Wednesday, 7 September 2016

सार्थकता : केन्द्र समाचार

हमारा जीवन अर्थपूर्ण और उद्देश्यपूर्ण होना चाहिए। वह उद्देश्य है हमारी मातृभूमि की सेवा करना, राष्ट्र को सशक्त और जगदगुरु भी बनाना। हमने, माननीय एकनाथजी की जन्म शताब्दी के अवसर पर तीन दिवसीय शिविर में, इस बिन्दु पर विचार-विमर्श कर लिया है। अब हम सबको इस संदेश को हमारे संबंधित स्थानों तक ले जाना है और उस समाज को सुसंगठित बनाने के लिए कार्य करना है।
हमें अपने जीवन में, केन्द्र प्रार्थना में उल्लिखित समस्त गुणों को अपने हृदय में बिठा लेना चाहिए। आओ, हम में से प्रत्येक व्यक्ति, इसे करने का पूर्ण प्रयास करें। ताकि अगली बार जब हम मिलें, हमारी गतिविधियाँ हमारे समाज में प्रसारित हो जाएँ और स्वामीजी का संदेश वास्तविकता प्राप्त कर लेना चाहिए।

अनंतकाल से, भारत ने, त्याग और सेवा - इन दो आदर्शों को सदैव अपने सम्मुख रखा है। त्याग तभी सार्थक होता है जब वह सेवा से जुड़ा हो। हमारे प्राचीन शास्त्रों ने हमें इस श्लोक द्वारा अमरत्व का मार्ग दिखाया है ‘त्यागेन एकेन अमृतत्वम् अनुशुः’ पश्चिमी संस्कृति ने सिखाया है कि भोग महत्त्वपूर्ण है और भोग के लिए प्रत्येक वस्तु का व्यय किया जाता है। हमारी संस्कृति ने हमें सिखाया है कि, त्याग के पश्चात् ही भोग पर हमारा अधिकार होता है। एक कार्यकर्ता को, समाज की अच्छाई के लिए, अपनी ऊर्जा और अपने समय का उपयोग करने में समर्थ होना चाहिए। उसे उन गतिविधियों में अपना समय व्यर्थ नहीं गवाँना चाहिए जो निरर्थक हैं अथवा जिनमें उसकी व्यक्तिगत रुचि है। उसे समाज के प्रति एक सकारात्मक दृष्टिकोण भी विकसित करना चाहिए। उसे पूर्ण रूप से आश्वस्त होना चाहिए कि समाज धीरे-धीरे एक आदर्श समाज में विकसित हो जाएगा। समाज की नेकनामी उसे पूर्ण संतुलित रखती है और यही वास्तविक धर्म है।

प्रत्येक व्यक्ति को, अपने में, दूसरों को अच्छा बनने में सहायता देने की आदत को विकसित करना चाहिए और उनमें कोई दोष होने पर, उन पर दोषारोपण नहीं करना चाहिए। निम्नांकित विभिन्न गुणों को विकसित कर सार्थकता का उन्नयन किया जा सकता है जैसे - ईश्वर में श्रद्धा, निर्भयता, पवित्रता और सत्य, अनाशक्ति, करुणा, संतोश, सहभागिता, बुद्धिमता, कृतज्ञता, क्षमा, धैर्य, स्वीकार्यता, उत्कृटता, विनम्रता, साहस, परिवर्तन शीलता आदि।

केन्द्र के प्रत्येक कार्यकर्ता को इन सभी गुणों को साकार रूप प्रदान का प्रयास करना चाहिए। इससे उसका जीवन सार्थक बनेगा और मातृभूमि समर्थ बनेगी।


Thursday, 4 August 2016

राष्ट्र चेतना अंक


वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः
भारत की सनातन परम्परा में प्रत्येक साधक की पहली चाह होती है - जगने की, जागरूक रहने की। यजुर्वेद में इसी चाह को शब्द दिए गए हैं - हम राष्ट्र में पुरोहित बन कर जागें - वयं राष्ट्रs जागृयाम पुरोहिताः।
राष्ट्र का अर्थ होता है - प्रकाशमान्, द्युतिमान, दीप्तिमान्। श्रेष्ठ आचार और विचार से जीवन में सत्त्व गुण का उद्रेक होता है तब मनुष्य में प्रकाश प्रकट होता है। ‘सत्त्वं लघु प्रकाशकम्’ - सत्त्वगुण स्फूर्ति और प्रकाश पैदा करता है। तब व्यक्ति प्रकाश पुंज - राष्ट्र बन जाता है।
ऐसे व्यक्तियों का समूह भी राष्ट्र होता है और वे जहाँ रहते हैं वह भूखण्ड भी राष्ट्र बन जाता है। भारत-भा-रत = प्रकाश में लीन है। भारत शब्द राष्ट्र का पर्याय है। यह राष्ट्र शब्द राज-दीप्तौ धातु से बनता है। इस नाम की सार्थकता तभी है जब प्रत्येक व्यक्ति राष्ट्र बने - राजा बने। प्रत्येक माता अपने बेटे को ‘राजा बेटा’ बनाना चाहती है - बेटी को ‘रानी बेटी’ बनाता चाहती है। 
माता संस्कार दात्री होती है। इसलिए उसमें यह क्षमता होती है कि वह अपनी सन्तान को प्रकाशमान्-प्रकाशमती बना दे। इसीलिए माता महीयसी होती है। वाल्मीकि ने कहा है -
जननी जन्मभूमिष्च स्वर्गादपि गरीयसी ।
राष्ट्र संज्ञक नागरिक जब भूखण्ड को राष्ट्र संज्ञा प्रदान करते हैं तो उसके निकट से निकट होने की साध एक मंत्र में प्रकट की गई है - उप सर्प मातरम् भूमिम्। अथर्ववेद के पृथिवीसूक्त में कहा गया है - माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः - भूमि माता है और मैं पृथिवी का पुत्र हूँ। मैथिलीषरण गुप्त ने कहा था - 
हे मातृभूमि ! तू सत्य ही, सगुणमूर्ति सर्वेश की ।
भूमि की उपासना को भोंम-ब्रह्म की उपासना कहा गया है।
भारत को त्यागभूमि कहा जाता है और भोगभूमियों से उसे पृथक् माना गया है। भारतवासी त्यागपूर्वक ‘भोग त्यक्तेन भुंजीथाः’ में विश्वास करते हैं। इसके लिए दूसरा राष्ट्र शब्द है - रा-दाने धातु से बहुलार्थक = या ष्ट्रन् प्रत्यय से बना हुआ है। राज-धातु से बने हुए राष्ट्र शब्द से यह नितान्त भिन्न है - इसी कारण अर्थ भिन्न है।
ये दोनों राष्ट्र शब्द अलग-अलग अर्थ के वाचक हैं। डा. फतहसिंह का कहना है कि जिनकी रीतियाँ समान हों उस मानव-समुदाय को राष्ट्र कहा जाता है। ‘अराति’ उसे कहा जाता है जो दूसरे संगी-साथियों को उनका प्राप्य नहीं देता - न राति स अरातिः ।
भारत की भिन्न प्रकार की एक पहचान और है - वह है - जहाँ कृष्णसार - कस्तूरी मृग निद्र्वन्द्व होकर विचरते हों - कस्तूरी जैसी महंगी गन्ध को प्राप्त करने के लिए उनको मारा न जाता हो - वह भारतवर्ष है अर्थात् नितान्त निर्लोभवृत्ति के लोग जहाँ रहते हों वह है भारतवर्ष। 
विष्णु पुराण में कहा गया है कि जिसके गीत देवता भी गाते हैं और स्वर्ग-अपवर्ग से महत्त्वपूर्ण जिस भूमि में अमरत्व छोड़कर देवता भी जन्म लेने को लालायित रहते हैं - वह है भारतवर्ष।
गयन्ति देवाः किल गीतिकानि धन्योऽयं भारतभूमिः भागः।
स्वर्गापवर्गास्पद मार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषा सुरत्त्वात् ।।
वर्षं तद्भारतं ज्ञेयः भारती यस्य सन्ततिः।
मनु के अनुसार यह भारत पूर्व समुद्र (प्रशान्त महासागर) से पश्चिम सागर (भूमध्य सागर, कृष्ण सागर, लाल सागर और मृत सागर का संयुक्त रूप) तक विस्तीर्ण है। उदयाचल पर्वत (प्रशान्त महासागर का तट) से अस्ताचल तक (सिनाई प्रायद्वीप के टेरेसाँ पर्वत तक फैला हुआ है। इसी के लिए जयशंकर प्रसाद ने कहा है -
हिमालय के आँगन में जिसे प्रथम किरणों का दे उपहार,
उशा ने हँस अभिनन्दन किया और पहनाया हीरक हार ।
इस विराट् राष्ट्र में एक अखण्ड परिवार रहता है। भाशा भले ही भिन्न-भिन्न बोलते हों, धर्म-आचार-पद्धतियाँ भले ही पृथक्-पृथक् हों; अलग-अलग क्षेत्रों में भले ही बसते हों, विचार भले ही पृथक् पृथक् हों - पर, है यह एक अखण्ड परिवार। सब प्रकार के मतभेदों से ऊपर उठकर - एक होकर जीने का मार्ग हमने खोज लिया है।
अपने-पराये के भेद को भूलकर उदारचरित बन कर वसुधा को कुटुम्ब बनाकर जीने का अभ्यास भी हमने किया है -
अयं निजः परो बेति गुणना लघुचेतसाम् ।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ।।
(मनुस्मृति)
धर्मप्राण भारत ने याज्ञवल्क्य के इस कथन को माना है - 
अयं तु परमो धर्मः यद् योगेन आत्मदर्शनम् ।
(याज्ञवल्क्य स्मृति)
सब प्राणियों में, कण-कण में आत्म-साक्षात्कार करने की विधि हमने खोज ली है। हम सृष्टि संवत् 1974927118 को स्मरण करते रहते हैं। सब वेद से प्रसिद्ध होता है - यह भी हम जानते हैं - वेदात् सर्वं प्रसिद्ध यति। वेद ही अखिल धर्म का मूल है। इसीलिए यह वेदभूमि है।
परिवार संसार का सबसे बड़ा विष्वविद्यालय है। सबसे बड़ा चिकित्सालय है। सबसे बड़ी पाठशाला है। इसका निर्माण गृहिणी करती है - गृहिणी गृहम् उच्यते। मनुस्मृति के इस कथन का वैदिक आधार है - जायेदस्तम् - जाया इत् अस्तम् = जाया ही घर है। नारी की सुरक्षा और सम्मान परिवार में संभव है। परिवार में हर सदस्य को अपने दोषों को दूर करने की छूट होती है - परितः (नि-) वारयति स्व दोषान् यस्मिन्। परिवार नामक संस्था को सुरक्षित रखने से ही भारत राष्ट्र सुरक्षित है।



Saturday, 2 July 2016

गुरु- शिष्य परम्परा


शिक्षा यह वेदांगों में से एक है जिसे वेद- शरीर की नाक कहा गया है - शिक्षा घ्राण तु वेदस्य । सामान्य रूप से शिक्षा को उच्चारण-विज्ञान कहा जा सकता है। अशुद्ध उच्चारा करने वालों को ‘म्लेच्छ’ कहा जाता रहा है। शुद्ध-उच्चारण करने वालों के सम्पर्क में न आने के कारण आर्य राष्ट्र की सीमा के बाहर रहने वाले लोग म्लेच्छ कहे गए।
एक और शब्द है - शीक्षा। इसका अर्थ है - व्यक्ति की सोई हुई (ज्ञान-शक्ति) चेतना को देखने की प्रक्रिया - शयनं ईक्षते इति शिक्षा । तैत्तिरीय उपनिषद् की शिक्षावल्ली में कहा गया है - अथ शीक्षां व्याख्यास्यामः। वेद शिक्षा समाप्त होने के बाद आचार्य अपने अन्तेवासी के भीतर की क्षमता का समावर्तन-संस्कार में उल्लेख करता है।
प्रारम्भ में कहा गया है - सत्यं वद । धर्मं चर । स्वाध्यायान् मा प्रमदः । स्वाध्याय प्रवचनाभ्यां मा प्रमदितव्यम् । सत्य बोलने, धर्माचरण करने, स्वाध्याय और प्रवचन करने की क्षमता प्रत्येक व्यक्ति में समाहित होती है। इसलिए आचरण की शिक्षा देने वाला आचार्य भद्र ब्रह्मचारी को प्रमाद रहित होकर अपनी क्षमता प्रकट करने का अनुरोध करता है।
आगे आचार्य का मार्गदर्शन है - मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव, अतिथिदेवो भव । सामान्यतया पाँच देवो के संस्मरण की परम्परा है। यहाँ माता, पिता, आचार्य और अतिथि - चार देवों का नाम ही आया है। पाँचवा देवता आत्मा है - आत्मदेवो भव - स्वयं को देवता मानने वाले बनो। यह तूश्णीब्रह्म की उपासना है। गीता में कहा गया है -
उच्दरेद् आत्मनात्मानं नात्मानम् अवसादयेत् ।
माता, पिता और आचार्य तो ज्ञात देवता है। अतिथि अज्ञात देवता है - उस अनजाने को भी देवता मानने वाले बनो। साथ ही तूष्णीब्रह्म (आत्मा) को देव बनने की बात भी समझ लेनी होगी।
गुरु या शिक्षक वह होता है जो ज्ञान-विज्ञान की परम्परा को आगे बढ़ाने के लिए अपने शिष्य से पराजित होना चाहता है - शिष्याद् इच्छेत् पराजयम्। शिष्य पर अपने ज्ञान और अनुभव को थोपेगा तो इसे आधुनिक भाषा में क्या ‘गुरु’ कहा जाएगा। इससे शिष्य में आत्महीनता की ग्रन्थि पैदा हो जाती है। छात्रों द्वारा आये दिन आत्महत्या करने के पीछे ऐसी ही ग्रन्थि का प्रकोप हो सकता है।

इन पंक्तियों का लेखक जब सबसे पहले अपनी कक्षा में गया तो शिष्यों को देखकर मन में सब से पहली बात याद आई - इष्टदेव मम बालक रामा । ये बालक मेरे इष्टदेव राम हैं। मैं इनको इनकी योग्यता के अनुसार गढूंगा। वेद के ब्रह्मचारी सूक्त के अनुसार जब गुरु के पास शिष्य आता है तो वह तीन दिन उसे अपने गर्भ में रखता है। शीक्षा की तरह दूसरा शब्द है - परीक्षा - परितः ईक्षा। तीन दिन पास रखकर - अन्तेवासी बना लिया जाता था। तब विद्यारम्भ या वेदारम्भ संस्कार किया जाता था।
शिक्षार्थी के समक्ष ध्येय होता था - आत्मानं विद्धि अर्थात् स्वयं को पहचानो। उपनिषद् के अनुसार- आत्मा वा अरे श्रोतव्यः मन्तव्यः निदिध्यासितव्यः । आत्मा को सुनो, उस पर मनन करे और अन्त में उसका ध्यान किया जाय।
समावर्तन उपदेश में आचार्य यह कहना भी नहीं भूला - यानि अस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि । अर्थात् जो हमारे सुचरित हों उनकी उपासना की जानी चाहिए अन्य की नहीं। अपने शिष्य की योग्यता पर इतना भरोसा हो, शिक्षा के केन्द्र में शिष्य-ब्रह्मचारी हो तो वह आत्महत्या क्यों करेगा। छात्र को आत्मविश्वासी न बनाये तो वह कैसी शिक्षा ?
आज की शिक्षा छात्र पर विष्वास नहीं करती। परीक्षा प्रणाली उसी अविश्वास की देन है। परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद छात्र पर बेरोजगारी का भूत सवार हो जाता है। भारत कृषि प्रधान देश है। ‘उत्तम खेती, मध्यम वणिज और अधम चाकरी’ की कहावत प्रसिद्ध है। उसी अधम नौकरी के लिए युवक भागे फिर रहे हैं।
स्वर्गीय ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने कहा था कि शिक्षा ऐसे छात्रों को तैयार करें जो नौकरी खोजने वाले नहीं, नौकरी देने वाले हों। शिक्षक का पहला काम है वह छात्र की योग्यता को परख कर उसके भीतर की क्षमताओं को प्रकट करे। उसकी मानवीय संवेदनाओं को जगाकर उसे मनुष्य - सम्पूर्ण मनुष्य बनाये। आत्मविश्वास अपने आप पैदा हो जाएगा।
शिष्य केन्द्रित शिक्षा में आचार्य यह भी कहने में संकोच नहीं करता कि यदि किसी समय किसी कर्म के विषय में सन्देह (विचिकित्सा) हो तो वही अपने आसपास जो सज्जन, सुशिक्षित, स्वहित स्वभाव का और रुचि सम्पन्न व्यक्ति मिले उससे सहायता लेकर काम साध लेना चाहिए। परिवार में ही ऐसे व्यक्ति मिल जाते हैं।
विद्यार्थी को कठोर परिश्रम करने का अभ्यासी होना चाहिए -
नास्ति सुखार्थिनः विद्या विद्यार्थिनः कुतः सुखम् ।
सुखार्थी का त्यजेद् विद्या विद्यार्थी वात्यजेत् सुखम् ।।
विद्यार्थी साधक को ब्रह्मचारी कहा जाता है - ब्रह्म चर्य का पालन करने वाला। ब्रह्मवृंह धातु से बना हुआ शब्द है। इसका अर्थ है - विकासशील या प्रगतिशील आचरण। ब्रह्मचर्य पालन करने वाले के जीवन में हताशा  या निराशा का कोई स्थान नहीं होता।
वेदोक्ति है - उद्-यानं ते नावयानम् अर्थात् तुझे तो ऊपर की ओर जाना है, उन्नति या उत्थान ही करना है - नीचे की ओर नहीं जाना है। जो उन्नतिकामी बनेगा उसमें किसी भी काम को करने की क्षमता तो पैदा हो ही जाएगी।
तुलसी ने कहा -
‘गुरुगृह गये बहुरि रघुराई । अल्पकाल विद्या सब पाई ।’
साधक गुरु अपनी शक्ति की स्थापना शिष्य में कर देता है ।
किंकर्तव्यविमूढ़ अर्जुन अपनी समस्या के समाधान के लिए श्रीकृष्ण से कहते हैं -
कार्यण्यदोशोऽपहतस्वभाव पृच्छामित्वां धर्मसम्मूढ़चेता ।
यच्छे्रयतः निश्चितं ब्रहि तन्मे, शिष्यस्तेऽहंशाधि मां त्वां प्रपन्नम् ।।
समर्पित भाव से शिष्यत्व स्वीकार करने के उपरान्त श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सम्बोधित-प्रबोधित किया। अर्जुन समझ गया। बोला -
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादात् जनार्दनः ।
श्रीकृष्ण के अनुसार कर्म कुशलता का नाम योग है - योगः कर्मसु कौशलम्। शिक्षक द्वारा शिक्षा देने की इस प्रक्रिया का अन्त हुआ -
यत्र योगेश्वरः कृष्ण यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीः विजयो भूतिः ध्रुवं नीतिर्मतिर् मम् ।।
कौत्स ने गुरु से चैदह विद्याएं पढ़ी। गुरु दक्षिणा में चैदह कोटि स्वर्ण देने के लिए राजा रघु के पास कौत्स गया। रघु ने देवकोशाध्यक्ष के ऊपर चढ़ाई करने की योजना बनाई। धन गुरु को दिया गया। गुरु ने राजा को जनहित में उपयोग के लिए समस्त स्वर्ण सौंप दिया। शिक्षा अभावों से जूझने की क्षमता प्रदान करती है।
शिक्षक का काम है शिष्य को उसकी योग्यता और क्षमता से परिचित करा देना। शिष्य का काम है - प्राप्त विद्या का सही दिशा में विनियोजन करना। लोग कहते हैं - पढ्यौ तो है गुण्यो कोई न ऽ। प्राप्त विद्या का जीवन में समयानुसार विनियोजन करना ही गुण है जिसे क्षमतावान् शिक्षक सिखाता है।