Tuesday, 9 October 2018


बुनियादी शिक्षा
- मीनल जोशी
पढ़ाई! पढ़ाई! पढ़ाई! कितने बार? क्यों? मुझे नहीं पढ़ना। मुझे खेलना है। नाचना है, गाना है।... यही है आज के बच्चों की पुकार!
वर्तमान शिक्षा प्रणाली ने बच्चों को यंत्रवत बना दिया है। स्कूल जाओ, निर्धारित पाठ्यक्रम पढ़ो, ट्यूशन जाओ, परीक्षा दो, अंक प्राप्त करो। बस! यही शिक्षा हैं। अंक अच्छे मिले तो ठीक नहीं तो छात्र, जीवन के सभी स्तर पर निकम्मा हो जाता है। उस बच्चे को इसी नजरिये से देखा जाता है। वह अपना आत्मसम्मान खो बैठता है। ऐसे में बच्चे का भविष्य क्या होगा? स्वतंत्र भारत के करोड़ों बच्चों को आधुनिक शिक्षा द्वारा आखिर हम क्या दे रहे हैं?  
हमारी शिक्षा व्यवस्था के विषय में हमें गंभिरता से सोचने की आवश्यकता है। महात्मा गांधी के शिक्षा विषयक विचार आज भी उतने ही मौलिक है। गांधीजी ने शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य के देह, मन, बुद्धि का सर्वांगीण विकास माना हैं। जिस में मनुष्य का आध्यात्मिक विकास भी अंतर्भूत है। वे कहते हैं, “आध्यात्मिक विकास की नीव शील निर्माण है। अक्षर ज्ञान की अपेक्षा चरित्र निर्माण शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए।”
गांधीजी मातृभाषा द्वारा शिक्षा के पुरस्कर्ता थे। मातृभाषा में अध्ययन करने से विद्यार्थी को सहजता से विषयों का आकलन होता है। वह स्वतंत्र रूप से विचार करने का सामर्थ्य प्राप्त करता है। अपनी भावनाओं और विचारों को सहजता पूर्वक और स्पष्ट रूप से अभिव्यक्ति कर सकता है। आज हम अप्बे बच्चों को बचपन से ही केवल अंग्रेजी सिखाने के पीछे पड़े हैं। जिससे हम बालक की संवेदन क्षमता को संकुचित करते हैं। बालक अपनी क्षमताओं को सीमित पाकर असहायता महसूस करता है। जिसका परिणाम उसके कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों के विकास पर होता है। गांधीजी कहते हैं, “कोई जापानी अपने को इतना असहाय अनुभव नहीं करता जितना हम अपने को समझते जान पड़ते हैं।”    
भाषा का संबंध अपनी संस्कृति से है। गांधीजी कहते हैं, “विदेशी भाषा के माध्यम से भारत में शिक्षा दी जाती है। इसने हमारे राष्ट्र को हद से ज्यादा बौद्धिक और नैतिक आघात पहुँचाया है। हमें और हमारे बच्चों को अपनी निजी विरासत का निर्माण करना है। राष्ट्र अपनी भाषा के कोश को भरें। और इसके लिए संसार की अन्य भाषाओं का कोश भी अपनी देशी भाषाओं में संचित करें।” आज दुख की बात तो यह है कि हमें, हमारे बच्चों को शेक्सपीयर, न्यूटन के बारे में तो पता है, किन्तु वे कालिदास, आर्यभट्ट, वराहमिहिर आदि के साहित्य और संशोधनों से सर्वधा अनभिज्ञ हैं। गांधीजी कहते हैं, “इतना मैं आदर के साथ कहूँगा कि दूसरी संस्कृतियों का गुण या मान अपनी संस्कृति के बाद अवश्य हो सकता है, पहले कदापि नहीं। हमारी संस्कृति का भण्डार जितना भरा-पूरा है, उतना और किसी का नहीं है।” प्रान्तीय भाषाओं को उनका उचित स्थान मिलना चाहिए। तभी हमारे देश की विविधता का हम आनंद ले सकेंगे। विदेशी संस्कृति पर आधारित शिक्षा प्रणाली अपनी भारतीय संस्कृति का पोषण नहीं कर सकती। आज के युग में हमें समन्वय की आवश्यकता है। बच्चों के शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास के महत्त्व को समझते हुए प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए।
शिक्षा प्रणाली में गांधीजी श्रमप्रतिष्ठा को मूलभूत स्थान देते हैं। वे कहते हैं, “हमें हृदय और हाथ की संस्कृति पर ध्यान देना चाहिए। हम शिक्षा के विषय में केवल मस्तिष्क तक सीमित है।” शिक्षा द्वारा मनुष्य के आंतरिक विचारों का पोषण होना चाहिए। हमारे कॉलेजों में जो इतनी सारी तथाकथित शिक्षा दी जाती हैं, उससे विद्यार्थियों का मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य चौपट हो जाता है। आजकल तो बचपन से ही छात्रों में मोटापा, डायबीटीज जैसी बीमारियाँ दिखाई देती हैं। स्वयं का काम स्वयं न करने से वे शरीर श्रम को हेय समझते हैं। यही द्वेष सामाजिक कुरीतियों में परिणत होता है। शिक्षित युवक श्रम करने की अपेक्षा बेकार रहना पसंद करता है। जो लोग शारीरिक श्रम करते हैं, उन्हें नीच समझते हैं।
गांधीजी कहते हैं, “लड़के-लड़कियों को ऐसी शिक्षा कभी नहीं दी जाती जिससे वे अपने आस-पड़ोस पर अभिमान कर सके। छात्र शिक्षा में जितना आगे बढ़ता है, उतना अपने घर से दूर हो जाता है। गृह जीवन में, उसे रस नहीं आता।” आज हम देखते हैं कि लड़के-लड़कियों की विदेश में जाकर नौकरी पाने की होड़ लगी है। ब्रेन-ड्रेन की समस्या से हम गुजर रहे हैं। अपने देश की, माता-पिता की सेवा का विचार उसके मन को छूता तक नहीं। हमारे भविष्य के नागरिकों को हम स्वार्थी बना रहे हैं।
गांधीजी ने शिक्षा प्रणाली में आठ घण्टा व्यावसायिक शिक्षा और दो घण्टे अक्षर ज्ञान को देने की बात कही है। उनके मतानुसार, बच्चों की अभिरुचि के अनुसार शिक्षा व्यवस्था होनी चाहिए। बच्चें स्वावलम्बी बनें। अपनी जीविका स्वयं अर्जित करें तथा व्यवसाय प्रशिक्षण का पाठ्यक्रम राष्ट्र की आवश्यकताओं को पूरा कर सके। शालेय शिक्षा का संबंध जीवन की शिक्षा से होना चाहिए। अगर हम आज भी गांधीजी के इन विचारों को कार्यान्वित करें तो देश में बेकारी की समस्या नहीं रहेगी। हमारे देश को बाहर से सड़क बनाने के यंत्र या देश की रक्षा के लिए विदेशों से हवाई जहाज खरीदने नहीं पड़ेंगे। हमारे छात्र ही अपने देश के लिए उच्च तकनीकी ज्ञान विकसित करेंगे। उनका इस देश में उचित सम्मान भी होगा। सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी सृजनशील होगा। घर की छोटी-छोटी समस्याओं के लिए उसका परावलंबन खत्म हो जाएगा। “कौशल विकास” कार्यक्रम शालेय स्तर पर पहुँचना आवश्यक है। इससे उच्च शिक्षा भी महँगी नहीं रहेगी।
गांधीजी शिक्षा व्यवस्था में धार्मिक शिक्षा को महत्त्व देते हैं। वे कहते हैं, “धार्मिक शिक्षा पुस्तकों की अपेक्षा आचरण से होनी चाहिए। शिक्षकों के वर्तन से उसे प्राप्त किया जा सकता है।” शिक्षक का चरित्र उन्नत होना अपेक्षित है। वह उदार हृदय का तथा स्वतंत्र विचारक्षम होना चाहिए। विद्यार्थियों के साथ उसका हृदय से आंतरिक संबंध हो। शिक्षक के नैतिक आचरण का परिणाम छात्र के चारित्र निर्माण में सहायक होता है। इसका उदाहरण हम अनेक महनीय व्यक्तियों के जीवन में देखते हैं।
गांधीजी ने बुनियादी शिक्षा का प्रारूप प्रस्तुत किया। उन्होंने आश्रमवासी बच्चों और स्वयं के बच्चों पर विभिन्न शैक्षणिक प्रयोग किए। फलस्वरूप उनका विश्वास दृढ़ हुआ कि व्यक्ति का चरित्र निर्माण ही महत्त्वपूर्ण है। शिक्षा के माध्यम से हमें संकुचित नहीं वरन् उदार समाज का निर्माण करना है। प्रतिस्पर्धा की अपेक्षा सहकारिता विकसित करनी है। गांधीजी के विचारों को आधुनिक व्यवस्था में अग्रक्रम देते हुए स्वावलम्बी सत्त्वशील भारत के निर्माण में हम कृतिशील बनें।
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