प्रेम ही जगत के सब रहस्यों का द्वार है। अतएव, ऐ मेरे भावी सुधारकों, मेरे भावी देशभक्तों, तुम अनुभव करो! क्या तुम अनुभव करते हो कि देव और ऋषियों की करोड़ों संतानें आज पशु-तुल्य हो गयीं हैं? क्या तुम हृदय से अनुभव करते हो कि लाखों आदमी आज भूखे मर रहे हैं, और लाखों लोग शताब्दियों से इसी भांति भूखों मरते आए हैं? क्या तुम अनुभव करते हो कि अज्ञान के काले बदल ने सारे भारत को ढंक लिया है? क्या तुम यह सब सोचकर बेचैन हो जाते हो? क्या इस भावना ने तुमको निद्राहीन कर दिया है? क्या यह भावना तुम्हारे रक्त के साथ मिलकर तुम्हारी धमनियों में बहती है? क्या वह तुम्हारे हृदय के स्पंदन से मिल गयी है? क्या उसने तुम्हें पागल-सा बना दिया है?

क्या देश की दुर्दशा की चिंता ही तुम्हारे ध्यान का एकमात्र विषय बन बैठी है? और क्या इस चिंता में विभोर हो जाने से तुम अपने नाम-यश, पुत्र-कलत्र, धन-संपत्ति, यहां तक कि अपने शरीर की भी सुध बिसर गए हो? तो जानो, कि तुमने देशभक्त होने की पहली सीढ़ी पर पैर रखा है- हां, केवल पहली ही सीढ़ी पर!”

स्वामी विवेकानन्द ने आगे कहा, “अच्छा, माना कि तुम अनुभव करते हो; पर पूछता हूं, क्या केवल व्यर्थ की बातों में शक्तिक्षय न करके इस दुर्दशा का निवारण करने के लिए तुमने कोई यथार्थ कर्तव्य-पथ निश्चित किया है? क्या लोगों की भर्त्सना न कर उनकी सहायता का कोई उपाय सोचा है? क्या स्वदेशवासियों को उनकी इस जीवन्मृत अवस्था से बाहर निकालने के लिए कोई मार्ग ठीक किया है? क्या उनके दुखों को कम करने के लिए दो सांत्वनादायक शब्दों को खोजा है? यही दूसरी बात है। किन्तु इतने से ही पूरा न होगा!” 

उन्होंने कहा, “क्या तुम पर्वताकार विघ्न-बाधाओं को लांघकर कार्य करने के लिए तैयार हो? यदि सारी दुनिया हाथ में तलवार लेकर तुम्हारे विरोध में खड़ी हो जाए, तो भी क्या तुम जिसे सत्य समझते हो उसे पूरा करने का साहस करोगे? यदि तुम्हारे सगे-सम्बन्धी तुम्हारे विरोधी हो जाएं, भाग्यलक्ष्मी तुमसे रूठकर चली जाए, नाम-कीर्ति भी तुम्हारा साथ छोड़ दे, तो भी क्या तुम उस सत्य में संलग्न रहोगे? फिर भी क्या तुम उसके पीछे लगे रहकर अपने लक्ष्य की ओर सतत बढ़ते रहोगे? क्या तुममे ऐसी दृढ़ता है? बस यही तीसरी बात है।” स्वामी विवेकानन्द ने जोर देकर आगे कहा, “यदि तुममे ये तीन बातें हैं, तो तुममे से प्रत्येक अद्भुत कार्य कर सकता है। तब तुम्हें समाचारपत्रों में छपवाने की अथवा व्याख्यान देते फिरने की आवश्यकता न होगी। स्वयं तुम्हारा मुख ही दीप्त हो उठेगा! फिर तुम चाहे पर्वत की कन्दरा में रहो, तो भी तुम्हारे विचार चट्टानों को भेदकर बाहर निकल आयेंगे और सैकड़ों वर्ष तक सारे संसार में प्रतिध्वनित होते रहेंगे। और हो सकता है तब तक ऐसे ही रहें, जब तक उन्हें किसी मस्तिष्क का आधार न मिल जाए, और वे उसी के माध्यम से क्रियाशील हो उठें। विचार, निष्कपटता और पवित्र उद्देश्य में ऐसी ही जबर्दस्त शक्ति है।”

स्वामी विवेकानन्दजी का यह कथन देशप्रेम और देशभक्ति के मर्म को समझने के लिए पर्याप्त सरल है।