Thursday, 6 October 2016

स्त्री शक्ति अंक : शक्तिमती कल्याणमूर्ति नारी


मैथिली शरण गुप्त ने कहा - अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी। आँचल में दूध और आँखों में पानी। स्त्री को अबला कहना पाप है। जिसके आँचल में दूध है - मानवता का पोषण करने के लिए और आँखों में पानी है - मूर्तिमती करुणा बनने के लिए - वह अबला कैसे हो सकती है। अरबी में अ सर्वोत्तम वाचक उपसर्ग है। उसके आधार पर अबला का अर्थ होगा - सर्वोत्तम बलवती। शhल ही स्त्री का आभूषण है। इसलिए सर्वोत्तम शीलवती अर्थ भी हुआ।
वह कन्या रूप में काम्या है, माता रूप में स्वर्ग से भी अधिक गरिमामयी है - जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी; कुलवधू के रूप में वह पारिवारिक दायित्व निभाने वाली है; महिला के रूप में उत्सव की जन्मभूमि (महस्य इळा) है - जीवन को अपनी उपस्थिति से उत्कृष्ट यज्ञ का स्वरूप प्रदान करने वाली है।
उसको जयषंकर प्रसाद ने ‘नारी तुम केवल श्रद्धा हो’ कह कर गरिमा प्रदान की है। डाॅ. रामानन्द तिवारी ने कहा है - केवल श्रद्धा ही नहीं, शक्ति भी नारी। गोस्वामी तुलसीदास ने रामवल्लभा सीता को उद्भवस्थितिसंहारकारिणी और क्लेशहारिणी कहा है -
उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम् । स्र्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं राम वल्लभाम् ।।
 (रामचरित मानस)
ब्राह्मण ग्रन्थों में कहा गया है - अयज्ञियो ह वै एष यो अपत्नीकः। श्रद्धा पत्नी सत्यो ह वै यजमानः। श्रद्धा और सत्य को उत्तम जोड़ा कहा गया है। कालिदास और तुलसीदास ने पार्वती और शिव को संसार के माता पिता कह कर वन्दना की है -
जगतः पितरौ वन्दे पार्वती-परमेश्वरौ ।
ऋग्वेद के आम्भृणी-सूक्त में वाग्देवी स्वयं को ‘राष्ट्री’ कहती है - अहं राष्ट्री संगमनी वसूनाम्। राष्ट्री का अर्थ प्रकाशमती। साथ ही उसे धरती को वसने योग्य बनाने वाले वसुओं की संगमनी कहा है। 
वेद में उक्ति है - जायेदस्तम् = जाया इत् अस्तम् = जाया ही घर है। मनु ने इसी के आधार पर कहा है - गृहिणीगृहम् उच्यते। घर परिवार का निर्माण करना उसके श्रम की सफलता और सार्थकता है। इसमें वह अपने सहचर - पति का सहयोग लेती है। दोनों मिलकर समर्पित भाव से परिवार का पालन करते हैं इसलिए दम्पती कहलाते हैं। दमसय पतिः पालनकर्तारौ इति दम्पती।
परिवार संसार का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय है, चिकित्सालय है, प्रशिक्षण केन्द्र है और साधना भूमि है जिसमें प्रत्येक सदस्य को अपने दोषों को निवारित करने का पूरा अवसर मिलता है - परितः वारयति स्वदोषान् यस्मिन् स परिवारः। दाम्पत्य जीवन अपनाते हुए पति-पत्नी परिवार का प्रबन्धन बड़े कौशल से करते हैं। उनके श्रम को सार्थकता प्रदान करने के लिए देवता भी उनके सखा बन जाते हैं। बिना परिश्रम करके थके देवता सखा नहीं बनते - 
न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः। (ऋग्वेद)
पारिवारिक दायित्व वहन करने के लिए ही विवाह संस्कार किया जाता है। बोळ्हा (वोढा) वर और वधू मिलकर दम्पती बने। दाम्पत्य के लिए कन्या ही वर का वरण करके वधू बनती है। पुरुष को वरण करने का अधिकार नहीं है। दम्पती को सन्तान-परम्परा का निर्वाह भी करना पड़ता है। सन्तान को संस्कार देने का काम माता करती है और अनुशासित करने का काम पिता करता है। आचार्य आचरण की शिक्षा देता है। बालक से इसीलिए कहा गया है - मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव।
जीवन में सतत ताजगी बनाये रखने के लिए जीवन को उत्सव बनाने का विचार पनपा। भारत में वर्ष भर में प्रतिदिन को उत्सव बनाकर जीने का विधान है। कुछ उत्सव ऋतु-परिवर्तन से सम्बंद्ध होते हैं, कुछ मानवीय सम्बन्धों की घनिष्ठता और पवित्रता से सम्बद्ध हैं। कुछ उत्सव जीवन को संस्कारित करने वाले हैं तो कुछ श्रम निष्ठ जीवन के अंग। कुछ कला-साधना से सम्बद्ध होते हैं। कुछ उत्सव धार्मिक आचरण से सम्बद्ध होते हैं।
महाभारत के अनुसार उत्सवों से गणराज्यों का परिचय मिलता है - गणान् उत्सव संकेतान्। होली आमीर गणराज्य का उत्सव था जिसने राष्ट्रीय रूप ग्रहण कर लिया। दीपावली वैश्य गणराज्य का उत्सव था। उसने भी राष्ट्रीय रूप ग्रहण कर लिया। कृषि जीवन के त्योहार अक्षय तृतीया, मकर संक्रान्ति आदि हैं। रक्षाबन्धन में बहिन भाई की कलाई में रक्षासूत्र बाँध कर उसको वेद, धर्म, राष्ट्र, भाषा और संस्कृति की रक्षा करने का व्रत दिलाती है। शिक्षण संस्थाओं में गुरु शिश्य को विद्यारम्भ और वेदारम्भ संस्कार करता है।
सभी उत्सवों में महिलाओं की विशेष भूमिका होती है। अपने दाम्पत्य सम्बन्धों को सुदृढ़ करने के लिए महिलाएँ शिव, विष्णु, दुर्गा, राम, कृष्ण, कुलदेवताओं का पूजन करती है। गोमाता, गंगामाता, तुलसीमाता आदि का पूजन करती हैं। पति के सुदीर्घ जीवन की कामना के लिए वह कई व्रत और कथाओं का सहारा लेता हैं। अष्ट सौभाग्यवती व्रत करती है। कामना करती है कि उसकी अन्तिम सांस सौभाग्यवती के रूप में ही निकले। 
कई व्रत कष्टदायक होते हैं। संकष्टी चतुर्थी,  ऊभछठ, करवाचैथ आदि के व्रत निर्जल उपवास के रूप में किए जाते हैं। अपने पति की दीर्घायु की कामना से ये व्रत किए जाते हैं। दीर्घायु के लिए एकादशी, प्रदोष, शिवरात्रि, पूर्णिमा, तीज, सोमवती अमावस आदि के व्रत भी किए जाते हैं। भाई दीर्घायु के लिए वह भैयादूज का व्रत करती है। पुत्र की दीर्घायु के लिए पुत्रजीवन्तिका व्रत करती है।
संसार के कल्याण की कामना के लिए वह कार्तिक स्नान, माघ स्नान का व्रत लेती है। तीर्थाटन करती है। कथा-श्रवण करती है। सीता के नित्य प्रति स्नान करने से गोदावरी का जल पवित्र होने की स्मृति कालिदास जगाते हैं। पार्वती की माता मेना को उन्होंने मुनियों की भी माननीय कहा था - मेनां मुनानामपि माननीयाम्।
नारी का सम्पूर्ण जीवन लोक कल्याण के लिए समर्पित होता है। इसीलिए मनु ने कदाचित् कहा है - न स्त्री स्वातंत्र्यम् अर्हति। जीवन का क्षण-क्षण वह लोक कल्याण के लिए समर्पित कर देती है। वह प्रथम पूजनीय है। मनु ने कहा है कि जहाँ नारी का पूजन होता है वहाँ देवता भी रमण करते हैं -
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।
मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने शबरी को तुलसी के शब्दों में भामिनि (प्रकाशवती) और वाल्मीकि के शब्दों में महान्त्रमणा कहा है। पोषक पिता जनक ने सीता के लिए कहा है - यदि पवित्रता की कोई परिभाषा करनी हो तो सी और ता शब्द कह दीजिए। राम ने अश्वमेध में सीता सामने न होने के कारण उसे स्वर्ण मूर्ति के रूप में प्रतिष्ठपित किया था।
लीला पुरुशोत्तम श्री कृष्ण की राधा के बिना कल्पना ही नहीं की जा सकती। शिवाजी को संस्कार प्रदान करने वाली माता जीजा बाई और महाराणा प्रताप की माता जैमन्ता देवी और उदयसिंह की पन्ना धाय के नाम इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखे गए हैं। ईसा के साथ माता मरियम का नाम भी स्मरणीय माना जाता है। शुद्धोऽसि बुद्धोऽसि निरंजनोऽसि की लोरी देने वाली माता मदालसा और अत्रिपत्नी अनसूया के नाम भी चिरस्मरणीय है। असुरों का संहार करने वाली देवी शक्तियों ने स्त्री का रूप बना कर ही अपना कार्य संपादित किया। रक्तबीज को मारने के लिए चण्डिका भी बनी।  


Wednesday, 7 September 2016

सार्थकता : केन्द्र समाचार

हमारा जीवन अर्थपूर्ण और उद्देश्यपूर्ण होना चाहिए। वह उद्देश्य है हमारी मातृभूमि की सेवा करना, राष्ट्र को सशक्त और जगदगुरु भी बनाना। हमने, माननीय एकनाथजी की जन्म शताब्दी के अवसर पर तीन दिवसीय शिविर में, इस बिन्दु पर विचार-विमर्श कर लिया है। अब हम सबको इस संदेश को हमारे संबंधित स्थानों तक ले जाना है और उस समाज को सुसंगठित बनाने के लिए कार्य करना है।
हमें अपने जीवन में, केन्द्र प्रार्थना में उल्लिखित समस्त गुणों को अपने हृदय में बिठा लेना चाहिए। आओ, हम में से प्रत्येक व्यक्ति, इसे करने का पूर्ण प्रयास करें। ताकि अगली बार जब हम मिलें, हमारी गतिविधियाँ हमारे समाज में प्रसारित हो जाएँ और स्वामीजी का संदेश वास्तविकता प्राप्त कर लेना चाहिए।

अनंतकाल से, भारत ने, त्याग और सेवा - इन दो आदर्शों को सदैव अपने सम्मुख रखा है। त्याग तभी सार्थक होता है जब वह सेवा से जुड़ा हो। हमारे प्राचीन शास्त्रों ने हमें इस श्लोक द्वारा अमरत्व का मार्ग दिखाया है ‘त्यागेन एकेन अमृतत्वम् अनुशुः’ पश्चिमी संस्कृति ने सिखाया है कि भोग महत्त्वपूर्ण है और भोग के लिए प्रत्येक वस्तु का व्यय किया जाता है। हमारी संस्कृति ने हमें सिखाया है कि, त्याग के पश्चात् ही भोग पर हमारा अधिकार होता है। एक कार्यकर्ता को, समाज की अच्छाई के लिए, अपनी ऊर्जा और अपने समय का उपयोग करने में समर्थ होना चाहिए। उसे उन गतिविधियों में अपना समय व्यर्थ नहीं गवाँना चाहिए जो निरर्थक हैं अथवा जिनमें उसकी व्यक्तिगत रुचि है। उसे समाज के प्रति एक सकारात्मक दृष्टिकोण भी विकसित करना चाहिए। उसे पूर्ण रूप से आश्वस्त होना चाहिए कि समाज धीरे-धीरे एक आदर्श समाज में विकसित हो जाएगा। समाज की नेकनामी उसे पूर्ण संतुलित रखती है और यही वास्तविक धर्म है।

प्रत्येक व्यक्ति को, अपने में, दूसरों को अच्छा बनने में सहायता देने की आदत को विकसित करना चाहिए और उनमें कोई दोष होने पर, उन पर दोषारोपण नहीं करना चाहिए। निम्नांकित विभिन्न गुणों को विकसित कर सार्थकता का उन्नयन किया जा सकता है जैसे - ईश्वर में श्रद्धा, निर्भयता, पवित्रता और सत्य, अनाशक्ति, करुणा, संतोश, सहभागिता, बुद्धिमता, कृतज्ञता, क्षमा, धैर्य, स्वीकार्यता, उत्कृटता, विनम्रता, साहस, परिवर्तन शीलता आदि।

केन्द्र के प्रत्येक कार्यकर्ता को इन सभी गुणों को साकार रूप प्रदान का प्रयास करना चाहिए। इससे उसका जीवन सार्थक बनेगा और मातृभूमि समर्थ बनेगी।


Thursday, 4 August 2016

राष्ट्र चेतना अंक


वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः
भारत की सनातन परम्परा में प्रत्येक साधक की पहली चाह होती है - जगने की, जागरूक रहने की। यजुर्वेद में इसी चाह को शब्द दिए गए हैं - हम राष्ट्र में पुरोहित बन कर जागें - वयं राष्ट्रs जागृयाम पुरोहिताः।
राष्ट्र का अर्थ होता है - प्रकाशमान्, द्युतिमान, दीप्तिमान्। श्रेष्ठ आचार और विचार से जीवन में सत्त्व गुण का उद्रेक होता है तब मनुष्य में प्रकाश प्रकट होता है। ‘सत्त्वं लघु प्रकाशकम्’ - सत्त्वगुण स्फूर्ति और प्रकाश पैदा करता है। तब व्यक्ति प्रकाश पुंज - राष्ट्र बन जाता है।
ऐसे व्यक्तियों का समूह भी राष्ट्र होता है और वे जहाँ रहते हैं वह भूखण्ड भी राष्ट्र बन जाता है। भारत-भा-रत = प्रकाश में लीन है। भारत शब्द राष्ट्र का पर्याय है। यह राष्ट्र शब्द राज-दीप्तौ धातु से बनता है। इस नाम की सार्थकता तभी है जब प्रत्येक व्यक्ति राष्ट्र बने - राजा बने। प्रत्येक माता अपने बेटे को ‘राजा बेटा’ बनाना चाहती है - बेटी को ‘रानी बेटी’ बनाता चाहती है। 
माता संस्कार दात्री होती है। इसलिए उसमें यह क्षमता होती है कि वह अपनी सन्तान को प्रकाशमान्-प्रकाशमती बना दे। इसीलिए माता महीयसी होती है। वाल्मीकि ने कहा है -
जननी जन्मभूमिष्च स्वर्गादपि गरीयसी ।
राष्ट्र संज्ञक नागरिक जब भूखण्ड को राष्ट्र संज्ञा प्रदान करते हैं तो उसके निकट से निकट होने की साध एक मंत्र में प्रकट की गई है - उप सर्प मातरम् भूमिम्। अथर्ववेद के पृथिवीसूक्त में कहा गया है - माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः - भूमि माता है और मैं पृथिवी का पुत्र हूँ। मैथिलीषरण गुप्त ने कहा था - 
हे मातृभूमि ! तू सत्य ही, सगुणमूर्ति सर्वेश की ।
भूमि की उपासना को भोंम-ब्रह्म की उपासना कहा गया है।
भारत को त्यागभूमि कहा जाता है और भोगभूमियों से उसे पृथक् माना गया है। भारतवासी त्यागपूर्वक ‘भोग त्यक्तेन भुंजीथाः’ में विश्वास करते हैं। इसके लिए दूसरा राष्ट्र शब्द है - रा-दाने धातु से बहुलार्थक = या ष्ट्रन् प्रत्यय से बना हुआ है। राज-धातु से बने हुए राष्ट्र शब्द से यह नितान्त भिन्न है - इसी कारण अर्थ भिन्न है।
ये दोनों राष्ट्र शब्द अलग-अलग अर्थ के वाचक हैं। डा. फतहसिंह का कहना है कि जिनकी रीतियाँ समान हों उस मानव-समुदाय को राष्ट्र कहा जाता है। ‘अराति’ उसे कहा जाता है जो दूसरे संगी-साथियों को उनका प्राप्य नहीं देता - न राति स अरातिः ।
भारत की भिन्न प्रकार की एक पहचान और है - वह है - जहाँ कृष्णसार - कस्तूरी मृग निद्र्वन्द्व होकर विचरते हों - कस्तूरी जैसी महंगी गन्ध को प्राप्त करने के लिए उनको मारा न जाता हो - वह भारतवर्ष है अर्थात् नितान्त निर्लोभवृत्ति के लोग जहाँ रहते हों वह है भारतवर्ष। 
विष्णु पुराण में कहा गया है कि जिसके गीत देवता भी गाते हैं और स्वर्ग-अपवर्ग से महत्त्वपूर्ण जिस भूमि में अमरत्व छोड़कर देवता भी जन्म लेने को लालायित रहते हैं - वह है भारतवर्ष।
गयन्ति देवाः किल गीतिकानि धन्योऽयं भारतभूमिः भागः।
स्वर्गापवर्गास्पद मार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषा सुरत्त्वात् ।।
वर्षं तद्भारतं ज्ञेयः भारती यस्य सन्ततिः।
मनु के अनुसार यह भारत पूर्व समुद्र (प्रशान्त महासागर) से पश्चिम सागर (भूमध्य सागर, कृष्ण सागर, लाल सागर और मृत सागर का संयुक्त रूप) तक विस्तीर्ण है। उदयाचल पर्वत (प्रशान्त महासागर का तट) से अस्ताचल तक (सिनाई प्रायद्वीप के टेरेसाँ पर्वत तक फैला हुआ है। इसी के लिए जयशंकर प्रसाद ने कहा है -
हिमालय के आँगन में जिसे प्रथम किरणों का दे उपहार,
उशा ने हँस अभिनन्दन किया और पहनाया हीरक हार ।
इस विराट् राष्ट्र में एक अखण्ड परिवार रहता है। भाशा भले ही भिन्न-भिन्न बोलते हों, धर्म-आचार-पद्धतियाँ भले ही पृथक्-पृथक् हों; अलग-अलग क्षेत्रों में भले ही बसते हों, विचार भले ही पृथक् पृथक् हों - पर, है यह एक अखण्ड परिवार। सब प्रकार के मतभेदों से ऊपर उठकर - एक होकर जीने का मार्ग हमने खोज लिया है।
अपने-पराये के भेद को भूलकर उदारचरित बन कर वसुधा को कुटुम्ब बनाकर जीने का अभ्यास भी हमने किया है -
अयं निजः परो बेति गुणना लघुचेतसाम् ।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ।।
(मनुस्मृति)
धर्मप्राण भारत ने याज्ञवल्क्य के इस कथन को माना है - 
अयं तु परमो धर्मः यद् योगेन आत्मदर्शनम् ।
(याज्ञवल्क्य स्मृति)
सब प्राणियों में, कण-कण में आत्म-साक्षात्कार करने की विधि हमने खोज ली है। हम सृष्टि संवत् 1974927118 को स्मरण करते रहते हैं। सब वेद से प्रसिद्ध होता है - यह भी हम जानते हैं - वेदात् सर्वं प्रसिद्ध यति। वेद ही अखिल धर्म का मूल है। इसीलिए यह वेदभूमि है।
परिवार संसार का सबसे बड़ा विष्वविद्यालय है। सबसे बड़ा चिकित्सालय है। सबसे बड़ी पाठशाला है। इसका निर्माण गृहिणी करती है - गृहिणी गृहम् उच्यते। मनुस्मृति के इस कथन का वैदिक आधार है - जायेदस्तम् - जाया इत् अस्तम् = जाया ही घर है। नारी की सुरक्षा और सम्मान परिवार में संभव है। परिवार में हर सदस्य को अपने दोषों को दूर करने की छूट होती है - परितः (नि-) वारयति स्व दोषान् यस्मिन्। परिवार नामक संस्था को सुरक्षित रखने से ही भारत राष्ट्र सुरक्षित है।