Thursday, 2 August 2018

स्वतंत्रता का मोल

स्वतंत्रता सबको प्रिय है। क्योंकि स्वतंत्रता मनुष्य का स्वभाव है। यही कारण है कि वह अपनी स्वतंत्रता के लिए छटपटाता है। हमारे देश में लगभग 1000 वर्षों तक विदेशी आक्रमण होते रहे। ग्रीक, हूण, शक, यवन और मुग़ल शासन की प्रताड़ना सहते हुए अपने सांस्कृतिक और अध्यात्मिक विरासत का जतन बड़ी सजगता के साथ हमारे पूर्वजों ने किया। तब जाकर हमारी सांस्कृतिक विरासत की रक्षा हो सकी। बाद में अंग्रेज आए और लगभग 200 वर्षों तक उन्होंने हमारे भारतवर्ष पर शासन किया। यह एक ऐसा शासन था जिसने वास्तव में हमारे देशवासियों के मन को गुलाम करने में सफलता पायी। देश अपना, भूमि अपनी, खेत अपने, इतिहास अपना, लोग अपने फिर भी सब पर शासन अंग्रेजों का ही चलता था। हम नहीं चाहते थे कि अपने भूमि, भवन, धर्म, संस्कृति और शिक्षा व्यवस्था पर अंग्रेजों की अधीनता रहे। इसलिए तो हमारे पूर्वजों ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया, हजारों देशभक्तों ने अपने प्राणों की आहुति दी, लाखों परिवारों इस स्वाधीनता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। और अंततोगत्वा 15 अगस्त, 1947 को हमारा देश “भारत” स्वतंत्र हुआ। पर क्या हम हमारे बलिदानी वीरों के ‘त्याग और सेवा’ प्राप्त स्वाधीनता के मोल को समझ पाए हैं, इस पर विचार होना चाहिए।

स्वतंत्रता का श्रेय केवल ‘एक’ को नहीं  

कई लोग कहते हैं कि देश को स्वतंत्रता अहिंसा से मिली, यह स्वतंत्रता महात्मा गांधी ने दिलाई। कई लोग कहते है कि अंग्रेजों ने भारत को लूटकर छोड़ दिया और हमें स्वतंत्रता मिल गई। स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजों के साथ युद्ध नहीं करना पड़ा। कई बुद्धिजीवी तो यहां तक कहते हैं कि अंग्रेज नहीं होते तो यहां लोकतंत्र नहीं होता और न ही देश में कोई विकास हो पाता। ये सही है कि महात्मा गांधी ने ‘स्वतंत्रता’ की इच्छा को जन मन में जगाया, उन्होंने इसे आन्दोलन का स्वरूप दिया। पर केवल अहिंसक आन्दोलन के प्रभाव से अंग्रेजों ने भारत को नहीं छोड़ा। भारत के अन्दर युवा क्रांतिकारियों के बलिदान के प्रति भारतवासियों के मन में अपार श्रद्धा थी, उनसे लाखों लोग देश के लिए मर मिटने के लिए प्रेरित हुए थे। एक तरफ सशस्त्र क्रांतिकारी, दूसरी ओर अहिंसक आन्दोलन (सत्याग्रह)। स्वतंत्रता आन्दोलन में जहां चंद्रशेखर आजाद ने क्रांतिकारियों के संगठन का नेतृत्व किया, वहीं महात्मा गांधी ने अहिंसक आन्दोलन की बागडोर सम्भाली। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने एक ओर आजाद हिन्द फ़ौज का नेतृत्व किया, वहीं दूसरी ओर स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने भारतीय युवाओं को सेना में शामिल होने का आह्वान किया। द्वितीय विश्वयुद्ध चल रहा था और अंग्रेजों को सैनिकों की आवश्यकता थी। अंग्रेज अपने स्वार्थ के लिए भारतीय युवाओं को सैनिक शिक्षा देने को तैयार थे। तब सावरकर ने इस अवसर का लाभ लेने के लिए युवाओं से कहा, “एकबार सैनिक शिक्षा ले लो और जब जरुरत पड़ेगी तो तय कर लेना कि बंदूक की गोली किस ओर चलाना है। सावरकर की प्रेरणा काम कर गई और युवा भारत सैनिक प्रशिक्षण में शामिल होने के लिए दौड़ पड़े। अंग्रेज डर गए कि जब सारे युवा सैनिक बन गए तो वे अंग्रेजों से लड़कर बूरी तरह समाप्त कर देंगे। अंग्रेजों का यह भय स्वाभाविक था क्योंकि लाखों युवा सैनिक प्रशिक्षण ले चुके थे।

स्वतंत्रता का श्रेय किसके नेतृत्व को है, इसको लेकर बहुत चर्चा होती है, विशेषकर सामान्य लोगों में। स्वतंत्रता आन्दोलन का नेतृत्व अनेक धाराओं में स्वतंत्रता सेनानियों ने किया, लेकिन सारे देशभक्तों की प्रेरणास्रोत तो स्वामी विवेकानन्दजी के विचार ही रहे। चाहे गांधी हो या सुभाष, चाहे लोकमान्य तिलक हो या सावरकर, क्रांतिकारियों के ठिकानों पर कभी अंग्रेज छापे मारते तो उन्हें उन ठिकानों पर स्वामी विवेकानन्दजी के देशभक्ति जगानेवाले विचार की प्रतियां मिलती। यह भी एक विशेष बात है जिसका संज्ञान लेना आवश्यक है। वहीं देश के कवियों, गीतकारों और साहित्यकारों के देशभक्ति जगानेवाले साहित्यिक योगदान को भी कभी नहीं भूलाया जा सकता। लोकमान्य तिलक और गणेशशंकर 'विद्यार्थी' की राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत पत्रकारिता जिसने स्वतंत्रता आन्दोलन को मुखर बनाया, गांधीजी का अहिंसक आन्दोलन, सावरकर ने सेना में भर्ती होने का आह्वान किया, सुभाषचन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फ़ौज बनाई और सशस्त्र क्रांति की मशाल तो 1857 से स्वतंत्रता तक जल ही रही थी। इसलिए केवल एक व्यक्ति को स्वतंत्रता प्राप्ति का श्रेय देना लाखों स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग, तप और बलिदान का अपमान हो होगा। लेकिन देश का दुर्भाग्य ही है कि हमारे यहां अंग्रेजों की चापलूसी करनेवाले लोग तब भी थे और उनका गुणगान करनेवाले लोग अब भी हैं।

स्वतंत्रता का दुरुपयोग

गुलामी मानसिकता के लोग स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग और बलिदान का महत्त्व न पहले समझते थे और न ही अब। इसलिए आज स्वतंत्रता का दुरुपयोग करने में इन्हें मजा आता है। इस श्रेणी में सामान्य मनुष्य कम ही हैं पर बड़े पदों पर बैठे लोग इस महान स्वतंत्रता का दुरुपयोग करने में कोई मौका नहीं छोड़ते। शिक्षा संस्थानों में शिक्षा की अव्यवस्था को देखिए, राजनीति में भ्रष्टाचार को देखिए, सिनेमा जगत में स्वैराचार को देखिए, सामाजिक क्षेत्रों में फैले जातिभेद और दुराचार को देखिए, कानून व्यवस्था में ईमानदारी की दुर्गति को देखिए, ये सारे दृश्य मानो हमारे महान स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान का उपहास कर रहे हैं। 

दूसरी ओर स्वतंत्रता दिवस के उत्सव को मनाने का तरीका भी देखिए। विद्यालयों, महाविद्यालयों तथा विभिन्न संस्थानों में तिरंगा फहराया जाता है। कुछ क्षण बलिदानियों को याद किया जाता है। वहीं देश की युवा पीढ़ी मोटरसाइकिल में सवार होकर, हाथों में तिरंगा लेकर सड़कों पर डीजे की कर्कश आवाज के साथ इस उत्सव को मनमानी ढंग से सेलिब्रेट करते दिखाई देते हैं। ये ‘देशभक्ति’ भी आज की पीढ़ी के लिए बड़ी कमाल की चीज हो गई है। फेसबुक, ट्विटर और वाट्सएप प्रोफाइल या चेहरे, कपड़े अथवा ब्रेसलेट पर तिरंगा लगा लो तो आप देशभक्त बन जाते हैं। क्या यही देशभक्ति है? तिरंगा का आदर तो होना ही चाहिए क्योंकि वह हमारे देश का राष्ट्रीय ध्वज है। पर केवल तिरंगे का प्रोफाइल फोटो बना देनेभर से क्या हमारी देशभक्ति साबित हो जाती है? क्यों क्रिकेट, 15 अगस्त और 26 जनवरी को ही जागती है हमारी लिमिटेड राष्ट्रभक्ति? इस बात पर भी चिन्तन होना चाहिए।

स्वतंत्रता मिली है - “राष्ट्रभक्ति की भावना से, समर्पण और बलिदान से”। राष्ट्र का उत्थान भी होगा देशभक्ति भाव के जागरण से। आइए, “देशभक्ति फिर जगे, देश का ये प्राण है” इस भाव का जागरण कर समाज में राष्ट्र चेतना का अलख जगाएं।

Thursday, 5 July 2018

गुरु पूर्णिमा

गुरु पूर्णिमा इस साल 27 जुलाई को आनेवाली है। विवेकानन्द केन्द्र में हम इस उत्सव को मुख्यतः कार्यकर्ताओं के संवर्धन के लिए मनाते हैं। हम राष्ट्र के मूल को मजबूत करने, या यूँ कहें कि राष्ट्रीय पुनरुत्थान के लिए काम कर रहे हैं। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, ‘प्रत्येक राष्ट्र के पास देने के लिए एक संदेश है, उसे पूरा करना ही उसका भाग्य और मिशन है’। भारत की नियति है आध्यात्मिकता में दुनिया का मार्गदर्शन करना अर्थात् जीवन के सभी क्षेत्रों में एकत्व की अभिव्यक्ति। वेदों ने ‘‘एकत्व - एक से अनेक की उत्पत्ति’’ की इस दृष्टि को संदर्भित किया, निकाला, पोषण किया, उस पर चर्चा की और उसका वर्णन किया।

वेदों को संरक्षित करने के लिए (अस्तित्व के शाश्वत सत्य को प्रकट करनेवाले मन्त्रों का संग्रह), महर्षि श्री व्यास ने गुरु परम्परा स्थापित की। वह जानते थे कि किसी भी ज्ञान की निरंतरता, ज्ञान को आगे बढ़ाने हेतु प्रतिबद्ध और चरित्रवान व्यक्तियों की शृंखला पर निर्भर है। उन्होंने गुरु परम्परा बनाकर और ज्ञान की प्रत्येक शाखा को अलग-अलग परिवारों को सौंपकर इसे यथार्थ बना दिया।

महर्षि वेदव्यास के ये प्रयास और दृष्टि इतनी सफल थी कि भारत एक ऐसी भूमि बन गई जहाँ गुरु से शिष्य या पिता से पुत्र को ज्ञान की विभिन्न शाखाएँ प्राप्त होती रहीं । गुरु से शिष्य दृ गुरु परंपरा ने ज्ञान के इस प्रवाह को संरक्षित और समृद्ध करके, प्रत्येक युग के लिए इसे प्रासंगिक किया। इस प्रकार भारतमाता, जिसके जीवन में सनातन धर्म स्थापित है और सनातन धर्म जो नित्य नूतन और चिर पुरातन है, सदैव प्रासंगिक और शाश्वत हो गए। भगवान वेदव्यास द्वारा निर्मित गुरु परम्परा की यह प्रथा इतनी अनोखी थी कि उनकी जन्मतिथि अर्थात आषाढ़ पूर्णिमा को हमारी इस भूमि पर इसे गुरुपूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है।

भारत आंतरिक रूप से पूर्ण व्यवस्थित और आक्रमणों का सामना करने के लिए अच्छी तरह सुसज्जित था। लेकिन जब भारत में संगठित सेन्य बल और हिंसक विचारधाराओं का आगमन प्रारम्भ हुआ, तो हम असफल सिद्ध हुए। विभिन्न संगठित शत्रुतापूर्ण ताकतों और विचारधाराओं की शक्ति ने हमारी विभिन्न प्रणालियों को नष्ट कर दिया। अतः, संगठित होकर काम करने की आवश्यकता उत्पन्न हुई। यह समय की माँग है कि जो लोग राष्ट्र के बारे में चिंतित हैं, वे एक साथ आएँ और इसलिए धर्म को पुनः स्थापित करने के लिए, रामकृष्ण मिशन, चिन्मय मिशन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विवेकानन्द केन्द्र, माता अमृतानंदमयी मिशन और कई अन्य संस्थाएँ अस्तित्व में आईं।

संगठित कार्य आवश्यकता बन गई है। हमारा हिन्दू समाज बहु-स्तरीय है और इसमें विभिन्न सम्प्रदाय समाहित हैं। स्वामी विवेकानन्द जानते थे कि हमें व्यवस्थित होना है, लोगों को एक साथ लाने की आवश्यकता है। उन्होंने लिखा, ‘‘हमारे पास एक मंदिर होना चाहिए, क्योंकि हिन्दुओं के लिए, धर्म पहले आना चाहिए। फिर, आप कह सकते हैं, सभी सम्प्रदाय इसके बारे में झगड़ा करेंगे। लेकिन हम गैर-साम्प्रदायिक मंदिर बनायेंगे, जिसमें प्रतीक के रूप में केवल ‘‘ॐ’’ होगा, जो किसी भी सम्प्रदाय का सबसे बड़ा प्रतीक होगा। यदि यहाँ कोई ऐसा सम्प्रदाय है, जो मानता है कि ‘‘ॐ’’ प्रतीक नहीं होना चाहिए, तो उसे स्वयं को हिन्दू कहने का कोई अधिकार नहीं है... इसके बाद मंदिर के संबंध में शिक्षकों को प्रशिक्षित करने के लिए एक संस्थान होना चाहिए जो धर्म प्रचार करे और हमारे लोगों को धर्मनिरपेक्ष शिक्षा दे... फिर यह काम इन शिक्षकों और प्रचारकों के माध्यम से आगे बढ़ाया जाएगा, और धीरे-धीरे हमारे पास अन्य स्थानों पर भी ऐसे ही मंदिर होंगे, जब तक कि हम पूरे भारत को कवर न कर लें। यही मेरी योजना है। यह विशाल दिख सकती है, लेकिन यह बहुत जरूरी है। आप पूछ सकते हैं, इसके लिए पैसा कहां है। पैसे की जरूरत नहीं है... मनुष्य कहां हैं? यह सवाल है। मनुष्य, केवल मनुष्य की ही आवश्यकता हैः बाकी सब तो स्वतः हो जाएगा, लेकिन शक्तिवान, सामथ्र्यवान, आस्थावान युवा पुरुष जिनकी रीढ़ की हड्डी शुद्ध हो, जरूरी हैं।“
यही स्वामी विवेकानन्द की योजना थी, जिसने माननीय एकनाथजी को विवेकानन्द केन्द्र के लिए प्रेरित किया। युवा, अग्निपुंज और जीवंत युवाओं को सक्षम बनाने की दृष्टि से एकनाथजी ने विवेकानन्द केन्द्र की स्थापना की। केन्द्र में ‘‘ॐ’’ हमारे गुरु हैं। ॐकार अर्थात ईश्वर, जो लोगों को एक साथ लाने, संगठित तरीके से टीमवर्क के साथ काम करने हेतु मार्गदर्शक है। अतः हम अपने प्रार्थना कक्ष में ‘‘ॐ’’ के सामने प्रार्थना करते हैं। ॐ भगवान का नाम है, जो किसी भी भाषा से संबंधित नहीं है। भगवान का कोई भी अन्य नाम किसी विशिष्ट भाषा के मूल शब्दों से संबंधित है जो विशिष्ट अर्थ देता है और इस प्रकार उस भाषा को समझने वाले भक्त में सम्मान, भक्ति, प्रशंसा आदि के स्पन्दन पैदा करता है। लेकिन ॐकार किसी भी विशिष्ट भाषा तक सीमित नहीं है। यह भाषा से परे है और इस प्रकार सभी भाषाओं में भगवान के लिए आदर्श अभिव्यक्ति बन जाता है। ॐकार ब्रह्मांड के सभी चरणों- सृजन, जीवन और विसर्जन का प्रतिनिधित्व करता है। यह सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ है। यह सभी लोगों के देवी-देवताओं का प्रतिनिधित्व करता है। यह सर्व समावेशी है- इसमें सभी जातियाँ और पंथ समाहित है। योगशास्त्र कहते हैं, ‘‘तस्या वाचका प्रणवः’’ ॐकार ईश्वर की सबसे गहन अभिव्यक्ति है। ॐ ईश्वर है, जो हम सभी के लिए प्रेरणा का सदासर्वदा स्रोत है।

हम ऐसी भूमि पर पैदा हुए हैं जिसने सदैव संसार का मार्गदर्शन किया है और भविष्य में भी उसे दुनिया का मार्गदर्शन करना है। संगठन, जो धर्म स्थापित करने के लिए अस्तित्व में आया है, ईश्वरीय कार्य करने के लिए है, हमारे लिए ईश्वरीय है। अतः, जैसे गुरु को महत्व दिया जाता है, इसी प्रकार हम संगठन को महत्व देते हैं। हमारी इस भूमि ने अपने बच्चों को यही सिखाया है कि अपने सभी बुजुर्गों को गुरु के रूप में देखें, ताकि प्रत्येक में गुरुता-महानता और दिव्यता को देखा जा सके। यह वह जगह है जहां न केवल मनुष्यों बल्कि जानवरों और पक्षियों समेत पूरी प्रकृति को कई लोगों द्वारा गुरु के रूप में सम्मानित किया है, और किसी ने नहीं, बल्कि स्वयं दत्तात्रेयजी ने दृ जिन्हें ब्रह्मा, विष्णु, महेश का संयुक्त अवतार माना जाता है। ऐसा कहा जा सकता है कि चूँकि दत्तात्रेयजी ने अपने आस-पास गुरुता को देखा, अपने आस-पास की हर चीज से सीखने के लिए अपने दिमाग को प्रशिक्षित किया, अतः वे गुरुओं के गुरु बन गए। जब हम कहते हैं कि ॐकार हमारा गुरु है तो हमें इसका गहरा अर्थ समझना होगा। ॐकार से ही सृजन हुआ है, अतः ईश्वर हर जगह है। हमें अपने दिमाग को दत्तात्रेय जैसे ही, अपने आसपास के उन सभी से सीखने के लिए प्रशिक्षित करना है।

कभी-कभी कार्यकर्ता आसपास की स्थिति को देखकर निराशा का अनुभव करता है या दैनंदिन गतिविधि में यांत्रिक बन जाता है, या श्रद्धा की कमी के कारण रूचि खो देता है। ऐसा क्यों होता है? कहीं न कहीं व्यक्ति केवल दूसरों की कमियों और दुर्गुणों को देखता है और प्रत्येक वस्तु में गुरुता को देखने में विफल रहता है। या आत्मविश्वास की कमी से जूझता है, या ’मैं पृथ्वी पर और इस संगठन में क्यों हूँ’ यह प्रश्न महत्वहीन हो जाता है, या टीम के स्थान पर ’मैं’ बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। ऐसे समय में ॐकार से सीखना यानी हमारे चारों ओर की सब चीजों से सीखना, विभिन्न स्तरों पर हमारी टीमों में यह भाव जरूरी है। जैसा कि माननीय एकनाथजी ‘‘साधना आॅफ सर्विस’’ में कहते हैं, ‘‘हमें केवल बहरा और गूंगा बनकर हर बात पर आत्मसमर्पण नहीं करना चाहिए, बल्कि हमारे आस-पास की हर चीज के प्रति एक प्रबुद्ध दृष्टिकोण होना चाहिए। समीक्षकों की तरह अपने चारों ओर देखो और आप पाएंगे कि प्रतिक्षण और प्रकृति की महत्वहीन चीजों में भी आपके लिए एक सन्देश है, जो आपके लिए लाभकारी और प्रगति के लिए है। बस उन संदेशों को सुनने के लिए और उचित प्रकाश में उन्हें समझने और विमुक्त होने के लिए ग्रहणशील कान और एक चैकस मन होना चाहिए। हमारे चारों ओर सबकुछ के अर्थ को समझने की कोशिश करें। ये सब चीजें वहां क्यों हैं? उनमें क्या अर्थ निहित है और उनका उद्देश्य क्या है? मेरा जन्म क्यों हुआ? मुझे कन्याकुमारी (विवेकानन्द केन्द्र) क्यों लाया गया है? जब मैं अपनी शिक्षा प्राप्त कर रहा था तब तो मैंने कभी इसका सपना भी नहीं देखा।... अब जब यह निर्धारित किया गया है कि मुझे यहां होना चाहिए, तो मुझे अपने भविष्य को एक योग्य तरीके से आकार देना है। मेरा दृष्टिकोण सही होना चाहिए। कई बार मैंने देखा है कि लोग अपनी बस मिस कर देते हैं। यह अपने साथ नहीं होने दो। मैं यहाँ इस प्राचीन पवित्र भूमि में हूँ, न कि अमेरिका या जर्मनी में। क्यों?... हमें अपने आस-पास की दुनिया को सही तरीके से देखना है। अन्यथा सुस्त दिनचर्या के कारण जीवन नीरस और उबाऊ हो जाता है। उन सभी लोगों में यह असंबद्ध एकता है, जिनमें इस दृष्टिकोण की कमी हैं क्योंकि वे बाह्य प्रकृति को देखने और इसके अर्थ को समझने के कौशल से सुसज्जित नहीं हैं। हमारे आस-पास की दुनिया और घटनाओं में हमारे लिए निहित सन्देश को समझकर सही भावना से अनुकरण करनेवाला प्रत्येक व्यक्ति अच्छे समापन की ओर जाता है। ईश्वरीय प्रस्तावों पर अडिग रहना और उन्हें हल्के में न लेना ही एकमात्र तरीका है।’’

हमारे लिए गुरुपूर्णिमा का अर्थ है कि हम स्वयं को ईश्वरीय प्रस्तावों से जोड़ते हैं, ‘हमें भारत को विश्वगुरु बनाकर मानवता के लिए काम करने हेतु एक साथ लाया गया है’।

पिछले साल से, हम विषय ‘जल ही मूल है’ विषय पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि हम एकत्व-आत्मीयता जैसे उद्देश्यपूर्ण सिद्धांतों पर काम करते हुए, निरर्थक प्रयासों में समय बर्बाद न करें और स्वयं का विलय उस चमू में कर दें जिनके साथ हम काम करते हैं - ‘मैं’ नहीं ‘हम’। तभी हमारे टीमों का विस्तार होगा, अधिक कार्यकर्ता हमारे पास आएंगे। सभी स्तरों पर विस्तार और समावेशी चमुओं का निर्माण करने की आवश्यकता है। हम प्रत्येक के अच्छे गुणों की सराहना करना सीखते हैं और टीम के हित में स्वयं को विलय करने के लिए बड़ा दिल रखते हैं, ताकि हम टीमों का निर्माण कर सकें। गुरु-उपासना, हमारे लिए आध्यात्मिक साधना ही है।

इस वर्ष गुरुपूर्णिमा के उत्सव के लिए हम अपने सभी परिचितों - कार्यकर्ताओं, संरक्षकों, शुभचिंतकों, सभी योग सत्रों और अब तक किए गए सभी वर्गों के प्रतिभागियों, हमारी पत्रिकाओं के सदस्यों आदि को बुला सकते हैं। वे सभी गुरुपूर्णिमा उत्सव में शामिल हो सकते हैं, साथ ही साथ विवेकानन्द केन्द्र की गतिविधियों के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए ताकि वे देश के लिए अपना समय और ऊर्जा प्रदान कर सकें। कम से कम ‘राष्ट्र के लिए सप्ताह में एक घंटे’ देने के लिए और इस प्रकार उन्हें केन्द्र के वर्गों में सहभागी होने के लिए अपील की जा सकती है। जैसे-जैसे वे नियमित रूप से आते हैं, देश के लिए और अधिक समय देने के प्रति उनकी रुचि विकसित होगी।

गुरु पूर्णिमा का अवसर - ॐकार उपासना, सृष्टि में दिव्यता को देखने के लिए साधना शुरू करने का सही समय है, प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं की टीमों में ‘‘स्व’’ को विसर्जित कर उसके लिए कार्य करना।


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Monday, 4 June 2018

समरसता

मन एवं मनुष्याणां कारणं बन्ध मोक्षयोः अर्थात् बन्धन और मोक्ष का कारण मन है। यह श्रीमद्भगवद्गीता का वचन है। वहीं यह भी कहा गया है कि मन को वश में करना बड़ा कठिन है पर अभ्यास और वैराग्य से मन को जीता जा सकता है। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।

मन की तीन वृत्तियाँ हैं - इच्छा, ज्ञान और क्रिया। ये मिलकर एक रस हो जाए तब समरसता पैदा होती है। महाकवि जयशंकर प्रसाद ने कहा है - समरस थे जड़ और चेतन आनन्द अखण्ड घना था।

कामायनी में उनका आनन्द दर्शन विशद् रूप में प्रकट हुआ है। उसमें इच्छा, ज्ञान और क्रिया - मन की तीनों वृत्तियाँ मिलकर एक हो जाती हैं। ये समरस न हों तब तक आनन्द की सृष्टि नहीं हो सकती। तीनों वृत्तियाँ समरस हो जावें, तब मन विज्ञानमय कोश में आत्मसात् हो जाता है। विवेक का उदय होता है। आनन्दमय कोष में अखण्ड आनन्द की अनुभूति होती है।

सुख-दुःख की परिभाषा की गई - अनुकूलवेदनीयं सुखम्; प्रतिकूल वेदनीयं दुःखम्।
 
शरीर प्रकृति से बना है। उसमें समता-समानता नहीं होती। हाथ की पाँच अँगुलियाँ तक समान नहीं होतीं। चार अँगुलियाँ और अँगूठे में समरसता होती है।

परिवार के सब लोग एक-दूसरे के पूरक बनकर, परस्पर मदद करते हैं। मदद ही नहीं करते एक-दूसरे की उन्नति में सहायक भी होते हैं। वेद का वचन है - उद्-यानम् ते नावद्रव मानम् अर्थात् हे मनुष्य तुम्हारे लिए केवल ऊपर जाने का मार्ग है, उन्नति का मार्ग है न कि अद्योगति का।

परिवार का बड़ा रूप समाज होता है। जिसमें लोग साथ-साथ गति करें उसे समाज कहा जाता है - समं अजन्ते इति समाजः। मनु ने कहा है कि यह मेरा है, वह तेरा है - यह छोटी बुद्धिवाले सोचते हैं। उदारचरित व्यक्तियों के लिए तो वसुधा ही कुटुम्ब के समान है।
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।   (मनुस्मृति)

संसार भर के मनुष्य, एक ही मनुष्य जाति के हैं जिनका धर्म मानवता है। एक शब्द और है - जाति जिसे बोलचाल में न्यात कहा जाता है। जाति वह जिससे व्यक्ति की पहचान होती है। सोने का काम करे वह स्वर्णकार, चमड़े का काम करे वह चर्मकार, लोहे का काम करे वह लौहकार, लकड़ी का काम करे वह वर्द्धकि, कपड़े धोने का काम करे वह धोबी, घड़ा बनाए वह कुम्भकार (कुम्हार)। समाज के ये सभी लोग समरसतापूर्वक एक दूसरे की आवष्यकता की पूर्ति करते हैं। यह परिवार से बड़ा संगठन है।

भारत कृषिजीवी लोगों का देश है। कृषि सामूहिक श्रम का क्षेत्र है। इसमें अनेक मानवीय सम्बन्धों का विकास होता है और उन सम्बन्धों की पवित्रता की रक्षा भी की जाती है। यह सामाजिक समरसता का प्रमाण है। जाति और जाति का अन्तर न समझने के कारण हमारे प्रगतिशील लोग जाति-पाँति तोड़ने के लिए कटिबद्ध होकर बैठे हैं। भारत के सामाजिक ढाँचे को न समझने के कारण ऐसा होता है। जाति को गाली देने का अर्थ है - जन्मदात्री माता को गाली देना। जाति को तोड़ने का अर्थ है - सामाजिक समरसता को तोड़-मरोड़ कर नष्ट करना। दोनों ही अपराध हैं।

वेद का वचन है - कृषिमित् कृशस्व मादीन्यत् अर्थात् खेती ही करो जीवन को जुआँ मत बनाओ। लोक में भी प्रसिद्ध है - उत्तम खेती, मध्यम वणिज, अधम चाकरी। आज भारतीय समरसता की जीवन पद्धति को भूल जाने के कारण लोग नौकरियों के लिए गलकांट होड़ लगा रहे हैं। राजनीतिक दल नौकरियाँ बाँटने के नाम पर उनको बहका रहे हैं। वे आसानी से बहकावे में आ जाते हैं। भारत को सुनागरिकों का देश बनाना है अथवा नौकरों का देश बनाना है - इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। मानवीय श्रम का सौदा बन्द होना चाहिए।


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