Wednesday, 2 March 2016

संस्कारशीलता

संपादकीय

मनु का कथन है कि जन्म से सब शुद्र हैं | संस्कार से वे द्विज बनते हैं - जन्मना जायते शुद्र: संस्काराद्  द्विज उच्यते | संस्कार से ही मनुष्य बनता है | मानवी माता से जन्म लेने मात्र से कोई मनुष्य नहीं बन जाता | संस्कार ही मनुष्य को मनुष्य बनाते हैं |

संस्कारदात्री माता ही होती है | विद्या और जीवनानुभव से संस्कार की पुष्टि होती है | उक्ति है - ऋणं ह वै जायमान: जो भी पैदा हुआ है, वह ऋण स्वरूप होता है | ब्राह्मणी माता से ऋण ब्राह्मण पैदा होता है | क्षत्रिया माता से ऋण क्षत्रिय पैदा होता है | वैश्य माता से ऋण वैश्य उत्पन्न होता है और शुद्र माता से ऋण शुद्र पैदा होता है |इन सब को ऋण से धन बनना पड़ता है | ऋण से धन बनने पर ही मनुष्य धन्य बनता है | संस्कारों से ही मनुष्य ऋण से धन और धन्य बनता है |

संस्कारों से ही मनुष्य का चरित्र बनता है | भारतीय परम्परा में चरित्र को सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है | प्रत्येक भारतीय विश्व को चरित्र की शिक्षा देता था | मनु ने कहा है -

एतत् देश प्रसूतस्य सकाशाद् अग्रजन्मन: |
स्वम् स्वम् चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवा: ||

चरित्र की शिक्षा देने के कारण ही भारत विश्वगुरु कहलाता था | मनु ने यह भी कहा है कि एक भी चारित्रिक दोष से मनुष्य नष्ट हो जाता है - छिद्रेण नश्यते नर : | चरित्र व्यक्ति को श्रेष्ठ बनाता है, आर्य बनाता है जिसके कारण भारत आर्यावर्त कहलाता है, जिसमें आर्य बार-बार पैदा होते है -

 आर्या: आवर्तन्ते पुन: पुन: इति आर्यावर्त: 

संस्कार ही मनुष्य को उदार चरित बनाते हैं जो अपने और पराये का भेद नहीं करते और संपूर्ण वसुधा को ही कुटुम्ब की तरह मानते हैं -

अयं निज: परोवेति गणना लघुचेतसाम् |
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ||

संस्कार मनुष्य को इतना सक्षम बना देते हैं कि वह प्रत्येक कार्य को श्रेष्ठ बना दे | श्रेष्ठ कर्म को यज्ञ कहा जाता है - यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म: | संस्कारी मनुष्य यज्ञ-योगमयी जीवनशैली अपनाता है | भोगमय शैली से दूर रहता है | यजुर्वेद में कहा गया है - आयुर्यज्ञेन कल्पताम् | वह अपने संपूर्ण जीवन को यज्ञ बन लेता है |

संस्कार और संस्कृति एक ही अर्थ ज्ञापित करते हैं | कृ धातु और  घञ् प्रत्यय से कार शब्द बनता है, अर्थ है - करने का भाव | कृ से क्तिन्  प्रत्ययपूर्वक कृति शब्द बनता है , जिसका अर्थ है - करने का भाव | सम् उपसर्ग का अर्थ है - सम्यक्, उचित प्रकार से करना | सम् + कृति के बीच में सुप् का आगम शोभास्पद् के अर्थ में हुआ है | सम्यक् और शोभास्पद् रूप से करने का भाव है - संस्कार या संस्कृति | 

यजुर्वेद के अनुसार मनुष्य मात्र की संस्कृति एक ही है - सा प्रथमा संस्कृति: विश्ववारा: | मनुष्य जाति एक और उसकी संस्कृति भी एक - विश्ववरणीय | संस्कारशील व्यक्ति की जीवन दृष्टि ही बदल जाती है | वह सर्वत्र आत्मदर्शन में प्रवृत्त हो जाता है - अयं तु परमो धर्म: यद्योगेनात्यदर्शनम् | संस्कार विश्व शान्ति का द्वार खोल देते हैं |

वेद का वचन है - उद्यानम् ते नावयानम् अर्थात् हे पुरुष ! तुम्हारे लिए एक ही मार्ग है - उपर जाने का, नीचे जाने का नहीं | सब मनुष्य संस्कारशील बन कर उन्नति करें |

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