Saturday, 4 November 2017

साधक, साधना और साधना मन्दिर

Kendra Bharati : November 2017
भारत धर्म प्राण और आध्यात्मनिष्ठ देश है। यहाँ केवल श्वास लेने निकालने को जीवन नहीं माना जाता। भारत ने मानव जाति को परिवार नामक संस्था दी है। परिवार संसार का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय है, सबसे बड़ा चिकित्सालय है, सबसे बड़ा प्रशिक्षणालय है और सबसे बड़ा साधना केन्द्र भी है। परिवार में सभी सदस्यों को अपनी ओर से दोष निवारण करने का अवसर मिलता है। परितः वारयति स्वदोषान् यस्मिन् इति।
 
परिवार में साधनामय जीवन जीने का खुला अवसर होता है। परिवार एक अनुशासित संस्था होती है। इसमें अपने-पराये का भेद मिट जाता है। उदार चरितता का विकास होता है और वसुधा को कुटुम्ब मानने का शुद्ध आधार बनता है -
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् ।
उदार चरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ।।
-मनुस्मृति

वेद के अनुसार प्रत्येक जन्म लेने वाला ऋण स्वरूप होता है - ऋणं ह वै जायमानः। मानवी माता से पैदा होने वाला ऋण मानव होता है। ब्राह्मणी माता से ऋण ब्राह्मण] क्षत्रिया माता से ऋण क्षत्रिय] वैष्य माता से ऋण वैष्य और षूद्र माता से पैदा होने वाला ऋण शूद्र पैदा होता है।


इनमें से प्रत्येक को ऋण से धन बनना होता है। ऋण से धन बनने की प्रक्रिया मानव जीवन की सबसे बड़ी साधना होती है। जो ऋण से धन बनने की साधना करे उसको धन्य कहा जाता है।


मनुश्य सदा मनुश्य नहीं होता। मनुष्य बन जाने पर भी उसे पद पद पर मनुष्य होने का प्रमाण देना पड़ता है। यदि किसी ऐतिहासिक मोड़ पर] जहाँ उसे मनुष्योचित आचरण करना चाहिए] वैसा आचरण नहीं करता तो उसकी मानवी साधना अधूरी कही जायगी।


सामान्य बोलचाल में भी कहा जाता है - सिधि चाल्या साहब ! (सिद्धि के लिए जा रहे हो श्रीमन् !) वेद में कहा गया है –


मधुमन्मे आक्रमणं मधुमन्मे निक्रमणम् ।


अर्थात् मेरा घर से निकलना और घर में आना मधुमय हो। ऐसा साधना से ही संभव हो सकता है। साधना से सिद्धि मिलती है।


साधना के लिए साधन आवश्यक होते हैं( पर साधन बाहरी साधन हैं। साधना में सिद्धि पाने के लिए साध (उत्कट चाह) होना आवश्यक है। वह साध ही लक्ष्य सिद्धि करने वाला संकल्प बन जाता है। उसी को सिद्ध करके मनुष्य अपने मनुष्य होने का प्रमाण देता है।

परिवार घर होता है। वह साधना मन्दिर भी होता है। उसे वटवृक्ष की तरह माना गया है। उसमें सबको प्रवेश करने का अधिकार होता है। उसी में साधना करके मनुष्य पूर्ण मनुष्य बनता है।

Saturday, 7 October 2017

भगिनी के समर्पित जीवन को नमन

Kendra Bharati : October 2017
ग्वालियर में भगिनी निवेदिता की आदम मूर्ति लगी है] जिस पर वाक्य लिखा है - "निवेददितात्मा विचिकीर्शतोऽहम्" अर्थात् मैं निवेदित (समर्पित) आत्मा कुछ करने की चाह रखता हूँ। निवेदिता का जन्म आयरलैंड में हुआ। मूल नाम मार्गरेट था। स्वामी विवेकानन्द के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उन्होंने भारत में आकर पूरी तरह से समर्पित भाव से मानवता की सेवा का व्रत ले लिया।

भारत अंग्रेजों के अधीन था। भारतीय उनके अत्याचारों से संत्रस्त थे। अंग्रेजों ने भारत को बुरी तरह से लूटा। इससे सामान्य व्यक्ति दीन-हीन का जीवन जीने लगे। निराशा ने उनको बुरी तरह से तोड़ दिया। स्वामी विवेकानन्द ने भारतीयों की इस स्थिति को देखा और सभी लोगों से दीन-हीन भारतीयों की सेवा करने की अपील की।

विवेकानन्द मानते थे कि हिन्दू जीवन पद्धति सारे संसार को श्रेष्ठ जीवन जीने की प्रेरणा देने में सक्षम है। इसलिए उसकी रक्षा होनी चाहिए। भारत आध्यात्मिक देश है। आध्यात्मिक जीवन मूल्यों के आधार पर श्रेष्ठ अध्यात्मनिष्ठ व्यक्तियों का निर्माण करके भारत को विश्व के लिए प्रेरणा का विषय बनाया जा सकता है।

भारत अपनी चारित्रिक दीप्ति से विश्वगुरु था और अब भी वह वैभवशाली बनकर विश्व का नेतृत्व कर सकेगा। विवेकानन्द के अनुसार] भारत के गाँवों में ही श्रेष्ठ मानव का निर्माण हो सकता है। इसलिए उन्होंने निवेदिता को प्रेरित किया कि वह ग्रामीण भारत की सेवा करे। निवेदिता ने वैसा ही किया। हिन्दू जीवन पद्धति को समझा। उसके अनुसार जीवन जिया और अन्यों को भी प्रेरित किया।

उन्होंने हिन्दू विद्यालय की स्थापना की और लोगों को शिक्षित किया कि वे स्वयं को हिन्दू कह कर गर्व अनुभव करें। स्वयं को हताश अनुभव न करें। महामारी-बीमारी में निवेदिता ने जन-जन की बड़े अपनत्व के साथ सेवा की। उनकी हिन्दुत्व की इस मान्यता ने महामना पंडति मदनमोहन मालवीय को भी प्रभावित किया। उन्होंने 23 मार्च] 1893 को हिन्दू धर्म में दीक्षा ग्रहण की और मारग्रेट एलिजाबेथ] निवेदिता बन गई।

उनके व्याख्यान के विषय होते थे - भारतीय जीवन मूल्य और जीवन जीने की हिन्दू पद्धति। इन सबके लिए विवेकानन्द ही उनके लिए आदर्श और व्याख्याता थे। ^द मास्टर एज आई सा हिम* उनकी पुस्तक बड़े परिश्रम से लिखी गई पुस्तक है। इससे स्वामी विवेकानन्द को समझने की दृष्टि भी मिलती है। निवेदिता को भारतीयता में ढालने में विवेकानन्द के अतिरिक्त माता शारदा का भी हाथ है।

विदेशी घुसपैठिये के रूप में अंग्रेजों ने भारतीयों के जीवन में हताशा और अकर्मण्यता भर दी थी। भगिनी निवेदिता ने उसको समाप्त करके साफ-सुथरी स्वस्थ जीवन दृष्टि उजागर की। हम सब भारतीय कृतज्ञता के भाव से भगिनी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए यह कहने में कतई संकोच अनुभव नहीं करेंगे कि हमारे लिए वह श्रेष्ठ शिक्षिका थीं] जो सोचती उसे करके दिखाती थी।

'आत्मानं विद्धि' भारतीय विचार परम्परा का - सनातन विचार परम्परा का आधार सूत्र है। विदेशी शरीर में भारतीय आत्मा को हमने, उनमें प्रत्यक्ष देखा है। उन्होंने जो सोचा उसे लिखा भी है वह बहुत है। अंग्रेजी में है। सार्ध शताब्दी मानते हुए हम उसे हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में उपलब्ध करा सकें तो यह बड़ी उपलब्धि होगी। निवेदिता की देन और प्रशस्त होगी।

Sunday, 3 September 2017

विवेक दैनंदिनी २०१८

विवेकानन्द केन्द्र हिन्दी प्रकाशन विभाग द्वारा वर्ष 2018 की हिन्दी डायरी के प्रकाशन की तैयारी हो गयी हैं |


प्रकाशन विभाग द्वारा यह प्रस्तावित हैं कि कोई सज्जन अपने जन्मदिवस/शादी की सालगिरह/पूर्वजों की पुण्य तिथि आदि के स्मरण हेतु डायरी में उस तारीख के पृष्ठ का प्रायोजन कर सकता हैं| प्रति पृष्ठ दान की राशि 500/-अभीष्ट हैं | राशि एवं आवश्यक विवरण भेजने से पूर्व सम्बंधित तिथि के लिए पृष्ठ की उपलभ्ता सुनिश्चित कर , अपना पृष्ठ प्रायोजन एवं डायरी की प्रति हेतु अमुल्य सहयोग दिनांक 20/09/2017 तक प्रदान करे |


संपर्क : vkhpv [@] vkendra.org
दूरभाष : 0291-2612666
http://kb.vkendra.org

Monday, 7 August 2017

राष्ट्र का रक्षा कवच

वेद का वचन है - पुमान् पुमांसं परिपातु विश्वतः। मनुष्य मनुष्य की रक्षा करे सब ओर से। मनुष्य कैसे करे मनुष्य की रक्षा ? मनुष्य का धर्म मनुष्यता है - मानवता है। उस धर्म का पालन करने से मनुष्य के साथ ही सभी प्राणियों की रक्षा होगी। पुरानी परम्परागत मान्यता है - धर्मो रक्षति रक्षतिः। धर्म की रक्षा करने से वह सबकी रक्षा करता है। 

लोक में रक्षाबन्धन का त्यौहार प्रचलित है। उसमें सामान्यतः बहिनें भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बाँधती हैं। सर्वप्रथम शची पौलोगी ने अपने पति और देवों की रक्षा के लिए रक्षा सूत्र बाँधा था। प्रेरणा थी देव-गुरु बृहस्पति की। कुलगुरु यजमान के राखी बाँधता है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर शान्ति निकेतन में सभी छात्रों की कलाई में राखी बाँधते थे।

रक्षासूत्र रक्षणीय पदार्थ - राष्ट्र, वेद, धर्म, संस्कृति और भाषा की रक्षा के लिए बाँधा जाता है। श्रावणी पूर्णिमा को ऋग्वेदीय परम्परा की, हरतालिका को सामवेदीय परम्परा की, ऋषि पंचमी को यजुर्वेदीय परम्परा की और विजयादशमी को अथर्व वेदीय परम्परा की राखी होती है। वस्तुतः इन दिनों से वेदारम्भ या विद्यारंभ संस्कार होते थे।

वेदारम्भ संस्कार करते समय आचार्य प्रवेशार्थी छात्रों को रक्षा सूत्र बाँधकर उनको राष्ट्र, वेद, धर्म, संस्कृति और भाषा की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध करते थे। चारों वेदों के आचार्यों के शिक्षा सत्र इन दिनों शुरू होते थे। वैसे हर धार्मिक कार्य को करने के लिए कलाई पर व्रत धारण करने की ‘वर्णी’ बाँधी जाती है। वह भी रक्षासूत्र ही है।

1965 में युद्ध के लिए भारतीय सेना की तीन बटालियनों सीमा पर युद्ध के लिए जा रही थी उस समय राजकीय महाविद्यालय, किशनगढ़ के छात्र-छात्राओं ने रेलवे-स्टेशन पर पहुँच कर सबको राखी बाँधी और उनको फल-मिठाई खिलाई। अद्भुत दृश्य था वह ! फल-मिठाई का भुगतान संकाय सदस्यों ने किया। युद्ध प्रयाण का परम्परागत क्षण जीवित हुआ।

1971 के भारत-पाक युद्ध में पाकिस्तान के जनरल नियाजी ने 93 हजार सैनिकों के साथ आत्मसमर्पण किया। बांग्लादेश बन गया पूर्वी पाकिस्तान। कारगिल युद्ध में भी पाकिस्तान ने मुँह की खाई। यदि अब पाकिस्तान ने दुस्साहस किया तो उसके टुकड़े-टुकड़े हो जाएँगे।

भारत के पास रक्षा कवच के रूप में परिवार है। संसार का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय, चिकित्सालय, प्रशिक्षणालय और साधना केन्द्र है परिवार। उसमें प्रत्येक सदस्य को अपने दोष दूर भगाने का अवसर मिलता है। परितः वारयति स्वदोशान् यस्मिन् इति। वह किले की तरह होता है जिसका निर्माण कुलवधू करती है - जायेदस्तम् - जाया ही घर है - गृहिणी गृहम् उच्यते। चारित्रिक दृढ़ता सम्पन्न उस किले में सभी की रक्षा होती है। पारिवारिक एकता ही उसे रक्षा-सामथ्र्य प्रदान करता है।

Tuesday, 4 July 2017

प्रेरणा : शाश्वत साधना

प्रेरणा उसे मिलती है जो प्रेरणा लेना चाहे। प्रेरणा पुरुष कोई भी हो सकता है - देवता, शासक, आचारवान् कोई भी पुरुष । परम्परा कहती है - वेदात् सर्वं प्रसिद्धयति। ज्ञान विज्ञान के विस्तार का मूल वेद है। हमारे सभी ऐतिहासिक प्रेरणा पुरुषों ने भी वेद से ही प्रेरणा ली है। 

प्रेरणा के लिए प्रवचन की आवश्यकता नहीं होती। सचिवार, आचार और साचार-विचार की आवश्यकता होती है। एक बच्चा गुड़ बहुत खाता था। उसकी माता उसे लेकर ठाकुर (रामकृष्ण परमहंस) के पास गई और उनसे निवेदन किया कि बालक को गुड़ न खाने का आदेश दें। ठाकुर ने महिला को एक मास बाद आने को कहा। 

महिला एक मास बाद फिर गई। ठाकुर ने बच्चे को समझाया। वह गुड़ न खाने के लिए मान गया। महिला ने ठाकुर से पूछा - आपने इतने दिन बाद उसे गुड़ न खाने का आदेश क्यों दिया। पहले भी समझा सकते थे। ठाकुर ने कहा - पहले मैं भी गुड़ खाता था। गुड़ छोड़ कर देखा तभी तो मैं आशीवार्द देने का अधिकारी बना। 

दत्तात्रेय ने 24 गुरु बनाएं। उनसे प्रेरणा ली। प्रेरणा लेने की सहज कामना ने ही उनको यह रास्ता सुझाया। गीता में कहा गया है -
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गविहस्तिनि । 
शुनि चैव श्वयाके च पण्डिताः समदर्शिनः ।। 

समदर्शी का अर्थ यह भी होता है कि उनसे सभी से प्रेरणा लेकर जीवन को सँवारा जा सकता है। वेद ने कहा - ‘मित्रस्य चक्षुषा सर्वाणि समीक्षामहे’। मित्र की दृष्टि से हम सभी को देखें। तप का मार्ग अपनाने के लिए वेद का अतप्रतनूर न तदामो अश्नुते। न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः अर्थात् श्रम करके थके बिना देवता सुखी नहीं बनते। जैसी श्रद्धा वैसा व्यक्तित्व। 

इन्द्र इच्चरतः सखा: देवराज इन्द्र उन्हीं का सखा होता है जो साचार-विचार और सविचार आचार का मार्ग अपनाता है। केवलाद्यो भवति केवलादी अर्थात् अकेला खाने वाला केवल पाप खाता है। धर्म की कमाई को सौ व्यक्तियों के साथ मिलकर खाएँ। उद्यानं ते नावयानम् अर्थात् उन्नति करना ही धर्म है। 

स्वामी विवेकानन्द ने रामकृष्ण परमहंस से प्रेरणा लेकर संसार में भारतीय जीवन दृष्टि का तहलका मचा दिया। स्वाध्याय को मनु ने परम ज्योति कहा है। स्वाध्याय से प्रेरणा मिलती है। मनु के अनुसार स्वाध्याय करके ऋषियों की अर्चना करें। भारत त्यागभूमि है। अथर्ववेद की उक्ति है - सौ हाथ वाला होकर अर्जित कर और हजार हाथ वाला होकर उसे बाँट दे। पर, प्रेरणा लेने की उत्कट चाह हो तभी प्रेरणा ली जा सकती है। 

स्वामी दयानन्द ने तो राजदरबार की गायिका से भी प्रेरणा ली। देश की पराधीन, भूखी जनता से भी प्रेरणा ली। भूख और पराधीनता से संग्राम छेड़ दिया। प्रेरणा पुरुषों की संसार में कमी नहीं है। रूसो और वाल्टेयर के लेखों ने फ्रांस में क्रान्ति कर दी। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने वेद की दृष्टि का विश्व में डंका बजा दिया। जो प्रेरणा लेगा वह प्रेरणा दे भी सकेगा।

Monday, 5 June 2017

योगः वेदात् प्रसिद्धयति

"सर्वं योगात् प्रसिद्धयति" की उक्ति प्रसिद्ध है। उसके आधार पर यह कहने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि ^योगं वेदात् प्रसिद्धयति* अर्थात् वेद से योग प्रमाणित होता है। योग का सामान्य अर्थ है - जोड़।

गणितीय प्रक्रिया के चार अंग है – जोड़] बाकी] गुणा और भाग। विद्यार्थी जीवन में बालक अधिकाधिक संचय करता है। गृहस्थ आश्रम में जो जोड़ा उसको बाकी किया। ^त्यक्तेन भुंजीथाः* त्यागकर के भोग करे। वानप्रस्थ आश्रम में गुणन की प्रक्रिया होती है। गुण सम्पदा बढ़ाई जाती है। संन्यास आश्रम में व्यक्ति अपनी अच्छाइयों का लाभ सबको देने लगता है।

योग का प्रथम पाठ जीवेम है। उगते हुए सूर्य को देखकर कहा जाता है - तच्चक्षुः देवहितं पुरस्तात् शqकृमुच्चरत्। पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतं शृणुयाम शरदः शतात्। 

मंत्र में पश्येम शरदः शतम् का प्रयोग पहले हैं - जीवमे शरदः शतम् उसके पश्चात्। यदि जीवन जीने की कोई दृष्टि है तो जियो अन्यथा नहीं। जीवन जीने की दृष्टि ही योग है। भारतीय जीवन पद्धति है - योगमयी - यज्ञमयी। अन्य भोग भूमियों की दृष्टि भोगमयी होती है।

जीना है तो पद-पद पर विजय लाभ करते हुए जीना है। वेद की शब्दावली में कहा गया है - वयं जयेम त्वायुजम्। हम पद-पद पर विजय-लाभ करें ईश्वर से युक्त होकर। ईश्वर - सायुज्य प्राप्त करने से विजय होती है। महर्षि पतंजलि ने योग के यम-नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान समाधि इन अष्ट सोपानों के माध्यम से चित्तवृत्ति का निरोध करने का मार्ग प्रदर्शित किया है क्योंकि चित्तवृत्ति का निरोध ही  योग है - योगिÜचत्तवृत्ति निरोधः। वे भी मानते हैं कि ईश्वर प्रणिधान से आसानी से चित्तवृत्ति का निरोध हो जाता है।
विजय प्राप्त करना है तो यजन करना पड़ेगा। सर्वश्रेष्ठ कर्म को यज्ञ कहा जाता है। इसका यह अर्थ नहीं है कि कुछ काम श्रेष्ठ होते हैं और कुछ साधारण। किसी भी कार्य को संकल्पित होकर सर्व श्रेष्ठ बनाया जा सकता है। गीता में इसीलिए कर्म कौशल को योग कहा गया है - योगः कर्मसु कौशलम्।
यज्ञ फलदायिनी क्रिया है। उसका फल यजमान को ही नहीं मिलता - सबको मिलता है। इसलिए याज्ञवल्क्य ने कहा है कि अयं तु परमो धर्मः यदयोजेन आत्म दर्शनम्। सभी प्राणियों में आत्म दर्शन करना परम धर्म है। सब अपने हैं। इसलिए यज्ञ से जो मिला उसको सब में बराबर बाँट दिया जाए। यही भक्ति है। इस तरह जीवेम] जयेम] यजेम और भजेम से हमारा जीवन बनता हैं। इनका योग ही सच्चा योग है।

Thursday, 4 May 2017

अहिंसा - आत्मप्रकाशन की चाह

अहिंसा - आत्मप्रकाशन की चाह
अहिंसा का सामान्य अर्थ अहिं-सा = आत्म प्रकाशन की चाह है। यह अह् धातु से बना हुआ शब्द है, जिससे 'अहन्' शब्द भी बनता है - दिवसवाची। यह सकारात्मक शब्द है नकारात्मक नहीं। लोगों ने अहिंसा को अ-हिंसा समझ कर नकारात्मक बना दिया है।

वेद का असुर शब्द परमात्मा वाची था - वरुणो नाय असुरो महत्। असून् प्राणान् प्रदाति इति असुरः। इस को भ्रमवश अ-सुर = जो सुर नहीं है वह असुर समझ लिया गया। असुर महत् - अहुर मज्दा के उपासकों ने विरोध किया। प्रतिक्रिया स्वरूप पारसियों ने देव का अर्थापकर्ष कर दिया। असुर पूजकों और देवपूजकों में संग्राम छिड़ गया। कई देवासुर संग्राम हुए।


उदयाचल से अस्ताचल तक भारत राष्ट्र का विस्तार था। उदयाचल प्रशान्त महासागर के किनारे है और अस्ताचल भूमध्य सागर-कृष्णसागर] मृतसागर के संयुक्त रूप के सिनाई प्रायद्वीप का टेरेसाँ (स्थानीय नाम) है। यह विशाल भारतवर्ष विभाजित हो गया। सिन्धु नदी सीमा बन गई। इसका नाम हो गया - दारदी सिन्धु। इसके आस-पास का क्षेत्र दरद प्रदेश हो गया। भारत का बँटवारा हुआ तब वसिष्ठ और ऐसे ही कई ज्ञानी पुरुष दरद प्रदेश - काशगर में रहने लगे थे। वे देश के बँटवारे से बहुत दुःखी थे। 


अहिंसा के साथ असुर जैसी ही गलती नहीं की जानी है। जैन ग्रन्थ भगवती आराधरा (7-80) की उक्ति है -


सव्वेसिं वदगुणापां हिदयं गब्यो व सव्वसत्थाणं ।
सव्वेसिं वदगुणापां पिण्डो सारो अहिंसा दु ।।

अर्थात् अहिंसा सब आश्रमों का हृदय है। सारे शास्त्रों का गर्भ है। सारे व्रत और गुणों का पिण्डीभूत सार है।


तह जाण अहिंसा ए विणा ण सीलाणि ठंति सव्वाणि ।
तिस्सेव रक्खटूं सीलाणि वदीव सस्सस्स ।।(भ.आ. 789)


यह ज्ञातव्य है कि अहिंसा के बिना सारे ही षील ठहर नहीं सकते। इसलिए उसी की रक्षा के लिए षील है जैसे अनाज की रक्षा के लिए बाड़ होती है।

आत्मप्रकाशन का कार्य श्रेष्ठ कार्य के रूप में होता है जिसे यज्ञ कहा जाता है –
 

यज्ञो वै श्रेष्ठतयं कर्म (तैत्तिरीय ब्राह्मण)

जैन उत्तराध्य सूत्र में कहा गया है -


तवो जोइ जीवो जोइठाणं] जोगा सुया सरीरं कारिसंग।
कम्पेहा संजयजोग सन्ती] होमं हुगामि इसिणं पसत्थं।।


अर्थात् तप आग है] जीव ज्योति स्थान - उस आग के ठहरने की वस्तु। योग (मन, वचन और काया का) सु्रवा- कुड़छी है। शरीर सूखा हुआ गोबर है। कर्म इंधन है। संयम की प्रवृत्ति शान्ति पाठ है। ऐसे ही होम से मैं हवन करता हूँ। ऋषियों के लिए यही होम प्रशस्त है। 


यज्ञ को अ-ध्वर = हिंसा रहित कर्म कहा जाता है। उसमें हिंसा न हो इसके लिए अध्वर्यु की नियुक्ति की जाती है - अध्वरं युनक्ति इति। कर्मकाण्ड के वेद यजुर्वेद का जानकार अधिकारी अध्वर्यु होता है। अग्निहोत्र में 'उद् बुध्यस्व अग्ने ! प्रतिजागृहि' कह कर आत्माग्नि को ही उद्दीप्त किया जाता है। आत्मप्रकाशन की चाह या संकल्प को करने के लिए ही अग्निहोत्र किया जाता है। 


भगवान् बुद्ध भी अहिंसा के उपासक हैं - उनको करुणावतार कहा जाता है। करुणा, दया, तप, सहानुभूति, सहनशीलता, सहयोग आदि गुण अहिंसा के ही रूप हैं। इनके माध्यम से आत्म तत्त्व का ही प्रकाशन करने की इच्छा होती है। भौतिक अग्नि में आहुति देना तो नाटक मात्र है। 


जब यजमान यज्ञ के लिए संनबद्ध होते हैं तो कहते हैं - इयं वेदिः। इयं भुवनस्य नामिः। वेदिका के ऊपर अग्निहोत्र] यज्ञादि किए जाते हैं। होलिका महोत्सव वपर नवसस्येष्टि की जाती है। हमारा चार्वाक दर्शन उपहास योग्य समझा जाता है। उसको मानने वाले कहते हैं - ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत् - ऋण करके] घी पीने की बात की गई। मद्य पीने की चाह प्रकट नहीं की गई। मांस भक्षण की ओर भी संकेत नहीं किया गया।


यज्ञ करते समय वैदिक राष्ट्रगान भी किया जाता है -


आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसीजायताम्। आ राष्ट्रs राजव्यः शूर इषव्योऽति व्याधी महारथो जायताम्। दोग्घ्री धेनुर्वोढानड्वान् आशु: सप्तिः पुरन्धिर्योषा जिष्णू रथेष्ठाः सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायताम्। निकाये निकाये नः पर्जन्यो वर्षतु फलवल्यो न भोषधयः पच्यन्तां योगक्षेमो नः कल्पताम्। (यजुर्वेद 22/22)


इसमें कहीं भी जानवरों की हिंसा करने का कोई संकेत नहीं है।


महाभारतकार वेद व्यास ने कहा था -


अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् ।
परोपकायः पुण्याय पापाय परपीडनम् ।।


वे मानते थे कि मनुष्य से बढ़कर संसार में कोई नहीं है - न हि मानुषात् श्रेष्ठ तरं हि किंचत्। इसलिए उन्होंने कहा - 


श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम् ।
आत्मनः प्रतिकूलानि परेशां न समाचरेत् ।।


याज्ञवल्क्य का कथन है -


अयं तु परमो धर्मः यद्योगेनात्म दर्शनम् । (याज्ञवल्क्य स्मृति)


जब सब प्राणियों में, कण-कण में आत्म दर्शन करना है] तो किसी की प्राण हानि कैसे की जायेगी?  योगपूर्वक आत्मदर्शन करना भी आत्मप्रकाशन की चाह का ही संकेतक है - आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यतिस पंडितः।

Friday, 14 April 2017

रामायण अंक : राम सब के

रामायण और महाभारत इतिहास है। इतिहास और पुराण से वेद का उपग्रहण किया जाता है। दोनों कृतियाँ परिवार संगठन और परिवार-विघटन की कहानियाँ हैं।
वेद मानवता का संविधान है। वह मनुष्य को मनुष्य बनाता है। मनुष्य में मनुष्य होने का विचार और विश्वास जगाता है। वेद का मंत्र है -
वेदाहमेतं पुरुषं पुराणंयादित्यवर्णं तमसः परस्तात्।
सूर्य को देखकर आह्लादित मन की भावना व्यक्त हुई है इस मंत्र में। इससे दो प्रकार के विचार पैदा होते हैं; पहला - अहं सूर्य इव अजनि - मैं सूर्य की तरह पैदा होऊँ और दूसरा, क्या ऐसा सूर्य जैसे प्रखर व्यक्तित्व का धनी पुरु संसार में है ?
इस दूसरे प्रश्नात्मक विचार का उत्तर महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण महाकाव्य है। वाल्मीकि के मन में प्रश्न जागा - प्रश्न ब्रह्म उत्पन्न हुआ। समाधान किया नारद ने - पृथ्वी पर सूर्य वं में दरथ पुत्र राम साक्षात् सूर्य की तरह है - अंधकार से ऊपर।
इस बीच तमसा नदी के किनारे क्रौंचवध की घटना हो गई और वाल्मीकि के मुख से श्लोक का अवतरण हुआ -
मा निषाद ! प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः। यत्क्रौंचमिथुनादेक मवधीः कामोहितम्।।
यह शापयुक्त वाणी हृदय की गहरी संवेदना से प्रकट हुई थी। यह प्रथम लौकिक कविता थी। ब्रह्मा ने आदे दिया कि तुम्हारे मुँह से जो सरस्वती प्रकट हुई है उसका सहारा लेकर रामकथा का गान करो। यों रामायण की रचना का विधान हुआ।
वाल्मीकि ने ऐसे व्यक्ति के विय में पूछा था - जिसमें 11 गुण हों। नारद ने दारथि राम का परिचय दिया, जिनमें 33 गुण थे। उस गुण सागर के चरित का गान रामायण में किया गया।
रथ की रानी कौसल्या ने राम को जन्म दिया और कैकेयी ने भरत को। सुमित्रा के दो पुत्र लक्ष्मण और त्रुघ्न।
राम के विय में राष्ट्रकवि मैथिलीरण गुप्त ने लिखा-
राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है, कोई कवि बन जाय सहज संभाव्य है ।
आधुनिक चिन्तन में जब राम मनुष्य बन गए तो उन्होंने यह भी कहा -
राम तुम मानव हो, ईश्वर नहीं हो क्या ?
तन मन में रमे हुए सब कहीं नहीं हो क्या ?
तो मैं निरीश्वर हूँ ईश्वर क्षमा करे
तुम न रमो तो मन तुम में रमा करे ।
राम रमते - रमण करने वाले न भी हो - कण कण में व्याप्त न भी हों तो कोई अन्तर नहीं आता। कवि का मन राम में रमना चाहता है - रम्यते असौर।
वाल्मीकि की रामायण सामने है जिसमें राम की सत्ता पुराण पुरु की है जो अन्धकार से परे है - सब दोशों से मुक्त है। तुलसी के रामचरितमानस में राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं और मैथिलीरण गुप्त के साकेत में वे रम्य पुरु है, जिनको आराध्य मानकर कवि मन उन उनमें रमता है।
राम के भ्राता भरत के लिए तुलसी ने कहा -
विश्व भरण पोण कर जोई। ता कर नाम भरत अस होई ।
लक्ष्मण को लक्षण धाम माना गया। त्रुघ्न त्रु संहारकारी थे। अयोध्या में दरथ के भवन में चारों भाई बड़े हुए। विद्या प्राप्त करके योग्य बने। मिथिला नरे की पोषिता पुत्री सीता के साथ राम का और उनके भ्राता की कन्या उर्मिला के साथ लक्ष्मण का पाणिग्रहण संस्कार हुआ। भरत और त्रुघ्न का विवाह भी उनकी बहिनों के साथ ही हुआ। माण्डवी से भरत का श्रुतकीर्ति से त्रुघ्न का।
राम का राजतिलक हो रहा था कि कैकेयी ने दो वरदान दरथ से माँग लिए - भरत का राज्याभिषेक हो और राम चौदह वर्ष तक वन में वास करें। राम के साथ सीता और लक्ष्मण भी वन को गए। सुमित्रा ने लक्ष्मण को यह कह कर विदा किया -
रामं दरथं विद्धि माम् विद्धि जनकात्यनाम । अयोध्यामस्वीं विद्धि गच्छ पुत्र यथा सुखम् ।।
राम वन को चले गए। दरथ का देहान्त हो गया। राम ने दक्षिण भारत में निशाचरों का वध किया। रावण ने सीता का अपहरण कर लिया तो राम ने लंका पर आक्रमण करके रावण का वध कर दिया। उसका भाई कुम्भकरण और पुत्र मेघनाद भी मारे गए। राम ने विभीण को लंका राज्य सौंप दिया। वे अयोध्या लौट आये। उनका कहना था -
अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते। जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।
वन में राम ने अपने शील और सौन्दर्य से सुग्रीवादि वनवासियों को अपना बना कर रावण के विरुद्ध अजेय बना कर खड़ा कर दिया। यह राम के पराक्रम की कहानी है। राम का राज्याभिषेक अयोध्या में हुआ तब अयोध्या, अयोध्या बनी।
वेद के अनुसार अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्याहै। उसमें आत्मा राम विराजते हैं। ऐसे ही राम के अभिशेक से अयोध्या पुरी का नाम सार्थक हुआ।
रामकथा ने भारतीय समाज के लिए अनेक आदर्श दिए। माता, पिता और पुत्र, भाई-भाई, स्वामी और सेवक, पति और पत्नी और श्रेष्ठ मानव व्यवहार को रामायण में देखा जा सकता है। मानवीय सम्बन्धों की पवित्रता का आदर्ष रूप  राम कथा में देखा जा सकता है। राम लक्ष्मण के साथ हनुमान् का सम्बन्ध भी आदर्श है।
पुरुषार्थ के प्रतीक राम थे और सीता तुलसी के ब्दों में -
उद्भवस्थितिसंहार कारिणीं क्लेहारिणीम्।
सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं राम वल्लभाम्।।
वन गमन के समय वह राम को आश्वस्त करती है -
अग्रतस्ते गमिष्यामि मद्नन्ती कुकण्टकान्।
सीता के श्रेष्ठ व्यक्तित्व का चित्रण होने के कारण वाल्मीकि ने रामायण को सीताचरितनाम दिया है। सीता के विय में पोक पिता जनक ने कहा - यदि पवित्रता की परिभाषा करना हो तो सी और ता कह दीजिए। कौसल्या ने सीता का परिचय दिया -
सीता - रघुकुलमहत्तराणां तु वधू अस्माकम् सुता एव।

Wednesday, 8 March 2017

धर्म अंक : दिशाबोध - ‘मैं’ नहीं ‘हम’

धर्म अंक : दिशाबोध  - ‘मैं’ नहीं ‘हम’
राष्ट्र के रूप में हमारे पास किसी वस्तु का अभाव नहीं है। भारत के पास अत्यधिक उपजाऊ भूमि, अच्छी वर्षा, विशाल मानवीय संसाधन, बौद्धिक व तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त व्यक्ति, एक दीर्घ व सतत् इतिहास है तथा संघर्षरहित धर्म व दर्शनशास्त्र सजीव रूप में है। फिर भी हम विष्व के लिए दिशा निश्चित नहीं कर रहे हैं। वे जो ऐसा करते हैं, वे संस्कृति व विचारधारा की उपज हैं, जो असहिष्णुता, घृणा व हिंसा को जन्म देती है तथा दूसरों को अधीन करके उन पर शासन करने हेतु बाध्य करती है, क्यों ? क्योंकि हम बाह्य आक्रमण का वैचारिक व भौतिक दोनों प्रकार से सामना करने के लिए संगठित नहीं थे। हमने अपने वैष्विक स्थान को खो दिया तथा धीरे-धीरे राष्ट्र स्थान को भी, असहिष्ण विचारों तथा देशों के अधीन होकर खो दिया तथा अपने आप को शताब्दियों के लिए दासता में रखा। हम आन्तरिक समानता के लिए संगठित थे। यहाँ तक कि जो शत्रुओं के रूप में पहले आए थे, वे भी हमारे राष्ट्र व सांस्कृतिक जीवन द्वारा आत्मसात् व सम्मिलित कर लिए गए। 


किन्तु जब अन्य जीवन पद्धतियाँ तथा पूजा पद्धतियों  के प्रति असहिष्णुता का भाव रखने वाले शत्रु आए, तब उनका सामना करने की दृष्टि से हम संगठित नहीं थे। हमारी सुरक्षा व्यवस्था इस प्रकार के असहिष्णु विचारों से अपरिचित थी। वास्तव में एक राष्ट्र के रूप में, हमने ऐसी कल्पना ही नहीं की थी कि इस प्रकार की असहिष्णुता भी अस्तित्व में है। ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि रोमन मूर्तिपूजक धर्म तथा रोमन राज्य स्वयं नष्ट हो गए क्योंकि वे नहीं जानते थे कि ऐसे असहिष्णु रिलिजन के साथ किस प्रकार का व्यवहार किया जाना चाहिए, जो अपने अतिरिक्त अन्य सभी पंथवादी विश्वासों को अस्वीकृत करता है। अर्थात् हम ऐसी पंथवादी निष्ठाओं से सर्वथा अपरिचित थे जो न केवल अन्य निष्ठाओं का अनादर करती है बल्कि उन्हें अस्वीकार भी करती है और यहाँ तक की अन्य निष्ठाओं को मिटाना अपना परम कर्तव्य समझती है। वास्तव में जब ऐसी पंथवादी (रिलीजियस) निष्ठाएँ पहली बार शरणार्थी के रूप में आई, जो ऐसे ही अन्य नि निष्ठाओं का शिकार हो गए थे या उनके ही अपने सह-नैष्ठिकों कों के द्वारा अधर्मी मान लिए गए थे, इस राष्ट्र ने ही उन्हें आश्रय तक दिया। इस प्रकार बहुत पहले से यहूदी, ईसाई, इस्लामी तथा पारसी समुदाय अन्य धर्मों या अपने सह-धर्मियों से सुरक्षा हेतु भारत में आकर बस गए। किन्तु जब वे जीतने हेतु आयी शक्तियों के रूप में आए, उस समय हमारी आन्तरिक व बाह्य, दोनों प्रकार की सुरक्षा व्यवस्थाएँ, पर्याप्त व कुशल नहीं थी। किन्तु, चूँकि हमारी सभ्यता, राज्य तथा राष्ट्र पर निर्भर नहीं थी, इसलिए हम रोम तथा ग्रीक के समान नश्ट नहीं हुए, पर जीवित रहे, केवल जीवित रहे। यहाँ तक कि अभी भी हम केवल अनुजीवी ही है। स्वामीजी केवल जीवित भारत नहीं चाहते थे। वे एक जीवित हिन्दुत्व नहीं चाहते थे। वे एक ऐसा हिन्दुत्व तथा हिन्दू राष्ट्र चाहते थे,  जो सम्पूर्ण विश्व का नेतृत्व करे, न कि विश्व में केवल अनुजीवी बनकर रहे। 


जब से असहिष्णु ‘रिलीजन’ विचार तथा राष्ट्रों ने वैश्विक घटनाक्रमों में नेतृत्व करना प्रारम्भ किया तब से वैश्विक इतिहास तथा भूगोल बदल गए। इसलिए असहिष्णु विचारों तथा राष्ट्रों का सामना करने के लिए, पारम्परिक हिन्दू पद्धतियों को पुनः ढालने तथा समायोजित करने की आवश्यकता थी। यहीं से स्वामीजी ने संगठन पर बल देना शुरु किया। उनका हिन्दू समाज के लिए एक शब्द का मन्त्र था ‘संगठन ! संगठन !! जिसका अर्थ है एकता ! एकता !! क्या संगठन तथा एकता हमारे स्वभाव के विरुद्ध है, स्वाभाविक नहीं ? क्या यह हमारी दृश्टि से पराई है ? जिन्होंने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में एकत्व देखा है क्या उनके लिए एकता की विशेषता, जो संगठन का आधार है, का न होना संभव है ? इसके लिए गम्भीर विश्लेषण करने की आवश्यकता है। मोक्ष (उसे ‘साल्वेशन’ बराबर मानकर) के हिन्दू-दृष्टिकोण का आधार यह है कि यह एक व्यक्तिगत प्रयास है तथा इसके लिए व्यक्तिगत रूप से समय देना भी आवष्यक है। वह व्यक्ति जो इसके लिए प्रयत्न करता है, उस समय मोक्ष प्राप्त करता है, जब वह इसके योग्य हो जाता है। यदि असफल होता है तो पुनः प्रयत्न करता है, सतत् प्रयत्न करता रहता है। मोक्ष के लिए हिन्दू धर्म में कोई सामूहिक प्रयास नहीं हो सकता, या मोक्ष हेतु सामूहिक समय नहीं हो सकता। 


अब्रह्मिक पंथवादी निष्ठाओं में इससे विपरीत स्थिति है। विशेष रूप से ईसाई तथा इस्लाम रिलिजन में। ईसाइयों में परलोकशास्त्र की कल्पना, ईसाइयों के मोक्ष के विचार की व्याख्या करती है। वास्तव में, ईसाईवाद के अनुसार मोक्ष का समय सम्पूर्ण समुदाय के लिए है अर्थात् या तो सभी एक ही समय में मोक्ष प्राप्त करते हैं या सभी को मोक्ष प्रदान करने से एक साथ मनाकर दिया जाता है। अर्थात् ‘अॅपोकॅलिप्स’ की कल्पना के अनुसार वह वो समय है तब विश्व का अन्त होगा। जबकि हिन्दू अनादि-अनन्त में विश्वास करते हैं, ईसाइयों का विश्वास एकरेखीय समय रचना पर आधारित है, जिसके प्रारम्भ तथा अन्त का समय निश्चित बताया गया है। अन्त का समय अॅपोकॅलिप्स है ऐसा उनका विश्वास है। येशु के राज्य की स्थापना ईसाई विश्वास का केन्द्र है। विश्वास यह है कि ईसा वापस आएँगे तथा सम्पूर्ण विश्व पर एक हजार वर्षों तक शासन करेंगे। यह सहस्त्राब्दि की कल्पना है। अन्त समय तब आएगा, जब येशु के राज्य की स्थापना होगी तथा वे एक हजार वर्षों के लिए राज्य कर लेंगे, तब विश्व का अन्त हो जाएगा, अर्थात् समय का अन्त हो जाएगा। उस समय वे सभी ईसा जो हजारों वर्षों से दफनाएँ गए हैं, पुनः जीवन प्राप्त करेंगे तथा पृथ्वी व स्वर्ग के मध्य में पहुँचाये जाएँगे एवं उनके अच्छे व बुरे कार्यों का मूल्यांकन किया जाएगा और उसी के अनुसार उन्हें स्वर्ग या नर्क प्रदान किया जाएगा अर्थात् सारे गैर-ईसाई जो पृथ्वी पर रहे हैं, वे नरक में ही जाएँगे। उस समय गैर-ईसाइयों के बचे रहने का कोई प्रश्न ही नहीं है, क्योंकि पृथ्वी पर येशु का साम्राज्य तब तक नहीं हो सकता, जब तक कि किसी ओर कोई भी गैर-ईसाई है। 


इस प्रकार मोक्ष की ईसाई अवधारणा सामूहिक पर आधारित है। यह समूह का पंथवाद है, प्रार्थना में, अन्य धर्मों के प्रति व्यवहार में, ईसाईयों के प्रति व्यवहार में, पृथ्वी पर सभी को अपने साम्राज्य के अधीन करने में, प्रत्येक क्षेत्र में है। अतः ईश्वर के साम्राज्य के लिए, अन्य धार्मिक विश्वासों को मिटाने के लिए, सामूहिक प्रयासों को करने हेतु संगठित होना, यही येशु के साम्राज्य को पृथ्वी पर स्थापित करने हेतु ईसाई पंथवाद का आन्तरिक व केन्द्रीय बिन्दु बन चुका है। यह सम्पूर्ण ईसाई सभ्यता का केन्द्र बन चुका है, चाहे वह राजनीतिक क्षेत्र हो, या आर्थिक क्षेत्र, समाज हो या पंथवाद। इस्लाम ने भी विश्व पर सामूहिक रूप से शासन करने के विचार को अपनाया तथा एक सामूहिक समय पर सिर्फ इस्लाम पर विश्वास करने वाले के लिए मोक्ष का आश्वासन दिया। राज्य स्वयं ही उनका सामूहिक यन्त्र था। ईसाई पंथवाद को राज्य प्राप्त करने के लिए चर्च की आवश्यकता पड़ी। इस्लाम को नहीं क्योंकि इस्लामी राज्य की स्थापना, इस्लाम पंथवाद की स्थापना का ही पर्याय था। 


यद्यपि ऐसा प्रतीत होता है कि हिन्दू कम संगठित थे या बिल्कुल भी संगठित नहीं थे, वास्तव में हिन्दू, धर्म के आधार पर अत्यधिक संगठित थे, जिसने उनके मन को संगठित किया था तथा यह उनके सामाजिक संगठन से प्रदर्शित होता था। संगठन की इस व्यवस्था ने किस प्रकार कार्य किया ? माननीय एकनाथजी ने ‘सेवा ही साधना’ में स्पष्ट किया है, ‘भारतीयों ने ही सर्वप्रथम सुसंगठित सामाजिक संस्था का सिद्धान्त प्रतिपादित किया तथा तदनुसार हजारों वर्षों तक एक संगठित समुदाय के रूप में जीवन-यापन करते रहे तथा इसे आज तक भी जारी रखा है, यद्यपि यह विकृत रूप में है, यह सिद्ध तथ्य है जो कि हिन्दू जीवनपद्धति की वर्णाश्रम व्यवस्था द्वारा प्रमाणित होता है। यदि आवश्यकता हो, तो अन्य साक्ष्य इस तथ्य को यह कहते हुए गुणित कर सकते हैं कि यज्ञ, जो ऋग्वैदिक आर्यों के हृदय का आदर्श था, सामूहिक धार्मिक पूजा के रूप में किया जाता था तथा इसमें सम्पूर्ण समाज सहभागी होता था, क्योंकि सम्पूर्ण ऋग्वेद में, एक भी ऐसी ऋचा मुश्किल से मिल सकती है, जहाँ किसी वस्तु की प्रार्थना या माँग, एक व्यक्ति के लिए की गई हो। यह सर्वदा ‘सभी के लिए’ है तथा ‘मैं’ के लिए नहीं। सर्वविदित गायत्री मन्त्र में, ‘हम सभी की बुद्धि प्रेरित करें’, इस हेतु प्रार्थना की गई है। दसवें मण्डल में ऋषि कहते हैं, ‘तुम सभी एक साथ जाओ, साथ में वार्तालाप करो तथा तुम सभी के मस्तिष्क एक साथ वस्तुओं को जानें’ इत्यदि (ऋग्वेद द 191-3-5) यजुर्वेद का महान् राष्ट्रगान सम्पूर्ण राष्ट्र तथा इसके विविध संगठनों का ही साथ वर्णन करता है,  न कि व्यक्तिगत रूप से किसी एक व्यक्ति का। उपनिषदों के प्रसिद्ध शान्ति मन्त्र सम्पूर्ण समाज के लिए प्रार्थना करते हैं, किसी एक व्यक्ति के लिए कभी नहीं।’ 


परन्तु संगठन की इस तकनीक, प्रारूप व योजना की रचना बाह्य भय के कारण विश्व पर शासन करने के लिए नहीं की गई थी। यह आन्तरिक रचना को सुव्यवस्थित रखने के लिए थी। यह एकता गुणात्मक तथा संख्यात्मक रूप से उस विकट कार्य के बराबर नहीं थी, जिसका सामना हिन्दुत्व को करना पड़ा जब अन्य धर्मों की वैधता को नकारने वाले विरोधी रिलिजन उभर आए। सृश्टि के एकत्व की हिन्दू संकल्पना उस परिस्थिति का सामना करने के लिए पर्याप्त नहीं थी, जिसका सामना विश्व को, उस समय करना पड़ा, जब सृष्टि के एकत्व की संकल्पना को अमान्य करने वाले पंथवाद या निष्ठाएँ उभर आयी। अतः इसके स्थान पर एकता तथा संगठन के नये तथा मेल खाने वाले विचार को रखने की आवश्यकता थी।  


हमारे अन्दर किसी के प्रति शत्रुता की भावना नहीं थी इसलिए हम किसी के विरुद्ध संगठित नहीं थे। हम स्व-केन्द्रित थे, क्योंकि हमें कोई भय नहीं था। हम संगठित नहीं थे, क्योंकि हमें सामूहिक रूप से रक्षात्मक तथा आक्रामक होने की कोई आवश्यकता नहीं थी। हम एक दूसरे के प्रति ईश्र्या भाव नहीं रखते थे, क्योंकि हमारे सामूहिक अस्तित्व को, किसी का कोई भय नहीं था। हम एक शान्तिपूर्ण व समृद्ध समाज के सभी परिणामों को बिना किसी बाह्य भय से भोग रहे थे। इसे एक परिवार के सन्दर्भ में स्पष्ट किया जा सकता है, जो कि धनवान व समृद्ध है, जिसमें लोग एक दूसरे के प्रति ईश्र्या भाव रखते हैं तथा इन बातों पर झगड़ते हैं कि प्रत्येक को क्या मिलना चाहिए तथा प्रत्येक के साथ कैसा व्यवहार होना चाहिए। बाह्य आक्रमण झेलने से पूर्व, समृद्ध हिन्दू समाज की स्थिति यह थी।  


बाह्य शक्तियों ने हमारी कमियों को उजागर कर दिया तथा साथ ही हमारी शक्ति व समृद्धि को कमजोर बना दिया तथा हमें उन गुणों को अर्जित करने के लिए बाध्य किया, जो हमारी प्रकृति के लिए नए थे, जैसे कि हमारा धर्म और जीवन-पद्धति की रक्षा के लिए नए तरीके से संगठित होना। जहाँ वे पंथवादी लोग अन्य लोगों को जीतने के लिए संगठित होते हैं, उसी प्रकार हमें भी संगठित होना लेकिन अपनी निष्ठा व धर्म की रक्षा के लिए। अध्यात्मिक तथा धार्मिक दृष्टि से यह प्रयास श्री रामकृष्ण परमहंस तथा स्वामी विवेकानन्द के दिव्य संयोग के साथ प्रारम्भ हुआ। स्वामीजी ने हिन्दुओं को निन्दायुक्त स्व आलोचना के द्वारा उत्तेजित कर उन्हें संगठित होने के लिए जागृत किया तथा उन आसुरी शक्तियों के द्वारा निर्मित भय की स्थिति का सामना करने हेतु एकत्रित होने को कहा, जो, इनसे असहमत लोगों पर विजय प्राप्तकर उन्हें नष्ट करने के लिए संगठित हुए हैं। इसके परिणामस्वरूप रामकृष्ण मिशन से शुरु होकर संगठनों का एक सतत् प्रवाह प्रारम्भ हुआ, जिनमें से प्रत्येक संगठन हिन्दू समाज की विभिन्न आवष्यकताओं को पूर्ण कर सके। इसी पूर्व-निर्धारित प्रवाह में, माननीय श्री एकनाथजी की संकल्पना तथा विचारों द्वारा, विवेकानन्द केन्द्र भी अस्तित्व में आया। 


संगठन की भावना का मूल है कि सामूहिक ‘हम’ अर्थात् धर्म की पुनः स्थापना के लिए संगठन के हित में ‘मैं’ को नष्ट करना। एक साधक अपने अन्दर के ‘मैं’ को नष्ट करता है तथा अन्ततः अपने ‘मैं’ को परम सत्य में विलीन कर देता है। ठीक यही धर्म की पुनःस्थापना करने हेतु समर्पित संगठन का कार्यकर्ता करता है। धर्म की पुनःस्थापना के आदर्श का ही लगभग रूप है ऐसे संगठन की विशाल पहचान में कार्यकर्ता अपने ‘मैं’ को समाने की प्रक्रिया अपनाता है। संगठन ‘हम’ है,  जिसमें वह अपने मैं, को समा देता है।