Sunday, 3 April 2016

समरसता का संचार





जीवन में एकरसता के कारण मानसिक तनाव और अनेक प्रकार के रोगों का प्रकोप बढ़ता जा रहा है। इसलिए आवश्यक है कि इस समस्या का समय रहते समाधान खोजा जाय। समरसता इस समस्या का समाधान है।

नित्य टी.वी. और लेपटाप के सामने देर रात तक आँखें गड़ाये रखना, देर से सोना और देर से उठना, इसके बाद भागते-दौड़ते दफ्तर भाग जाना और वहाँ पर दिन भर फाइलों में खोये रहना, फिर हारे-थके घर आकर पड़ जाना - इतने में ही जीवन सीमिट कर रह गया है। इससे छुट्टी चाहिए तो बीमारी का बहाना करना पड़ता है। दो-चार बीमारी का बहाना करने के बाद बीमारी सचमुच आ जाती है। फिर अस्पताल के फेरे, एण्टीबायोटिक ओषधियों का सेवन और डाक्टरों के यहाँ हाजिरी-नित्य का काम बन जाता है। जीवन से ताजगी गायब हो गयी है।

बतरस से ताजगी बटोरना चाहें तो न बात कहने वाला मिलता है, न बात सुनना ही कोई पसन्द करता है। यह तो जीवन-संग्राम भी नहीं है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने कहा था - इसको ही क्या कहते हैं ये विद्वज्जन जीवन-संग्राम। तो इसमें सुनाम पा लेना है कितना साधारण काम।

एकरसता से मुक्ति पा लेना तो साधारण काम नहीं है। हँसी है एकरसता से बचने का उपाय। पर, किस पर हँसे ? अपने आप पर हँसे तो लोग पागल कहेंगे और दूसरों पर हँसे तो वे पत्थर मारने को तत्पर हो जायेंगे।

लोगों की रुचि एक जैसी नहीं होती। कुछ लोग आशावादी होते हैं। उनको जीवन में कुछ नयापन आने की आशा होती है। अन्य निराशावादी होते हैं। निराशा और हताशा उनको नकारात्मक और अकर्मण्य बना देती है। इनसे मुक्ति पाना टेढ़ी खीर हो गया है।

लोभ नरक का द्वार है; पर लोभ से पीछा नहीं छूटता। यही हाल काम और क्रोध का भी है। मानव मन अत्यन्त इच्छाएँ पाल कर बैठा रहता है। वे कभी पूरी हो ही नहीं सकती है। उनको दबाएँ तो मानसिक रोग उभर आते हैं। व्यक्ति वरदान माँगता है -
सांई इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय । 
आप नहीं भूखा रहे, अतिथि न भूखो जाय ।।

एक दूसरा व्यक्ति वर माँगता है -
गोधन, गजधन, वाजिधन और रतनधन खल । 
जो आये सन्तोश धन, सब धन धूरि समान ।।
मन की आकुल-व्याकुलता इन्द्रियों की खींचतान के कारण हैं। उसको रोकने के लिए इन्द्रियों पर विजय पाना जरूरी है। वे विषयों की ओर दौड़ती हैं। विषयों से उनको निवृत्त करना जरूरी है। मन की लगाम खींचने से यह संभव है। मन को वश में किया जाय।

अर्जुन ने अनुभव किया था कि मन को वश में करना कठिन है, वह प्रमथनकारी है, बलवान् है और दृढ़ है -
दुर्निग्रहं तु मनः कृष्ण प्रमाथीः बलवद् दृढम्।

तब कृष्ण ने कहा था कि हे अर्जुन ! ऐसे मन को भी अभ्यास और वैराग्य से वश में किया जा सकता है -
अभ्यासेन तु कौन्तेय, वैराग्येण च गृह्यते । (गीता)

एकरसता की जड़ता को तोड़ने के उपाय भी अभ्यास और वैराग्य हैं।

हमारे पुरुखों ने जीवन की एकरसता को समाप्त करने और समरसता लाने के लिए जीवन को उत्सव (उत्कृष्ट यज्ञ) बनाने का उपाय खोजा था। कहा जाता है - भारत तो त्योहारों का देश है जिसमें 365 दिन में 366 त्योहार होते हैं। अकेले व्यक्ति को अयज्ञिय कहा गया है - अयज्ञियो ह वै एषः योऽपत्नीकः। सत्यः यजमानः। श्रद्धा वै यजमान पत्नी । एकरसता से बचने का उपाय है - दाम्पत्य जीवन।

महाकवि जयशंकर प्रसाद के अनुसार जीवन के द्वन्द्व समाप्त हुए तो -
समरस थे जड़ और चेतन, श्रद्धा-विश्वास घना था। 

उसी स्थिति में आनन्द की सृष्टि होती है -
जीवन महोत्सव बनता है। महिला महस्यईळा = उत्सव की जन्मभूमि बनती है।

तभी अथक परिश्रम करने की मनोभूमि बनती है। प्रत्येक कर्म को श्रेष्ठ (यज्ञ) बनाकर करने की आदत पड़ जाती है - तब थकावट क्यों आयेगी। यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म’ - इस श्रेष्ठ कर्म को कर के अपने इष्टदेव के प्रति समर्पित कर दिया जाता है। थकावट और द्वन्द्व की समाप्ति होती है और समरसता का संचार होता है।

- डा. बद्रीप्रसाद पंचोली

 

Wednesday, 2 March 2016

संस्कारशीलता

संपादकीय

मनु का कथन है कि जन्म से सब शुद्र हैं | संस्कार से वे द्विज बनते हैं - जन्मना जायते शुद्र: संस्काराद्  द्विज उच्यते | संस्कार से ही मनुष्य बनता है | मानवी माता से जन्म लेने मात्र से कोई मनुष्य नहीं बन जाता | संस्कार ही मनुष्य को मनुष्य बनाते हैं |

संस्कारदात्री माता ही होती है | विद्या और जीवनानुभव से संस्कार की पुष्टि होती है | उक्ति है - ऋणं ह वै जायमान: जो भी पैदा हुआ है, वह ऋण स्वरूप होता है | ब्राह्मणी माता से ऋण ब्राह्मण पैदा होता है | क्षत्रिया माता से ऋण क्षत्रिय पैदा होता है | वैश्य माता से ऋण वैश्य उत्पन्न होता है और शुद्र माता से ऋण शुद्र पैदा होता है |इन सब को ऋण से धन बनना पड़ता है | ऋण से धन बनने पर ही मनुष्य धन्य बनता है | संस्कारों से ही मनुष्य ऋण से धन और धन्य बनता है |

संस्कारों से ही मनुष्य का चरित्र बनता है | भारतीय परम्परा में चरित्र को सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है | प्रत्येक भारतीय विश्व को चरित्र की शिक्षा देता था | मनु ने कहा है -

एतत् देश प्रसूतस्य सकाशाद् अग्रजन्मन: |
स्वम् स्वम् चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवा: ||

चरित्र की शिक्षा देने के कारण ही भारत विश्वगुरु कहलाता था | मनु ने यह भी कहा है कि एक भी चारित्रिक दोष से मनुष्य नष्ट हो जाता है - छिद्रेण नश्यते नर : | चरित्र व्यक्ति को श्रेष्ठ बनाता है, आर्य बनाता है जिसके कारण भारत आर्यावर्त कहलाता है, जिसमें आर्य बार-बार पैदा होते है -

 आर्या: आवर्तन्ते पुन: पुन: इति आर्यावर्त: 

संस्कार ही मनुष्य को उदार चरित बनाते हैं जो अपने और पराये का भेद नहीं करते और संपूर्ण वसुधा को ही कुटुम्ब की तरह मानते हैं -

अयं निज: परोवेति गणना लघुचेतसाम् |
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ||

संस्कार मनुष्य को इतना सक्षम बना देते हैं कि वह प्रत्येक कार्य को श्रेष्ठ बना दे | श्रेष्ठ कर्म को यज्ञ कहा जाता है - यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म: | संस्कारी मनुष्य यज्ञ-योगमयी जीवनशैली अपनाता है | भोगमय शैली से दूर रहता है | यजुर्वेद में कहा गया है - आयुर्यज्ञेन कल्पताम् | वह अपने संपूर्ण जीवन को यज्ञ बन लेता है |

संस्कार और संस्कृति एक ही अर्थ ज्ञापित करते हैं | कृ धातु और  घञ् प्रत्यय से कार शब्द बनता है, अर्थ है - करने का भाव | कृ से क्तिन्  प्रत्ययपूर्वक कृति शब्द बनता है , जिसका अर्थ है - करने का भाव | सम् उपसर्ग का अर्थ है - सम्यक्, उचित प्रकार से करना | सम् + कृति के बीच में सुप् का आगम शोभास्पद् के अर्थ में हुआ है | सम्यक् और शोभास्पद् रूप से करने का भाव है - संस्कार या संस्कृति | 

यजुर्वेद के अनुसार मनुष्य मात्र की संस्कृति एक ही है - सा प्रथमा संस्कृति: विश्ववारा: | मनुष्य जाति एक और उसकी संस्कृति भी एक - विश्ववरणीय | संस्कारशील व्यक्ति की जीवन दृष्टि ही बदल जाती है | वह सर्वत्र आत्मदर्शन में प्रवृत्त हो जाता है - अयं तु परमो धर्म: यद्योगेनात्यदर्शनम् | संस्कार विश्व शान्ति का द्वार खोल देते हैं |

वेद का वचन है - उद्यानम् ते नावयानम् अर्थात् हे पुरुष ! तुम्हारे लिए एक ही मार्ग है - उपर जाने का, नीचे जाने का नहीं | सब मनुष्य संस्कारशील बन कर उन्नति करें |

Friday, 5 February 2016

सबके श्रद्धापात्र

संपादकीय

रामकृष्ण परमहंस मठ में माँ काली के पुजारी थे। साधना के बल पर दिव्य व्यक्तित्व का विकास करके वे जन-जन के आदर्श बन गये। उनको परमहंस इसलिए कहा गया कि उन्होंने अपने जीवन में सभी धर्मों की आचार - पद्धति अपनाकर सीमित अवधि में साधनापूर्ण जीवन जिया था।

वे भारत की यज्ञ-योगमयी जीवन-पद्धति में से विश्वास करते थे। याज्ञवल्क्य ने कहा था कि योगपूर्वक सबमें आत्मदर्षन ही परम धर्म है। इसको रामकृष्ण ने प्रयोग करके दिखाया। उनकी सबसे बड़ी देन है - विवेकानन्द। नरेन्द्र के रूप में जो केवल तर्क करता था, ईश्वर को नकारता था उस नरेन्द्र को उन्होंने शक्तिपात के द्वारा विराट् व्यक्तित्व प्रदान किया।

नरेन्द्र पहली बार उनके पास आया तब उसने प्रश्न किया था - क्या आपने ईश्वर को देखा है ? उनका उत्तर था - हाँ, देखा है। वैसे ही, जैसे तुम्हें देख रहा हूँ।

नरेन्द्र ने जिज्ञासा की कि मुझे भी दर्शन कराइये। तब उन्होंने नरेन्द्र को दूसरे दिन निश्चित समय पर अपने पास बुलाया। वे उस समय समाधि में बैठे हुए थे। उनके पास आकर नरेन्द्र बैठ गया। रामकृष्ण ने अपना हाथ नरेन्द्र के सिर पर रख दिया। शक्तिपात हुआ।

रामकृष्ण ने समाधि टूटने पर नरेन्द्र से प्रश्न पूछा - बोलो क्या देखना-जानना चाहते हो नरेन्द्र का उत्तर था - कुछ नहीं पूछना। जो जानना था - वह जान लिया।

परिवार की अकिंचनता नरेन्द्र के लिए चिन्ता का कारण थी। रामकृष्ण ने कहा - जा, काली माता से जो चाहे माँग ले। वे मंदिर में गए। चिन्मयी माता के सामने हाथ जोड़कर खड़े हुए और माँगा - माँ मुझे ज्ञान दो, भक्ति दो, वैराग्य दो।

मनुष्य को परमात्मा ने बुद्धि दी है जिसकी वृत्ति है - विवेक। अपने हित-अहित की पहचान तो पशु-पक्षी भी कर लेते हैं। मनुष्य स्वविवेक से हित-अहित की पहचान करता है। विवेकानन्दयह नाम तो खेतड़ी में महाराज अजीतसिंह ने दिया; पर विवेकी रामकृष्ण परमहंस ने ही बनाया।

लोक कल्याण के लिए स्वामी विवेकानन्द ने रामकृष्ण मिशनकी स्थापना की। उन्होंने रामकृष्ण के आशीर्वाद से  देशभर में आम आदमी के लिए शिक्षण संस्थाएँ, चिकित्सा केन्द्र और ध्यान योग केन्द्र स्थापित किए।

ठाकुर का विवाह माँ सारदा से हुआ था, इसके बावजूद भी उन्होंने कभी सांसारिक जीवन नहीं जिया। उनके साधनामय जीवन से माता सारदा को कोई शिकायत या असुविधा नहीं थी। उनके सान्निध्य में वे स्वयं साधिका बन गयी थी।

रामकृष्ण तर्क से अधिक भावना को महत्त्व देते थे। साधना को सुविधा से अधिक महत्त्व देते थे। उनके उपदेश सुनकर कई लोगों के जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन आ गया। उनके जीवन की दशा ही बदल गई।

स्वामी दयानन्द भी उनसे मिलने के लिए गए थे। मिलने के पहले स्वामी दयानन्द हाथ में दण्ड लेकर जल्दी-जल्दी घूम रहे थे। समाधि टूटने पर रामकृष्ण को उनके शिष्य ने बताया कि स्वामी दयानन्द आपसे मिलने आये हैं। रामकृष्ण ने पूछा कि ये इतने उतावले क्यों है। इस तरह तो इनको मोक्ष नहीं मिलेगा। शिष्य ने कहा कि ये समाज का उत्थान चाहते है। समाज में वेद को प्रतिष्ठित करना चाहते हैं। ये मोक्ष नहीं चाहते। यह सुनकर रामकृष्ण दयानन्द से बहुत प्रभावित हुए और उनसे आदरपूर्वक मिले।


अपने विकास और उद्धार के लिए तो सब प्रयास करते हैं; रामकृष्ण परमहंस ने दूसरों के विकास में रुचि ली। इसलिए उनको महान् व्यक्ति निर्माता और समाज निर्माता के रूप में प्रसिद्ध मिली और वे सबकी श्रद्धा के पात्र बन गये।