Sunday, 3 September 2017

विवेक दैनंदिनी २०१८

विवेकानन्द केन्द्र हिन्दी प्रकाशन विभाग द्वारा वर्ष 2018 की हिन्दी डायरी के प्रकाशन की तैयारी हो गयी हैं |


प्रकाशन विभाग द्वारा यह प्रस्तावित हैं कि कोई सज्जन अपने जन्मदिवस/शादी की सालगिरह/पूर्वजों की पुण्य तिथि आदि के स्मरण हेतु डायरी में उस तारीख के पृष्ठ का प्रायोजन कर सकता हैं| प्रति पृष्ठ दान की राशि 500/-अभीष्ट हैं | राशि एवं आवश्यक विवरण भेजने से पूर्व सम्बंधित तिथि के लिए पृष्ठ की उपलभ्ता सुनिश्चित कर , अपना पृष्ठ प्रायोजन एवं डायरी की प्रति हेतु अमुल्य सहयोग दिनांक 20/09/2017 तक प्रदान करे |


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Monday, 7 August 2017

राष्ट्र का रक्षा कवच

वेद का वचन है - पुमान् पुमांसं परिपातु विश्वतः। मनुष्य मनुष्य की रक्षा करे सब ओर से। मनुष्य कैसे करे मनुष्य की रक्षा ? मनुष्य का धर्म मनुष्यता है - मानवता है। उस धर्म का पालन करने से मनुष्य के साथ ही सभी प्राणियों की रक्षा होगी। पुरानी परम्परागत मान्यता है - धर्मो रक्षति रक्षतिः। धर्म की रक्षा करने से वह सबकी रक्षा करता है। 

लोक में रक्षाबन्धन का त्यौहार प्रचलित है। उसमें सामान्यतः बहिनें भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बाँधती हैं। सर्वप्रथम शची पौलोगी ने अपने पति और देवों की रक्षा के लिए रक्षा सूत्र बाँधा था। प्रेरणा थी देव-गुरु बृहस्पति की। कुलगुरु यजमान के राखी बाँधता है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर शान्ति निकेतन में सभी छात्रों की कलाई में राखी बाँधते थे।

रक्षासूत्र रक्षणीय पदार्थ - राष्ट्र, वेद, धर्म, संस्कृति और भाषा की रक्षा के लिए बाँधा जाता है। श्रावणी पूर्णिमा को ऋग्वेदीय परम्परा की, हरतालिका को सामवेदीय परम्परा की, ऋषि पंचमी को यजुर्वेदीय परम्परा की और विजयादशमी को अथर्व वेदीय परम्परा की राखी होती है। वस्तुतः इन दिनों से वेदारम्भ या विद्यारंभ संस्कार होते थे।

वेदारम्भ संस्कार करते समय आचार्य प्रवेशार्थी छात्रों को रक्षा सूत्र बाँधकर उनको राष्ट्र, वेद, धर्म, संस्कृति और भाषा की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध करते थे। चारों वेदों के आचार्यों के शिक्षा सत्र इन दिनों शुरू होते थे। वैसे हर धार्मिक कार्य को करने के लिए कलाई पर व्रत धारण करने की ‘वर्णी’ बाँधी जाती है। वह भी रक्षासूत्र ही है।

1965 में युद्ध के लिए भारतीय सेना की तीन बटालियनों सीमा पर युद्ध के लिए जा रही थी उस समय राजकीय महाविद्यालय, किशनगढ़ के छात्र-छात्राओं ने रेलवे-स्टेशन पर पहुँच कर सबको राखी बाँधी और उनको फल-मिठाई खिलाई। अद्भुत दृश्य था वह ! फल-मिठाई का भुगतान संकाय सदस्यों ने किया। युद्ध प्रयाण का परम्परागत क्षण जीवित हुआ।

1971 के भारत-पाक युद्ध में पाकिस्तान के जनरल नियाजी ने 93 हजार सैनिकों के साथ आत्मसमर्पण किया। बांग्लादेश बन गया पूर्वी पाकिस्तान। कारगिल युद्ध में भी पाकिस्तान ने मुँह की खाई। यदि अब पाकिस्तान ने दुस्साहस किया तो उसके टुकड़े-टुकड़े हो जाएँगे।

भारत के पास रक्षा कवच के रूप में परिवार है। संसार का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय, चिकित्सालय, प्रशिक्षणालय और साधना केन्द्र है परिवार। उसमें प्रत्येक सदस्य को अपने दोष दूर भगाने का अवसर मिलता है। परितः वारयति स्वदोशान् यस्मिन् इति। वह किले की तरह होता है जिसका निर्माण कुलवधू करती है - जायेदस्तम् - जाया ही घर है - गृहिणी गृहम् उच्यते। चारित्रिक दृढ़ता सम्पन्न उस किले में सभी की रक्षा होती है। पारिवारिक एकता ही उसे रक्षा-सामथ्र्य प्रदान करता है।

Tuesday, 4 July 2017

प्रेरणा : शाश्वत साधना

प्रेरणा उसे मिलती है जो प्रेरणा लेना चाहे। प्रेरणा पुरुष कोई भी हो सकता है - देवता, शासक, आचारवान् कोई भी पुरुष । परम्परा कहती है - वेदात् सर्वं प्रसिद्धयति। ज्ञान विज्ञान के विस्तार का मूल वेद है। हमारे सभी ऐतिहासिक प्रेरणा पुरुषों ने भी वेद से ही प्रेरणा ली है। 

प्रेरणा के लिए प्रवचन की आवश्यकता नहीं होती। सचिवार, आचार और साचार-विचार की आवश्यकता होती है। एक बच्चा गुड़ बहुत खाता था। उसकी माता उसे लेकर ठाकुर (रामकृष्ण परमहंस) के पास गई और उनसे निवेदन किया कि बालक को गुड़ न खाने का आदेश दें। ठाकुर ने महिला को एक मास बाद आने को कहा। 

महिला एक मास बाद फिर गई। ठाकुर ने बच्चे को समझाया। वह गुड़ न खाने के लिए मान गया। महिला ने ठाकुर से पूछा - आपने इतने दिन बाद उसे गुड़ न खाने का आदेश क्यों दिया। पहले भी समझा सकते थे। ठाकुर ने कहा - पहले मैं भी गुड़ खाता था। गुड़ छोड़ कर देखा तभी तो मैं आशीवार्द देने का अधिकारी बना। 

दत्तात्रेय ने 24 गुरु बनाएं। उनसे प्रेरणा ली। प्रेरणा लेने की सहज कामना ने ही उनको यह रास्ता सुझाया। गीता में कहा गया है -
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गविहस्तिनि । 
शुनि चैव श्वयाके च पण्डिताः समदर्शिनः ।। 

समदर्शी का अर्थ यह भी होता है कि उनसे सभी से प्रेरणा लेकर जीवन को सँवारा जा सकता है। वेद ने कहा - ‘मित्रस्य चक्षुषा सर्वाणि समीक्षामहे’। मित्र की दृष्टि से हम सभी को देखें। तप का मार्ग अपनाने के लिए वेद का अतप्रतनूर न तदामो अश्नुते। न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः अर्थात् श्रम करके थके बिना देवता सुखी नहीं बनते। जैसी श्रद्धा वैसा व्यक्तित्व। 

इन्द्र इच्चरतः सखा: देवराज इन्द्र उन्हीं का सखा होता है जो साचार-विचार और सविचार आचार का मार्ग अपनाता है। केवलाद्यो भवति केवलादी अर्थात् अकेला खाने वाला केवल पाप खाता है। धर्म की कमाई को सौ व्यक्तियों के साथ मिलकर खाएँ। उद्यानं ते नावयानम् अर्थात् उन्नति करना ही धर्म है। 

स्वामी विवेकानन्द ने रामकृष्ण परमहंस से प्रेरणा लेकर संसार में भारतीय जीवन दृष्टि का तहलका मचा दिया। स्वाध्याय को मनु ने परम ज्योति कहा है। स्वाध्याय से प्रेरणा मिलती है। मनु के अनुसार स्वाध्याय करके ऋषियों की अर्चना करें। भारत त्यागभूमि है। अथर्ववेद की उक्ति है - सौ हाथ वाला होकर अर्जित कर और हजार हाथ वाला होकर उसे बाँट दे। पर, प्रेरणा लेने की उत्कट चाह हो तभी प्रेरणा ली जा सकती है। 

स्वामी दयानन्द ने तो राजदरबार की गायिका से भी प्रेरणा ली। देश की पराधीन, भूखी जनता से भी प्रेरणा ली। भूख और पराधीनता से संग्राम छेड़ दिया। प्रेरणा पुरुषों की संसार में कमी नहीं है। रूसो और वाल्टेयर के लेखों ने फ्रांस में क्रान्ति कर दी। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने वेद की दृष्टि का विश्व में डंका बजा दिया। जो प्रेरणा लेगा वह प्रेरणा दे भी सकेगा।