Tuesday, 5 December 2017

वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः

राष्ट्र शब्द ‘नेशन’ का समानार्थ नहीं है। हिन्दी में दो अलग-अलग अर्थों के वाचक राष्ट्र शब्द प्रचलित हैं। एक शब्द राज् धातु से बना हुआ शब्द है - राज-दीप्तौ़त्र प्रत्यय त्र अतिशय प्रकाशमान्, द्युतिमान्, दीप्तिमान। यह दीप्ति मनुष्य में पैदा होती है। वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहितः - वेद की उक्ति है - हम राष्ट्रभाव में जागरूक होकर अग्रणी बनें।

जब व्यक्ति में सच्चरित्र और विचारों में सत्त्व गुण का उद्रेक होता है तो वह दीप्तिमान् हो जाता है। उस समय उसे राश्ट्र कहा जाता है। ऐसे कई राष्ट्रसंज्ञर्क व्यक्ति जहाँ रहते हैं वह भूमि भी राष्ट्र कही जाती है। महर्षि पतंजलि ने सत्त्व गुण का लक्षण लिखा है - सत्त्वं लघु प्रकाशकम्। सात्त्विक गुण ही व्यक्ति को राष्ट्र बनाता है। यह राष्ट्र संज्ञक दीप्ति चारित्रि दीप्ति के रूप में भी पहचान बनाती है। इस सदीप्ति से सम्पन्न व्यक्ति ही इस देश के वे अग्रजन्मा होते हैं जो संसार के लोगों को अपने-अपने चरित्र की शिक्षा दिया करते हैं –

एतद्देशेप्रसूतस्य सकाशाद ग्रजन्यनः ।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्याः सर्वमानवाः ।।

(मनु स्मृति)

भारत का अर्थ है - प्रकाश में लीन - भायांरतः। जो प्रकाश में लीन होगा वह द्युतिमान् तो होगा ही।

दूसरा राष्ट्र शब्द रा-दाने धातु से ष्ट्रन् प्रत्ययपूर्वक बनता है। इसका अर्थ है - अतिशय दानशील, अतिशय त्यागषील। भारत को त्याग भूमि कहा जाता है और संसार की अन्य भूमियों को भोगभूमि। जीवन जीने की दो ही पद्धतियाँ होती हैं। पहली शैली यज्ञयोगमयी शैली है। अभी-अभी संघ प्रमुख माननीय मोहन भागवत ने कहा है कि हिन्दू जीवन शैली है। भोगमय जीवन हिन्दुत्व की पहचान नहीं है।

हिन्दू वस्तुतः हिन्धु शब्द है - हियं द्युनोति इति - जो अपने भीतर की जड़ता को दूर भगावे वह हिन्धु होता है। विप्र शब्द का अर्थ भी अपने भीतर की जड़ता को कैपा कर दूर भगाने वाला है - वेपति इति। इसी के आधार पर कहा गया है -
जन्मना जायते विप्रः संस्कार् द्विज उच्यते ।

‘ऋणं ह वै जायमानः’ उक्ति के अनुसार मानवी माता से ऋण मानव, ब्राह्मणी माता से ऋण ब्राह्मण, क्षत्रिया माता से ऋण क्षत्रिय, वैष्य माता से ऋण वैष्य और शूद्र माता से ऋण शूद्र पैदा होता है। इनमें से प्रत्येक को धन मानव, धन ब्राह्मण, धन क्षत्रिय, धन वैष्य और धन शूद्र बनना पड़ता है। इसी से ये सब धन्य होते हैं।

इसी तरह व्यक्ति प्र-ज - प्रकृष्ट जन्मा बने तो प्रजातंत्र सफल होगा। जन नया जन्म लेने में सक्षम हो तो जनतंत्र बनेगा। अवलोकनक्षम बनने पर लोकतंत्र सफल होगा और गणमान्यों से गणतंत्र सफल होता है। नागरिक कुछ भी न बनने की स्थिति में हो तो कोई भी तंत्र सफल नहीं होगा। जिम्मेदार नागरिक ही राष्ट्र बनकर राष्ट्र संज्ञा को सार्थक बनाते हैं। मातृभूमि को राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने सर्वेशर की सगुण मूर्ति कहा है।

अथर्ववेद में कहा गया है - माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः। ऋग्वेद में कहा गया है - उप सवर्प मातरं भूमिम्। भूमि की उपासना को भौम ब्रह्म की उपासना कहा गया है। भौम ब्रह्म की उपासना करने वाला राष्ट्राराधन के पुण्य का भागी बन जाता है।

Saturday, 4 November 2017

साधक, साधना और साधना मन्दिर

Kendra Bharati : November 2017
भारत धर्म प्राण और आध्यात्मनिष्ठ देश है। यहाँ केवल श्वास लेने निकालने को जीवन नहीं माना जाता। भारत ने मानव जाति को परिवार नामक संस्था दी है। परिवार संसार का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय है, सबसे बड़ा चिकित्सालय है, सबसे बड़ा प्रशिक्षणालय है और सबसे बड़ा साधना केन्द्र भी है। परिवार में सभी सदस्यों को अपनी ओर से दोष निवारण करने का अवसर मिलता है। परितः वारयति स्वदोषान् यस्मिन् इति।
 
परिवार में साधनामय जीवन जीने का खुला अवसर होता है। परिवार एक अनुशासित संस्था होती है। इसमें अपने-पराये का भेद मिट जाता है। उदार चरितता का विकास होता है और वसुधा को कुटुम्ब मानने का शुद्ध आधार बनता है -
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् ।
उदार चरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ।।
-मनुस्मृति

वेद के अनुसार प्रत्येक जन्म लेने वाला ऋण स्वरूप होता है - ऋणं ह वै जायमानः। मानवी माता से पैदा होने वाला ऋण मानव होता है। ब्राह्मणी माता से ऋण ब्राह्मण] क्षत्रिया माता से ऋण क्षत्रिय] वैष्य माता से ऋण वैष्य और षूद्र माता से पैदा होने वाला ऋण शूद्र पैदा होता है।


इनमें से प्रत्येक को ऋण से धन बनना होता है। ऋण से धन बनने की प्रक्रिया मानव जीवन की सबसे बड़ी साधना होती है। जो ऋण से धन बनने की साधना करे उसको धन्य कहा जाता है।


मनुश्य सदा मनुश्य नहीं होता। मनुष्य बन जाने पर भी उसे पद पद पर मनुष्य होने का प्रमाण देना पड़ता है। यदि किसी ऐतिहासिक मोड़ पर] जहाँ उसे मनुष्योचित आचरण करना चाहिए] वैसा आचरण नहीं करता तो उसकी मानवी साधना अधूरी कही जायगी।


सामान्य बोलचाल में भी कहा जाता है - सिधि चाल्या साहब ! (सिद्धि के लिए जा रहे हो श्रीमन् !) वेद में कहा गया है –


मधुमन्मे आक्रमणं मधुमन्मे निक्रमणम् ।


अर्थात् मेरा घर से निकलना और घर में आना मधुमय हो। ऐसा साधना से ही संभव हो सकता है। साधना से सिद्धि मिलती है।


साधना के लिए साधन आवश्यक होते हैं( पर साधन बाहरी साधन हैं। साधना में सिद्धि पाने के लिए साध (उत्कट चाह) होना आवश्यक है। वह साध ही लक्ष्य सिद्धि करने वाला संकल्प बन जाता है। उसी को सिद्ध करके मनुष्य अपने मनुष्य होने का प्रमाण देता है।

परिवार घर होता है। वह साधना मन्दिर भी होता है। उसे वटवृक्ष की तरह माना गया है। उसमें सबको प्रवेश करने का अधिकार होता है। उसी में साधना करके मनुष्य पूर्ण मनुष्य बनता है।

Saturday, 7 October 2017

भगिनी के समर्पित जीवन को नमन

Kendra Bharati : October 2017
ग्वालियर में भगिनी निवेदिता की आदम मूर्ति लगी है] जिस पर वाक्य लिखा है - "निवेददितात्मा विचिकीर्शतोऽहम्" अर्थात् मैं निवेदित (समर्पित) आत्मा कुछ करने की चाह रखता हूँ। निवेदिता का जन्म आयरलैंड में हुआ। मूल नाम मार्गरेट था। स्वामी विवेकानन्द के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उन्होंने भारत में आकर पूरी तरह से समर्पित भाव से मानवता की सेवा का व्रत ले लिया।

भारत अंग्रेजों के अधीन था। भारतीय उनके अत्याचारों से संत्रस्त थे। अंग्रेजों ने भारत को बुरी तरह से लूटा। इससे सामान्य व्यक्ति दीन-हीन का जीवन जीने लगे। निराशा ने उनको बुरी तरह से तोड़ दिया। स्वामी विवेकानन्द ने भारतीयों की इस स्थिति को देखा और सभी लोगों से दीन-हीन भारतीयों की सेवा करने की अपील की।

विवेकानन्द मानते थे कि हिन्दू जीवन पद्धति सारे संसार को श्रेष्ठ जीवन जीने की प्रेरणा देने में सक्षम है। इसलिए उसकी रक्षा होनी चाहिए। भारत आध्यात्मिक देश है। आध्यात्मिक जीवन मूल्यों के आधार पर श्रेष्ठ अध्यात्मनिष्ठ व्यक्तियों का निर्माण करके भारत को विश्व के लिए प्रेरणा का विषय बनाया जा सकता है।

भारत अपनी चारित्रिक दीप्ति से विश्वगुरु था और अब भी वह वैभवशाली बनकर विश्व का नेतृत्व कर सकेगा। विवेकानन्द के अनुसार] भारत के गाँवों में ही श्रेष्ठ मानव का निर्माण हो सकता है। इसलिए उन्होंने निवेदिता को प्रेरित किया कि वह ग्रामीण भारत की सेवा करे। निवेदिता ने वैसा ही किया। हिन्दू जीवन पद्धति को समझा। उसके अनुसार जीवन जिया और अन्यों को भी प्रेरित किया।

उन्होंने हिन्दू विद्यालय की स्थापना की और लोगों को शिक्षित किया कि वे स्वयं को हिन्दू कह कर गर्व अनुभव करें। स्वयं को हताश अनुभव न करें। महामारी-बीमारी में निवेदिता ने जन-जन की बड़े अपनत्व के साथ सेवा की। उनकी हिन्दुत्व की इस मान्यता ने महामना पंडति मदनमोहन मालवीय को भी प्रभावित किया। उन्होंने 23 मार्च] 1893 को हिन्दू धर्म में दीक्षा ग्रहण की और मारग्रेट एलिजाबेथ] निवेदिता बन गई।

उनके व्याख्यान के विषय होते थे - भारतीय जीवन मूल्य और जीवन जीने की हिन्दू पद्धति। इन सबके लिए विवेकानन्द ही उनके लिए आदर्श और व्याख्याता थे। ^द मास्टर एज आई सा हिम* उनकी पुस्तक बड़े परिश्रम से लिखी गई पुस्तक है। इससे स्वामी विवेकानन्द को समझने की दृष्टि भी मिलती है। निवेदिता को भारतीयता में ढालने में विवेकानन्द के अतिरिक्त माता शारदा का भी हाथ है।

विदेशी घुसपैठिये के रूप में अंग्रेजों ने भारतीयों के जीवन में हताशा और अकर्मण्यता भर दी थी। भगिनी निवेदिता ने उसको समाप्त करके साफ-सुथरी स्वस्थ जीवन दृष्टि उजागर की। हम सब भारतीय कृतज्ञता के भाव से भगिनी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए यह कहने में कतई संकोच अनुभव नहीं करेंगे कि हमारे लिए वह श्रेष्ठ शिक्षिका थीं] जो सोचती उसे करके दिखाती थी।

'आत्मानं विद्धि' भारतीय विचार परम्परा का - सनातन विचार परम्परा का आधार सूत्र है। विदेशी शरीर में भारतीय आत्मा को हमने, उनमें प्रत्यक्ष देखा है। उन्होंने जो सोचा उसे लिखा भी है वह बहुत है। अंग्रेजी में है। सार्ध शताब्दी मानते हुए हम उसे हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में उपलब्ध करा सकें तो यह बड़ी उपलब्धि होगी। निवेदिता की देन और प्रशस्त होगी।