Tuesday, 15 November 2016

दिशा बोध

एकनाथ जी ने एक आध्यात्म उन्मुख सेवा मिशन के रूप में विवेकानंद केंद्र प्रारम्भ किया - जिसने हमें एक अंतर्दृष्टि और अवसर प्रदान किया कि हम कैसे ईश्वरीय साधन के रूप में देश के लिए काम कर सकते हैं। हम जो भी काम करते है, साधन भाव से करते हैं - ‘‘तवैव कार्यार्थमिहोपजात’’ यह मनोभाव कि हमारा चयन ईश्वरीय उपकरण के रूप में हुआ है - हमारे कार्य या सेवा को साधना में रूपांतरित कर देता है। इस उपकरण के मनोभाव का सतत अभ्यास योग है। योग केवल कुछ शारीरिक और श्वांस-प्रश्वांस का व्यायाम भर नहीं है। ये अभ्यास भगवान के काम के साधन को फिट रखने के लिए जरूरी है। योग का अभ्यास हमारे अंतस को शरीर और मन के साथ एकसूत्र में लाने जैसा जटिल कार्य करता है, जो हमारे आसपास सद्भाव को बढ़ाता है। 

एकनाथ जी ने ‘सेवा ही साधना’ में आदमी के विकास की यात्रा को बताया है । जन्म के बाद बच्चा केवल भूख को जानता है। जैसे जैसे बच्चा बढ़ता है, उसकी शारीरिक भूख धीरे-धीरे विभिन्न स्तरों पर बढ़ती है, जैसे शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, भावनात्मक आदि। उसे अहसास होता है कि उसकी कामनाओं, इच्छाओं की पूर्ति भर पर्याप्त नहीं है, चारों ओर एक शांतिपूर्ण समाज की भी जरूरत है और फिर जब वह एक ऐसा समाज बनाने के लिए काम करता है, तब उसका स्वार्थ परमार्थ में बदल जाता है। इससे उसे प्रेरणा मिलती है, कि वह अपने जीवन के आसपास की चीजों का अर्थ और गहराई से समझ सके। उसे समझ में आता है कि सृष्टि में निरुद्देश्य कुछ भी नहीं है। इस अनुभूति से उसके दिमाग में सवाल कोंधता है कि अगर सबका कुछ ना कुछ उद्देश्य है, तो फिर उसके जीवन का उद्देश्य क्या है? 

एकनाथ जी का कहना है कि ‘‘जब यह सवाल उठे, तभी आदमी वस्तुतः वयस्क होता है, अन्यथा तो वह केवल एक मूछों वाला बच्चा ही है।’’ जब इंसान अपने जीवन का उद्देश्य खोजता है, तब उसे अहसास होता है कि सृष्टि में सब कुछ योजनाबद्ध है। यह सिर्फ किसी वस्तु या जीवित प्राणी की ही बात नहीं है, बल्कि परिवार, समुदाय, समाज और राष्ट्र जैसी समष्टियों का भी एक उद्देश्य है। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि प्रत्येक राष्ट्र का अपना प्रारब्ध है, जो उसे भोगना होता है, प्रत्येक राष्ट्र के पास वितरित करने के लिए एक संदेश है, प्रत्येक राष्ट्र को पूरा करने के लिए एक मिशन है। हमारे राष्ट्र का मिशन पूर्ण करने के लिए हमें सौंप दिया गया है। मनुष्य को अपने राष्ट्र का मिशन विरासत में मिलता है। भारत का मिशन है दुनिया को आध्यात्मिकता, अर्थात एकत्व की दृष्टि देना । 

तो, जब हम पूरी ईमानदारी से जीवन के उद्देश्य की खोज शुरू करते हैं, हमें समझ में आता है कि यदि हम भारत में पैदा हुए हैं ‘‘इहोपजाताः’’, तो हमारा उद्देश्य भी आध्यात्मिक प्रगति में मानवता की मदद करना है। अतः आध्यात्मिक संदेश प्रसारित करने के लिए भारत को सक्षम संवाहक बनना होगा। इसलिए, भारत का पुनर्निर्माण, उसे जीवंत और आत्मविश्वास युक्त राष्ट्र बनाना हमारे जीवन का उद्देश्य बन जाता है। इसके लिए अपने आप को तैयार करना और अन्य अनेक को भी जागृत करना ताकि वे भी देश के लिए काम करने को अपने जीवन का उद्देश्य बनाने हेतु प्रेरित हों। इस प्रकार, मानव-निर्माण और राष्ट्र निर्माण आपस में जुड़कर हमारे जीवन का उद्देश्य बन गया है। निज परम हितार्थम का अर्थ है मनुष्य निर्माण, दैवीय प्रकृति (सद्गुणों) का प्राकट्य और राष्ट्र निर्माण द्वारा भारत को अध्यात्म में मानवता का मार्गदर्शन करने हेतु सक्षम करना। निज परम हितार्थम हेतु, मनुष्य निर्माण व राष्ट्र निर्माण गतिविधियों को संचालित करने के लिए संगठित प्रयासों की आवश्यकता है। मानवता को आध्यात्मिक बनाने के उच्च उद्देश्य हेतु संगठित प्रयास और उसके लिए राष्ट्र निर्माण अपने आप में एक साधना है। 

चूंकि हम भारत में पैदा हुए हैं, अतः इस देश का पुनर्निर्माण हमारे जीवन का उद्देश्य है। इसे केवल संगठित होकर ही किया जा सकता है। चूंकि राष्ट्र एक निष्क्रिय इमारत नहीं है अतः इसे व्यक्तियों के समूह द्वारा यंत्रवत बनाया जा सकता है। राष्ट्र चेतना का प्रवाह है, अतः राष्ट्र का पुनर्निर्माण अर्थात राष्ट्रीय चेतना युक्त स्थानीय नेतृत्व। इस काम के लिए, किसी को हमारे देश की आध्यात्मिक सम्पदा में गहराई से डूबना होगा। आध्यात्मिकता को व्याख्यान के माध्यम से प्रेषित नहीं किया जा सकता। आध्यात्मिकता का अर्थ कोई विशिष्ट धार्मिक या अन्य गतिविधि नहीं है। आध्यात्मिकता तो मन की एक विकसित स्थिति है, जो एकत्व की दृष्टि से आती है। एकत्व की यह जीवनदृष्टि और इन्हीं लाइनों पर विकसित मन व्यवहार में दिखाई देता है। इसके लिए हमें ‘‘कर्म योगैक निष्ठा’’ की आवश्यकता है। संतोष, धैर्ययुक्त मन, समावेशी दृष्टिकोण - प्रत्येक वस्तु में दैवीय तत्व की अभिव्यक्ति है, अतः सबको स्वीकार करने व सम्मान करने की जरूरत है - आत्म नियंत्रण और आपसी सद्भाव के लिए तत्परता से काम करने की जरूरत है। इसी प्रकार, हमारे देश के लिए संगठित तरीके से काम करने का मतलब है कि उसकी आध्यात्मिक जड़ों को जानकर तदनुसार काम करना और जीना, साथ ही टीमों का निर्माण करना। इसके लिए योग हमारे जीवन का मार्ग हो जाना चाहिए। अतः, भारत के पुनर्निर्माण में जुटे संगठन में काम करना अपने आप में एक साधना है और इसलिए, एकनाथ जी ने योग को विवेकानंद केंद्र के प्रमुख तत्व के रूप में चुना। 

जब हम राष्ट्र के पुनर्निर्माण के लिए किसी संगठन में काम करते हैं, तब हमें अपने व्यक्तिमत्व से परे जाना होगा, एकजुटता की शपथ लेनी होगी। त्याग, सेवा और आत्मबोध के अभ्यास से हम एकजुट हो सकते हैं। संगठनात्मक काम, नाम-रूप की पहचान से परे जाने की साधना है। जितना ज्यादा हम नाम-रूप की पहचान से चिपकते हैं, उतना ही एक टीम के रूप में विकसित होना कठिन होता है। जब तक हम एक टीम के रूप में विकसित नहीं होते, हम संगठनात्मक काम नहीं कर सकते। ‘ऑर्गेनाईजेशन’ शब्द ही ‘ओर्गेनिज्म’ से बना है जिसका अर्थ है, सम्पूर्ण शरीर में एक जीवन को देखना। शरीर के कई कोशिकायें और अंग है। प्रत्येक कोशिका का अपना जीवन और कार्य हैं, किन्तु पूरे शरीर का एक ही जीवन है, एक ही चेतना है, इसलिए यह एक सुर में कार्य करता है। इसी तरह, हालांकि हम संगठन में कई हैं, हमारा उद्देश्य एक ही है और इसलिए, हम एकता की दृष्टि से काम करते हैं। 

योग का अर्थ है अपने भीतर से एक रूपता, उसे आत्मा या ईश्वर जो भी नाम दें - जो अंतनिर्हित है, (जो भीतर मौजूद है या कुछ में निहित है) जो हर जगह है और जिसका सामुदायिक स्वरूप परिवार, संगठन, समाज, राष्ट्र और पूरी सृष्टि में प्रकट होता है। जब हम ध्यान करते हैं, तब चेतना के साथ एकत्व का अभ्यास करते हैं, शरीर-मन की जटिलता से परे जाते हैं। जब ध्यान में नहीं होते, तब योगाभ्यास का उपयोग हमारे शरीर, मन की जटिलता को परिवार, संगठन, राष्ट्र और सृष्टि जैसी दैवीय अभिव्यक्ति की सेवा में लगाना होता है। हमारे केन्द्र की प्रार्थना में हम कहते हैं ‘‘आत्मबोध’’ जो कठिनाइयों को अवसरों में बदलने के लिए आवश्यक है। किन्तु उस आत्मबोध को प्राप्त करने के लिए अपनी आत्म-शक्ति पर प्रतिदिन ध्यान केन्द्रित करने की आवश्यकता है। एकनाथ जी ने ‘‘साधना ऑफ सर्विस’’ में कहा है ‘‘चाहे जितनी कठिनाई हो, किन्तु अगर सही ढंग से समझकर अपनी मन की आंखों के सामने रखा तो विचार की पूर्ति होगी ही ! प्रतिभाशाली वह है, जिसके मन में विचार और दिल में बेहद मजबूत इच्छाशक्ति है। दस प्रतिशत प्रेरणा और नब्बे प्रतिशत पसीना बहाने वाले को प्रतिभाशाली कहा जाएगा। यह पसीना भीतर की प्रेरणा की अभिव्यक्ति है।... अन्य सभी मदद विफल हो सकती है, किन्तु अगर आपके पास आत्मबल है तो आप कभी निराश नहीं होंगे । यह आपके स्वयं के पास है।’’ 

इस आत्म-शक्ति के दोहन की शक्ति ‘योग’ में है। कार्यकर्ता यदि ईमानदारी से अपने दायित्व का निर्वहन भगवान के साधन की भावना से करता है, तो यह उसकी साधना भी है और योगाभ्यास भी । यही कारण है कि एकनाथ जी ने योग को विवेकानंद केंद्र का मूल तत्व बनाया - ‘कर्मयोग एकनिष्ठा’ ! जब हम अपने काम को साधना के रूप में करते हैं, तब कार्यकर्ता में परिपक्वता आती है। कार्यकर्ता की परिपक्वता का आंकलन इससे नहीं होता कि वह कितने वर्षों से काम कर रहा है । यह गुणवत्ता है, जैसा कि एकनाथ जी ने कहा है, ‘‘परिपक्व कार्यकर्ता वह है जो स्वयं संचालित है और जिसे सुधारने और नवीकरण की जरूरत नहीं होती’’। हमें ऐसे ही कार्यकर्ता बनना है। साधना दिवस पर, हम एकनाथ जी से प्रेरणा लेकर ऐसे ही कार्यकर्ता बनने के लिए जीवन में आगे बढ़ें।


Thursday, 6 October 2016

स्त्री शक्ति अंक : शक्तिमती कल्याणमूर्ति नारी


मैथिलीरण गुप्त ने कहा - अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी। आँचल में दूध और आँखों में पानी। स्त्री को अबला कहना पाप है। जिसके आँचल में दूध है - मानवता का पोण करने के लिए और आँखों में पानी है - मूर्तिमती करुणा बनने के लिए - वह अबला कैसे हो सकती है। अरबी में अ सर्वोत्तम वाचक उपसर्ग है। उसके आधार पर अबला का अर्थ होगा - सर्वोत्तम बलवती। hल ही स्त्री का आभूण है। इसलिए सर्वोत्तम शीलवती अर्थ भी हुआ।
वह कन्या रूप में काम्या है, माता रूप में स्वर्ग से भी अधिक गरिमामयी है - जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी; कुलवधू के रूप में वह पारिवारिक दायित्व निभाने वाली है; महिला के रूप में उत्सव की जन्मभूमि (महस्य इळा) है - जीवन को अपनी उपस्थिति से उत्कृष्ट यज्ञ का स्वरूप प्रदान करने वाली है।
उसको जयषंकर प्रसाद ने नारी तुम केवल श्रद्धा होकह कर गरिमा प्रदान की है। डाॅ. रामानन्द तिवारी ने कहा है - केवल श्रद्धा ही नहीं, क्ति भी नारी। गोस्वामी तुलसीदास ने रामवल्लभा सीता को उद्भवस्थितिसंहारकारिणी और क्लेहारिणी कहा है -
उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेहारिणीम् । स्र्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं राम वल्लभाम् ।।
 (रामचरित मानस)
ब्राह्मण ग्रन्थों में कहा गया है - अयज्ञियो ह वै ए यो अपत्नीकः। श्रद्धा पत्नी सत्यो ह वै यजमानः। श्रद्धा और सत्य को उत्तम जोड़ा कहा गया है। कालिदास और तुलसीदास ने पार्वती और शिव को संसार के माता पिता कह कर वन्दना की है -
जगतः पितरौ वन्दे पार्वती-परमेश्वरौ ।
ऋग्वेद के आम्भृणी-सूक्त में वाग्देवी स्वयं को राष्ट्रीकहती है - अहं राष्ट्री संगमनी वसूनाम्। राष्ट्री का अर्थ प्रकामती। साथ ही उसे धरती को वसने योग्य बनाने वाले वसुओं की संगमनी कहा है। 
वेद में उक्ति है - जायेदस्तम् = जाया इत् अस्तम् = जाया ही घर है। मनु ने इसी के आधार पर कहा है - गृहिणीगृहम् उच्यते। घर परिवार का निर्माण करना उसके श्रम की सफलता और सार्थकता है। इसमें वह अपने सहचर - पति का सहयोग लेती है। दोनों मिलकर समर्पित भाव से परिवार का पालन करते हैं इसलिए दम्पती कहलाते हैं। दमसय पतिः पालनकर्तारौ इति दम्पती।
परिवार संसार का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय है, चिकित्सालय है, प्रशिक्षण केन्द्र है और साधना भूमि है जिसमें प्रत्येक सदस्य को अपने दोषों को निवारित करने का पूरा अवसर मिलता है - परितः वारयति स्वदोषान् यस्मिन् स परिवारः। दाम्पत्य जीवन अपनाते हुए पति-पत्नी परिवार का प्रबन्धन बड़े कौल से करते हैं। उनके श्रम को सार्थकता प्रदान करने के लिए देवता भी उनके सखा बन जाते हैं। बिना परिश्रम करके थके देवता सखा नहीं बनते - 
न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः। (ऋग्वेद)
पारिवारिक दायित्व वहन करने के लिए ही विवाह संस्कार किया जाता है। बोळ्हा (वोढा) वर और वधू मिलकर दम्पती बने। दाम्पत्य के लिए कन्या ही वर का वरण करके वधू बनती है। पुरु को वरण करने का अधिकार नहीं है। दम्पती को सन्तान-परम्परा का निर्वाह भी करना पड़ता है। सन्तान को संस्कार देने का काम माता करती है और अनुशासित करने का काम पिता करता है। आचार्य आचरण की शिक्षा देता है। बालक से इसीलिए कहा गया है - मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव।
जीवन में सतत ताजगी बनाये रखने के लिए जीवन को उत्सव बनाने का विचार पनपा। भारत में वर्ष भर में प्रतिदिन को उत्सव बनाकर जीने का विधान है। कुछ उत्सव ऋतु-परिवर्तन से सम्बंद्ध होते हैं, कुछ मानवीय सम्बन्धों की घनिष्ठता और पवित्रता से सम्बद्ध हैं। कुछ उत्सव जीवन को संस्कारित करने वाले हैं तो कुछ श्रम निष्ठ जीवन के अंग। कुछ कला-साधना से सम्बद्ध होते हैं। कुछ उत्सव धार्मिक आचरण से सम्बद्ध होते हैं।
महाभारत के अनुसार उत्सवों से गणराज्यों का परिचय मिलता है - गणान् उत्सव संकेतान्। होली आमीर गणराज्य का उत्सव था जिसने राष्ट्रीय रूप ग्रहण कर लिया। दीपावली वैश्य गणराज्य का उत्सव था। उसने भी राष्ट्रीय रूप ग्रहण कर लिया। कृषि जीवन के त्योहार अक्षय तृतीया, मकर संक्रान्ति आदि हैं। रक्षाबन्धन में बहिन भाई की कलाई में रक्षासूत्र बाँध कर उसको वेद, धर्म, राष्ट्र, भाषा और संस्कृति की रक्षा करने का व्रत दिलाती है। शिक्षण संस्थाओं में गुरु शिश्य को विद्यारम्भ और वेदारम्भ संस्कार करता है।
सभी उत्सवों में महिलाओं की विशेष भूमिका होती है। अपने दाम्पत्य सम्बन्धों को सुदृढ़ करने के लिए महिलाएँ शि, विष्णु, दुर्गा, राम, कृष्ण, कुलदेवताओं का पूजन करती है। गोमाता, गंगामाता, तुलसीमाता आदि का पूजन करती हैं। पति के सुदीर्घ जीवन की कामना के लिए वह कई व्रत और कथाओं का सहारा लेता हैं। अष्ट सौभाग्यवती व्रत करती है। कामना करती है कि उसकी अन्तिम सांस सौभाग्यवती के रूप में ही निकले। 
कई व्रत कष्टदायक होते हैं। संकष्टी चतुर्थी,  ऊभछठ, करवाचैथ आदि के व्रत निर्जल उपवास के रूप में किए जाते हैं। अपने पति की दीर्घायु की कामना से ये व्रत किए जाते हैं। दीर्घायु के लिए एकादशी, प्रदो, शिवरात्रि, पूर्णिमा, तीज, सोमवती अमावस आदि के व्रत भी किए जाते हैं। भाई दीर्घायु के लिए वह भैयादूज का व्रत करती है। पुत्र की दीर्घायु के लिए पुत्रजीवन्तिका व्रत करती है।
संसार के कल्याण की कामना के लिए वह कार्तिक स्नान, माघ स्नान का व्रत लेती है। तीर्थाटन करती है। कथा-श्रवण करती है। सीता के नित्य प्रति स्नान करने से गोदावरी का जल पवित्र होने की स्मृति कालिदास जगाते हैं। पार्वती की माता मेना को उन्होंने मुनियों की भी माननीय कहा था - मेनां मुनानामपि माननीयाम्।
नारी का सम्पूर्ण जीवन लोक कल्याण के लिए समर्पित होता है। इसीलिए मनु ने कदाचित् कहा है - न स्त्री स्वातंत्र्यम् अर्हति। जीवन का क्षण-क्षण वह लोक कल्याण के लिए समर्पित कर देती है। वह प्रथम पूजनीय है। मनु ने कहा है कि जहाँ नारी का पूजन होता है वहाँ देवता भी रमण करते हैं -
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।
मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने बरी को तुलसी के ब्दों में भामिनि (प्रकावती) और वाल्मीकि के ब्दों में महान्त्रमणा कहा है। पोक पिता जनक ने सीता के लिए कहा है - यदि पवित्रता की कोई परिभाषा करनी हो तो सी और ता ब्द कह दीजिए। राम ने अश्वमेध में सीता सामने न होने के कारण उसे स्वर्ण मूर्ति के रूप में प्रतिष्ठपित किया था।
लीला पुरुशोत्तम श्री कृष्ण की राधा के बिना कल्पना ही नहीं की जा सकती। शिवाजी को संस्कार प्रदान करने वाली माता जीजा बाई और महाराणा प्रताप की माता जैमन्ता देवी और उदयसिंह की पन्ना धाय के नाम इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखे गए हैं। ईसा के साथ माता मरियम का नाम भी स्मरणीय माना जाता है। शुद्धोऽसि बुद्धोऽसि निरंजनोऽसि की लोरी देने वाली माता मदालसा और अत्रिपत्नी अनसूया के नाम भी चिरस्मरणीय है। असुरों का संहार करने वाली देवी क्तियों ने स्त्री का रूप बना कर ही अपना कार्य संपादित किया। रक्तबीज को मारने के लिए चण्डिका भी बनी।  


Wednesday, 7 September 2016

सार्थकता : केन्द्र समाचार

हमारा जीवन अर्थपूर्ण और उद्देश्यपूर्ण होना चाहिए। वह उद्देश्य है हमारी मातृभूमि की सेवा करना, राष्ट्र को सशक्त और जगदगुरु भी बनाना। हमने, माननीय एकनाथजी की जन्म शताब्दी के अवसर पर तीन दिवसीय शिविर में, इस बिन्दु पर विचार-विमर्श कर लिया है। अब हम सबको इस संदेश को हमारे संबंधित स्थानों तक ले जाना है और उस समाज को सुसंगठित बनाने के लिए कार्य करना है।
हमें अपने जीवन में, केन्द्र प्रार्थना में उल्लिखित समस्त गुणों को अपने हृदय में बिठा लेना चाहिए। आओ, हम में से प्रत्येक व्यक्ति, इसे करने का पूर्ण प्रयास करें। ताकि अगली बार जब हम मिलें, हमारी गतिविधियाँ हमारे समाज में प्रसारित हो जाएँ और स्वामीजी का संदेश वास्तविकता प्राप्त कर लेना चाहिए।

अनंतकाल से, भारत ने, त्याग और सेवा - इन दो आदर्शों को सदैव अपने सम्मुख रखा है। त्याग तभी सार्थक होता है जब वह सेवा से जुड़ा हो। हमारे प्राचीन शास्त्रों ने हमें इस श्लोक द्वारा अमरत्व का मार्ग दिखाया है ‘त्यागेन एकेन अमृतत्वम् अनुशुः’ पश्चिमी संस्कृति ने सिखाया है कि भोग महत्त्वपूर्ण है और भोग के लिए प्रत्येक वस्तु का व्यय किया जाता है। हमारी संस्कृति ने हमें सिखाया है कि, त्याग के पश्चात् ही भोग पर हमारा अधिकार होता है। एक कार्यकर्ता को, समाज की अच्छाई के लिए, अपनी ऊर्जा और अपने समय का उपयोग करने में समर्थ होना चाहिए। उसे उन गतिविधियों में अपना समय व्यर्थ नहीं गवाँना चाहिए जो निरर्थक हैं अथवा जिनमें उसकी व्यक्तिगत रुचि है। उसे समाज के प्रति एक सकारात्मक दृष्टिकोण भी विकसित करना चाहिए। उसे पूर्ण रूप से आश्वस्त होना चाहिए कि समाज धीरे-धीरे एक आदर्श समाज में विकसित हो जाएगा। समाज की नेकनामी उसे पूर्ण संतुलित रखती है और यही वास्तविक धर्म है।

प्रत्येक व्यक्ति को, अपने में, दूसरों को अच्छा बनने में सहायता देने की आदत को विकसित करना चाहिए और उनमें कोई दोष होने पर, उन पर दोषारोपण नहीं करना चाहिए। निम्नांकित विभिन्न गुणों को विकसित कर सार्थकता का उन्नयन किया जा सकता है जैसे - ईश्वर में श्रद्धा, निर्भयता, पवित्रता और सत्य, अनाशक्ति, करुणा, संतोश, सहभागिता, बुद्धिमता, कृतज्ञता, क्षमा, धैर्य, स्वीकार्यता, उत्कृटता, विनम्रता, साहस, परिवर्तन शीलता आदि।

केन्द्र के प्रत्येक कार्यकर्ता को इन सभी गुणों को साकार रूप प्रदान का प्रयास करना चाहिए। इससे उसका जीवन सार्थक बनेगा और मातृभूमि समर्थ बनेगी।


Thursday, 4 August 2016

राष्ट्र चेतना अंक


वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः
भारत की सनातन परम्परा में प्रत्येक साधक की पहली चाह होती है - जगने की, जागरूक रहने की। यजुर्वेद में इसी चाह को शब्द दिए गए हैं - हम राष्ट्र में पुरोहित बन कर जागें - वयं राष्ट्रs जागृयाम पुरोहिताः।
राष्ट्र का अर्थ होता है - प्रकामान्, द्युतिमान, दीप्तिमान्। श्रेष्ठ आचार और विचार से जीवन में सत्त्व गुण का उद्रेक होता है तब मनुष्य में प्रका प्रकट होता है। सत्त्वं लघु प्रकाकम्’ - सत्त्वगुण स्फूर्ति और प्रका पैदा करता है। तब व्यक्ति प्रका पुंज - राष्ट्र बन जाता है।
ऐसे व्यक्तियों का समूह भी राष्ट्र होता है और वे जहाँ रहते हैं वह भूखण्ड भी राष्ट्र बन जाता है। भारत-भा-रत = प्रका में लीन है। भारत ब्द राष्ट्र का पर्याय है। यह राष्ट्र ब्द राज-दीप्तौ धातु से बनता है। इस नाम की सार्थकता तभी है जब प्रत्येक व्यक्ति राष्ट्र बने - राजा बने। प्रत्येक माता अपने बेटे को राजा बेटाबनाना चाहती है - बेटी को रानी बेटीबनाता चाहती है। 
माता संस्कार दात्री होती है। इसलिए उसमें यह क्षमता होती है कि वह अपनी सन्तान को प्रकामान्-प्रकामती बना दे। इसीलिए माता महीयसी होती है। वाल्मीकि ने कहा है -
जननी जन्मभूमिष्च स्वर्गादपि गरीयसी ।
राष्ट्र संज्ञक नागरिक जब भूखण्ड को राष्ट्र संज्ञा प्रदान करते हैं तो उसके निकट से निकट होने की साध एक मंत्र में प्रकट की गई है - उप सर्प मातरम् भूमिम्। अथर्ववेद के पृथिवीसूक्त में कहा गया है - माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः - भूमि माता है और मैं पृथिवी का पुत्र हूँ। मैथिलीषरण गुप्त ने कहा था - 
हे मातृभूमि ! तू सत्य ही, सगुणमूर्ति सर्वे की ।
भूमि की उपासना को भोंम-ब्रह्म की उपासना कहा गया है।
भारत को त्यागभूमि कहा जाता है और भोगभूमियों से उसे पृथक् माना गया है। भारतवासी त्यागपूर्वक भोग त्यक्तेन भुंजीथाःमें विश्वास करते हैं। इसके लिए दूसरा राष्ट्र ब्द है - रा-दाने धातु से बहुलार्थक = या ष्ट्रन् प्रत्यय से बना हुआ है। राज-धातु से बने हुए राष्ट्र ब्द से यह नितान्त भिन्न है - इसी कारण अर्थ भिन्न है।
ये दोनों राष्ट्र ब्द अलग-अलग अर्थ के वाचक हैं। डा. फतहसिंह का कहना है कि जिनकी रीतियाँ समान हों उस मानव-समुदाय को राष्ट्र कहा जाता है। अरातिउसे कहा जाता है जो दूसरे संगी-साथियों को उनका प्राप्य नहीं देता - न राति स अरातिः ।
भारत की भिन्न प्रकार की एक पहचान और है - वह है - जहाँ कृष्णसार - कस्तूरी मृग निद्र्वन्द्व होकर विचरते हों - कस्तूरी जैसी महंगी गन्ध को प्राप्त करने के लिए उनको मारा न जाता हो - वह भारतवर्ष है अर्थात् नितान्त निर्लोभवृत्ति के लोग जहाँ रहते हों वह है भारतवर्ष। 
विष्णु पुराण में कहा गया है कि जिसके गीत देवता भी गाते हैं और स्वर्ग-अपवर्ग से महत्त्वपूर्ण जिस भूमि में अमरत्व छोड़कर देवता भी जन्म लेने को लालायित रहते हैं - वह है भारतवर्ष।
गयन्ति देवाः किल गीतिकानि धन्योऽयं भारतभूमिः भागः।
स्वर्गापवर्गास्पद मार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषा सुरत्त्वात् ।।
वर्षं तद्भारतं ज्ञेयः भारती यस्य सन्ततिः।
मनु के अनुसार यह भारत पूर्व समुद्र (प्रशान्त महासागर) से पश्चिम सागर (भूमध्य सागर, कृष्ण सागर, लाल सागर और मृत सागर का संयुक्त रूप) तक विस्तीर्ण है। उदयाचल पर्वत (प्रशान्त महासागर का तट) से अस्ताचल तक (सिनाई प्रायद्वीप के टेरेसाँ पर्वत तक फैला हुआ है। इसी के लिए जयशंकर प्रसाद ने कहा है -
हिमालय के आँगन में जिसे प्रथम किरणों का दे उपहार,
उशा ने हँस अभिनन्दन किया और पहनाया हीरक हार ।
इस विराट् राष्ट्र में एक अखण्ड परिवार रहता है। भाशा भले ही भिन्न-भिन्न बोलते हों, धर्म-आचार-पद्धतियाँ भले ही पृथक्-पृथक् हों; अलग-अलग क्षेत्रों में भले ही बसते हों, विचार भले ही पृथक् पृथक् हों - पर, है यह एक अखण्ड परिवार। सब प्रकार के मतभेदों से ऊपर उठकर - एक होकर जीने का मार्ग हमने खोज लिया है।
अपने-पराये के भेद को भूलकर उदारचरित बन कर वसुधा को कुटुम्ब बनाकर जीने का अभ्यास भी हमने किया है -
अयं निजः परो बेति गुणना लघुचेतसाम् ।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ।।
(मनुस्मृति)
धर्मप्राण भारत ने याज्ञवल्क्य के इस कथन को माना है - 
अयं तु परमो धर्मः यद् योगेन आत्मदर्शनम् ।
(याज्ञवल्क्य स्मृति)
सब प्राणियों में, कण-कण में आत्म-साक्षात्कार करने की विधि हमने खोज ली है। हम सृष्टि संवत् 1974927118 को स्मरण करते रहते हैं। सब वेद से प्रसिद्ध होता है - यह भी हम जानते हैं - वेदात् सर्वं प्रसिद्ध यति। वेद ही अखिल धर्म का मूल है। इसीलिए यह वेदभूमि है।
परिवार संसार का सबसे बड़ा विष्वविद्यालय है। सबसे बड़ा चिकित्सालय है। सबसे बड़ी पाठशाला है। इसका निर्माण गृहिणी करती है - गृहिणी गृहम् उच्यते। मनुस्मृति के इस कथन का वैदिक आधार है - जायेदस्तम् - जाया इत् अस्तम् = जाया ही घर है। नारी की सुरक्षा और सम्मान परिवार में संभव है। परिवार में हर सदस्य को अपने दोषों को दूर करने की छूट होती है - परितः (नि-) वारयति स्व दोषान् यस्मिन्। परिवार नामक संस्था को सुरक्षित रखने से ही भारत राष्ट्र सुरक्षित है।



Saturday, 2 July 2016

गुरु- शिष्य परम्परा


शिक्षा यह वेदांगों में से एक है जिसे वेद- रीर की नाक कहा गया है - शिक्षा घ्राण तु वेदस्य । सामान्य रूप से शिक्षा को उच्चारण-विज्ञान कहा जा सकता है। अशुद्ध उच्चारा करने वालों को म्लेच्छकहा जाता रहा है। शुद्ध-उच्चारण करने वालों के सम्पर्क में न आने के कारण आर्य राष्ट्र की सीमा के बाहर रहने वाले लोग म्लेच्छ कहे गए।
एक और ब्द है - शीक्षा। इसका अर्थ है - व्यक्ति की सोई हुई (ज्ञान-क्ति) चेतना को देखने की प्रक्रिया - यनं ईक्षते इति शिक्षा । तैत्तिरीय उपनिद् की शिक्षावल्ली में कहा गया है - अथ शीक्षां व्याख्यास्यामः। वेद शिक्षा समाप्त होने के बाद आचार्य अपने अन्तेवासी के भीतर की क्षमता का समावर्तन-संस्कार में उल्लेख करता है।
प्रारम्भ में कहा गया है - सत्यं वद । धर्मं चर । स्वाध्यायान् मा प्रमदः । स्वाध्याय प्रवचनाभ्यां मा प्रमदितव्यम् । सत्य बोलने, धर्माचरण करने, स्वाध्याय और प्रवचन करने की क्षमता प्रत्येक व्यक्ति में समाहित होती है। इसलिए आचरण की शिक्षा देने वाला आचार्य भद्र ब्रह्मचारी को प्रमाद रहित होकर अपनी क्षमता प्रकट करने का अनुरोध करता है।
आगे आचार्य का मार्गदर्शन है - मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव, अतिथिदेवो भव । सामान्यतया पाँच देवो के संस्मरण की परम्परा है। यहाँ माता, पिता, आचार्य और अतिथि - चार देवों का नाम ही आया है। पाँचवा देवता आत्मा है - आत्मदेवो भव - स्वयं को देवता मानने वाले बनो। यह तूश्णीब्रह्म की उपासना है। गीता में कहा गया है -
उच्दरेद् आत्मनात्मानं नात्मानम् अवसादयेत् ।
माता, पिता और आचार्य तो ज्ञात देवता है। अतिथि अज्ञात देवता है - उस अनजाने को भी देवता मानने वाले बनो। साथ ही तूष्णीब्रह्म (आत्मा) को देव बनने की बात भी समझ लेनी होगी।
गुरु या शिक्षक वह होता है जो ज्ञान-विज्ञान की परम्परा को आगे बढ़ाने के लिए अपने शिष्य से पराजित होना चाहता है - शिष्याद् इच्छेत् पराजयम्। शिष्य पर अपने ज्ञान और अनुभव को थोपेगा तो इसे आधुनिक भाषा में क्या गुरुकहा जाएगा। इससे शिष्य में आत्महीनता की ग्रन्थि पैदा हो जाती है। छात्रों द्वारा आये दिन आत्महत्या करने के पीछे ऐसी ही ग्रन्थि का प्रकोप हो सकता है।

इन पंक्तियों का लेखक जब सबसे पहले अपनी कक्षा में गया तो शिष्यों को देखकर मन में सब से पहली बात याद आई - इष्टदेव मम बालक रामा । ये बालक मेरे इष्टदेव राम हैं। मैं इनको इनकी योग्यता के अनुसार गढूंगा। वेद के ब्रह्मचारी सूक्त के अनुसार जब गुरु के पास शिष्य आता है तो वह तीन दिन उसे अपने गर्भ में रखता है। शीक्षा की तरह दूसरा ब्द है - परीक्षा - परितः ईक्षा। तीन दिन पास रखकर - अन्तेवासी बना लिया जाता था। तब विद्यारम्भ या वेदारम्भ संस्कार किया जाता था।
शिक्षार्थी के समक्ष ध्येय होता था - आत्मानं विद्धि अर्थात् स्वयं को पहचानो। उपनिद् के अनुसार- आत्मा वा अरे श्रोतव्यः मन्तव्यः निदिध्यासितव्यः । आत्मा को सुनो, उस पर मनन करे और अन्त में उसका ध्यान किया जाय।
समावर्तन उपदे में आचार्य यह कहना भी नहीं भूला - यानि अस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि । अर्थात् जो हमारे सुचरित हों उनकी उपासना की जानी चाहिए अन्य की नहीं। अपने शिष्य की योग्यता पर इतना भरोसा हो, शिक्षा के केन्द्र में शिष्य-ब्रह्मचारी हो तो वह आत्महत्या क्यों करेगा। छात्र को आत्मविश्वासी न बनाये तो वह कैसी शिक्षा ?
आज की शिक्षा छात्र पर विष्वास नहीं करती। परीक्षा प्रणाली उसी अविश्वास की देन है। परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद छात्र पर बेरोजगारी का भूत सवार हो जाता है। भारत कृषि प्रधान दे है। उत्तम खेती, मध्यम वणिज और अधम चाकरीकी कहावत प्रसिद्ध है। उसी अधम नौकरी के लिए युवक भागे फिर रहे हैं।
स्वर्गीय ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने कहा था कि शिक्षा ऐसे छात्रों को तैयार करें जो नौकरी खोजने वाले नहीं, नौकरी देने वाले हों। शिक्षक का पहला काम है वह छात्र की योग्यता को परख कर उसके भीतर की क्षमताओं को प्रकट करे। उसकी मानवीय संवेदनाओं को जगाकर उसे मनुष्य - सम्पूर्ण मनुष्य बनाये। आत्मविश्वास अपने आप पैदा हो जाएगा।
शिष्य केन्द्रित शिक्षा में आचार्य यह भी कहने में संकोच नहीं करता कि यदि किसी समय किसी कर्म के विय में सन्देह (विचिकित्सा) हो तो वही अपने आसपास जो सज्जन, सुशिक्षित, स्वहित स्वभाव का और रुचि सम्पन्न व्यक्ति मिले उससे सहायता लेकर काम साध लेना चाहिए। परिवार में ही ऐसे व्यक्ति मिल जाते हैं।
विद्यार्थी को कठोर परिश्रम करने का अभ्यासी होना चाहिए -
नास्ति सुखार्थिनः विद्या विद्यार्थिनः कुतः सुखम् ।
सुखार्थी का त्यजेद् विद्या विद्यार्थी वात्यजेत् सुखम् ।।
विद्यार्थी साधक को ब्रह्मचारी कहा जाता है - ब्रह्म चर्य का पालन करने वाला। ब्रह्मवृंह धातु से बना हुआ ब्द है। इसका अर्थ है - विकासशील या प्रगतिशील आचरण। ब्रह्मचर्य पालन करने वाले के जीवन में हताशा  या निराशा का कोई स्थान नहीं होता।
वेदोक्ति है - उद्-यानं ते नावयानम् अर्थात् तुझे तो ऊपर की ओर जाना है, उन्नति या उत्थान ही करना है - नीचे की ओर नहीं जाना है। जो उन्नतिकामी बनेगा उसमें किसी भी काम को करने की क्षमता तो पैदा हो ही जाएगी।
तुलसी ने कहा -
गुरुगृह गये बहुरि रघुराई । अल्पकाल विद्या सब पाई ।
साधक गुरु अपनी क्ति की स्थापना शिष्य में कर देता है ।
किंकर्तव्यविमूढ़ अर्जुन अपनी समस्या के समाधान के लिए श्रीकृष्ण से कहते हैं -
कार्यण्यदोशोऽपहतस्वभाव पृच्छामित्वां धर्मसम्मूढ़चेता ।
यच्छे्रयतः निश्चितं ब्रहि तन्मे, शिष्यस्तेऽहंशाधि मां त्वां प्रपन्नम् ।।
समर्पित भाव से शिष्यत्व स्वीकार करने के उपरान्त श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सम्बोधित-प्रबोधित किया। अर्जुन समझ गया। बोला -
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादात् जनार्दनः ।
श्रीकृष्ण के अनुसार कर्म कुलता का नाम योग है - योगः कर्मसु कौलम्। शिक्षक द्वारा शिक्षा देने की इस प्रक्रिया का अन्त हुआ -
यत्र योगेश्वरः कृष्ण यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीः विजयो भूतिः ध्रुवं नीतिर्मतिर् मम् ।।
कौत्स ने गुरु से चैदह विद्याएं पढ़ी। गुरु दक्षिणा में चैदह कोटि स्वर्ण देने के लिए राजा रघु के पास कौत्स गया। रघु ने देवकोशाध्यक्ष के ऊपर चढ़ाई करने की योजना बनाई। धन गुरु को दिया गया। गुरु ने राजा को जनहित में उपयोग के लिए समस्त स्वर्ण सौंप दिया। शिक्षा अभावों से जूझने की क्षमता प्रदान करती है।
शिक्षक का काम है शिष्य को उसकी योग्यता और क्षमता से परिचित करा देना। शिष्य का काम है - प्राप्त विद्या का सही दिशा में विनियोजन करना। लोग कहते हैं - पढ्यौ तो है गुण्यो कोई न ऽ। प्राप्त विद्या का जीवन में समयानुसार विनियोजन करना ही गुण है जिसे क्षमतावान् शिक्षक सिखाता है।

Thursday, 2 June 2016

योगभूमि भारत

योग दिवस पर देशभर में सभी विद्यालयों में विशेष कार्यक्रम रखे जाने की तैयारी हो रही है। सरकार स्वयं रुचि ले रह है। योग सम्पूर्ण जीवन दर्शन है। इसलिए एक दिन योग के लिए देने से काम चलने वाला नहीं है। प्रत्येक दिन योग साधना के लिए समर्पित होना चाहिए। सरकार की रुचि को देख कर नागरिकों को भी अपने स्तर पर प्रयत्नशील होना चाहिए।

भारत यज्ञभूमि है - योगभूमि है। योग को श्रीकृष्ण ने कर्म कौशल कहा है - योगः कर्मसु कौशलम्। भारत कर्मभूमि योगनिष्ठा के कारण ही कहलाता है। योग शरीर साधना भी है, प्राण साधना भी और मनः साधना भी। इनकी एकीभूत चेतना बुद्धि में होकर आत्मा से जुड़ती है,  इसलिए योग आत्म-साधना है।
भारत अध्यात्मनिष्ठ राष्ट्र है। अधिगत आत्मनिष्ठ होना योग द्वारा ही संभव है। योग की एकनिष्ठ चेतना ही अन्तः की चित्तवृत्तियों का निरोध है जिसका पतंजलि ने अपने योग दर्शन में उल्लेख किया है - योगनिष्चत्त वृद्धि निरोधः।

महर्शि याज्ञवल्क्य ने अपने स्मृति ग्रन्थ में कहा है -

अयं तु परमो धर्मः यद् योगेनात्मदर्शनम् ।


योग पूर्वक जन-जन में ही नहीं, कण-कण में आत्म दर्शन करना योग द्वारा ही संभव है। वेद में कहा गया था - शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः अर्थात् विश्व के अमृत पुत्रो ! सुनो - इस कथन को योग दर्शन ही सार्थक करता है। मनुर्भव जनय दैव्यं जनम् - मनु बनकर अपने भीतर दिव्य जन को जन्म देना योग से ही संभव है।

योग से विश्व-ऐक्य संभव है। व्यक्ति अपने-पराये का भेद त्याग कर,  उदारचरित बन कर वसुधैव कुटुम्बकम् को अनुभूति का विषय बना सकता है।

अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् ।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ।।


परिवार में योग की साधना अधिक फलीभूत होती है। परिवार संसार का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय है, सबसे बड़ा चिकित्सालय है, सबसे बड़ी संस्कार प्रशिक्षण शाला है। उसमें सभी सदस्यों को अपने दोशों को दूर भगाने का खुला अवसर मिलता है।

युजिर् धातु से बनने वाले सहयोग, संयोग, वियोग, आयोग, नियोग, प्रयोजन, नियोजन आदि का सम्बन्ध परिवारिक जीवन के साथ ही होता है।


Wednesday, 4 May 2016

भौम ब्रह्म के उपासक - मंत्रद्रष्टा

जिनका मनन किया जाता है उनको मंत्र कहा जाता है। ऋषि मंत्रद्रष्टा होते हैं। वेद मानवता का संविधान है। उसमें मंत्रद्रष्टा ऋषियों के मंत्र संकलित हैं। ऋग्वेद अर्चना का वेद है। यजुर्वेद कर्म प्रेरणा का वेद है। सामवेद संगीत का वेद है। अथर्ववेद रसवेद है। रस जीवनानन्द है। उसे जीवन का वेद कहा जा सकता है।

वेद को अपौषेय माना जाता है। इसलिए यास्क ने ऋषियों को मंत्रद्रष्टा ही माना है - ऋषय मंत्रद्रष्टारः। मंत्रों का रचयिता नहीं माना। मंत्र एक अक्षर का भी हो सकता है। कहा गया है कि कोई भी अक्षर अमंत्र नहीं होता।

वेद में जितने भी मंत्र हैं वे सब मंत्रद्रष्टा ऋषियों की जीवन दृष्टियाँ हैं जिनको अपना कर व्यक्ति श्रेष्ठ मनुष्य बन सकता है। व्यक्ति उसे कहा जाता है जिसमें अभिव्यक्त या प्रकट होने की क्षमता विद्यमान हो। ऐसी क्षमता सब में होती है। कोई उनको प्रकाशित कर पाता है तो कोई नहीं भी कर सकता।

यास्क ने कहा है कि एक शब्द भी अच्छी तरह जान लिया जाय उसे सम्यक् रूप से प्रयुक्त किया जाय तो वह स्वर्ग और लोक में कामधेनु हो जाता है - एकोऽपि शब्दः सम्यक् ज्ञातः सुप्रयुक्तः स्वर्गे लोके च कामधेनु भवति ।

शतर्ची ऋषियों ने अपनी-अपनी दृष्टि से व्यक्ति को मनुष्य बनने की विधि प्रदर्शित की है। एक शतर्ची ऋषि कश्यप है जिनका एक ही मंत्र है। सौ सुनार की - एक लुहार की। कहावत ऐसी ही स्थिति की संकेतक लगती है। ऐसे ही दीर्घ तथा ऋषि दृष्ट मंत्र पौने तीन सौ से अधिक है।

वेद के अध्येता जानते हैं कि कई मंत्रों के मंत्रद्रष्टा एक से अधिक है। क्यों \ विचार तो सारे वेद से ही प्रमाणित होते है - वेदात् सर्व प्रसिद्धयति। एक विचार को पुष्ट करने वाले तो अनेक हो सकते हैं।

वेद अखिल धर्म के मूल है - वेदाऽखिलो धर्ममूलम्। उस धर्म का समर्थन तो सारा समाज करता है] राष्ट्र करता है और विश्व करता है। वेद ने सूत्र दिया उसका समर्थन ^दशकं धर्म लक्षणम्* कह कर मनु ने किया।

वेद ने कहा - जायेदस्तम् त्र जाया इत् अस्तम्। अर्थात् जाया ही घर है। मनु ने समर्थन किया - मृहिणी मृहम् उच्यते । आगे यह भी कह दिया - यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता । इसी तरह मंत्रद्रष्टाओं के विचारों का समर्थन परवर्ती में होता रहा। समर्थक भी मंत्रद्रष्टा कहलाये। भारत की सनातन मान्यता है - स्वातंत्र्यं परम सुखम् । अर्थात् स्वतंत्रता ही परम सुख है। उससे बढ़कर कोई सुख नहीं होता। पराधीनता से बढ़कर कोई दुःख नहीं है। अंगे्रजों ने देश को अपने अधीन कर लिया तब बालगंगाधर राव ने हुँकार भरी - ^स्वतंत्रता मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है*] मैं उसे लेकर रहूँगा।

बाल गंगाधर को इस स्वतंत्रता मंत्र का द्रष्टा कहा गया। इससे स्वतंत्रता संघर्ष तीव्र हो गया। महात्मा गाँधी ने अंगरेजों से दो टूक शब्दों में कहा - क्विट इंडिया अर्थात् अंग्रेजों ! भारत छोड़ो। उनको भी मंत्रद्रष्टा माना गया। इसका प्रभाव पड़ा - अंगरेजों को भारत छोड़ कर जाना पड़ा।

वेदोद्धारक महर्षि दयानन्द ने अंगरेजी राज्य को कभी स्वीकार नहीं किया। स्वामी विवेकानन्द ने भी स्वीकार नहीं किया। घास की रोटी खाकर भी स्वाधीनता की अलख जगाने वाले महाराणा प्रताप का आदर्श इन सबके सामने था।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने लिखा - अंगरेज राज सुख साज सजे सब भारी] वै धन विदेश चलि जात यहै अति ख्वारी । पराधीनता उनको भी पसन्द नहीं थी। ये सब स्वराज्य के मंत्रद्रष्टा और पुरोधा ही कहे जाएँगे।

रानी लक्ष्मीबाई ने कहा - मैं झाँसी किसी को नहीं दूँगी। वह अंग्रेजों से लड़ी और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए उसने अपने प्राण दे दिए।

सूर्यमल मिश्रण ने कहा - 
इळा न देणी आपणी हालरियै हुलराय । 
पूत सिखावै पालणै मरण बडाई माय ।।

वे स्वाधीन चेतना के मंत्रद्रष्टा थे। स्वतंत्र चेताओं का प्रषस्ति गान करने के लिए उन्होंने वीर सतसई लिखी। एक भारतीय आत्मा माखनलाल चतुर्वेदी ने गाया -

मुझे तोड़ लेना वनमाली औ* उस पथ पर देना फेंक]
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जावै वीर अनेक ।

भौम ब्रह्म की उपासना करने वाले अनेक मंत्रद्रष्टा हुए] जिन्होंने हमारी आजादी को सुरक्षित किया।


- डा. बद्रीप्रसाद पंचोली