Wednesday, 3 June 2015

योग से मनुष्यता

 संपादकीय

भारत योगियों का देश रहा है | व्यक्ति और समाज को उच्च से उच्चतर दिशा में ले जाने में, हमारे ऋषि-मुनियों ने अपना जीवन समर्पित कर दिया | हमारी संस्कृति और संस्कारों का विश्व में अन्य कोई दावेदार नहीं है | व्यक्ति के जीवन को सम्पूर्णत: सुखी बनाने और समाज में एकरसता घोलने में, हमारा अध्यात्म शिखर पर रहा है | इसलिए भारत को विश्वगुरु का दर्जा मिला | आज भी, संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जो नवीनतम दिवस 'अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस' घोषित किया गया है, वह भारत की ही विश्व को एक महान देन है | पूरे विश्व में योग की चर्चा है | घरों, विद्यालयों, संस्थानों से लेकर सार्वजनिक स्थानों तक में लोगों को योग करते देखा जा सकता है |

सामान्यत: जो योग हमें दिखाई देता है- वह मात्र शरीर के स्वास्थ्य से जुड़ा है | ऐसा स्वास्थ्य तो किसी भी प्रकार के श्रम से प्राप्त किया जा सकता है | योग का असली मक़सद शरीर-मन-बुद्धि-आत्मा से जुड़ते हुए, अंततः परमात्मा से जुड़ना है | जिसे भुलाकर, इसे केवल शरीर के स्वास्थ्य के लिए उपयोगी माना जा रहा है | व्यष्टि में सिमटा ऐसा योग, समष्टि के लिए उपयोगी नहीं लगता | योग का मतलब जोड़ना है | यदि व्यक्ति- स्वयं से, परिवार से, समाज से और अपनी मातृभूमि से नहीं जुड़ता, तो ऐसा तथाकथित योग अर्थहीन ही माना जाएगा | अपने प्राण-प्रण से सकारात्मक सोच के साथ विधिनुसार योग करने पर ही, योग की उपलब्धियों से साक्षात्कार कर पाना संभव हो पाता है | पाश्चात्य जीवनशैली से ग्रसित इस भागम-भाग में व्यक्ति में आपसी प्रेम, सहयोग, त्याग, नैतिकता, संवेदना यानी मनुष्यता लुप्त होती जा रही है | गलाकाट प्रतिस्पर्धा के साथ भौतिकता की आकंठ चाहना ने मनुष्य की विशालता को बौना कर दिया है | समाज में व्याप्त हो रही बद से बदतर घटनाएँ हमारे लगातार गिरते चरित्र को दर्शाती है | इसलिए हमें आज योग की अधिक आवश्यकता है और संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी इसकी महत्ता को समझा है | विश्व पटल पर सुख और शांति को डसती अमानवीयता के रोग का इलाज़ है- योग |

योग के नाम पर आसन और प्राणायाम पर ही ध्यान दिया जा रहा है, जबकि यम और नियम को साधे बिना, इनकी शरीर सौष्ठव के अलावा कोई उपयोगिता नहीं है | पतंजलि के अष्टांग योग की विधिनुसार पालना पर ही, यथार्थ में योग का महत्व है | इन आठ अंगों में सबसे पहले यम और नियम आते हैं | योग के लिए इन्हें साधना अत्यावश्यक है | यम- यानी अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह | इन मूल्यों को जीवन में धारण करके, व्यवहार में लाना होता है | हिंसा नहीं करना, सत्यता को अपनाना, चोरी नहीं करना, वासना पर नियंत्रण और आवश्यकता से अधिक संग्रह नहीं करना | अपने सुदृढ़ चित्त के साथ इन यमों का अभ्यास करके अमल में लाया जाए, तो यह मनुष्यता की ओर बढाया गया पहला कदम होगा | लोभ, क्रोध, वासना, अहंकार, द्वेष आदि विकार मनुष्यता के दुश्मन हैं |

दूसरा अंग है- नियम | इसमें शौच- यानी शरीर और मन को शुद्ध करना, शुद्ध सात्विक आहार लेना | दूसरा नियम है- संतोष यानी जो है- जितना है, उसी में संतोष करना | सभी प्रकार का असंतोष दुःख का कारण बनता है | कहा भी गया है- संतोषी सदा सुखी | उफनती कामनाएँ, गलत काम करने को प्रेरित करती है | तीसरा नियम है- तप यानी शरीर, मन और अपनी इन्द्रियों में शुचिता लाकर, उन्हें ऊर्जावान बनाना | चौथा नियम है- स्वाध्याय यानी स्वयं का, उत्तम ग्रंथों का मनोयोग से अध्ययन करना और उनकी देशनाओं से सीख लेना | यह हमें विवेकी बनाता है  और पाँचवा नियम है- ईश्वर प्रणिधान यानी फल की कामना किए बगैर कर्म करना, कर्म का फल परमात्मा पर छोड़ देना, अहंकार को त्यागकर समाज के प्रति पूर्णत: समर्पित हो जाना | यह मनुष्यता की सीढ़ी पर दूसरा कदम है | अनुशासित जीवनशैली के साथ अपने-अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन- मनुष्यता की सुगंध  है |

यम और नियम के बाद योग का तीसरा अंग आता है- आसन | यह शरीर को लचीला, स्वस्थ बनाता है | इससे सहन शक्ति और एकाग्रता को बल मिलता है | आसन से श्रम और विश्राम का संतुलन बनता है, जो उत्तम स्वास्थ्य के लिए जरुरी है | यह मनुष्यता को साधे रखने का तीसरा कदम है | बढ़ते कदमों से ही मंजिल मिलती है |

योग का चौथा अंग है- प्राणायाम | आसन के सध जाने पर प्राणायाम का प्रारम्भ होता है, जो श्वास-प्रश्वास की गति का नियमन है | प्राण, प्रकृतिदत्त वह ऊर्जा है, जिस पर हमारा जीवन टिका हुआ है | शरीर की समस्त बाह्य गतिविधियाँ हमारे प्रयासों से संचालित होती है | आंतरिक गतिविधियों में शरीर के भीतरी अवयवों की क्रियाएँ, बिना हमारे प्रयास के, प्रकृति द्वारा सम्पन्न होती हैं ,लेकिन प्राण उनका आधार है | प्राण पर नियंत्रण के लिए अपनी श्वासों को विधिपूर्वक साधना होता है | ऊर्जावान बने रहने पर ही मनुष्यता फलती- फूलती है, जो इसका चौथा चरण है |

प्राणायाम सध जाने के बाद प्रत्याहार का स्थान है, जो योग का पाँचवा अंग है | प्रत्याहार में हम अपने चित्त से इन्द्रिओं की प्रवृत्ति को साधने का प्रयास करते हैं | इससे हम अपनी इन्द्रियों पर काबू करना सीखते हैं, जो मनुष्यता की दिशा- निर्धारण का पाँचवा कदम है |

प्रत्याहार के पश्चात् योग का छठा अंग है- धारणा | धारणा में मन को दीर्घावधि तक किसी अंगविशेष पर स्थिर किया जाता है | इससे संयम और एकाग्रता को बल मिलता है | संयमित रहना मनुष्यता का छठा कदम है | योग का सातवा अंग ध्यान है, जो अनर्गल विचारों को संयोजित और संयमित करते हुए, विचार शून्यता की ओर ले जाता है | मनुष्यता का सदैव बने रहना, ध्यानावस्था का प्रमाण है, जो मनुष्यता का सातवा कदम है | ध्यान की गहनता भेद-भाव निवारक है |

अंत में योग का आठवा अंग है- समाधि, जो परमात्मा से मिलने का द्वार है | हमारी संस्कृति, प्रत्येक चर और अचर जीव में आत्मा देखती है | हर प्राणी में परमात्मा बसते हैं | इसलिए आपसी भाईचारा, समदृष्टि, प्रेम, व्यक्तियों का आपस में जुड़ना, प्रकृति-पूजा, ये सभी मूल्य परमात्मा से मिलन में ही है, जो मनुष्य का अंतिम लक्ष्य है | यह व्यष्टि का समष्टि में समा जाना है |

आधुनिक मनुष्य की जीवनशैली में यदि संपूर्ण योग द्वारा मनुष्यता की इतनी लम्बी यात्रा संभव न भी हो, तो भी वह केवल यम और नियम को अपने जीवन में उतारकर मनुष्यता की ओर कदम बढ़ा सकता है | इतना भर कर लेने पर समाज में फैली दूषितता रुक सकती है | स्वयं, घर-परिवार, समाज और राष्ट्र स्वस्थ-सुखी और सम्पन्न हो सकता  है | दोगला चरित्र कथनी और करनी की दूरियाँ बढ़ाकर व्यक्तित्व को खण्डित कर देता है | व्यक्ति निर्माण और उसकी गरिमा के लिए सर्वश्रेष्ठ उपाय है- योग | इस योग दिवस पर संकल्प लेकर, हम सीखें - योग से मनुष्यता...

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