Sunday, 31 December 2017

गर्वित हो तब तरुणाई

धर्मो रक्षति रक्षितः धर्म की रक्षा करने पर धर्म हमारी रक्षा करता है। धर्म की रक्षा करने का काम देश के युवा करते हैं। सौभाग्य से भारत की 61 प्रतिशत आबादी युवाओं की है। इस तरह भारत युवा देश है। 

युवा शब्द यु मिश्रणे-अपमिश्रणणे धातु से बना है] जिसका अर्थ है वह] जो जुड़ता है और अलग हो जाता है। युवा जब किसी काम को करने का दायित्व हाथ में लेता है तो सब कामों का भार एक साथ खड़ा नहीं करता। वह एक जिम्मेदारी का सामना करता है और सफलता प्राप्त करता है – attach to one, detach from every one. वह एक एक करके सभी दायित्वों को निभाता हुआ सभी में सफलता प्राप्त कर लेता है। इसलिए उसे युवा कहा जाता है। 

वैदिक राष्ट्रीय गति (यजु. २२ /२२)  में जयशील, सभासद, रधारो ही, युवा पुत्र हों यजमान के - यह कामना की गई है - जिष्णू स्थेष्टा सभयो युवा अस्य यजमानस्य वीरो जायताम्। राष्ट्र को युवा शक्ति ही चलाती है। वृद्ध मार्गदर्शन का काम करते हैं। संसद भवन के सामने लिखा है - न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः, वृद्धा न तेयेन प्रवदन्ति धर्मम्। सभा में बैठने योग्य हो वही सभ्य या सभेय होते है -          
स-भा = प्रकाश सहित। 

युवा शब्द का पर्यायवाची शब्द तरुण है] जिसका अर्थ है - तैर कर पार कर जाने वाला - संसार की सभी समस्याओं का समाधान खोज कर वह तैर कर पार कर जाता है। वेद का एक मंत्र है - 

अश्मन्वती रीयते संरबध्यम्-उत्तिष्ठत] प्रतरत सखायः। 

पथरीली नदी बह रही है। उसे पार करना बड़ा कठिन है। समारम्भ करो - उत्सव मनाओ। जितनी बड़ी चुनौती है उतने ही दृढ़ संकल्प युक्त बनना होगा। समुद्र पार करने की चुनौती मिली तो हनुमान् ने कनकभूधराकार शरीरा होकर चुनौती को स्वीकार किया था। 

जल से भरी नदी को तो कोई भी व्यक्ति पार कर सकता है तैर कर। पर] पथरीली नदी को कैसे पार किया जाय। इस कार्य को संभव बनाने के लिए कहा गया है - उठो और हे सखाओ ! पार कर जाओ। स्पष्ट है कि बड़ी समस्या को] अकेले न सुलझा सको तो कई सखा मिलकर पार कर जाओ। जिनकी इन्द्रियों के कार्यकलाप एक जैसे हों वे सखा (स-खा) कहलाते है - समानानि खानि येशां ते। 

तैरने का कार्य अकेला करे या सखाओं के साथ मिल एक साथ तरुण कहा जायगा। स्वामी विवेकानन्द ने भारत के तरुणों को जगाने के लिए कहा था - प्राण वायु का एक कण अनेक प्राणियों को जीवन दे सकता है] प्रकाश की एक किरण सर्वत्र प्रकाश भर सकती है। तुम तो प्राणमय ज्याति हो और ज्योतिर्मय प्राण - क्या नहीं कर सकते। उनका यह वाक्य मुर्दों में भी प्राण फूंक सकता है। 

भारत अध्यात्मनिनिष्ठ राष्ट्र है। युवा शक्ति को अनुशासित और संकल्पित होकर राष्ट्र के इस स्वरूप को प्रकट करना चाहिए। पौष्टिक आहार न मिलने से बच्चे बड़े कमजोर होते हैं। गरीबी-साधन विपन्नता सबसे बड़ी बीमारी है। अंकुरित धान्य और जवारे खाकर शरीर को मजबूत बनाया जा सकता है। पुरानी उक्ति है - शरीर माद्यं खलु धर्म साधनम्। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का निवास होता है। जैसा खाये अन्न वैसा होये मन। युवक हितभुक्, मितभुक् और अमृतभुक् बने। अमृतभुक् ईमानदारी की कमाई खाता है। 

परिवार में युवक को अनुशासित होने का अवसर मिलता है। यदि दुर्भाग्य से ऐसा परिवार मिलने की स्थिति न हो तो पास-पड़ोस के सात्त्विक परिवार में संपर्क बढ़ा कर स्वयं को अनुशासित कर ले। हताशा और अकर्मण्यता से बचें। सतत् उत्साह उल्लासपूर्वक जीवन जीने का अभ्यास करें। सच्चरित्र बन कर युग का मार्गदर्शन करें।

Tuesday, 5 December 2017

वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः

राष्ट्र शब्द ‘नेशन’ का समानार्थ नहीं है। हिन्दी में दो अलग-अलग अर्थों के वाचक राष्ट्र शब्द प्रचलित हैं। एक शब्द राज् धातु से बना हुआ शब्द है - राज-दीप्तौ़त्र प्रत्यय त्र अतिशय प्रकाशमान्, द्युतिमान्, दीप्तिमान। यह दीप्ति मनुष्य में पैदा होती है। वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहितः - वेद की उक्ति है - हम राष्ट्रभाव में जागरूक होकर अग्रणी बनें।

जब व्यक्ति में सच्चरित्र और विचारों में सत्त्व गुण का उद्रेक होता है तो वह दीप्तिमान् हो जाता है। उस समय उसे राश्ट्र कहा जाता है। ऐसे कई राष्ट्रसंज्ञर्क व्यक्ति जहाँ रहते हैं वह भूमि भी राष्ट्र कही जाती है। महर्षि पतंजलि ने सत्त्व गुण का लक्षण लिखा है - सत्त्वं लघु प्रकाशकम्। सात्त्विक गुण ही व्यक्ति को राष्ट्र बनाता है। यह राष्ट्र संज्ञक दीप्ति चारित्रि दीप्ति के रूप में भी पहचान बनाती है। इस सदीप्ति से सम्पन्न व्यक्ति ही इस देश के वे अग्रजन्मा होते हैं जो संसार के लोगों को अपने-अपने चरित्र की शिक्षा दिया करते हैं –

एतद्देशेप्रसूतस्य सकाशाद ग्रजन्यनः ।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्याः सर्वमानवाः ।।

(मनु स्मृति)

भारत का अर्थ है - प्रकाश में लीन - भायांरतः। जो प्रकाश में लीन होगा वह द्युतिमान् तो होगा ही।

दूसरा राष्ट्र शब्द रा-दाने धातु से ष्ट्रन् प्रत्ययपूर्वक बनता है। इसका अर्थ है - अतिशय दानशील, अतिशय त्यागषील। भारत को त्याग भूमि कहा जाता है और संसार की अन्य भूमियों को भोगभूमि। जीवन जीने की दो ही पद्धतियाँ होती हैं। पहली शैली यज्ञयोगमयी शैली है। अभी-अभी संघ प्रमुख माननीय मोहन भागवत ने कहा है कि हिन्दू जीवन शैली है। भोगमय जीवन हिन्दुत्व की पहचान नहीं है।

हिन्दू वस्तुतः हिन्धु शब्द है - हियं द्युनोति इति - जो अपने भीतर की जड़ता को दूर भगावे वह हिन्धु होता है। विप्र शब्द का अर्थ भी अपने भीतर की जड़ता को कैपा कर दूर भगाने वाला है - वेपति इति। इसी के आधार पर कहा गया है -
जन्मना जायते विप्रः संस्कार् द्विज उच्यते ।

‘ऋणं ह वै जायमानः’ उक्ति के अनुसार मानवी माता से ऋण मानव, ब्राह्मणी माता से ऋण ब्राह्मण, क्षत्रिया माता से ऋण क्षत्रिय, वैष्य माता से ऋण वैष्य और शूद्र माता से ऋण शूद्र पैदा होता है। इनमें से प्रत्येक को धन मानव, धन ब्राह्मण, धन क्षत्रिय, धन वैष्य और धन शूद्र बनना पड़ता है। इसी से ये सब धन्य होते हैं।

इसी तरह व्यक्ति प्र-ज - प्रकृष्ट जन्मा बने तो प्रजातंत्र सफल होगा। जन नया जन्म लेने में सक्षम हो तो जनतंत्र बनेगा। अवलोकनक्षम बनने पर लोकतंत्र सफल होगा और गणमान्यों से गणतंत्र सफल होता है। नागरिक कुछ भी न बनने की स्थिति में हो तो कोई भी तंत्र सफल नहीं होगा। जिम्मेदार नागरिक ही राष्ट्र बनकर राष्ट्र संज्ञा को सार्थक बनाते हैं। मातृभूमि को राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने सर्वेशर की सगुण मूर्ति कहा है।

अथर्ववेद में कहा गया है - माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः। ऋग्वेद में कहा गया है - उप सवर्प मातरं भूमिम्। भूमि की उपासना को भौम ब्रह्म की उपासना कहा गया है। भौम ब्रह्म की उपासना करने वाला राष्ट्राराधन के पुण्य का भागी बन जाता है।