Sunday, 6 September 2015

संपूर्णता यानि श्रीकृष्ण

संपादकीय

मनुष्य के जीवन का ऐसा कोई कोना नहीं है, जिसे कृष्ण ने न छुआ हो। जिन्दगी के हर पहलू पर कृष्ण की नज़र रही और बड़ी संजीदगी के साथ उसका सरल समाधान भी दिया। वैसे तो हर युग में अनेक महापुरुषों ने लोगों का मार्गदर्शन किया, परन्तु अकेले कृष्ण ही थे, जिन्होंने जीवन के सभी आयामों पर गहरी दृष्टि डाली और सहज, सरल अनुगामी दिशा-बोध दिया। संपूर्ण जगत् के मानव मन की व्यथा-कथा को जानते हुए, श्रीकृष्ण ने ऐसे-ऐसे अद्भुत उपाय प्रस्तुत किए, जिनको अपनाकर प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन की संपूर्णता को आसानी से प्राप्त कर सकता है। ईश्वर-अवतार तो कई हुए हैं, लेकिन कृष्ण जैसा हरफनमौला-आलराउन्डर मिलना मुश्किल है। लगभग सवा पाँच हजार बरस पहले के लोग और समाज कैसा रहा होगा, आज से काफी उन्नत। फिर भी उनको कृष्ण की जरूरत पड़ी। मानव स्वभाव की शायद यही नियति है, जो हर युग में अपना रंग दिखाती है।

कृष्ण के बारे में प्रायः सभी जानते हैं कि उनकी लीलाएँ कितनी अनुठी और हम सबके जीवन का आईना थी। यदि उनको गहराई से समझकर अनुसरण करें, तो यह जीवन सफल हो जाए, संपूर्णता को प्राप्त कर ले। समाज के कंटकों, दुराचारियों से निपटना, अपनी मातृभूमि की रक्षा, रासलीलाओं द्वारा वासना-शून्य प्रेम, प्रगाढ़ मित्रता का निर्वहन, सफल कूटनीति, उत्कृष्ट प्रबन्धन, त्याग की पराकाष्ठा, ज्ञान की प्रभुता, सच्चा मार्गदर्शन, दलित-मसीहा, न्यायप्रिय, सकारात्मक बोध, अद्वितीय साहस, विलक्षण चातुर्य आदि जीवन के ऐसे महत्वपूर्ण घटक हैं, जिनका व्यावहारिक प्रयोग करके, कृष्ण ने हमारा मार्गदर्शन किया। मनुष्य के भीतर बैठी पशुता जब-जब भी उछाल मारती है, तब-तब अस्थिरता जन्म लेकर दुःखी बना देती है। कृष्ण ने दुःख निवारण की वह दिशा बताई, जो मानव कल्याण में अत्यन्त उपयोगी है, गतिमान जीवन की प्राण-वायु है।

कृष्ण का कर्म-दर्शन जीवन की समग्रता को समेटे हुए है। यदि सकाम और निष्काम की गूढ़ता समझ आ जाए और उसे जीवन में उतार लिया जाए, तो यह जीवन यात्रा सुगम हो सकती है। उनका प्रकृति प्रेम अपनाकर पर्यावरण सुधारा जा सकता है। संतुलित आहार-विहार-योग के द्वारा आरोग्य पाया जा सकता है। कर्म-ज्ञान-भक्ति-सांख्य योग जीवन के दिशा-निर्धारक हैं। कृष्ण की दुःख-सुख में समभाव की देशना, अवसाद और निराशा से बचा सकती है। उनका कुशल नेतृत्व जीवन की सफलता का बोधक है। उनका सौन्दर्यबोध जीवन को सकारात्मकता से भर सकता है। मोह-माया से बचकर, इस नश्वर-अनित्य शरीर के कर्म को व्यष्टि से समष्टि की ओर ले जाने का कृष्ण का सन्देश, जन-जन को खुशियों से भर सकता है। कृष्ण के वासना-रहित प्रेम को यदि व्यवहार में उतारा जाए, तो समाज में फैल रहा व्यभिचार घट सकता है। कृष्ण की गौ-सेवा और पशु-प्रेम हमें जीव-दया की ओर प्रेरित करता है। करुणा के सागर कृष्ण की सीख हृदय में प्रेम भरकर, समाज में भाई-चारा और शांति ला सकती है।

आधुनिक युग में स्वामी विवेकानन्द ने भी प्रायः वही काम किया, जो कृष्ण किया करते थे। जाति-पांति, धर्म आदि से ऊपर उठकर, सभी मनुष्यों को एक मानकर, मनुष्य निर्माण की दिशा में स्वामीजी का योगदान अविस्मरणीय है। मातृभूमि से प्यार, चरित्र-निर्माण, युवकों में साहस भरने और उनको बलशाली बने रहने की प्रेरणा देने में, वे अग्रणी रहे। निर्बल और दलित के प्रति प्रेम, करुणा की अवधारणा के साथ दरिद्र को नारायण मानकर, उसकी सेवा करने का आह्वान, मानव-कल्याण की दिशा में उनकी अद्भुत सोच थी, जो आज अधिक प्रासंगिक है। भारत को वैभव की ओर ले जाने में स्वामीजी के अथक प्रयासों की सफलता, अब वर्तमान युवाओं के कंधों पर है। कृष्ण और स्वामीजी के बताए मार्ग पर चलकर, चारित्रिक-समाज की रचना संभव है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में परिपूर्णता और संपूर्णता की अभिलाषा हर मन में होती है। इसकी प्राप्ति के लिए कृष्ण को अपनाना होगा। केवल पूजा-पाठ, वंदना करके कृष्ण को नहीं पाया जा सकता। उनके जीवन-मूल्यों के अधिकाधिक अंशों को स्वयं के जीवन में उतारना जरूरी है। पग-पग पर उत्सव मनाने वाले कृष्ण कोइसलिए कहा जाता है - संपूर्णता यानि कृष्ण

Sunday, 9 August 2015

सेवा में समर्पण

संपादकीय

सेवा एक प्रकार की कृत्य अभिव्यक्ति है, जो पीड़ित या अभावग्रस्त की आवश्यकताओं की पूर्ति करती है। यह भावात्मक, भौतिक और श्रम के रूप में भी हो सकती है, जो सेवक और सेव्य, दोनों के लिए सुखदायी होती है। अगर सेवा में कोई भी पक्ष कट जाता है या दुःख का अनुभव करता है, तो वह सेवा नहीं है। सेवा में आनन्द का अनुभव होता है। आनन्द की शून्यता में सेवा का कोई अर्थ, कोई मूल्य नहीं रहता। सेवा, स्वतःस्फूर्त होती है, थोपी नहीं जाती। मजबूरी में की गई सेवा, ढोंग की सहचरी कहलाती है। कामनाओं से लदी सेवा, अहंकार को सींचती है। सेवा का प्रकाशन व्यक्तित्व को खोखला बनाती हुई, ईर्ष्या का कारण बनती है। अपेक्षाओं से भरी सेवा, कर्म की गति को धीमा करती हुई, निराशा की भावनाओं को जन्म देती है। सुख की अनुभूति के साथ की गई सेवा, वासना बढ़ाती है, र्निलिप्तता से सनी सेवा काम, क्रोध, लोभ, अहंकार जैसे दोषों से बचाती है। अर्थपूर्ण और मौलिक सेवा में समर्पण की महत्ता सर्वोपरि होती है। सही मायने में तो समर्पण ही सेवा का प्राण है

भीतर से उपजा समर्पण ही सच्चा समर्पण होता है। यह निखालिस, स्वैच्छिक और आनन्द से परिपूर्ण होता है। दुराचारियों से कराया गया समर्पण, स्वाभाविक नहीं होता। विवशता से भरा समर्पण हमेशा दुःखदायी होता है। दिखावे वाले विवश समर्पण में प्रतिशोध की चिंगारी बुझती नहीं है, बल्कि मौका मिलने पर तेजी से धधक उठती है। संस्कार और जीवन-मूल्यों से वंचित लोगों में समर्पण को ढूँढ़ना, घास के ढेर में सुई को ढूँढ़ना जैसा होता है और समर्पण-शून्यता में सेवा की कल्पना तक करना, एकदम निरर्थक है। बिना समर्पण के सेवा असंभव है। समर्पण का होना, सेवा की पहली शर्त है। समर्पण के बिना, सेवा का अस्तित्व ही नहीं है। समर्पण है, तो सेवा का भाव स्वतः ही पैदा होता रहता है। सेवा में प्रयास होता है और समर्पण में सहजता। यह सहजता ही, प्रयास में ऊर्जा भर देती है।

प्राचीन भारत में शिष्यों का समर्पण, गुरुओं की सेवा को स्वतः ही प्रेरित करता था। सेवा में अनुशासन जैसी आज्ञाओं की, समर्पण में आवश्यकता ही नहीं पड़ती। स्वयं अकेला समर्पण ही जीवन-मूल्यों से सराबोर कर देने में समर्थ होता है। उसे किसी आदेश, आदर्श, सीख या प्रेरणा की जरूरत नहीं होती। समर्पण अपनेआप में परिपूर्ण है। स्वयं, परिवार, समाज और देश के प्रति पूर्णतः समर्पित लोग ही सेवा करने में सक्षम होते हैं। समर्पित हुए बिना, की जाने वाली सेवा, तथाकथित सेवा कहलाती है समर्पण का अभाव सेवा को पंगु बना देता है।

माँ-बाप के प्रति समर्पित हुए बिना, उनकी सेवा कर पाना असंभव है। श्रीराम और श्रवण कुमार जैसे उदाहरणों से साहित्य भरा पड़ा है। सेवा के सन्दर्भ में श्री हनुमान का अद्भुत समर्पण एक अनुपम मिसाल है, जो समर्पण की श्रेष्ठता दर्शाता है। समाज सेवा में समर्पण ही वह केन्द्र है, जिसमें रहकर हमारे अनेकानेक समाज सुधारकों ने समाज की सेवा की। देश पर मर-मिटने वाले शहीदों में यदि मातृभूमि के प्रति अटूट समर्पण भाव नहीं होता, तो भारतमाता की बेडि़याँ नहीं टूटती। पति-पत्नी, रिश्ते-नाते, अड़ौस-पड़ौस, मालिक-कर्मचारी, शासक-जनता, व्यक्ति-व्यक्ति में आपसी समर्पित भाव से ही एक दूसरे की सेवा का भाव पनपता है। समर्पण में अहंकार तिरोहित रहता है। मीराँ का समर्पण भक्ति का अनुपम उदाहरण है। श्रीरामकृष्ण परमहंस के प्रति विवेकानन्द के समर्पण ने उनको देश-सेवा से ओत-प्रोत कर दिया। विवेकानन्द शिलास्मारक के प्रति एकनाथ रानडे का पूर्ण समर्पण ही सफलता का जनक था। देश में समर्पित लोगों की कभी भरमार थी, तभी यह देश सोने की चिडि़या और विश्व गुरु कहलाया। आज परिवार, समाज और देश के प्रति समर्पण भाव की हमें अत्यन्त आवश्यकता है।

जीवन का कोई भी क्षेत्र हो, बिना समर्पण सफलता मिल पाना संभव नहीं है। समर्पण भाव से ही सच्ची सेवा संभव है वरना सिर्फ स्वार्थ का ही बोलबाला रहता है। स्वस्थ, सुखी और सर्वांग सम्पन्नता के लिए, जरूरी है - सेवा में समर्पण

Thursday, 16 July 2015

चरित्र की शिक्षा


संपादकीय

भारतीय समाज की आम धारणा है कि गुरु के बिना ज्ञान नहीं हो सकता- गुरु बिन होइ न ज्ञान | गोस्वामी तुलसीदास ने गुरु को ज्ञान प्रदाता और शंकर रूप माना है- वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकर रुपिणं | गुरु को अभिवादन करने की परंपरा है | माता-पिता और  गुरु तीनों प्रणम्य है | इनका अभिवादन करने से आयु, विद्या यश और बल बढ़ते है -

अभिवादनशीलस्य नित्यपादाभिवन्दनात्  |
चत्वारि तस्य वर्ध्दन्ते आयुर्विद्या यशोबलम्  ||

अथर्ववेद के ब्रह्मचारी सूक्त में आता है कि उपनयमान ब्रह्मचारी आचार्य के पास जाता है, तब आचार्य उसे तीन दिन तक अपने गर्भ में रखता है | इसके बाद वेदारम्भ संस्कार करता है | तीन दिन तक मातृभाव से आचार्य उसकी रूचि और क्षमता की परीक्षा लेता है, तदुपरान्त वैसी ही शिक्षा की व्यवस्था करता है | यह वैयक्तिकता ही शिक्षा को जीवनोपयोगी बनाती थी | इसका आजकल नितांत अभाव है जिसके कारण विद्यार्थी अत्यधिक तनाव में रहते हैं | परीक्षा से भय खाते हैं और अनुकूल परिणाम न आए तो आत्महत्या भी करते है |

विद्या दान के लिए कोई शुल्क नहीं होता था | विद्या समाप्ति के उपरांत समावर्तन संस्कार होता था- तब शिष्य अपनी ओर से दक्षिणा देता था | स्वामी विरजानन्द को दयानन्द ने वेद का उद्धार करने का वचन ही दक्षिणा के रूप में दिया था | सत्य के खोज के लिए उन्होंने अपना जीवन अर्पित कर दिया |

कौत्स के आचरण से वरतन्तु प्रसन्न और गर्वोन्नत थे ; पर कौत्स ने बार-बार दक्षिणा के लिए आग्रह किया तो वरतन्तु ने चौदह विद्याओं के बदले में चौदह करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ मांग ली | गुरु दक्षिणा चुकाने के लिए कौत्स राजा रघु के पास गए | रघु विश्वजित् यज्ञ करके अकिंचन हो गए थे | मिट्टी के पात्रों का उपयोग कर रहे थे ; पर कौत्स की मांग पूरी करने के लिए उन्होंने कुबेर पर आक्रमण करने का मानस बनाया | आक्रमण के पहले ही कुबेर ने राजकोष में स्वर्ण वृष्टि कर दी | कौत्स ने दक्षिणा चुकाई ; पर वरतन्तु ने वह धनराशि लोक कल्याण के लिए राजा रघु को ही सौंप दी |

शिवाजी के निर्माता समर्थ गुरु रामदास भिक्षावृत्ति से जीवन यापन करते थे | अध्यात्म निष्ठ भारत में गुरु, शिष्य की चेतना को जगाने का कार्य करता था | इसलिए उसे अच्छे शिष्य की परख करनी पड़ती थी | शिक्षा गुरुकुल और आश्रमों में होती थी | शिष्य परिश्रम करके शिक्षा प्राप्त करता था | आज शिक्षा का स्वरुप बदल गया | शुल्क देकर बालक विद्यालय में प्रवेश पाता है, इसलिए शिक्षक धनक्रीत सेवक मात्र बन गया है | शिक्षा व्यापार बन गई | विद्यार्थी से अधिकाधिक राशि वसूलना ही उद्देश्य बन गया | इससे शिक्षक का सम्मान कम हुआ और शिक्षा का स्तर गिरा | चारित्रिक स्तर गिरा | भारत विश्व गुरु था, चरित्र की शिक्षा देने के कारण |
वह स्थिति आज नहीं है |

आज की प्रथम आवश्यकता है - चरित्र की शिक्षा | चरित्रवान शिक्षक ही चरित्र की शिक्षा दे पाएगा | भारत को ऐसे शिक्षकों की आवश्यकता है | ऐसे शिक्षक देश को पुन: विश्व गुरु बना सकेंगे |