Thursday, 16 July 2015

चरित्र की शिक्षा


संपादकीय

भारतीय समाज की आम धारणा है कि गुरु के बिना ज्ञान नहीं हो सकता- गुरु बिन होइ न ज्ञान | गोस्वामी तुलसीदास ने गुरु को ज्ञान प्रदाता और शंकर रूप माना है- वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकर रुपिणं | गुरु को अभिवादन करने की परंपरा है | माता-पिता और  गुरु तीनों प्रणम्य है | इनका अभिवादन करने से आयु, विद्या यश और बल बढ़ते है -

अभिवादनशीलस्य नित्यपादाभिवन्दनात्  |
चत्वारि तस्य वर्ध्दन्ते आयुर्विद्या यशोबलम्  ||

अथर्ववेद के ब्रह्मचारी सूक्त में आता है कि उपनयमान ब्रह्मचारी आचार्य के पास जाता है, तब आचार्य उसे तीन दिन तक अपने गर्भ में रखता है | इसके बाद वेदारम्भ संस्कार करता है | तीन दिन तक मातृभाव से आचार्य उसकी रूचि और क्षमता की परीक्षा लेता है, तदुपरान्त वैसी ही शिक्षा की व्यवस्था करता है | यह वैयक्तिकता ही शिक्षा को जीवनोपयोगी बनाती थी | इसका आजकल नितांत अभाव है जिसके कारण विद्यार्थी अत्यधिक तनाव में रहते हैं | परीक्षा से भय खाते हैं और अनुकूल परिणाम न आए तो आत्महत्या भी करते है |

विद्या दान के लिए कोई शुल्क नहीं होता था | विद्या समाप्ति के उपरांत समावर्तन संस्कार होता था- तब शिष्य अपनी ओर से दक्षिणा देता था | स्वामी विरजानन्द को दयानन्द ने वेद का उद्धार करने का वचन ही दक्षिणा के रूप में दिया था | सत्य के खोज के लिए उन्होंने अपना जीवन अर्पित कर दिया |

कौत्स के आचरण से वरतन्तु प्रसन्न और गर्वोन्नत थे ; पर कौत्स ने बार-बार दक्षिणा के लिए आग्रह किया तो वरतन्तु ने चौदह विद्याओं के बदले में चौदह करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ मांग ली | गुरु दक्षिणा चुकाने के लिए कौत्स राजा रघु के पास गए | रघु विश्वजित् यज्ञ करके अकिंचन हो गए थे | मिट्टी के पात्रों का उपयोग कर रहे थे ; पर कौत्स की मांग पूरी करने के लिए उन्होंने कुबेर पर आक्रमण करने का मानस बनाया | आक्रमण के पहले ही कुबेर ने राजकोष में स्वर्ण वृष्टि कर दी | कौत्स ने दक्षिणा चुकाई ; पर वरतन्तु ने वह धनराशि लोक कल्याण के लिए राजा रघु को ही सौंप दी |

शिवाजी के निर्माता समर्थ गुरु रामदास भिक्षावृत्ति से जीवन यापन करते थे | अध्यात्म निष्ठ भारत में गुरु, शिष्य की चेतना को जगाने का कार्य करता था | इसलिए उसे अच्छे शिष्य की परख करनी पड़ती थी | शिक्षा गुरुकुल और आश्रमों में होती थी | शिष्य परिश्रम करके शिक्षा प्राप्त करता था | आज शिक्षा का स्वरुप बदल गया | शुल्क देकर बालक विद्यालय में प्रवेश पाता है, इसलिए शिक्षक धनक्रीत सेवक मात्र बन गया है | शिक्षा व्यापार बन गई | विद्यार्थी से अधिकाधिक राशि वसूलना ही उद्देश्य बन गया | इससे शिक्षक का सम्मान कम हुआ और शिक्षा का स्तर गिरा | चारित्रिक स्तर गिरा | भारत विश्व गुरु था, चरित्र की शिक्षा देने के कारण |
वह स्थिति आज नहीं है |

आज की प्रथम आवश्यकता है - चरित्र की शिक्षा | चरित्रवान शिक्षक ही चरित्र की शिक्षा दे पाएगा | भारत को ऐसे शिक्षकों की आवश्यकता है | ऐसे शिक्षक देश को पुन: विश्व गुरु बना सकेंगे |







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